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खाद्य सुरक्षा अध्यादेश: रोटी की चिंता या वोट बैंक की दुरुस्तगी?

Posted On: 8 Jul, 2013 में

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हाल ही में देश के करीब 80 करोड़ लोगों को रियायती दरों पर खाद्यान्न मुहैया कराने के लक्ष्य वाले केंद्र सरकार के खाद्य सुरक्षा अध्यादेश पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हस्ताक्षर कर दिया। केंद्र सरकार इसे देश हित में लिया गया निर्णय बता रही है, वहीं विपक्ष ने विधेयक संसद में पारित कराने की बजाय इस पर अध्यादेश लाने के केंद्र सरकार के फैसले की निंदा करते हुए इसे आगामी चुनावों से पहले वोट बैंक मजबूत करने का राजनीतिक फैसला बताया है।


खाद्य सुरक्षा अधिनियम का प्रारूप जब से तैयार किया गया है तभी से इसके पक्ष-विपक्ष में चर्चाएं तेज हो गई हैं और अब जब लोकसभा चुनाव का समय नजदीक आता जा रहा है तो इस मसले पर बहस और भी तेज हो गई है।

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तथा बीएसपी सुप्रीमो मायावती तो पहले ही इस बिल को गरीब जनता को पकड़ाई जाने वाली लॉलीपॉप करार दे चुकी हैं, जिसका फायदा सिर्फ और सिर्फ सरकार को अपना वोटबैंक दुरुस्त रखने के लिए ही मिलेगा। ममता बनर्जी का कहना है कि देश को सुरक्षा मुहैया करवाने में पूरी तरह असफल हो चुकी केन्द्रीय सरकार खाद्य सुरक्षा की बात कैसे कर सकती है। बनर्जी का कहना है कि धन की कमी के कारण ऐसा हो पाना असंभव है और अगर केन्द्र द्वारा ऐसे वादे किए जा रहे हैं तो वह मात्र एक छलावा है। वहीं दूसरी ओर मायावती का भी कहना है कि इस तरह के निर्णय केवल जनता को भ्रमित करने वाले होते हैं और अमरीकी जनवादी नीति पर आधारित ऐसे बिल किसी के भी फायदे के लिए नहीं होते। यह जनता को ठगने का केन्द्र का प्रयास है और आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर जनता को सतर्क रहना चाहिए और सिर्फ अपनी बुद्धिमत्ता से काम लेना चाहिए।


वहीं दूसरी ओर कांग्रेस समर्थक लोग खाद्य सुरक्षा बिल को एक ऐसा क्रांतिकारी बिल बता रहे हैं जो देश की तकदीर को पूरी तरह बदलकर रखने में कामयाब सिद्ध हो सकता है। उनका कहना है कि जहां एक ओर भारत में खाद्य पदार्थ फिजूल के खर्च किए जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर बहुत से लोग एक समय के भोजन की जुगत में ही अपना दिन बिता देते हैं। भूख और जरूरी पोषक तत्वों से मरने वाले लोगों की संख्या में दिनोंदिन इजाफा हो रहा है और अगर यह सब देखते हुए भी लोग इसका विरोध कर रहे हैं तो यह बहुत निराशाजनक है। इसे चुनाव और उसके नतीजों से जोड़ना निरर्थक है और ऐसी निरर्थक बातों पर ध्यान देकर सरकार को अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।


खाद्य सुरक्षा बिल से जुड़े विवाद और उसकी पैरोकारी करने वाले लोगों में चल रही बहस को समझने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं, जैसे:

1. क्या वाकई केन्द्र सरकार को गरीब की रोटी की नहीं बल्कि अपने वोटबैंक की परवाह है?

2. भूख से मरने वाले लोगों की तादाद में दिनोंदिन वृद्धि होने के बावजूद क्या इस अधिनियम का विरोध करना जायज है?

3. क्या भारत जैसे देश, जहां कदम-कदम पर वर्गीकृत समाज दिखता है, में इस व्यवस्था को लागू करवाना आसान है?

4. क्या इस अधिनियम को महज एक चुनावी स्टंट मानकर इसे अनदेखा किया जाना उचित है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:

खाद्य सुरक्षा अध्यादेश: रोटी की चिंता या वोट बैंक की दुरुस्तगी?

आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।

नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “गरीब को रोटी” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व गरीब को रोटी – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।

धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Tarun Anand के द्वारा
July 8, 2013

आपके अभिनव चिंतन के धनी मन की सुविधा के लिये कुछ अन्‍य रोचक विषय भी हैं। कहीं बोधगया में धमाके मोदी का नितीश पर पहला वार तो नहीं। क्‍या अभिनव भारत के आतंकी भी हो सकते हैं इन धमाकों के पीछे। क्‍योंकि यदि आईएम जैसे संगठन होते तो तीव्रता और टाइमिंग में इतनी बचकानी चूक कभी न करते।

Tarun Anand के द्वारा
July 8, 2013

अरे भाई इस प्रकार के ब्‍लाग आमंत्रित करने से बेहतर है कि सीधे सीधे …….. के लिये वोट की अपील करने लगो। पत्रकारिता के नाम पर भाजपा की भड़ैती का क्‍या मतलब।  कोई भी राजनैतिक दल हर काम राजनैतिक नफा नुकसान सोच कर करता है। क्‍या इसी प्रकार एक अन्‍य शीर्षक यह नहीं हो सकता था- भजपा को फिर आई रामलला की सुध: आस्‍था की चिंता या वोट बैंक की दुरुस्तगी?


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