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कितनी अराजक है ‘आप’ की नीति ?

Posted On: 27 Jan, 2014 Junction Forum में

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लोकलुभावन अराजकता शासन का विकल्प नहीं हो सकती। नेताओं को जनता से वही वादे करने चाहिए जो वो पूरे कर सकें – राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

पिछले कई दिनों से अपनी नीतियों, धरना-प्रदर्शनों को लेकर विवादों में चल रही दिल्ली की सरकार पर अराजक होने जैसे कई आरोप लगाए जा रहे हैं। इतना ही नहीं 65वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी अपने भाषण में ‘अराजकता’ को शासन का विकल्प मानने से इंकार किया है। प्रणब मुखर्जी के ऐसे तीखे शब्दों को सीधे तौर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कार्यप्रणाली से ही जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ लोग जहां अरविंद केजरीवाल के इस संघर्ष को एक बदलाव की नजर से देख रहे हैं वहीं बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो आम आदमी पार्टी की विचारधारा और काम करने के तरीकों को अराजकता की निशानी करार दे रहे हैं। यहां तक कि स्वयं अरविंद केजरीवाल भी खुद को सबसे बड़ा अराजकतावादी मान चुके हैं। ऐसे में यह बहस तेज हो गई है कि एक मुख्यमंत्री का अपने ही प्रशासन के खिलाफ संघर्ष किस ओर इशारा करता है।


बुद्धिजीवियों का एक वर्ग, जो परंपरागत तौर-तरीकों के इतर अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की नीतियों से संतुष्ट है, का कहना है कि आज देश को बदलाव की आवश्यकता है और यह जरूरत ऐसी है जिसे किसी भी रूप में नजरअंदाज कर आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता। मुख्यमंत्री का अपने ही राज्य की पुलिस व्यवस्था के खिलाफ धरना-प्रदर्शन यह साबित करता है कि दिल्ली की पुलिस राज्य के निर्वाचित नेताओं के प्रति जवाबदेह नहीं है और उनके अनुसार कार्य करना जरूरी नहीं समझती। इसके परिणामस्वरूप राज्य में शांति-व्यवस्था स्थापित करना एक कठिन कार्य बन चुका है। ऐसे हालातों में अरविंद केजरीवाल का यह संघर्ष प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ बदलाव तो जरूर लाएगा। इस वर्ग में शामिल लोगों का यह भी कहना है कि बड़े बदलाव लाने और प्रशासन की नींद खोलने के लिए बड़े कदम उठाने पड़ते हैं और ऐसे कदम उठाने वालों को थोड़े बहुत आरोपों का सामना करना ही पड़ता है।


वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जिनके अनुसार अरविंद केजरीवाल का प्रशासन के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करना समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अन्य राज्यों और आम जन के बीच एक गलत उदाहरण पेश कर रहे हैं। पहले ही प्रयास में इतनी बड़ी जीत हासिल कर ‘आप’ 2014 में भी एक बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है लेकिन सड़कों पर ऐसे प्रदर्शनों के कारण वह अपनी लोकप्रियता और आगामी चुनावों में मिलने वाले फायदे को गंवा सकती है। एक मुख्यमंत्री का अपनी मांग मनवाने के लिए सड़कों पर उतरना देखकर आम जनता भी अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर सकती है। ‘आप’ के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को संवैधानिक पद ग्रहण करने के बाद ऐसे प्रदर्शन या ऐसी कोई भी हरकत नहीं करनी चाहिए जिसका खामियाजा राज्य या फिर समाज को भुगतना पड़े।


उपरोक्त मुद्दे के दोनों पक्षों पर गौर करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने आते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:

1. अरविंद केजरीवाल का अपने ही राज्य की पुलिस व्यवस्था के साथ संघर्ष कितना जायज है?

2. क्या अराजकता के बल पर समाज में बदलाव लाया जा सकता है?

3. क्या अरविंद केजरीवाल की इस ‘अराजक’ नीति का खामियाजा अन्य राज्यों को भी भुगतना पड़ सकता है?

4. मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए क्रांति की आवश्यकता है, तो ऐसे में ‘आप’ की नीतियों को किस हद तक गलत करार दिया जा सकता है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:

कितनी अराजक है ‘आप’ की नीति ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक ‘आप की अराजकता’’  है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व आप की अराजकता’’  – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


3. अगर आपने संबंधित विषय पर अपना कोई आलेख मंच पर प्रकाशित किया है तो उसका लिंक कमेंट के जरिए यहां इसी ब्लॉग के नीचे अवश्य प्रकाशित करें, ताकि अन्य पाठक भी आपके विचारों से रूबरू हो सकें।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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24 प्रतिक्रिया

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Subrang के द्वारा
February 4, 2014

lage raho munna bhai

deepakbijnory के द्वारा
January 30, 2014

%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e2%80%98%e0%a4%86%e0%a4%aa%e2%80%99-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 29, 2014

मैं ही हरिश्र्चंद्रावतार

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 29, 2014

मै ही हरिश्र्चंद्रावतार अरविंन्द्र केजरीवालhttp://hcsharma.jagranjunction.com/2014/01/12/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A4%B5/

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 28, 2014

यमला पगला दीवानाा ,लक्ष्य न छोडना http://hcsharma.jagranjunction.com/2014/01/24/%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%A8/

PK SINHA के द्वारा
January 28, 2014

जागरण की भाषा भी अरविंद केजरीवाल के विरोध में ही झलकती है. निश्चित रूप के उनमें परिवर्तन की अभूतपूर्व क्षमता है. उनकी नीतियों को अराजक कहना ग़लत है. केजरीवाल की ताजपोशी तो हो गई कह दिया गया तुम राजा हो पर बिना सिपाही के लड़ाई करना पड़ेगा. सिपाही दूसरे राजा के अधीन रहेगा. नये तौर तरीके से कोई काम करना चाहता है तो उसे भी देखा जाना चाहिए. आज तक तो पुराने तरीके देखते ही आये हैं क्या पाया है यह भी देख लिया. इसलिए ऐसे निष्पक्ष और ईमानदार को पूरा सहयोग देना चाहिए. सिर्फ़ जनता को ही नहीं यह काम मीडिया को अधिक करना चाहिए. मीडिया आज अपना काम भूल कर स्वार्थी हो गई है.

    Subrang के द्वारा
    February 4, 2014

    bahut badiya mr. Sinha

MD FAIZ AHMAD के द्वारा
January 28, 2014

Jagran Junction Forum मेरे मानने से अरविन्द केजरीवाल जी को अब फुक – फुक कर अपना कदम आगे बढ़ाना चाहिए | क्यों कि दोनों बड़ी पार्टियां इनके पीछे पड़ी हुई हैं, साथ ही दिल्ली कि जनता के साथ-साथ पुरे देश कि जनता को एक आशा कि किरण नजर आई है | हाँ यह हो सकता है कि वादों को पूरा करने में वो देर कर दें पर इसका मतलब ये नहीं कि वो पूरा नहीं कर सकते हैं| जनता के पास पहले दो के अलावा कोई विकल्प नहीं था पर अब एक विकल्प और आ गया है| शायद यही कारण है कि सभी पार्टिया अपने पार्टी में साफ-सुथरे आचरण का प्रत्यासी लोगो के सामने ला रही हैं| ये बदलाव अगर आया है तो सिर्फ (आप) पार्टी के कारण| हाँ अरविन्द केजरीवाल जी को समय के अनुसार अपना कदम उठाना चाहिए| MD FAIZ AHMAD PUNE.

