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कैसे मिटेगा नक्सलवाद ?

Posted On: 27 May, 2013 में

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हाल ही में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के काफिले पर हुए घातक नक्सली हमले, जिसमें प्रदेश के शीर्ष कांग्रेसी नेताओं समेत लगभग 30 लोगों की जानें गईं और कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए, को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘रेड कॉरिडोर’ अब और अधिक विस्तृत और खतरनाक होता जा रहा है। मध्य-प्रदेश के घने और आदिवासी इलाकों में फैला नक्सलवाद अब और अधिक खतरनाक होता जा रहा है और जो हिमाकत इस बार उन्होंने दिखाई उसे देखते हुए इस नक्सली हमले को अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला करार दिया जा रहा है। आतंकवाद से भी कहीं ज्यादा विनाशक नक्सलवाद देश की अंदरूनी सुरक्षा को एक ऐसा खतरा है जिस पर आज तक नियंत्रण नहीं पाया जा सका है, इसके विपरीत यह अपने पांव अब और ज्यादा पसारने लगा है।


भारत की सीमाओं के भीतर पनप रही इस विरोधी लहर को जड़ से समाप्त करने के लिए बुद्धिजीवियों के दो वर्ग अलग-अलग कार्यवाहियों की मांग कर रहे हैं, जिसमें से कुछ नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए केवल सैनिक कार्यवाही को ही एकमात्र विकल्प बता रहे हैं तो कुछ सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में सुधार लाकर इस खतरे को टालने की पैरवी कर रहे हैं। हालांकि दोनों ही वर्ग देश के अंदरूनी हालातों को सुरक्षित करने के पक्ष में हैं लेकिन नक्सलवाद को खत्म करने के मामले पर एक-दूसरे से पूरी तरह असहमत प्रतीत होते हैं जिसकी वजह से इस बार यह मुद्दा एक गंभीर बहस में परिवर्तित हो गया है।


सैनिक कार्यवाहियों के पक्षधर बुद्धिजीवियों का कहना है कि भले ही इस बार के नक्सली हमले में ज्यादा संख्या में जानें गई हों लेकिन नक्सली शुरुआत से ही इतना ही ज्यादा निर्मम और हत्यारे प्रवृत्ति के रहे हैं। हर बार उन्होंने निर्दोष लोगों की जान ली है और उन पर कभी भी बातचीत का कोई असर नहीं हुआ है। इसके विपरीत हर बार वह और वहशीपन के साथ अवतरित होते आए हैं। देश के लिए खतरा बन चुके नक्सलवाद को समाप्त करने का एकमात्र उपाय सिर्फ और सिर्फ सैनिक कार्यवाही ही है। उनका कहना है कि हमारे पास इतने सक्षम सैनिक हैं कि वह मात्र कुछ दिनों में नक्सलियों की कौम को समाप्त कर देंगे और अगर व्यवहारिक रूप में देखा जाए तो आज हमारे पास यही एक उपाय भी है। सरकार के आगे हर समय नई मुश्किलें पैदा करने वाले नक्सलियों के सिर पर हर समय खून सवार रहता है और वह नहीं देखते कि जो उनका शिकार बन रहा है वो कौन है, ऐसे में उनके प्रति किसी भी तरह की सांत्वना रखना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है इसीलिए सख्त कदम तो उठाने ही पड़ेंगे।


वहीं दूसरी ओर इस विचारधारा के विपरीत पक्ष रखने वाले लोगों, जिनका मानना है कि भारत के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक हालातों में सुधार कर नक्सलवाद की समस्या पर काबू पाया जा सकता है, का कहना है कि नक्सली हत्यारे नहीं बल्कि हमारी नीतियों से प्रभावित आदिवासी और गरीब तबके के लोग हैं। उनकी जमीनों पर अतिक्रमण कर, उनसे उनके रहने और फलने-फूलने के सभी साधनों को छीनकर, हमने उन्हें अपने खिलाफ कर लिया है। अगर हम वाकई नक्सलवाद को समाप्त करने और देश की सुरक्षा के लिए गंभीर हैं तो हमें उन आदिवासियों से वार्तालाप कर इस समस्या का हल खोजना पड़ेगा, उन्हें हर वो हक देने होंगे जिनके ऊपर उनका अधिकार है। भारतीय सरकारों की नीतियों से आक्रोशित भारत के ही कुछ लोग भारत के खिलाफ हो गए हैं, उनकी समस्याओं को सुलझाए बिना किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि उन पर हुए अत्याचारों और अन्यायों की ही वजह से आज वह यह खूनी खेल खेलने के लिए मजबूर हुए हैं। उनकी दुर्दशा को समझते हुए सैनिक कार्यवाही जैसा विकल्प ना सिर्फ मानवाधिकारों के विरुद्ध है बल्कि घोर अमानवीय भी है क्योंकि इसमें ना सिर्फ नक्सली अपनी जान गवाएंगे बल्कि कई अन्य निर्दोष लोगों की भी जाने जाएंगी। इसीलिए बेहतर विकल्प सामाजिक और आर्थिक नीतियों में सुधार कर प्रत्येक भारतीय, भले ही वह नक्सली ही क्यों ना हो, को अपने साथ लेकर चलना ही है।


