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क्या लिव-इन संबंध भारतीय समाज में मान्य हो सकता है?

Posted On: 2 Dec, 2013 Junction Forum में

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पिछले कुछ महीनों में लिव-इन संबंधों को शादीशुदा स्त्री-पुरुष संबधों की तरह मान्यता देने के लिए सबसे बड़ी न्यायिक ईकाई सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कई टिप्पणियां दी हैं। कुछ महीने पहले लिव-इन संबंधों में बच्चे होने की स्थिति में इसे शादीशुदा संबंधों के समानांतर मानने की टिप्पणी के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक और टिप्पणी दी है। न्यायमूर्ति के. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता की पीठ का कहना है लिव-इन संबंध न कोई अपराध हैं, न पाप और संसद को ऐसे संबंधों को वैवाहिक संबंधों की प्रकृति में लाने के लिए कानून बनाने चाहिए दो लोगों के बीच का निहायत निजी मामला बताते हुए सुप्रीम कोर्ट बदलते वक्त के साथ लिव-इन संबंधों के बढ़ते मामलों में महिलाओं और इन संबंधों से पैदा हुए बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस पर कानून बनना जरूरी मानता है और संसद को इसे कानून के दायरे में लाने की सलाह देता है।


सुप्रीम कोर्ट की राय से सहमति रखने वाले लोगों का मानना है कि लिव इन संबंध बदलते आर्थिक-सामाजिक परिवेश की जरूरत बन चुके हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह दो लोगों के लिए न केवल आर्थिक सामंजस्य का मसला बन चुका है बल्कि यह भावनात्मक व सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान करता है। इससे सहमति रखने वाले लोगों का मानना है कि सरकार को अविलंब ऐसे संबंधों में शामिल महिलाओं तथा फलस्वरूप उत्पन्न बच्चों की हिफ़ाजत का कानून बनाना चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी पुरुष ऐसे मामलों में अपनी जिम्मेदारी से न बच सके।


इसके ठीक विपरीत सुप्रीम कोर्ट की राय से असहमति रखने वालों तथा परंपरा के समर्थकों का मानना है कि वस्तुत: सामाजिक दिशा में ऐसे संबंधों की रूपरेखा भारतीय समाज की मान्यताओं और सामाजिक धारा के खिलाफ जाती है। शादी पूर्व सेक्स-संबंध तो दूर, प्रेम संबंध भी यहां पूर्ण रूप से मान्य नहीं हैं। हमारी मान्यताओं में शादी जैसा संबंध दो लोगों का निजी मसला न होकर एक पारिवारिक और सामाजिक मामला है। यहां शादी सिर्फ दो लोगों का जुड़ाव नहीं बल्कि विवाह में दो लोगों के साथ दो परिवारों का जुड़ाव होता है। शादी के बंधन में बंधे इन दो लोगों के बनते-बिगड़ते संबंधों के साथ यह इन दो परिवारों के बनते-बिगड़ते संबंधों का मसला भी बन जाता है। इस तरह यह एक निहायती निजी मसला न रहकर एक पारिवारिक और सामाजिक मसला बन जाता है। अत: लिव-इन संबंधों को मान्यता मिलने के कारण ऐसे संबंधों के बढ़ने के साथ ही भारतीय परंपरा में विवाह-संस्था के निहित मूल्यों का ह्रास हो सकता है। यह सामाजिक रूप से अहितहारी होने के साथ ही निजी तौर भी इसमें लिप्त उन दो लोगों को भावनात्मक रूप से कमजोर ही करेगा।


उपरोक्त मुद्दे के दोनों पक्षों पर गौर करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने आते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या लिव-इन संबंध भारतीय सामाजिक दायरे में मान्य हो सकते हैं?

2. उदारीकृत आर्थिक परिवेश में लिव इन संबंध एक जरूरत बन चुका है तो क्या अब समाज के भी उदार होने का वक्त आ चुका है?

3. क्या लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता देना विवाह-संस्था के मूल्यों का अपमान नहीं होगा?