U C Pathak के द्वारा
January 28, 2014

1. अरविंद केजरीवाल का अपने ही राज्य की पुलिस व्यवस्था के साथ संघर्ष कितना जायज है? प्रथम दृष्टया, लगता है कि अरविंद केजरीवाल का अपने ही राज्य की पुलिस व्यवस्था के साथ संघर्ष जायज नहीं है. किन्तु मामला इतना साधारण नहीं है. प्रथम तो, यह पुलिस के विरुद्ध नहीं है. यह राज्य की पुलिस व्यवस्था के विरुद्ध है. यदि एक मुख्य मंत्री अपने राज्य में अपराधों का मूक दर्शक बने रहने के लिए मजबूर हो क्यों कि पुलिस राज्य के नियंत्रण के बाहर है, और पुलिस जिसके नियंत्रण में है वह अपराध के विरुद्ध कार्यवाई करना नहीं चाहते, तो उस मुख्य मंत्री की स्थिति दयनीय हो जाती है. एक अच्छा मुख्य मंत्री कानून की दुहाई देकर चुप बैठने के बजाय कानून में आवश्यक बदलाव की मांग करेगा ही. 2. क्या अराजकता के बल पर समाज में बदलाव लाया जा सकता है? धरना देने को अराजकता कहना ही है, तो यह जानना जरूरी है कि इस अराजकता का जिम्मेवार कौन है. यदि शासन अपना काम नहीं करता और लोगों के साथ अन्याय होता रहता है, तो यह स्थिति अपने में खुद ही अराजकता है. अगर कोई व्यक्ति किसी अपराधी के विरुद्ध शिकायत करता है और इस कारण, अपराधी उस व्यक्ति खुले आम मरवा देता है और उस अपराधी को सजा नहीं होती और जनता जानती है कि उस अपराधी को सजा इसलिए नहीं दी गई कि वह सत्ता के नजदीक था,तो जनता का खून खौलेगा और उचित ही खौलेगा. यदि जनता सड़क पर आकर धरना दे तो, जबतक वह धरना हिंसक नहीं है, जनता का कोई दोष नहीं, सिर्फ सत्ता का दोष है. 3. क्या अरविंद केजरीवाल की इस ‘अराजक’ नीति का खामियाजा अन्य राज्यों को भी भुगतना पड़ सकता है? यह अराजकता नहीं है. जो अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं उसका अच्छा ही परिणाम आयेगा. जनता जागरूक होगी. वह चुप बैठने के बजाय सड़क पर उतरेगी. अपराधी डरेंगे. वे या तो बदलेंगे या सजा भोगेंगे. इसे खामियाजा क्यों कहते हैं? अन्याय के विरुद्ध तो महाभारत लड़ना पड़ा था! 4. मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए क्रांति की आवश्यकता है, तो ऐसे में ‘आप’ की नीतियों को किस हद तक गलत करार दिया जा सकता है? क्रांति की आवश्यकता है, यह अनिवार्य है. ‘आप’ की नीतियों को किसी भी हद तक गलत नहीं करार दिया जा सकता है. अपराधी बदलें, समय रहते बदलें. नहीं तो उन्हें भयानक खामियाजा भुगतना पड़ेगा. जनता को तो ख़ुशी ही मिलेगी. जनता अभी अपराधियों के कहर का खामियाजा भुगत रही है, अगर अपराधी न बदले और जनता सड़क पर न उतरी तो वह भुगतती रहेगी. जनता और भुगतते रहने के लिए तैयार नहीं है.

sushil kumar singh के द्वारा
January 28, 2014

“Jagran Junction Forum”  आप कि राजनीती देश के लिए काफी सेहतमंद साबित हो सकती परन्तु इस का पूरा पूरा लाभ केजरीवाल जी को उठाना चैये अन्यथा ये आप कि सबसे महंगी हर साबित हो सकती . जिस सर्कार के पास अपनी फ़ोर्स न हो वो क्या करेगा किसी कि रक्षा के लिए जब पुलिस को बुलाया जाता ह तो वो केंद्र कि आज्ञां का इंतजार करती हहै हाँ एक गलती कि है कि जिस आम जनता कि लड़ाई आप लड़ कर देहली के मुख्यमंत्री बने है उसको किशी भी प्रकार का कास्ट नहीं होने देना होगा आप कहीं भी कोई आम आदमी कि आम सुबिधा को खुद ही रोकेंगे तो आम को आप क्या बिस्वाश दे सकेंगे . आप को अपनी पी पी एस कि नै भर्ती करके देहली राज्य पुलिस फ़ोर्स का गठन कारण ही आम आदमी कि रक्षा होगी

Ratnesh के द्वारा
January 28, 2014

congress ka hath aam aadmi ke saath???????????

tejas udeshi के द्वारा
January 27, 2014

Corruption,scams exposed are also a type of araajakta! Y no serious action against this practices?