उपरोक्त चर्चा और नक्सलवाद जैसी समस्या के समाधान से जुड़े दोनों पक्षों पर विचार करने के बाद निम्नलिखित प्रश्नों का जवाब ढूंढ़ा जाना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या नक्सलवाद का समाधान सिर्फ सैनिक कार्यवाही से ही संभव है?

2. क्या वाकई नक्सली भारत की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक नीतियों से पीड़ित लोग हैं?

3. बातचीत की कोशिश तो पहले भी कई बार की गई है, लेकिन कभी कोई नतीजा नहीं निकला। ऐसे में नक्सलियों को एक और मौका देना कितना सही होगा?

4. क्या नक्सलवाद स्वार्थ से ओत-प्रोत राजनीति का ही उत्पाद है?

5. देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके नक्सलियों के प्रति हमदर्दी रखना कितना जायज है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:

कैसे मिटेगा नक्सलवाद ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “नक्सलवाद” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व नक्सलवाद – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।

धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SAKSHI RASTOGI के द्वारा
June 5, 2013

i think there should be an honest aproach towards the goverment representatives for the welfare of naxalist. because these are the most deprived persons of this society and totally ignorant from the goverment schemes implemented for the welfare of the public.

sachin pandit के द्वारा
May 31, 2013

  naksalwad swarth ki rajneeti se panap rahaa hai….kyuki ye rajnitik partiya in logo se purv me bhi labh le chuki hain…..kyonki lalach buri balaa hai. by:-drswin

R.D.Verma के द्वारा
May 31, 2013

Naxalism is home grown problem not imported or aided or abated by foreign crooks. It means there was some thing wrought in our social and economical system which has given birth to it. Once a person commit a crime to meet his bare basic needs he never looks behind.How far he will go is only thing of imagination.Our political leaders and so called social reformers had never seriously analysied the problems of socially,politically,educationally and economically downtrodden persons. Now we will have to place ourselves in Doctor`s role. Do everything to diagnose problem, find out the root cause of disease and give treatment best suited to individual affected. One particular medicinal dose does not give desired results in all cases. Categorisation of Naxals is a must. Different methods are to be adopted. Short term single solution may prove suicidal If some foreigner gives solution of naxalism Army Operation he may be correct but a national pariart can never agree of killing innocent poors of his own country.

