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राजनीति में थप्पड़वाद: आक्रोश या रणनीति?

Posted On: 3 Feb, 2014 Junction Forum में

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गत कुछ वर्षों से राजनीतिज्ञों के साथ सार्वजनिक रूप से बदसलूकी का चलन सा बन गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यक्रम में उनके और यूपीए सरकार के खिलाफ नारे लगाने को अभी हफ्ता भी नहीं गुजरा कि एक भरी भीड़ में एक युवक द्वारा हरियाणा के मुख्यमंत्री को थप्पड़ मारे जाने का वाकया सामने आ गया। इस घटना के कुछ ही समय बाद ‘आप’ पार्टी के विधायक से भी बदसलूकी की घटना सामने आ गई। इन घटनाओं में बात थप्पड़ मारने से ज्यादा आम जनता द्वारा बड़ी राजनीतिक हस्तियों के साथ बदसलूकी की है। एक लोकतांत्रिक देश में जनता का यह उग्र रवैया कई इशारे करता है।


राजनीतिक समीक्षकों का एक वर्ग ऐसा है जो ऐसे मामलों में राजनीतिक दांवपेंच होने की बात करता है। इनका मानना है कि इस तरह सरेआम राजनीतिज्ञों को थप्पड़ मारकर या किसी भी रूप में अपमानित करना लोकतंत्र का स्वभाव नहीं है। लोकतांत्रिक जनता को राजनीतिज्ञों की नीतियों से कितनी ही शिकायतें क्यों न हों लेकिन व्यवस्था की खामियां समझते हुए जनता भी इसके स्वरूप को भली प्रकार जानती है कि कोई व्यक्ति विशेष इसके लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता। अत: इसे व्यक्तिगत तौर पर लेते हुए ऐसे अभद्र व्यवहार करना भी उसके स्वभाव के विपरीत है। इस तरह जो एक संभावना ऐसे समीक्षकों की नजर में है वह यह कि किसी खास राजनीतिक मकसद से व्यक्तिगत या संपूर्ण दलगत राजनीति के तहत किसी व्यक्ति विशेष को भरमाकर या कोई खास प्रलोभन देकर ऐसे वाकए अंजाम दिए जाते हैं।


इसके ठीक उलट राजनीतिक समीक्षकों का एक वर्ग इसे लोकतांत्रिक जनता का आक्रोशित स्वरूप बताता है। इनके अनुसार लोकतांत्रिक स्वरूप की जनता अब अपने अस्तित्व के लिए सजग हो गई है और अपने ही द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा वादे पूरे न करने या प्रदेश अथवा राज्य के विकास को हाशिए पर डालने के उनके रवैये को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। ऐसे में तमाम नकारात्मक विकास या विकास की कमियों के लिए वह चुने गए प्रतिनिधियों को वादाखिलाफी के लिए सजा देना चाहती है। अत: उनके अनुसार ऐसे वाकए जनप्रतिनिधियों के प्रति उपजे जनता के आक्रोश हैं।

उपरोक्त मुद्दे के दोनों पक्षों पर गौर करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने आते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. किसी राज्य या देश का प्रतिनिधित्व कर रहा प्रतिनिधि न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि के साथ जुड़ा होता है। ऐसे में इन्हें सरेआम अपमानित करना कितना सही है?

2. क्या विकास या उससे जुड़े मुद्दों के लिए व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

3. अगर राज्य और केंद्र सरकारों की भ्रष्टाचारी नीतियों से तंग आकर जनता द्वारा इस प्रकार अपना आक्रोश दिखाया जाता है तो क्या यह लोकतंत्र में बदलाव का सूचक है?

4. क्या इस तरह के वाकयों से संबंधित राजनीतिज्ञ या पार्टी की छवि पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ता है?

जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


राजनीति में थप्पड़वाद: आक्रोश या रणनीति?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “राजनीति में थप्पड़वाद”  है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व “राजनीतिक थप्पड़वाद – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


3. अगर आपने संबंधित विषय पर अपना कोई आलेख मंच पर प्रकाशित किया है तो उसका लिंक कमेंट के जरिए यहां इसी ब्लॉग के नीचे अवश्य प्रकाशित करें, ताकि अन्य पाठक भी आपके विचारों से रूबरू हो सकें।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार

Web Title : slapping political leader vs slapping democracy



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R P Pandey के द्वारा
February 7, 2014

आक्रोशित तो सब लोग है , जो लूट रहा है वह भी और जो लुट रहा है वह भी ! लेकिन इस प्रकार का कृत्य शोहरत पाने के अलावा कुछ नहीं है / आक्रोशित तो सुभाष आजाद bhagat सिंह भी थे / अजीब बिरोधाभास है , उस समय लोग अपने को छिपाते थे और आज ?


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