Ram Lakhan के द्वारा
January 27, 2014

बिलकुल गलत बोला जा रहा देश को बदलाव की जरूरररत है 

    Subrang के द्वारा
    February 4, 2014

    bilkul sahi (Hitler) ki jaroorat hai es desh ko

Umesh Partap Vats के द्वारा
January 27, 2014

कितनी गहरी साजिश रची जा रही है इस देश को बंधक बनाने की…… क्या अमेरिका अरविंद केजरीवाल की जरूरत ठीक उसी तरह समझ रहा है, जैसी पाकिस्तान में उसे इमरान खान की थी?यह समझने के लिए अरविंद की पृष्ठभूमि को जानना होगा। कबीर, शिमिरित ली और फोर्ड के अलावा कुछ भारतीय उद्योगपति भी इस मुहिम में शामिल हैं। एक-एक कर तार जुड़ रहे हैं। भारत सहित पूरे एशिया में फोर्ड की सियासी सक्रियता को समझने की बात कही जा रही है। इसकी पहचान एक अमेरिकी संस्था की है। दक्षिण एशिया में फोर्ड की प्रमुख कविता एन. रामदास हैं। वह एडमिरल रामदास की सबसे बड़ी बेटी हैं। एडमिरल रामदास अरविंद केजरीवाल के गॉडफादर हैं। केजरीवाल के नामांकन के समय भी एडमिरल रामदास केजरीवाल के साथ थे। एडमिरल रामदास की पत्नी लीला रामदास ‘आप’ के विशाखा गाइडलाइन पर बनी कमेटी की प्रमुख बनाई गई हैं। रामदास को भी मैगसेसे पुरस्कार मिला है। यहां सवाल उठता है कि क्या एडमिरल रामदास और उनका परिवार फोर्ड के इशारे पर अरविंद केजरीवाल की मदद कर रहा है? एशिया की सियासत में फोर्ड की सक्रियता इस उदाहरण से भी समझी जा सकती है। फोर्ड फाउंडेशन के अधिकारी रहे गौहर रिजवी अब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के सलाहकार के तौर पर काम कर रहे हैं। कबीर, शिमिरित ली और फोर्ड के अलावा कुछ भारतीय उद्योगपति भी इस मुहिम में शामिल हैं। इंफोसिस के मुखिया और फोर्ड फाउंडेशन के सदस्य नारायण मूर्ति ने भी 2008-2009 में हर साल 25 लाख रुपए की आर्थिक मदद केजरीवाल की संस्था को दी थी। 2010 में जब शिमिरित कबीर से जुड़ीं तो नारायणमूर्ति ने मदद 25 लाख रुपए से बढाकर 37 लाख रुपए कर दी। यही नहीं, इंफोसिस के अधिकारी रहे बालाकृष्णन ‘आम आदमी पार्टी’ में शामिल हो गए। इनफोसिस से ही नंदन नीलेकणी भी जुड़े हैं। नीलेकणी ‘बायोमेट्रिक आधार’ परियोजना के अध्यक्ष भी हैं। आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार बनते ही ‘आधार’ को जरूरी बनाने के लिए केजरीवाल ने कदम बढ़ा दिया है। ‘आधार’ और उसके नंदन को कुछ इस तरह समझा जा सकता है। जानकारी के मुताबिक नवंबर 2013 में न्यूयार्क की कंपनी मोंगाडीबी नंदन नीलेकणी के ‘आधार’ से जुडती है। इस कंपनी को आधार के भारतीय नागरिकों का डाटाबेस तैयार करने का काम दिया गया है। मैंगाडीबी की पड़ताल से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। इस कंपनी में इन-क्यू-टेल नाम की एक संस्था का पैसा लगा है। इन-क्यू-टेल सीआईए का ही वित्तीय संगठन है। यहां अब नंदन नीलेकणी और दिल्ली चुनाव के बीच संबंध को देखने की भी जरूरत है। दिल्ली चुनाव के दौरान अमेरिका से भारत एक मिलयन फोन आए। कहा गया कि यह आम आदमी पार्टी के समर्थन में आए। लेकिन यहां कई सवाल उठते हैं। पहला सवाल, इसे भारत से जुड़े लोगों ने किए या फिर किसी अमेरिकी एजेंसी ने किए? दूसरा सवाल है दिल्ली के लोगों के इतने फोन नंबर अमेरिका में उपलब्ध कैसे हुए? यहीं नंदन नीलेकणी की भूमिका संदेह के घेरे में आती है। दरअसल नंदन नीलेकणी जिस ‘आधार’ के अध्यक्ष हैं, उसमें फोन नंबर जरूरी है। इतने ज्यादा फोन नंबर सिर्फ नंदन नीलेकणी के पास ही संभव हैं। यही कारण है कि केजरीवाल की सरकार बनने के बाद दिल्ली के लोगों से ‘आधार’ नंबर मांगे जा रहे हैं। जब अदालत ‘आधार’ को जरूरी न मानते हुए अपना फैसला सुना चुकी है तो केजरीवाल सरकार आधार नंबर क्यों मांग रही है। आखिर उसकी मजबूरी क्या है? इस मजबूरी को इंफोसिस प्रमुख और फोर्ड के रिश्ते से समझा जा सकता है।

hemant kumar के द्वारा
January 27, 2014

WO JANTA KO BHRAMIT KAR APNA ULLU SIDHA KARNA CHAHTE HAI. WO DESH KE LIYE BARE GHATAK SIDDH HONGE. AAPKO PATA HOGA , WO TOUKIR RAJA KHAN SE BHI MILE THE CHUNAW SE PAHLE.