shuklaom के द्वारा
May 30, 2013

नाक्स्सल्वाद को समाप्त करने के लिए पहले यह विचार में लेना अतंत आवश्यक है की इसके जड़ में क्या है सबसे पहले हमें डॉ.भीमाराव अम्बेडकर द्वारा २५जन्वरि १९५१ के संविधान सभा में दिए गए महत्व्पुर्द भाषण जिसमे उन्होंने चेतावनी देते हुए आग्रह किया था की ‘ कल हम एक ऐसी व्यवस्था में प्रवेश करने जा रहे है जिसने हम एक व्यक्ति एक वोट को मान्यता दे रहे होगे वाही दूसरी तरफ आर्थिक और सामाजिक कारणों से सामाजिक रूप से इंकार क्र रहे होगे समाज के इब अंतरविरोधो को जितने जल्दी समाप्त करेगे अच्चा होगा नहीं हाशिये के बंचित लोगो द्वारा इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था को उकड़ फेकेगे जिन्हें हम लोगो ने इतने बलिदान के बाद बनाया है/ हमें तो संविधान निर्माताओ ने ही इस स्थिति को भाप लिया था तथा आदिवासियो एवं समाज के हसी के लोगो की पूरी व्यवस्था किया गया था मुख्य धारा के अनुसूचित एवं पिचादो को तो कुछ मिला परन्तु मुख्य धारा से अलग रहने वाले आदिवासिओ को उनके संविधान प्रदत्त अधिकारों से भी बंचित रखा गया जो आज भी जरी है भारत सर्कार के ग्रामीद विकास मंत्रालय के रिपोर्ट के अनुसार आजादी के बाद बाद ४०%आदिवासिओ का एक या एक से अधिक बार विस्थापन हुआ है परन्तु कही भी उन आदिवासिओ के पुनर्वास की व्त्वस्था भी नहीं की गयी दूसरा मुद्दा मजदूरी का है जिसकी वजह से भी मजदूरों में असंतोष होता है क्योकि मजदूरों को संविधान प्रदत्त न्यनतम मजदूरी से भी बंचित रखा जाता है योजना आयोग द्वारा गठित समिति ने भी स्वीकार किया है की नक्सल समस्या कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है वरन पूरी तरह आर्थिक और सामाजिक समस्या है तथा यह भी कहा गया की नक्सलियो के पास अच्चा-खासा जनाषर है प्रत्येक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी और विपक्च अगेर गिरोह बना शोषण एवं विस्थापन की नीतिओ को जोर-जबरदस्ती से लगो की जाएगी तो उनलोगों के पास लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विकल्प बहुत सीमित बचते है आजादी के बाद दसको तक इन आदिवासियो की खोज-खबर तो दूर एक तरह से उनके वजूद तक को संविधानिक रूप से त्याग दिया गया किसी तरह के हिंसा का समर्थन न करते हुए सबसे पहले उनकी समस्याओ पर जो अध्ययन हुए है उनकी धुल झाड़ कर समझाना चाहिए की आखिर इस समस्या के जड़ में क्या है छतीसगढ़ में ही मओवादियो के आने से पहले बीडी पत्ता तोड़ने वाले मजदूरों का जबरदस्त शोषद किया जा रहा था आज वाही व्यापारी २० गुना मजदूरी मिल रही है इस तरह आदिवासियो का दिल जीता और भी तमाम कम जो सरकारों को करना चाहिए आज नक्सलवादियो द्वारा कर के उनकी सहानुभूति प्राप्त की है आज जबसे उदारीकरण का घोडा द्वोड़ा है तथा सर्कार को पता चला की अरे ये तो अरबो खरबों डालर के खजाने पर बैठे है १९४७ के बाद एकाएक सर्कार को जबरदस्ती विकसित करने का अभियान चलाया जा रहा है सीधी सी बात है अगर जहा नक्सलवादियो का कब्ज़ा नहीं है क्यों नहीं सर्कार उन चेत्रो को विकसित कर के आदिवासियो का विश्यवास जितना चाहिए बजे इसके की टाटा अडानी के गुंडों द्वारा सलवाजदुम के साथ गैरकानूनी रूप से चोरी छिपे आदिवासिओ को उनके मूल निवासो से जबैदास्ती भागने से तो यह हिंसा बढ़ेगी ही अभी केन्द्रीय मंत्री श्री जय राम रमेश ने एक बहुत महत्व्पुर्द सुझाव दिया है की आदिवासियो के इलाके में १० वर्ष के लिए प्रतिवंधित कर देना चाहिए यह मन कर चलन की ये सब अपराधी है और इनलोगों से इसी तरह निपटा जाना चाही यह बिलकुल गलत सोच है सेना तो इसका इलाज कतई नहीं क्योकि नागालैंड,त्रिपुरा में तो हम आजादी के बाद से ही सेना के हवाले है क्या हुआ वह क्या शांति वापस आई? नहीं सेना देश की सुरकचा के लिए है हमारी सेना पेशेवर तरीके से कम कराती है इसीलिए जनरल वी.के. सिंह ने स्पष्ट तोंर से इंकार किया था आतंरिक सुरकचा में सेना को लगाने से भविष्य में पाकिस्तान जैसा भी कुछ हो सकता है कुछ लोग पंजाब का उदाहरद देते है जहा ओपरेशन ब्लू स्टार सेना द्वारा चलाया गया था लकिन वे भूल जाते है iक पंजाब में पहले जनता का विश्यास जीता गया और वहा की जनता भी आतंकवादियो से किनारा कर लिया था तथा स्व्द्मंदिर तथा जंगल की परिस्थितियो में जमीं-आसमान का अंतर है और आदिवासियो का समर्थन तो बिलकुल नहीं है नहीं तो बार-बार दुसरे प्रदेशो से सैकड़ो की तादाद में आने और इतने बड़े बड़े हमला करने का सुराग भी सुरकचा बलों को नहीं मिला निश्चित रूप से सेना का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए क्योकि इसमे बहुत बड़ी तादाद में निरीह आदिवासिओ को हिंसा हा शिकार होना पड़ेगा अभी भी वहा की खबरे बहार कहा आ पति है आदिवासिओ के उपर तो दुहरा जुल्म हो रहा है एक तरफ नक्सलवादियो की जोर-जबरदस्ती का शिकार होना पड़ता है वाही दूसरी तरफ जंगल विभाग सुरकचा बल वहा नक्सलियो का शिकार कम उनकी बहु-बेतिओ का शिकार अधिक करते है जब सरे राह किसी थाने में महिलाओ का शिकार करते रहते है वहा तो खुला खेल फर्रुखाबादी चल रहा है एक से एक कोबरा फाॅर्स ओप्रसन ग्रीन हंट जैसे भयाना नाम वाले सुरक्चाबलो को लगा दिया गया है जिसका सुरक्चाबलो में घोर असंतोष घर करता जा रहा है उन्हें भी महसूस हो रहा की ७४ जवानो की हत्या लोकतंत्र पर हमला क्यों नहीं मन जाता जब की नेताओ के उपर हुए हमले को लोकतंत्र पर हमला क्यों मन जाना चाहिए जब हम विद्र्ही नागो तथा अन्य अल्गाव्बडियो से बात कर सकते है दसको से दुसमन पाकिस्तान से बात कर सकते है चीनियो से वार्ता के लिए गिड़गिड़ा सकते है तो ये तो हमारे ही लोग है जो दसको की ज्यतातियो तथा शोषण एवं विस्थापन से नाराज लोग है जो विकल्फिनाता के चलात्र नाराज है तथा उनके वाजिब हको को स्वीकार करे तथा समाज के मुख्य धारा में लेन का प्रयास होना चाहिए हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था से जुड़े है जहा सबको अपने विचार व्यक्त करने आजादी है जिस दिन आदिवासिओ को लगेगा की हां हम भी इसी देश के नागरिक है इसपर हमारा भी उतना ही हक है जितना किसी अन्य नाग्रिक्ल का उबी दिन से नक्सल समस्या का समाधान निकलने लगेगा आदिवासिओ का विस्यास जितने के नाद ही कुछ बात बनेगी जो लोग सेना की बात कर रहे है उन्हें कश्मीर से लेकर पुरे पूर्वोत्तर में कोई प्रगति नहीं हो रही इन परिस्थितियो में श्री जयराम रमेशजी की बात को पुन्ह दुहराना चाहुगा की सबसे पहले १० वर्षो के लिए खनन पर रोक होनी चाहिए और फिर इन आदिवासिओ को विस्तास में ले कर ही कुछ किया जा सकता है कुछ लोग ऐओसे भी है आई एस आई का नाम नक्सलवादियो से जोड़ने का प्रयत्न कर रहे है उन्हें ध्यान रखना चाहिए की नक्सलवादियो द्वाराकभी अलगाव वाद की चर्चा नहीं की है और नाही इसके कोई प्रत्य्क्च साबुत है इन परिस्थितिओप में आई एस आई को लाना मतलब अलगाव वाद का एह मोर्चा और खुल जायेगा.