4. सुप्रीम कोर्ट कहता है कि कई देश अब लिव-इन संबंधों को मान्यता देने लगे हैं और बदलते वक्त में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए यह जरूरी है। लेकिन कानूनी मान्यता जरूरी नहीं कि सामाजिक मान्यता भी दिला दे। ऐसे में क्या कानून बनाने भर से ऐसे संबंधों में शामिल महिलाओं और इससे जुड़े बच्चों को उनके अधिकार वास्तव में प्राप्त हो जाएंगे?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


क्या लिव-इन संबंध भारतीय समाज में मान्य हो सकता है?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “लिव-इन संबंध” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व लिव-इन संबंध – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार



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7 प्रतिक्रिया

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Imam Hussain Quadri के द्वारा
December 9, 2013

ये जो भी चाहता हो जैसे भी पसंद हो मगर ये बिलकुल ही समाज और देश और धर्म सबके लिए गलत होगा इस से समाज और पवित्र रिश्तों पर बहुत ही असर पड़ेगा देश के संसद या उच्तम न्यायलय को चाहिए के सबको कानून और ऐश कि सभ्यता का सही से पालन हो अगर प्रसाशन और न्यायलय सभी अपनी ज़िम्मेदारी को ईमानदारी से निभाने लगें तो इसकी आवश्यकता खुद ही ख़त्म हो जायेगी और लोग खुद ही इस लिव इन सम्बन्ध से खुद ही नफरत करना शुरू कर देंगे क्युंके जो मज़ा दो पाक रिश्तों कि पाबन्दी में है वो इस आज़ादी में नहीं इस लिए हमारे देश कि यही खासियत है के हमारा देश सब रिश्तों को बहुत ही बखूबी अंजाम देता है और सभी को सम्मान देता है इस लिए इस परम्परा और देश कि गुणवक्ता को ख़तम करने कि कोशिश नहीं कि जाए .

