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क्या खत्म हो चुकी है आडवाणी की प्रासंगिकता?

Posted On: 10 Jun, 2013 में

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भाजपा की नींव, उसका आधार कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी की राजनैतिक अस्मिता पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह द्वारा नरेंद्र मोदी को वर्ष 2014 के लिए चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष घोषित करने पर ऐसा लगने लगा है कि पार्टी के भीतर ही नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच विरोधाभास की आग को हवा मिलने लगी है। इसका स्पष्ट उदाहरण हाल ही में गोवा सम्मेलन में लालकृष्ण आडवाणी के ही उपस्थित ना होने से मिलता है। बहुत से लोगों का तो यह भी कहना है कि सम्मेलन से संबंधित कट-आउट्स में भी पहले लालकृष्ण आडवाणी को शामिल नहीं किया गया था। इस बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के भीतर ही नरेंद्र मोदी बनाम लालकृष्ण आडवाणी जैसा माहौल विकसित हो गया है जो उन्हें अपने प्रतिद्वंदी गठबंधन, यूपीए के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देगा क्योंकि भाजपा अंदर ही अंदर नेतृत्व को लेकर प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है, जबकि कांग्रेस और यूपीए में राहुल गांधी के नेतृत्व को पूर्णत: स्वीकार कर लिया गया है। बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जहां आडवाणी के प्रति पार्टी में हो रहे ऐसे रवैये को पार्टी द्वारा उनके बहिष्कार के रूप में देख रहा है, वहीं अन्य इसे नरेंद्र मोदी को पार्टी की ओर से मिशन 2014 के लिए चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी कह रहे हैं। ऐसे में यह बहस तेज हो गई है कि क्या वाकई लालकृष्ण आडवाणी को मिलने वाली प्रमुखता में अब कमी आने लगी है और पार्टी के भीतर ही दो गुट एक-दूसरे से लड़ने के लिए तैयार हैं?


बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जो यह साफ कहता है कि भाजपा के भीतर चलने वाली तकरार जो अभी तक सिर्फ पर्दे के पीछे का खेल थी, अब खुलकर सामने आने लगी है। पहले बस इसे एक अफवाह माना जाता था लेकिन अब यह हकीकत सभी के सामने है कि भाजपा में दो गुट विभाजित हैं जिनमें से एक गुट नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़ा है तो दूसरा लालकृष्ण आडवाणी को अपना समर्थन दे रहा है। इस वर्ग में शामिल बुद्धिजीवियों का यह मानना है कि पार्टी के ऐसे नकारात्मक अंदरूनी हालातों को अगर जल्द से जल्द सुलझाया नहीं गया तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इन्हीं की वजह से चुनावों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ेगा। एक सच यह भी है कि भले ही आज नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष का दर्जा दिया जा रहा हो लेकिन पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता पर आज भी एक प्रश्नचिह्न ही लगा है। ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच जो समस्याएं उत्पन्न हुई हैं उन्हें जल्द से जल्द सुलझा लिया जाना चाहिए नहीं तो इसी अंतर्कलह की वजह से बिना कुछ खास मेहनत किए ही चुनावी नतीजे यूपीए के हक में चले जाएंगे और भाजपा के पास हाथ मलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।


वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवियों का दूसरा वर्ग इस बात पर सहमति नहीं रखता कि भाजपा के अंदर लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी को लेकर दो खेमे बंटे हुए हैं क्योंकि इनका मानना है कि पार्टी के भीतरी हालात नरेंद्र मोदी के पक्ष में हैं। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के वरिष्ठ और सम्माननीय नेता हैं लेकिन अब समय नरेंद्र मोदी का है और जनता उनसे यह अपेक्षा रखती है कि जिस तरह उन्होंने गुजरात को एक वर्ल्ड क्लास मॉडल बनाया है वैसे ही वह पूरे भारत की कमान संभालेंगे। ऐसे में नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच प्रतिस्पर्धा जैसी बातें फैलाकर यह कहना कि यूपीए की जीत का रास्ता साफ है, पूरी तरह गलत है।


भाजपा के विषय में हमेशा यह कहा जाता रहा है कि वह नेतृत्व के अभाव से ग्रस्त है ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनकी स्वीकार्यता से जुड़े दोनों पक्षों पर विचार करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या वाकई अब पार्टी के भीतर लालकृष्ण आडवाणी की साख और उनकी लोकप्रियता में कमी आने लगी है?


2. क्या नरेंद्र मोदी के रूप में भाजपा को वर्ष 2014 के लिए अपना नेता मिल चुका है?


3. क्या अब मोदी की स्वीकार्यता के बीच उनकी सांप्रदायिक छवि आड़े नहीं आएगी?


