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क्या इंसानी लालच की वजह से नाराज है 'प्रकृति'?

Posted On: 24 Jun, 2013 में

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केदारनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुंड साहेब और आसपास के सभी पहाड़ी इलाकों के रहनुमाओं और पर्यटकों ने पिछले दिनों जो मंजर देखा और जिन हालातों का सामना किया वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। जहां एक ओर प्राकृतिक आपदा के चलते हजारों सैलानियों और तीर्थयात्रियों ने अपनी जान गंवाई वहीं आज भी बहुत से लोग मदद के इंतजार में भूखों मरने के लिए मजबूर हैं। इतना ही नहीं, बहुत से लोग तो यह भी नहीं समझ पा रहे कि जिन अपनों की वे तलाश कर रहे हैं वह वाकई जिन्दा हैं भी या नहीं? जहां कुछ बुद्धिजीवी पहाड़ खिसकने और ग्लेशियर के पिघलने से पहाड़ी इलाकों पर आई इस आपदा को प्राकृतिक आपदा मानने से इंकार कर इन हालातों के लिए उस विकास के तरीके को दोषी ठहरा रहे हैं जिसे मानव ने अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए अपनाया है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका यह मानना है कि अगर विकास करना है तो थोड़ी बाधाएं तो पार करनी ही होंगी। पहाड़ी इलाकों पर हुई इस दुर्गति और मानव विकास की राह से जुड़े इस मुद्दे पर अलग-अलग विचारधारा वाले लोगों के बीच एक बहस छिड़ गई है कि जिस विकास की राह पर हम चल रहे हैं कहीं वह हमें ही गर्त की खाई में तो नहीं धकेल रहा है?



बुद्धिजीवियों का एक वर्ग यह मान रहा है कि पहाड़ी क्षेत्रोंऔर नदी के आसपास वाले इलाकों में आई इस आपदा के लिए कोई और नहीं बल्कि स्वयं मानव ही जिम्मेदार है। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में केदारनाथ और बद्रीनाथ में सैलानियों की आवाजाही में लगभग 10 गुना बढ़ोत्तरी हुई है, जिसकी वजह से तापमान के साथ-साथ वहां प्रदूषण की मात्रा में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इसी का खमियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है। पहाड़ी संकरे इलाकों में भारी-भरकम वाहनों, पुलों और इसके अलावा पानी जमा करने के लिए बनाए गए बांध भी आज मानवजाति के ही दुश्मन बन गए हैं। हम प्रगति तो कर रहे हैं लेकिन कोई इस बारे में सोचने में दिलचस्पी नहीं ले रहा है कि जिस प्रगति की राह पर हम चल रहे हैं वह नकारात्मक है या सकारात्मक? धारणीय विकास की जगह हम अल्पावधि विकास को ही महत्ता दे रहे हैं।


वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जिनका मानना है कि विकास की राह में थोड़ी-बहुत बाधाएं तो आती ही हैं। अगर बड़े पैमाने पर विकास करना है तो कुछ हद तक समझौते भी करने पड़ेंगे। बांध और पुल आज के दौर की प्रमुख जरूरतों में से एक हैं इसीलिए अगर कोई इनके निर्माण को इस आपदा के लिए दोषी ठहरा रहा है तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि इनके बिना सहज जीवन भी संभव नहीं है। जीवन को आसान बनाने के लिए ही यह सब करना पड़ता है और अगर हम इस मार्ग पर चल रहे हैं तो हमें ऐसी आपदाओं के लिए भी तैयार रहना चाहिए। इस वर्ग में शामिल लोगों का यह भी कहना है कि प्रतिदिन ऐसा कुछ नहीं होता, कभी-कभार हालात जब हाथ से बाहर निकल जाते हैं तभी ऐसी आपदाएं आती हैं और ऐसी दुर्लभ घटनाओं के विषय में सोचकर अगर हम प्रगति का मार्ग छोड़ दें तो यह किसी भी रूप में हमारे पक्ष में साबित नहीं होता।


केदारनाथ समेत आसपास के पहाड़ी इलाकों में हुई इस दिल दहला देने वाली घटना से जुड़े कुछ सवाल हमारे सामने प्रस्तुत हैं, जैसे.


1. क्या वाकई हमारी अपनी गलतियों की ही वजह से हमें ऐसे हालातों से रुबरू होना पड़ता है?

2. हम जिस उद्देश्य के साथ प्रगति कर रहे हैं कहीं वह उद्देश्य ही तो हमारी जान सांसत में नहीं डाल रहा हैं?