Shashi Kant के द्वारा
December 7, 2013

लिव -इन सम्बन्ध आज समाज की आवशकता बन गया है। इसका मुख्य कारण भारतीय न्याय व्यवस्था और भारतीय महिला संरक्षण कानून हैं। कोई भी व्यति जो वयस्क है, उसका सपना होता है की वो विवाह करे और अपना परिवार बनाये, बच्चे पैदा करे और उनका पालन पोषण करे. समाज में एक सम्मानित नागरिक की तरह निवास करे। आखिर आज वो कौन सी परिस्थियां हैं जिनके कारण दो वयस्क स्त्री -पुरुष लिव -इन सम्बन्ध में एक छत के नीचे एक साथ जीवन व्यतीत करने को राजी हो जाते है ? कहीं न कहीं हमारा समाज हमारे TV Serials , लड़किोयो को दी गाइ आजादी, स्वछंदता इनके जिम्मेदार हैं। आज जब भी किसी नव विवाहित जोड़े के मध्य कोइ भी वैचारिक मत भेद उत्पान होता है। या कोई विवाद उत्पन्न होता है तो महिला को पुरुष के अत्याचारो से बचने के लिये भारत मैं कानून है और अधिकतर सभी महिलाएं इस कानून का बेजा इस्तमाल करती हैं और कर रही हैं न्यायपालिका कछुआ से भी धीरे है. जब इस प्रकार के विवाद अदालत मैं पहुँच जाते हैं तो दोनों पक्षो को १०-१५ वर्षों तक इन क़ानूनी पचड़ो मैं अपना जीवन और धन बर्बाद करना होता है। हिन्दू विवाह कानून एक ऐसा कानून है जो आसानी से विवाह को विछेदित करने की अनुमति नहीं देता है। इन अदालतो के चक्कर काट काट कर पीड़ित पक्ष अपने जवानी का बहुमूल्य समय और संसाधन व्यर्थ कर देता है। आज जब समाज मैं महिलाओं के उत्थान के लिये सारा समाज सरकारी तंत्र कार्यरत है महिला शशक्ति करण की बात हो रही है महिला साक्षरता की बाते बहुत ही अच्छा प्रयास है परन्तु दूसरी ओर यही साक्षर महिला छोटी छोटी पारिवारिक विवादो पर अपने घर छोड़ने की धमकी देती है लड़के काके परिवार वालो को कारागार भेजने पर आमादा हो जाती है तब महिला शाश्क्तिकरण का वीभत्स रूप देखने को मिलता है। आज की माहिला जागरूक हो गाइए है परन्तु इसका आर्थ ये नहीं है की वो अपनी दी गई आजादी का दुरूपयोग करे आज महानगरो मैं collage जाने वाली लड़किया, कार्यरत महिलाएं अपने घर से दूर होकर स्वछंद रूप से रहती हैं इनमे से कुछ अपने अकेली पन को दूर करेनी काय लिये एक साथी की तलाश करती है जो की धीरे-धीरे आकर्षण मैं परिवतित हो जाता है और फिर बिना विवाह के शारीरिक आकर्षण, विपरीत लिन्गी आकर्षण, शारीरिक सम्बन्ध मैं परिवर्तित हो जाता है। इस तथ्यों का जीता जगता उदाहरण आये दिन सामने आने वाले MMS हैं। इंटरनेट का व्यापक प्रसार और उस पर उपलब्ध वयस्क सामग्री का बिना किसी रोक टोक के मोबाइल, LAPTOP , कंप्यूटर पर उपलब्ध होना इन सम्बन्धो को प्रोत्सहित करता है। आज के युवा के लिया विवाह पूर्व सम्बन्ध बहुत बड़ी बात नहीं रह गाइ है। इन मसलों पर युवाओं का अपने घर छोड़ देना भाग कर विवाह कर लेना या लड़की द्वारा अर्जित धन पर उसके पिता की नज़र होना या उस स्त्री धन को लड़की के पिता द्वारा अपना धन समझना,विवाह में देरी का कारन है। इन सब कारणो से लड़के लड़कियां के विवाह मैं देरी होती है और जो भी आज इंटरनेट से जुड़ा है कभी न कभी अश्लील फ़िल्म या तस्वीर अवशय ही देखा होगा ये सब बाते बच्चो को शारीरिक सुख की प्राप्ति हेतु अवैध सम्बन्धों की ओर धकेलती हैं। इन्ही सब कारणो से आज भारतीए समाज मैं लाइव-इन रिलेशन का चलन प्रारम्भ हो गया है। शुरू शुरू मैं ये प्रचला महनगा मैं प्ररम्भ हुआ और अब ये धीरे धीरे छोटे शहरों गावो और कस्बो मैं भी पाँव पसारने लगा है। जब एक बार विवाद न्यायलय मैं चला जाता है तो आज कल लोग तलाक के फैसले का इन्तजार किये बिना ही किसी दूसरे के साथ रहना प्रारभ कर देते है क्यूँ की मनुष्य एक समाजीक प्राणी एवं जो भी स्त्री या पुरुष एक बार वैवाहिक जीवन में रह चुके होते हैं उनके लिए अकेले रहना एक सजा से कम नहीं होता है। एक ओर अकेलापन दुसरी ओर मानसिक परेशानी इस प्रकार के सम्बन्धों को बढ़वा देती हैं। दो दुखी व्यक्ति जब इस पाकर के सम्बन्धो मैं प्रप्रविष्ट होते हैं तो दोनों इस के परिणाम और दुषपरिणाम से भली भंति परिचित होते हैं। दोनों एक दूसरे को भवनात्मक, मानसिक शरीरिक समर्थन देते हुए एक दूसरे का साथ देते हुए जीवन निर्वाह करते हैं। अधिकतर मामलों में ऐसे लोग किसी नये जहग पर जा कर नया जीवन शुरू करते है , वे समाज को एक दूसरे का पति पत्नी बताते हैं अब यदि आज के भोतिकता वादी समयं में जहाँ पड़ोसी को पड़ोसी की खबर नहीं होती उसके पड़ोस मैं क्या हो रहा है इस बात का सरोकार किसी को नहीं होता। चाहे समाज इन सम्बन्धों को मान्यता दे या न दे इस प्रकार के सम्बन्धो में रहने वालों को समाज का डर भय नहीं होता है। जब उच्यतम न्यायलय इन सम्बन्धों को मान्यता दे चुका है और अब सरकार को इन सम्बन्धो में रहने वाली महिलाओं और बच्चो की सुरक्षा के लिया कानून बनांने की बात कह रहा तो समाज इनको मान्यता दे या न दे कोई फर्क नहीं पड़ता है इन्हे तो क़ानूनी मान्यता प्राप्त है।