4. क्या लालकृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी को मिलने वाली प्रमुखता की वजह से उनका बहिष्कार कर रहे हैं या अब पार्टी ही उनसे अपना मुंह मोड़ने लगी है?


5. अगर नरेंद्र मोदी बीजेपी की बागडोर संभालने जा रहे हैं तो क्या वह कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को चुनौती दे पाने में सक्षम होंगे?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


क्या खत्म हो चुकी है आडवाणी की प्रासंगिकता?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

hcsharma के द्वारा
July 5, 2013

भाजपा—-लालक्रष्न आडवानी   –आडवानी जी वर्तमान राजनीती मैं भाजपा के लिए ही नही वरना सारी भरतीय राजनीतिक पार्टीयौं के लिए आधार  स्तम्भ साभीत हौंगे खासतौर से य़दि भाजपा उन्हैं नजरअंदाज करती है तो सबसे ज्यादा हानि भाजपा को ही होगी भाजपा,को चाहिए कि उन्हैं सोनिया गांधी की तरह महत्व देकर चुनाव का बिगुल बजाए । जब   कांग्रेस  ने,एक अनुभव हीन गैर भारतीय हिन्दी ना जानने वाली   महिला,, को पार्टी को संगठीत करने के लिए महत्व दिया और अपने लक्ष्य मै सफल हुई पार्टी तो सशक्त हुई ही सत्तारूढ भी हुई और आज सोनिया गांधी  दुनियां की सशक्त महिलाओं मै स्थान ऱकती हैं  । भजपा एक अनुभवी को महत्व ना देकर एक महान गलती कर रही है पिछले दो लोक सभा चुनाव से भी सबक नहीं ले रही है फिर प्रधानमंत्री के पद को लेकर मारामारी कर रही है वही अन्य घटक भी अपने- अपने प्रत्यासियौं के साथ मैदान मैं आ रही हैं ।   -पिछले चुनावों की तरह ही इस बार भी अपने आप को कमजोर दर्षा रही है– अपनी चुनावी रणनीतियों को इस तरह लागु कर रही है कि विपक्ष वैसा ही कर रहा है जैसा वो चाहती है जहां तक लग रहा है कि पिछले चुनावों की तरह इस बार भी वही— ढाक के तीन पात— ही हौगे।       —–अतः भाजपा कुछ अच्छे परिणाम चाहती है तो प्रधान- मंत्री पद के लिए मारामारी ना करके वयोब्रध्ध अनुभवी नेता को-महत्व देते हुए  चुनाव की घोषणा- तभी कुछ हासिल कर  सकती है।

Shivam Choudhary के द्वारा
June 19, 2013

इसमें कोई शक नहीं …. रिटायर हो ही जाना चाहिऐ । नां हो तो … पार्टी से बाहर का रास्‍ता दिखा देना चाहीऐ ।

DEEPAK GUPTA KUKSHI (MP) के द्वारा
June 18, 2013

आड्वाणीजी बेहद सम्माननीय नेता है.निश्चित तौर पर देश मे वह अधिक स्वीकार्य नेता साबित हो सकते हैं. नया जोशिला होता है तो पुराना बेहद अनुभवी…दोनो का मेल करके देश का भला कर सकते हैं.

abhay के द्वारा
June 18, 2013

एसा नहीं है आज बीजेपी के ही लोग उनकी नहीं सुन रहे है मगर वो जो बोलते है और जो बोल है देस की राजनीती के बारे में और अपनी पार्टी के बारे में वो सही है आज बीजेपी वो पार्टी नहीं रही जो मर अदाल्बिहारी वाजपेयी जी के समाज थी आज बीजेपी का हर लीडर अपनी स्वार्थ की राजनीती क्र रहा है मुझे दुःख होता है की बीजेपी एसी क्यों हो गयी

Nemi के द्वारा
June 17, 2013

लालकृष्ण आडवाणी——–  हरामी बुढ्ढा है  ।कभी उमा भारती जैसी महान देशभक्त को पार्टी से निकाल देता है और कभी जिनऩा की तारीफ करता है । इस  हरामी लालकृष्ण आडवाणी को जेल मे डाल दो ।

PITAMBER THAKWANI के द्वारा
June 16, 2013

क्या यह महत्वपूरण नहीं है की इस प्रकार की बातों से बी जे पी टूटने के कगार पर ही है एल के आडवानी को दर किनार करने से मतलब है की कांग्रेस को फ़ायदा और अब बी जे पी कभी भी उबर नहीं सकेगी यह सारा करा कराया राजनाथ जी का है जो की आडवानी जी को पसंद नहीं करते और मोदी को ला कर खडा कर दिया! सुषमा जी को लाल आडवानी का कर्ज चुकाने का समय आ गया है और न जाने वह चुप्न क्यों हैं?

