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आस्था के प्रदर्शन पर आत्मनियंत्रण की आवश्यकता?

Posted On: 15 Oct, 2013 Junction Forum में

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हिंदू धर्म से संबद्ध पावन पर्व ‘नवरात्रि’ के अवसर पर जहां एक ओर पूरा देश आस्था में लीन था वहीं मध्य प्रदेश के दतिया जिले के रतनगढ़ माता मंदिर में मची भगदड़ में सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवा दी। आधिकारिक तौर पर इस भगदड़ के पीछे जो कारण बताया जा रहा है उसके अनुसार पुल टूटने की अफवाह के कारण लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर दौड़ने लगे और देखते ही देखते आस्था से भरे माहौल में मातम छा गया। भक्ति पर्व के मौके पर मची यह भगदड़ कोई पहली ऐसी घटना नहीं है जब अपनी आस्था का प्रदर्शन करने पहुंचे भक्त अनहोनी का शिकार हो गए हों। अकसर यही देखा जाता है कि कभी अफवाह तो कभी पहले दर्शन करने की होड़ के चलते अपनी खुशहाली के लिए प्रार्थना करने पहुंचे लोगों का उत्साह किसी ना किसी दुर्घटना के साये में छिप जाता है। लेकिन इसे आस्था से जुड़ी विडंबना कहें या फिर नियति कि इन सब हादसों के बाद भी भक्त उसी जोशो-खरोश के साथ लाखों की संख्या में पूजास्थल पर पहुंच जाते हैं जिसके कारण फिर एक नई दुर्घटना घटित हो जाती है।


यहां सवाल आस्था या अनास्था का नहीं बल्कि आस्था के प्रदर्शन का है कि अपने आराध्य देव या देवी के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा को किस रूप में प्रदर्शित किया जाए?


बहुत से लोग हैं जिनका मानना है कि धर्म व्यक्ति का बेहद निजी मसला होता है, इसका सार्वजनिक प्रदर्शन करना सही नहीं है। प्रशासन के लचर होने जैसे हालातों के बीच विशेष मौके पर एक स्थान पर एकत्रित होना खुद ही अनहोनी को आमंत्रण देने जैसी बात है। आस्था का महत्व प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत ज्यादा है लेकिन हमें आस्था और आस्था की अतिरेकता के बीच के अंतर को कभी नहीं भूलना चाहिए।


वहीं दूसरे वर्ग में शामिल बुद्धिजीवियों का कहना कुछ और ही है। उनके अनुसार धर्म चाहे कोई भी हो आस्था और विश्वास का संबंध उससे जुड़े स्थान से होता ही है। विशेष मौके पर उस स्थान पर जाए बगैर भक्त और भगवान के बीच एक दूरी का एहसास होता है जो आस्था को अपनी मंजिल पर पहुंचने से रोकता है। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि दुर्घटनाओं के होने को नियति के साथ जरूर जोड़कर देखा जा सकता है लेकिन भक्त की भावना को आस्था का अतिरेक कहना सही नहीं है।


उपरोक्त मसले से जुड़े दोनों पक्षों पर विचार करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:

1. क्या आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन करना सही है?

2. अगर वह आस्था जान के लिए खतरा साबित हो सकती हो तो किस तरह भगवान और भक्त के बीच संबंध निर्मित किए जा सकते हैं?

3. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्थान और आस्था का गहरा नाता होता है तो ऐसे में धर्मस्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या को नियंत्रित करना कितना सही है?

4. क्या हजारों निर्दोषों की मौत का कारण बनती ऐसी घटनाओं को नियति मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


आस्था के प्रदर्शन पर आत्मनियंत्रण की आवश्यकता?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “आस्था ” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व आस्था – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार





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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shekhar suman के द्वारा
October 19, 2013