Rajeev Kumar Sharma के द्वारा
December 6, 2013

जब लिव इन रिलेशन को मान्यता है….तो इसको प्रॉपर बनाये रखने मैं प्रॉब्लम क्यों है…जो रिलेशन रख रखसकने कि हिम्मत रखता है…अपने गलतियों को भी समझता है….उसे मैंने से डरता कुयों है….कयों न उस टेम्पररी रिलेशन को परमानेंट कर ले… कानून को 9 महीने किसी भी लिविंग रिलेशन के जोड़े को कानूनन शादी शुदा करार देना चाहिए…और उन्हें शादी शुदा मन लेना चाहिए. जिससे सामाजिक नियमो का भी उलंघन नहीं होगा…

MANOJ KUMAR JHA के द्वारा
December 5, 2013

सामाजिक ब्यबस्था बिखराव कि ओर!!! ठण्ड कि मौसम में राजनीती कि अलाव पर सेकता स्वार्थ कि रोटी कि कुछ टुकड़े आम आदमियों के बीच फेंक नेतावों द्वारा वैतरणी पार करने कि कोशिश। संत -फ़कीर कि चोला पहन अय्याशियों का अड्डा चलानेवाले कुकर्मी का खेल। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पर लगा कलंक कि कालिख। बलात्कारी मीडिया सदश्य द्वारा मचाया गया तहलका। इन सबों के बीच एक ऐसी खबर पर बहस जारी है जो भारतीय सामाजिक ब्यबस्था पर पहली मान्यता प्राप्त चोट होगी। और वह हथौरा ” लीव इन रिलेशन ” का होगा जिसको कानूनी ” वस्त्र ” पहनाने कि बात हो रही है। एक तरफ औरतों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ पुरे भारत वर्ष से आवाजें बुलंद हो रही है दूसरे तरफ ऐसे ” आवारा ” (जिसकी कोई मंजिल ना हो) ब्यबस्थाओं पर कानूनी मुहर लगाने कि बात किया जा रहा है जो समाज और परिवार को विखंडित करने में सक्षम है। समाज एक ऐसी संस्था है जो हमें मानवीय मूल्यों से दर्शन कराकर पूर्ण मनुष्य बनाता है इसलिए अपराधियों के लिए “असामाजिक तत्व” जैसे शब्दों का ब्यबहार करते हैं तथा परिवार सेवा , सुरक्षा , मर्यादा , सहयोग एवं रिश्तों कि पवित्रता को समझाता है। क्या यह संबंध इन मानबीय मूल्यों को समझ पायेगा ? इन सम्बन्धों से उतपन्न संतान क्या कभी भावनाओं कि मर्म को समझ पायेगा ? ” माँ -बाप ” के अलावा भी रिश्तों कि एक लम्बी कतार होती है ,क्या यह बच्चा उसमे पंक्तिबद्ध हो पायेगा ? कल “गे” और “लिस्बेनियन” भी मान्यता प्राप्त बैबाहिक बंधन में बंधने लगेगे फिर क्या होगा ! जब समाज में छुपे बलात्कारी सैतान नन्हे बच्चे -बच्चियों को नहीं बख्शता ,पवित्र रिश्तों को तार-तार कर देता है तो क्या इनके आर में इनकी दरिंदगी नहीं बढ़ जायेगी ? गे” और “लिस्बेनियन” तो प्रकृति कि देन है , इसलिए इन आवारा रिश्ता (जिस रिश्ते द्वारा वंशबृद्धि ना हो ) कि आवारगी को सलाम और स्वीकार भी परन्तु क़ानूनी मान्यता के खिलाफ हैं हम और हमारी महान संस्कृति भी। परन्तु “लिव इन रिलेशन ” तो समाज और परिवार जैसी पवित्र संस्था को एक चुनौती देनेवाली सम्बन्ध है इसलिए यह संबंध तो हरगिज स्वीकार नहीं करना चाहिए। इससे औरतों का शोषण, बच्चों कि असुरक्षा, बुजुर्गों पर जुलम , पारिवारिक मूल्यों का ह्रास और बिखरता समाज के अलावा कुछ नहीं मिल सकता।

rekha के द्वारा
December 5, 2013

समाज  की  गंदगी है .