vinod kaul के द्वारा
June 16, 2013

ऐसी बात नहीं जब उमर बढ़ जाती तो अधमी को छोटू को आगे आने में मदत करनी चाहे न के भादाबन्ने की कोशिश | आडवाणी जी को मरी गुज़ारिश की जसे आप इतने सालू से बीजेपी की सेवा करते आये है आगे भी करते रहेगे

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 15, 2013

आडवानी जी निःसंदेह बड़े और बुज़ुर्ग नेता हैं पर उन्हें बचकाना हरकत नहीं करनी चाहिए थी , इससे उनका व्यक्तित्व धूमिल हुआ है और कद बौना ! वैसे तो आज नीच और अवसरवादी राजनेताओं पर से देश का विश्वास ही उठ चुका है ! चंद लोग आज भी शेष हैं जिनके सहारे देश चल रहा है | आज देश को एक क्रांतिकारी और ईमानदार व्यक्ति की आवश्यकता है !अभी जो राजनैतिक गलियारे में नौटंकी चल रही है वह बेहद चिंतनीय विषय है ! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !

shambhu goel के द्वारा
June 14, 2013

लाल कृष्ण आडवानी की प्रासंगिकता और देश प्रधान मंत्री की कुर्सी दोनों बिलकुल विपरीत बातें हैं. एक बार भाजपा नहीं अपितु दो बार देश हार चूका है  जब संप्रग सरकार देश में काबिज हुई . यह कैसा आडवानी है जो नरेंद्र मोदी को देश स्तर का चुनाव का चीफ बनाया गया और पहले तो इसने बिमारी का बहना बना लिया फिर अपने पार्टी के विभिन्न पदों से स्तीफा दे दिया .इस व्यक्ति का स्तीफा स्वीकार कर लेना चाहिए था .  आज जनमानस की ही नहीं पर भारत माँ की भी पुकार है की नरेंद्र मोदी जी जैसा एक प्रधान मंत्री बनें . चूर चूर कर दिया  देश को .आज तक अटल जी के अलावा जितनें भी प्रधान मंत्री किसी भी पार्टी के बनें .शर्म आनी चाहिए सभी राजनेताओं को जो अपनी जुबान पर नरेंद्र मोदी विरोधी शब्दों की मिसाइल दाग रहे हैं . सचमुच में नितीश कुमार जैसा बौना व्यक्तित्व को कोई हक नहीं रह गया है नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति पर किसी भी तरह का व्यंग्य करे . न नितीश की कोई नरेंद्र मोदी के बारे में अच्छी बात चाहिए .इस व्यक्ति की नरेंद्र मोदी जी के लिए कोई अच्च्ची बात भी मान्य नहीं है क्योंकि हमारे नरेंद्र मोदी जी इन सब के कायल नहीं हैं . वो एक राष्ट्र नेता हैं और न नितीश का प्रेम न ही इसके दुराव भरी बात से कुछ होने वाला है .आडवाणी भले मान ले की नितीश का बिहार मोडल या नितीश एक बहुत उच्च कोटि के नेता हैं , यह व्यक्ति तो अन्धों में काना राजा है .बिहार के लालू और रामविलास दोनों ही महा निकृष्ट व्यक्ति हैं ,जनता इन दोनों को लाखों किलोमीटर दूर फेंक चुकी है क्योंकि दोनों ही महा गिरे हुए और बहुत बड़े चोर हैं , इनको हरा कर नितीश ने गद्दी ले ही ली है तो क्या बहुत बड़ा काम कर गए. बार बार यह कहना की गुजरात तो विकसित था और इसमें विकास करना आसान है .अरे भाई बिहार में निगेटिव ग्रोव्थ  थी , यहाँ के मुख्य मंत्री सिर्फ स्वप्न में एक इंट जोड़ते हैं तब १% ग्रोथ रेट बढ़ता है . गुजरात में वास्तविक धरातल पर १० पुल १०-१० किलोमीटर लंबे बनते हैं तो ०.१ ज्ञ ग्रोथ भी नहीं हो पाता. अब आप दोनों राज्यों की वास्तविक विकास दर स्वयं जोड़ लें . लाल कृष्ण आडवानी को सिर्फ प्रधान मंत्री बनाने से मतलब है . अगर अटल जी के साथ सच्चा प्यार है तो नरेंद्र मोदी को ही प्रधान मंत्री बनाया जाना चाहिए.

