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क्या भारतीय मीडिया को और आजाद होना चाहिए?

Posted On: 18 Feb, 2014 Junction Forum में

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वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2014 का सर्वे बताता है कि भारत विश्व के उन देशों में है जहां मीडिया को बहुत ही कम आजादी दी गई है। कुल 180 देशों में प्रेस फ्रीडम में भारतीय मीडिया को 140वें पायदान पर रखा गया है।


प्रेस और मीडिया की आजादी पर हमेशा बहस उठती रही है। जब से सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर आदि) विंग्स के रूप में सामने आया है यह चर्चा और भी बड़ी हो गई है। अभी कुछ दिनों पहले की बात है पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया की आजादी के लिए एक दायरा निर्धारित किए जाने की जरूरत बताई। इन सबमें जहां मीडिया को अभिव्यक्ति की आजादी का नाजायज फायदा उठाने की बात दिखती है वहीं वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2014 का सर्वे बताता है कि भारत विश्व के उन देशों में है जहां मीडिया को बहुत ही कम आजादी दी गई है। कुल 180 देशों में प्रेस फ्रीडम में भारतीय मीडिया को 140वें पायदान पर रखा गया है।


बना बहस का मुद्दा

इस सर्वे के आने से एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि क्या भारतीय मीडिया को और आजादी दी जानी चाहिए?


पक्ष

मीडिया को सरकार या किसी भी तरह के दायरे से पूरी तरह स्वतंत्र रखे जाने की वकालत करने वाले लोग इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए लोकतंत्र की भलाई तथा सही दिशा में इसे चलाने के लिए और आजादी दिए जाने की वकालत करते हैं।


विपक्ष

मीडिया की पूर्ण स्वतंत्रता पर आपत्तियां जताने वाले लोग मीडिया में बढ़ते येलो जर्नलिज्म को समाज और लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह बताते हुए मीडिया पर अंकुश लगाने के पक्षधर हैं।


उपरोक्त मुद्दे के दोनों पक्षों पर गौर करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने आते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के ताजा सर्वे को भारतीय मीडिया को स्वतंत्रता दिए जाने का आधार बनाया जाना चाहिए?

2. अगर वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2014 के सर्वे की बात भी करें तो भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता न टॉप 10 में है, न निचले पायदान से टॉप 10 में है। क्या इस स्थिति को यहां की मीडिया की आदर्श स्थिति समझी जानी चाहिए जहां न वे बहुत स्वतंत्र हैं और न ही बहुत अधिक बंधे हुए?

3. क्या मीडिया के येलो जर्नलिज्म को रोकने के लिए प्रेस फ्रीडम पर अंकुश लगाना ही एकमात्र तरीका है और क्या यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए सही होगा?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


क्या भारतीय मीडिया को और आजाद होना चाहिए?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “भारतीय मीडिया की आजादी”  है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व “भारतीय मीडिया की आजादी” – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।

3. अगर आपने संबंधित विषय पर अपना कोई आलेख मंच पर प्रकाशित किया है तो उसका लिंक कमेंट के जरिए यहां इसी ब्लॉग के नीचे अवश्य प्रकाशित करें, ताकि अन्य पाठक भी आपके विचारों से रूबरू हो सकें।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार

Web Title : Indian Press In Press Freedom Index 2014



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rakeshmohan के द्वारा
March 17, 2014

मीडिया पर अंकुश हरगिज नही लगाया जाना चाहिए। हर कोई यह जानता है। लेकिन जिस को आप मीडिया मान रहे हैं क्या सिर्फ बही मीडिया है? ये तो वोह ब्योपारी हैं जो अपने किसी सगे को भी लाभ कमाने के लिए गिरवी रख दें, देश इन के लिए कौन सी बड़ी चीज है। रजत शर्मा कोई ऐसे ही तो अरबों पति नहीं बन गए, चौरसिया कोई -पंचरसिया बगैरह जिस धंधे मे हैं वहाँ सिर्फ भ्रष्ट तंत्र के निर्देश चलते हैं और छदम देश भक्ति । रहा सवाल अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का , तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार संबिधान ने सभी नागरिकों को दिया है सिर्फ इन्ही छद्म देश भक्तों को नहीं।  