Gurdev Singh Bedi के द्वारा
December 4, 2013

लिव इन रिलेशन एक ऐसा रिलेशन है जिस में आदमी विशष अपनी जिम्मेदार से भागता हुआ नजर आता है. बिना शादी किये साथ रहने का मतलब है कि आदमी विशेष औरत के जिस्म से खिलवाड़ तो कर सकता है लेकिन उस खिलवाड़ से उत्पन किसी भी चीज के सम्बन्ध में उस आदमी की कोई भी जिमेवारी नहीं है. लिव इन रिलेशन वाला आदमी केवल मौज मस्ती में यकीन रखता है और अपनी जिम्मेवारी से भागता है. आजकल हमारी सर्कार में भी कुछ इसी पार्कर हो रहा है यदि किसी आदमी को लिव इन रिलेशन का मजा लेना है तो उसे जिम्मेवारी भी उठानी होगी और जिम्मेवारी उठाने के वास्ते आदमी को उसके साथ आपना सम्बन्ध बनाना ही होगा यह तभी हो सकता है जब वोह आदमी अपने साथी के साथ कानूनी तौर पर रहे वर्ना लिव इन रिलेशन से तो गैर जिम्मेदार लोगों की उत्पति होगी

December 4, 2013

लिव इन रिलेशनशिप को कानूनन रोका जाये .. लिव इन रिलेशनशिप अर्थात सम्बन्ध में रहना किन्तु एक ऐसा सम्बन्ध या रिलेशनशिप जिसे जन्म देने वाले मात्र दो लोग एक नारी एक पुरुष उनके न पीछे कोई न आगे कोई जबकि भारतीय समाज एक ऐसा समाज जहाँ ये सम्बन्ध बड़ो के ,मित्रों के अपने बहुत से अपनों के सहयोग से उत्पन्न होता है ,विशेषकर नारी व् पुरुष का ये रिश्ता सामाजिक समझदारी ,पारिवारिक सहयोग के आधार पर निर्मित होता है क्योंकि यहाँ ये रिश्ता मात्र एक नारी व् पुरुष का संयोग न होकर दो परिवारों ,दो सभ्यताओं का मिलन माना जाता है . किन्तु आज ये दुर्भाग्य है भारत का कि यहाँ पाश्चात्य सभ्यता अपने पैर पसार रही है और उसी का असर है पहले ‘लव मैरिज ‘जैसी विसंगतियां यहाँ के समाज में आना और उसके बाद लिव इन रिलेशनशिप का यहाँ भी पैर पसारना , उस देश में जहाँ सीता जैसी आर्य पुत्री जो सर्व सक्षम हैं ,भूमि से ऋषि मुनियों के रक्त से उत्पन्न आर्य कन्या हैं ,तक श्री राम को अपने वर के रूप में पसंद करते हुए भी अपने पिता के प्रण को ऊपर रखती हैं और माता गौरी से कहती हैं – ”मोर मनोरथ जानहु नीके ,बसहु सदा उर पुर सबही के , कीनेउ प्रगट न कारन तेहि ,अस कही चरण गहे वैदेही .” अर्थात मेरी मनोकामना आप भली-भांति जानती हैं ,क्योंकि आप सदैव सबही के ह्रदय मंदिर में वास करती हैं ,इसी कारण मैंने उसको प्रगट नहीं किया ,ऐसा कहकर सीता ने उमा के चरण पकड़ लिए .[बालकाण्ड ] आज सीता जैसे आदर्श की कल्पना ही की जा सकती है हालाँकि सीता जैसी आदर्श हमें ढूंढने पर आज भी मिल जाएँगी किन्तु लिव इन रिलेशनशिप जैसी बुराई की आलोचना तो स्वयं ऐसी बुराई के अपनाने वालों के ही कार्यों द्वारा सरलता से की जा सकती है उसके लिए कोई सूक्ष्मदर्शी लेकर बुराई ढूंढने की ज़रुरत नहीं है और न ही सीता राम के आदर्श से इसकी तुलना के क्योंकि ये तुलना तो साफ़ साफ़ इनके आदर्श को गिराना ही कहा जायेगा क्योंकि ये तुलना तो भगवान की शैतान से और अच्छाई की बुराई से तुलना के सामान होगी जो कि सम्भव ही नहीं है . कहते हैं कि लिव इन रिलेशनशिप अपराध या पाप नहीं है किन्तु ये वास्तव में इन दोनों ही श्रेणी में आ जाता है क्योंकि ये सम्बन्ध ,यदि इसे स्थापित करने वाले स्वयं के गिरेबां में झांककर देखें तो कभी भी खुलेआम स्थापित नहीं करते और इसके दोनों सदस्य ऐसे सम्बन्ध अपने अपने घरों से बहुत अलग अलग रहकर स्थापित करते हैं .