3. वे लोग कहां तक सही हैं जिनका कहना है कि बड़े पैमाने पर विकास के लिए थोड़े-बहुत समझौते तो करने ही पड़ते हैं?

4. इन दोनों पक्षों से इतर कुछ लोग इस घटना के लिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ‘सुपरमून’ को भी कारण बता रहे हैं। उनका यह आधार कहां तक जायज है?



जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


क्या इंसानी लालच की वजह से नाराज है प्रकृति?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।



नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “मानवजाति की तबाही” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व मानवजाति की तबाही – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार





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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

hcsharma के द्वारा
July 1, 2013

कया इनसानी लालच की बजह से प्रक्रती नाराज हो सकती है।——————प्रत्क्ष  रूप से यह पूर्णतः सत्य प्रतीत होता  है  हम विकास के नाम पर जो कर रहे हैं वो ही इस का कारण है  परंतु   एक सीधा सा सत्य है कि विकास जब जब अपने चरम पर महसूस होता है फिर नीचे को फिसलता है  यह एकोनोमिकस का भी नियम है मनुष्रय की अब तक की विकास यात्रा कुछ इसी तरह की है। भगवान ने गीता मैं कहा है जो कुछ हो चुका है जी हो रहा है और जो होने वाला है  वह सब प्रक्रति के,नियम  के अनुसार सुनिषचित है जो अब किनहीं कारणों से अब  म्र्रत्यू को प्राप्त हुए नजर  आ रहे है उनको प्रक्रती अपने नियमानुसार  कर्म फलानुसार पहले ही निष्रचय कर चुकी है फिर भी मनुषय अपने स्वभानानुसार अपनी गलतीयौं को सुधारता आगे बढता रहता है,विज्ञान के नियम एक साषवत हैं शायद यह उन मनुषयों के कर्म ही रहे हौंगे  जो उनहैं वहां खिंच कर ले गये उनहैं आत्म चिंतन करना चाहिए किसी पाप को करके धन के अभिमान लेकर प्रायषचित कर लैंगे यह भाव ना रखकर पाप से ही दूरी रखैं ।,,,,,,,   मन चंगा तो कठौती मैं गंगा   ,,,,,,,यही भाव लेकर भुकतभोगी वापस आए हैं  जो चले गये वो भगवान के धाम मैं म्रत्यू पाकर मोक्ष्य पा गये भगवान अवष्य ही उनको और उनके परिजनों को शान्ति  प्रदान करेगा ।हम इस त्रासदी से अवष्य ही चिंतन करते हुए भूल सुधार करेंगे——-   इतने  बडे अनन्त आकार के  ब्रंमांड मै यह बहूत ही  तुच्छ घटना है जो कहीं भी कभी भी होती रहती हैं जो प्रक्रती के नियमानूसार-होती ही रहती हैं कब कहां किसके साथ हो जाए  कुछ नहीं कहा जा सकता है  हम जितना भी सावधानी वरतै   प्रक्रती नये रूप मै अपना रूप दिखाली रही है,,,,,, प्रलय ,,,,,महाप्रलय,,,,,,, अन्तरिक्ष्रय मै होने वाली  कितनी महा-महानतम प्रलय सब एक साष्वत है इन पर किसी का कोई बस नहीं हो सकता।..,,,,हम य़ही चाह सकते हैं ,,,,,,,,,,,,ओम  शांति शांति शांति

MRITYUNJAY PRASAD MISHRA के द्वारा
June 27, 2013

High intensity and wrong time brought about such a huge calamity .

V D Dimri के द्वारा
June 26, 2013

इंसानी लालच के साथ साथ हो रहे विकास जंगलो का पतन नदियों नालियों (गधेरे) को शोषण के साथ बढ़ता पाप इस महाप्रलय की जननी है ! तपो भूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड जहाँ तीर्थ यात्री कभी मात्र उस प्रभु के जाप के साथ चला करते थे वहां अब अपने सुखों का आनन्द लेने के साथ साथ अयाशी के लिए जा रहे हैं पाप बढ रहा है विकास हो रहा है सारे पहाड़ हिल चुके हैं जंगल के जंगल साफ हो चुदे हैं पानी के बहाव को रोकने सरे रास्ते बंद हैं जिससे पानी का तेज बहाव ताभाही मचा रहा है ! यह आज की प्राकृतिक भीषण आपदा है पहाड़ों में कोई बरसात ऐसा नहीं होता जिस बरसात मैं गाँव की गाँव नहीं बहते हैं ! जिस के लिए विकास के साथ विनाश पर रोक के साधन भी ढूढने हैं वृक्षारोपण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है !


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