syead abdullah के द्वारा
January 27, 2014

धरना देना लोकतन्त्र एक सशक्त हथियार है केजरीवाल ने वही अहिंसक रास्ता अपनाया है पद पाने के बाद पॉलिटिशियन इस रस्ते को त्याग देते है आज़ादी के बाद से यही होता आरहा है गांधी जी ने अंग्रेज़ो के खिलाफ जो काम किया केजरीवाल वही काम गूंगे बहरे लोकतंत्र जनता कि आवाज़ सुनाने के लिए कर रहे है .

    Umesh Partap Vats के द्वारा
    January 27, 2014

    बकवाश एकदम यह अमेरिका का एजैंट क्या गाँधीगिरी करेगा। इसके बारे में विस्तार से जानो तो सही………………………………..

    drshyamgupta के द्वारा
    January 28, 2014

    एक दम सही कहा…बधाई हो …

Jagran Junction Forum के द्वारा
January 27, 2014

अगर आपने संबंधित विषय पर अपना कोई आलेख मंच पर प्रकाशित किया है तो उसका लिंक कमेंट के जरिए यहां इसी ब्लॉग के नीचे अवश्य प्रकाशित करें, ताकि अन्य पाठक भी आपके विचारों से रूबरू हो सकें। धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

    hemant kumar के द्वारा
    January 27, 2014

    Jgran Junction Forum aap ki arajakta arving kejriwal ek behad satir aadmi hai. jo garibo ki nabj pakarna aur amiro ka manobhaw samajhata hai. wah sabdo ka jaal achchhi tarah bunta hai aur sadharan aadmi ko pata leta hai. dusri taraf wo janta ko gumrah bhi karta hai jaise ki bijli bil ka funda dekhiye , usne kaha ki bijli ka bill aadha kar denge , hua bhhi lekin 400 unit tak hi. matlab ye ekk rajnitik totka hi tha ye koi neeti nahi the bus garibo ko vote lene ka tarika tha. ab paani ke baat karte hai to 700 ltr pani mai samjht hu ki abhi 10% log hi uska faayda utha rahe honge , aur kahi 700 se 1 ltr bhi jyada hua to bill dugna dena parega, ye sav ek chalaki hi thi aur kuchh nahi , iske pichhi sirf vote ka funda tha imandari ka nahi.dusri taraf aap jante hai ki unke chhutbhaiye netao ka dansh kaise log jhel rahe hai. ek apne ko aam aadmi batata hai , kavita gata hai , baat banana janta hai 300 gariya lekar amethi me bhasan karta hai , ande ka mar khata hai. ek kanun mantri hai aur sareaam videshi larki ke ghar me ghus jata hai. ik apne lo aam aadmi kahat hi no 2 ki haisiyat rakhta hai , lal batti ka jal fekkar khud hi badi sarkari gari .li, mayour phase 2 me sandar bangla liye aur kahta tha ki hum lal batti nahi lenge, bangle nahi lenge, kejriwal khud kahta tha ki hame suraksha nahi chahiye matlab usko sabse jyada suraksha chahiye- warna ghat par z+ ki kya jarurat hai , ghar par se bhi suraksha hatwa kyo nahi deta hai, aapne dekha ki wo kaise kanoon ki dhajjiya ura diya. jab pahle se hi 144 lagu tha to wanha jakar dharna dene laga. galat savdo ka istemal kiya, gandantra ka majak ura diya puri duniya ke samne .

PRAVEEN MADAN के द्वारा
January 27, 2014

Ek nai party jisko delhi ki janja ne apna pratinidhi bana ke bheja hai.Arvind Kejriwal wohi karna chahta hai jo Rahul Gandhi karna chahta hai per Rahul sab kuch hoitey huye bhi kuch naa kar saka kuyn ki woh chahta hi nahi hai sirf bolta hai.Kejriwal delhi ki janta ki museebtain janta aur samajhta hai aur usme sab kuch theek karney ki samta bhi hai per uski rah me roorey dale ja ranhen hain unhi ki taraf se jo delji ki janta key liye yahi sab kahtain hain par kartey apni hi bhalai ka kam aur janta ko etnai saalon se dhoka dey rahain hain aur gantantra ka majak bana rahain hain.


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