ये तो विपाशा बासु व् जॉन अब्राहम जैसी बॉलीवुड हस्तियां ही हैं जो इस सम्बन्ध को खुलेआम निभा रहे थे और उनका ये सम्बन्ध आज टूट चुका है और ये फ़िल्मी बातें ही हैं कि आज उनके सम्बन्ध कहीं और स्थापित हो रहे हैं और ये किसी कानूनी अधिकार की भी इस समबन्ध में मांग नहीं कर रहे किन्तु सामान्य नारी पुरुष के साथ यदि ऐसा हो जाये तो वे कहीं के भी नहीं रहते . सामान्य नारी पुरुष एक दुसरे के बारे में जानते नहीं कि जिससे वे जुड़ रहे हैं उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है और एक अज्ञानता भरी सामायिक प्रेम रस में डूबी ज़िंदगी गुज़ारते रहते हैं जो बाद में जीवन की असलियत देखकर जहरीली हो जाती है जब बॉलीवुड हस्ती तक इस मामले में बेवकूफ बन जाती हैं तो सामान्य की तो बात ही क्या करें हेमामालिनी जैसी अभिनेत्री तक को शादी के बाद पता चलता है कि धर्मेन्द्र शादीशुदा और सनी ,बॉबी जैसे बड़े बड़े बच्चों के बाप हैं ,जो समझौता कर वे रह रही हैं जिन कानूनी अधिकारों की अवहेलना कर वे रह ली हैं एक सामान्य नारी के वश की बात नहीं है . जिस देश में कानून द्विविवाह को अपराध मानता है ,दूसरी पत्नी की कानून की नज़र में कोई स्थिति नहीं है वहाँ सबसे छिपाकर रखे जाने वाले इस संबंध की सुरक्षा के लिए कानून की अग्रणी संस्था की चिंता व्यर्थ का कदम है जबकि इस सम्बन्ध पर पूरी तरह से रोक लगायी जानी चाहिए क्योंकि ये संबंध मात्र आकर्षण के आधार पर बनाया जाता है ,दोनों में से कोई भी इस स्थिति में नहीं होता कि एक दुसरे की स्थिति जाने ,दोनों को अपने परिवार का कोई सहयोग मिला हुआ नहीं होता और न ही कोई सामाजिक स्वीकृति ,जैसे विवाह की निश्चित तिथि होती है ,गवाह होते हैं वैसे इसका कोई प्रमाण नहीं होता इसलिए ये संबंध कभी भी हमारे समाज में विवाह से ऊपर स्थान नहीं पा सकता और कभी भी ऐसी खतरे की स्थिति में आ जाता है कि इसका खामियाजा नारी को ही भुगतना होता है या फिर ऐसे सम्बन्ध से उत्पन्न संतान को .ये सम्बन्ध हमारे समाज में क्या विकृति पैदा करेगा ये न्यायालय के निम्न आदेश में भी देखा जा सकता है – ‘लिव इन’ पर कोर्ट ने सुनाया अनोखा फैसला मध्य प्रदेश के खंडवा में एक लोक अदालत ने अनोखा फैसला सुनाया है। अदालत ने याचिकाकर्ता व्यक्ति से पत्नी और लिव इन पार्टनर के साथ एक बराबर वक्त गुजारने को कहा है। इसके तहत अदालत ने कहा कि व्यक्ति को अपनी पत्नी और लिव इन के साथ 15-15 दिन व्यतीत करना चाहिए। अप्ने आदेश में जज गंगा चरण दुबे ने शनिवार को कहा कि पत्नी, लिव इन पार्टनर समेत तीनों एक ही छत के नीचे रहें और व्यक्ति आपसी सहमति से 15-15 दिन इन दोनों के साथ समय व्यतीत करे।[अमर उजाला से साभार ] अतः इस संबंध को यदि कानून इस संबंध में बनाये जाने की कोशिश की ही जानी है तो इसे कानूनन रोका जाना चाहिए क्योंकि ये केवल नारी या उससे उत्पन्न संतान के लिए ही नही अपितु परिवार ,समाज और हमारे देश की संस्कृति के भी विरुद्ध है जो वसुधैव कुटुंबकम की शिक्षा देती है जबकि ये उसे ”एक नारी व् एक पुरुष ”के संबंध में विभक्त कर देती है . शालिनी कौशिक [कौशल ]


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