ओमप्रकाश प्रजापति के द्वारा
February 25, 2014

“भारतीय मीडिया की आजादी” – Jagran Junction Forum जब से सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर आदि) विंग्स के रूप में सामने आया है यह चर्चा और भी बड़ी हो गई है! अभी कुछ दिनों पहले की बात है पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया की आजादी के लिए एक दायरा निर्धारित किए जाने की जरूरत बताई! इन सब में जहां मीडिया को अभिव्यक्ति की आजादी का नाजायज फायदा उठाने की बात दिखती है! जब मीडिया ने साथ दिया भले ही वह सोशल मीडिया ही क्यों न हो और सही खबर समाज तक पहुँचाई तो इस समाज ने सड़क पर उतर कर दामिनी बलात्कार के हत्यारों को भी सजा दिलवाई, कई बार यह सुनाने में आता है कि मीडिया को आज़ादी का दुरूपयोग हो सकता है या समाज में दंगा तक हो सकता है !जनता इतनी समझदार तो है ही कि सच और झूट में फर्क कर सके सोशल मीडिया का ही उदहारण लाइन तो इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है और पिछले कुछ सालों में सही समाचार सही समय पर पाकर जनता और अधिक जागरूक हुई है!पूरी तरह स्वतंत्र रखे जाने की वकालत करने वाले लोग इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए लोकतंत्र की भलाई तथा सही दिशा में इसे चलाने के लिए और आजादी दिए जाने की वकालत करते हैं! ओमप्रकाश प्रजापति 9910749424

deepakbijnory के द्वारा
February 20, 2014

: http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/02/20/क्या-भारतीय-मीडिया-को-और-आ/

deepakbijnory के द्वारा
February 20, 2014

मीडिया देश के चार पमुख स्तम्भों में से एक है इस स्तम्भ आज़ादी पर रोक लगाने का सीधा सीधा मलब इस स्तम्भ कमजोर करने जैसा है जिसका प्रत्यक्ष या परोक्ष असर देश कि राजनीती पर पड़ता है सर्कार और मीडिया के बीच भ्रम कि स्तिथि नहीं होने चाहिए सर्कार को मीडिया पर भरोसा होना चाहिए यदि उसका मन साफ़ है देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी देश के मीडिया कि छवि तभी बन सकती है जब कि वो आज़ाद हो इस पर मुझे एक वाकया याद आता है कि जब माननीय इंदिरा गांधी कि हत्या हुई थी तो अविश्वास कि स्तिथि में सबने बी बी सी लंदन लगाकर पक्का किया कि खबर सही है और अक्सर यही होता है जब भी कोई बड़ी घटना होती है तो असमंजस कि स्तिथि में विदेशी मीडिया पर भरोसा करना पड़ता है आज यदी हमारा मीडिया आज़ाद हो तो हमारे कर्मठ पत्रकार देश ही क्या विश्वा के किसी भी कोने की खबर सबसे पहले प्रस्तुत कर सकते हैं देश के अन्य मूल अधिकारों की ही भांति ही सही समाचार सही समय पर प्राप्त करना भी देश के नागरिक का मूल अधिकार होना चाहिए फिर उसे इस अधिकार से क्यूँ वंचित किया जाय आज जब देश भ्रष्टाचार से पीड़ित है तो समाज को मीडिया कि स्वंत्रता कि सख्त आवश्यकता है इतिहास गवाह है इस बात का जब जब मीडिया ने साथ दिया भले ही वह सोशल मीडिया ही क्यों न हो और सही खबर समाज तक पहुँचाई तो इस समाज ने सड़क पर उतर कर दामिनी बलात्कार के हत्यारों को भी सजा दिलवाई कई बार यह सुनाने में आता है कि मीडिया को आज़ादी का दुरूपयोग हो सकता है या समाज में दंगा तक हो सकता है तो मैं ये कहना चाहूंगा कि समाज में दंगे कभी भी राजनीनी के शाह के बिना सम्भव नहीं हुए हैं हर जगह दंगों में सत्ता या विपक्ष के राजनेताओं का हाथ होता है और यह स्तिथि तब तक बनी रहती है जब तक इन ख़बरों पर तथा मीडिया पर प्रतिबन्ध बना रहता है मीडिया पर बात आते ही हालात में सुधार शुरू होने लागत है मन कि मीडिया भी बिकाऊ हो सकता है मगर समाचार जनता तक तो पहुँचे बाकि जनता इतनी समझदार तो है ही कि सच और झूट में फर्क कर सके सोशल मीडिया का ही उदहारण लाइन तो इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है और पिछले कुछ सालों में सही समाचार सही समय पर पाकर जनता और अधिक जागरूक हुई है इस सोशल मीडिया में तमाम तरह कि ख़बरें आती हैं पर जनता उन ख़बरों में सही और गलत का भेद करने में सक्षम है तो क्यूँ न प्रिंट मीडिया को भी इस प्रकार की आज़ादी दी जाय जिससे जनता देश की प्रगति में और अधिक सहायक हो सके और विश्वा में भी भारतीय मीडिया अपनी एक अलग छवि के रूप में उभर कर आये


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