blogid : 4920 postid : 630673

जनमत को प्रभावित करता है चुनाव पूर्व सर्वेक्षण?

Posted On: 21 Oct, 2013 Junction Forum में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

आगामी महीनों में भारत के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और जीत-हार का सर्वे करवाने का दौर भी शुरू हो गया है। गत दिनों आम आदमी पार्टी ने स्वयं एक सर्वे करवाया था और कथित तौर पर उन नतीजों के अनुसार इस बार दिल्ली जैसे राज्य में ‘आप’ ही बाजी मारेगी। ऐसे ही प्रत्येक राजनीतिक दल अपने द्वारा करवाए गए सर्वे को पुख्ता करार देता है और अन्य राजनीतिक दलों की सैंपलिंग पर प्रश्न चिह्न लगाता है। इसके पीछे उनका मत यह होता है कि उनके सर्वे पूरी तरह प्रामाणिक होते हैं जबकि दूसरे दल जनता के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए ऐसे भ्रामक सर्वे करते हैं।


इस बात में कोई दोराय नहीं है कि आज की तारीख में मीडिया चैनल भी राजनीतिक दल उन्मुख रहते हैं। जिन-जिन दलों से वे संबंधित होते हैं, उन-उन दलों की ही वे वाहवाही करते हैं। ऐसे में यह एक बहस का मुद्दा बन गया है कि ‘अपना-अपना सर्वे और अपनी-अपनी सरकार’ का यह बढ़ता चलन आमजन को किस तरह प्रभावित करने वाला सिद्ध होगा।


बुद्धिजीवियों का एक वर्ग यह कहता है कि ऐसे सर्वे कर राजनीतिक दल जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता बरकरार नहीं रख पाते। अपने-अपने सर्वेक्षणों का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह होता है कि जनता खुद ही इस दुविधा में पड़ जाती है कि किसके जीतने की संभावना सबसे अधिक है और वह किसे अपना वोट दे। इस सब परेशानियों के चलते वोटर अपने मत का सही उपयोग नहीं कर पाते। इस वर्ग के लोगों का कहना है कि अपनी प्रशंसा करने के चक्कर में वह अपना नुकसान ही कर लेते हैं।


वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जिनका कहना है कि भारत की जनता को 66 वर्षों का अनुभव है और ऐसे सर्वे से वह अपना मत ना तो बदलती है और ना ही किसी तरह की दुविधा में फंसकर गलत प्रत्याशी को वोट देती है। ऐसे सर्वे सच हों या झूठ, जनता को कभी इस बात से अंतर नहीं पड़ता और ना ही किसी तरह की कोई समस्या होती है।


ऐसे हालातों में कुछ सवाल हमारे सामने उपस्थित हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. मीडिया चैनलों की सहायता से ऐसे भ्रामक सर्वे करवाकर क्या राजनीतिक दल अपनी विश्वसनीयता पर खतरा पैदा करते हैं?

2. क्या जनता ऐसे सर्वेक्षणों के नतीजों में उलझकर अपने मत का सही प्रयोग नहीं कर पाती?

3. क्या वाकई जनता इतनी समझदार है जो चुनाव के समय अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दे सके?

4. क्या चुनाव पूर्व ऐसे किसी भी तरह के सर्वेक्षण पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए?



जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


जनमत को प्रभावित करता है चुनाव पूर्व सर्वेक्षण?



आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “सर्वे का सच ” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व सर्वे का सच– Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




Tags:                   

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

4 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

s.p.singh के द्वारा
October 26, 2013

प्रिय बन्धु आपकी बात सिद्धांत रूप से सही है चुनाव पूर्व सभी पार्टियों एवं चुनाव लड़ रहे व्यक्तियों के सर्वेक्षण अवश्य होने चाहिए और सर्वेक्षणों को जनता के समक्ष प्रस्तुत भी करना चाहिए ही नहीं बल्कि चुनाव आयोग सभी अनिवार्य नियमो के साथ सर्वेक्षणों को भी अनिवार्य कर ही देना चाहिए जिससे की जनता को यह पता चले की कौन कैसा है लेकिन सर्वेक्षणों के आधार पर पार्टियों को हार जीत के दरवाजे पर लाकर खड़ा कर देना ऐसा ही है जैसे किसी को भी आरोपी बना कर बिना सजा पाए उसे जेल के दरवाजे पर खड़ा कर देना भले ही उसने अपराध किया हो या नहीं या न्यायालय से सजा मिली ही न हो फिर भी अपराधी साबित करना ? इस लिए मिडिया द्वारा किसी भी सर्वेक्षण के आधार पर चुनाव के नतीजे बताना गलत ही नहीं एक अपराधिक कुकृत्य है और इसको क़ानून बना कर तुरंत बंद करना ही श्रेयकर होगा ?