दृश्य 1 ******************** गेंदे का पौधा आज बहुत उदास था उसने गुलदावदी से कहा यार तुम्हारी खुशबू मेरी खुशबू से अच्छी है क्या ??? गुलदावदी इतराते हुये बोली, हाँ और नहीं तो क्या…. गेंदे ने बुझे मन से अपना ऑफिस बैग उठाया और दफ्तर की ओर चल पड़ा… पीछे से गुलदावदी ने आवाज़ लगाई आज दफ्तर से जल्दी आना, शाम को मंदिर जाना है… आते वक़्त रास्ते से इन्सानों के कुछ अच्छे बाल तोड़ लाना.… घने देख के ही लेना… और उनमे डैंड्रफ और जुएँ भी न हों…. शाम को लौटते वक़्त गेंदे ने देखा सभी इंसान गंजे ही हैं… “कमबख्त पूजा वाले दिन बालों की बड़ी किल्लत होती है, साले सब सुबह सुबह ही सारे बाल काट ले जाते हैं… ” बड़ी देर बाद खोजने पर एक 4-5 साल की बच्ची दिखी, गेंदे ने सोचा “यार बिना बालों के ये कितनी बेरंग दिखेगी, फिर सोचा अगर इसके बाल नहीं लिए तो आज की पूजा अधूरी रह जाएगी… फिर फटाफट उसके छोटे-छोटे बाल तोड़कर वो घर की तरफ चल पड़ा… “ये बाल चढ़ाने से पूजा ज़रूर सफल हो जाएगी…. ” दृश्य 2 ******************** लंच का समय है, कैंटीन की कुर्सियों पर बैठे बकरे, ऊंट और भैंस अपनी अपनी घास खा रहे हैं… भैंसे ने बात शुरू की, “अरे दोस्तो **** पूजा आ रही है, कैसे मनाना है, कुछ सोचा है ??? ” “सोचना क्या है…” “अरे पिछली बार जो हमने **** जाति के इन्सानों की बलि चढ़ाई थी, सब बेकार हुआ… देवी माँ खुश ही नहीं हुईं… गजब सूखा पड़ा था, साली हरी घास खाने को तरस गए थे… इस बार तो **** की ही बलि चढ़ाएँगे, मैंने पढ़ा है वो इंसान की सबसे ऊंची ब्रीड है…. इस बार माँ जरूर प्रसन्न होंगी…” बकरे ने बात आगे बढ़ाई, “यार इस बार तो अपने त्योहार पर हमने करीब 10000 हाई ब्रीड इन्सानों को इकट्ठा करके बांध रखा है… ” “वाह, क्या बात है…” “हाँ, इस बार **** जरूर खुश होगा, जन्नत नसीब होगी हमारे बकरों को….” ऊंट के चेहरे पर गजब का तेज़ आ गया, “भाईजान, हमने भी तो 10000 गोरे इंसान मंगवाएँ हैं विदेश से, सुना है उसकी बलि देने पर सारी मिन्नतें पूरी हो जाती हैं….” “वाह इसका मतलब मरने के बाद हम सबको ही स्वर्ग मिलेगा…” ये बोलकर तीनों ठहाका लगाते हैं, और पूरा कैंटीन उनकी हंसी से गूंज पड़ता है.. लेखक की चिप्पी … ******************** क्या किसी भी धर्म में ऐसा कोई त्योहार है जिसमे धार्मिक कारणों से छायादार पेड़ लगाने, फूल-पत्तियों के पौधे लगाने, या फिर पशु-पंछियों को आज़ाद करने की रस्म हो ??? इंसान द्वारा किया गया कोई भी धार्मिक अनुष्ठान बिना फूलों को तोड़े हुआ पूरा नहीं होता…. कई अनुष्ठानों में अलग अलग पशुओं की बलि देने की भी प्रथा है… मैं यहाँ किसी धर्म विशेष को उचित या अनुचित ठहराने के लिए नहीं आया, बस सवाल इतना सा है कि उस ऊपर वाले के नाम की धार्मिक गतिविधियों में हम इसे धरती का भला क्यूँ नहीं कर सकते…. धर्म की पूर्ति के लिए पर्यावरण विध्वंस क्यूँ ??? ये उस युग की बात हो सकती है जब पेड़-पौधे और पशुओं की प्रजातियों की सभ्यता ने विकसित रूप ले लिया होगा… सोचिए अगर भैंस, बकरे और ऊंट भी इतने ही विकसित और धार्मिक होते और वे अपने काल्पनिक इष्ट जनक को खुश करने के लिए इंसानों की बलि दिया करते तब इंसानों तुम्हें कैसा लगता ???

aryaji के द्वारा
October 16, 2013

धर्म व्यक्ति का बेहद निजी मसला होता है, इसका सार्वजनिक प्रदर्शन करना सही नहीं है।

Yogendra Singh Chauhan के द्वारा
October 16, 2013

ये प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया छुट्टा सांड हो गए है जब भी कोई ऐसी घटना होती है बस आस्था पर प्रहार करते है वो भी हिन्दू आस्था पर कभी केंद्र की और राज्य की सरकारों के बारे में बोला की जो टैक्स बसूलाती है उसका ४० % नेता अपने सुख सुभिधा सुरक्षा में खर्च करते है ये प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यदि असली जैविक बाप से पैदा है तो कभी मुस्लिम आस्था पर ऊँगली उठा कर दिखाओ तुमारी औकात पता चल जायेगे जो लम्बी लम्बी गाडियो में घूमते हो ५ स्टार होटल में मौज करते हो पता चल जायेगा


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