praveen के द्वारा
June 14, 2013

हा अडवानी जी खत्म हो गए है और वो बुद्धे हो गए है

chander के द्वारा
June 13, 2013

advani is superb

Akhilesh Singh के द्वारा
June 13, 2013

व्यक्ति से बड़ा देश और देश की जनता (इस बात को मोदी जी बेहतर समझ रहे है | ) यहाँ लोग रोज असमय मर रहे है और आप ………….. इंसान प्रासंगिक है की नहीं ये पूछो| घोर कपट का समय चल रहा है भारत में क्या होगा इस सून्य के वातावरण में राम जाने

harendra rawat के द्वारा
June 11, 2013

अच्छा है की अडवानी जी अपनी इच्छा से जिन्दगी के बाकी दिन ऊपर वाले से जुड़ कर बिताएं ! वैसे भी अभी तक अपने बल बूते पर वे क्या कर पाएं हैं ? २००४ का संसद का चुनाव समय से पहले कराना और पार्टी की बुरी तरह हारने का पदम् श्री अडवानी जी के नाम पर ही है ! वाजपेयी थे तो अडवानी थे वाजवेयी के बिना वे शून्य हैं और भाजपा के दिग्गज नेता इस रहस्य को जानते हैं ! ये अडवानी को पुश करने वाले बाजपा के कार्यकर्ता अडवानी जी के बुढापे को तो खराब कर ही रहे हैं लेकिन अपना भविष्य भी चौपट करने जा रहे हैं !

Ramesh kumar के द्वारा
June 11, 2013

गुजरात में कई कान्डों से जुङे रहे, कई राजनैतिक दिग्गजों को धूल चटा कर, अब नया अडवानी कांड किया है.अभी समय इनका है समय बदलेगा तो पता चलेगा राजनैतक शत्रुतायें क्या क्या गुल खिलाती हैं. अरे जिसने भाजपा को बनाया उस आदमी का भी जो नहीं हो सका, उस पद लोलुप से संघ और युवा यदि उम्मीद लगाते हैं तो यह एक  कलियुगी भ्रम है. हां मोदी का स्तीफा ही मोदी को माफी दिला सकता है, सही साबित कर सकता है. अडवानी जी से बङे तो हो नहीं सकते लेकिन सब पदों से स्तीफा देकर लगभग उनके बराबर आ सकते हैं.

c.khanna के द्वारा
June 11, 2013

आज देश को व भाजपा को नरेन्द्र मोदी में उम्मीद की एक किरण दिखाई दे रही है . निश्चित तौर पर मोदी जी ने गुजरात का कायाकल्प कर दिया . हरेक का अपना- अपना समय होता है . अडवाणी जी का अपना समय था . वे एक सम्माननीय व्यक्ति हैं . आज सवाल उनकी प्रासंगिकता का नहीं है. वे अपने कार्य के लिए हमेशा जाने जायेंगे. किन्तु आज देश हित व जनता की भावनाओं व उनके दिल की आवाज़ को सुनते हुए साक्षी भाव रखते हुए अगर वे मोदी जी को खुले दिल से भाजपा की कमान सौंपते हैं तो अडवाणी जी के लिए सब के दिल में इज्ज़त और बढ़ जाएगी . साथ ही भाजपा पार्टी और मजबूत होगी . हमारी सोच स्वस्थ और ईर्ष्या से परे रहनी चाहिए . आपसी कलह से जनता का पार्टी पर से विश्वास टूटता है.

sujit kumar lucky के द्वारा
June 10, 2013

आडवाणी प्रासंगिकता का प्रश्न नही, आखिर उनके नेतृत्व में दो चुनाव लड़े, हार का आत्ममंथन भी हुआ, भाजपा विचारधारा की पार्टी है हिदुत्व, राष्ट्रीयता, स्वदेशी, धर्म, संस्कृत आधारित विचारो की ! और एक पार्टी के सोच में, एक व्यक्ति की सोच कभी सर्वोपरी नही हो सकती, एक बुद्धिजीवी, सकारात्मक सोच के लिए जाने वाले नेता मने जाते है आडवाणी जी, उनका कहना पार्टी गलत दिशा में जा रही, ये उनको खुद गलत साबित करती, पार्टी पिछले दशक से वाजपेयी जी के बाद उन्ही के कदमो पर जनता के सामने है ..अब पद की महत्वकांक्षा में आन्तरिक कलह हास्यापद है ..आधुनिक सोच की अव्यश्कता है ! विकास और देश के बात करे, मोदी जी दूरगामी सोच के व्यक्ति है ..देश को विकास और प्रगति की पथ पर ले जाने की अव्य्श्कता है .. अत: वक़्त के परविर्तन को स्वीकार करे आडवाणी जी !


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