Ranjan Kumar के द्वारा
October 23, 2013

मुझे नहीं लगता. जिस चैनल का जिस राजनैतिक दल के प्रति झुकाव होता है, वे उसको विजेता घोषित कर देते हैं. भ्रम की स्थिति जरूर पैदा होती है इससे.

deepakbijnory के द्वारा
October 21, 2013

आम तौर पैर यह देखा गया है की इलेक्शन से पहले कई प्रकार के सर्वेक्षण होते रहते हैं जो मीडिया चैनलों के अपने अपने निजी झुकाव के अनुसार राजनितिक पार्टी के जीतने की भविष्यवाणी करते हैं इन सर्वेक्षणों का विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि ये सर्वे में मात्र कुछ इलाकों के बुद्धिजीवी वर्ग को शामिल करते हैं और भारत की राजनीती के इतिहास में बुद्धिजीवी वर्ग का योगदान सबसे कम रहता है वैसे भी जो मीडिया टी आर पी की भूख की खातिर एक बाबा के सपने को भी इतनी बार प्रसारित करता है की सरकार तक को वह बात सच मानकर खुदाई का आदेश देना पड़ता है सपनो को तवज्जो देने वाले इस मीडिया पर भरोसा करना कितना तर्कसंगत और प्रासंगिक है अब तो विभिन्न चैनलों में आने वाले ये सर्वेक्षण जनता के लिए मनोरंजन का प्रोग्राम बनकर रह गए हैं कुछ लोगों का मानना है की इन भ्रामक प्रचारों में पड़कर जनता उलझती है परन्तु ऐसा नहीं है लोकतंत्र में आपका वोट आपकी इच्छा के अनुसार पड़ना है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की वह पार्टी जीतती है या नहीं जनता इन दुष्प्रचारों को मनोरंजन की भांति देखती है और स्वयं में मंथन करती है वैसे भी जो पार्टी जीत रही है उसे पड़ने या न पड़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता आपको तो बस अपने वोट का प्रयोग करना है और अब तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद तो जनता के पास इनमे इ कोई नहीं का विकल्प भी आ गया है जिसको प्रयोग में लाना जनता भली भांति समझती है अब मैं बात करूँगा उस वर्ग की जो भारत की राजनीती में सबसे ज्यादा प्रभाव डालते हैं वास्तविकता में तो सर्वे में दिखाया जाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग या तो वोट डालने नहीं जाता या अपनी विद्वता के मंथन के आधार पर सही पार्टियों में बंट जाता है सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाला निम्न तथा अन्पड वर्ग आज भी धर्म गुरुओं के कहे अनुसार किसी एक पार्टी को वोट दल कर अपने लोकतंत्र के अधिकार की इतिश्री कर देता है या दूसरा बड़ा वर्ग आज भी चन्द बोतलों की या चन्द रुपयों की खातिर किसी एक पार्टी को वोट डालता है हमारे मुल्क में यही वर्ग है जो अपने मताधिकार का सबसे ज्यादा प्रयोग करता है तथा इलेक्शन को आज भी आमदनी तथा मधुशाला जाने का उचित साधन समझता है आज भी इस मुल्क में वोटिंग धर्म ,जाति, क्षेत्र व परिवारवाद के आधार पर होती है आज जब हमारे देश में सभी को विहारों की अभिव्यक्ति का अधिकार है तो इन सर्वेक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता बल्कि यह प्रोग्राम जनता एक मनोरंजक राजनितिक सीरियल की भांति अपनी जगह बना रहे हैं और इनसे राजनीती के प्रति ज्ञानवर्धन भी होता है अंत में भारत में होने वाले इलेक्शन की कटु सत्यता को दिखलाती हुई अपनी चन्द पंक्तियों के साथ इस चर्चा को समाप्त करना चाहूँगा उम्र भर मुफलिसी मेँ जो रोता ही रहा । फटेहाल वो गरीब ए हिन्दोस्तान है जनाब ॥

    dinesh pandey के द्वारा
    October 23, 2013

    मित्रो, इस देश ने कांग्रेस की पेंतरे बाजियों को वर्षो तक बड़े करीब से देखा है। इसकी धूर्तता और बेईमानी से पूरा देश त्रस्त है। अत: कांग्रेस का तो युगांत ही मानकर चलिए। जय श्रीराम।


topic of the week



latest from jagran