    har har mahadev के द्वारा
    June 20, 2013

    BILKUL SAHI KAHA APNE . NAXALWAAD KI JADH HAI CORRUPTION AUR CORRUPTION KI JADH HAI CASTE .corruption is desh mein kabhi mudda ho hi nahi sakta. is desh ke jadatar logon ke liye sirf ek hi mudda chalta hai aur woh hai jaatiwad ka mudda.azadi ke baad general category ke logon ne satta, prashashan, aur business mein kabza kar liya aur wahi ab jab obc aur sc st ko mauka mila hai to wo bhi dono haath se paisa collect kar rahein hai.isme galat kya hai .aur ise paise se woh apni aur apni jaat ka bhala kar sakte hain.jo log corruption ko khatam karne ki baat kar rahein unse mera sirf itna kehna hai ki hindustan se caste system khatam kar dijiye corruption automatic khatam ho jayega. kyonki har jaati ke govt employees aur neta corruption isiliye karte hai ki isse woh apni aur apni jaati ka bhala kar sakein kyuonki ek jaati ka neta ya govt employee doosri jati ki madad karne se raha aur madad toh door usko aise chkrawyuh mein fasa denge ki woh kabhi us sadme se bahar hi nahi aa payega. aaj jo savarn bhai jaatigadh aarakshan ka virodh karte hain unse mera sirf itna kehna hai ki jati khatam kar dijiye aarakshan automatic khatam ho jayega . is desh ka sabse badi beemari caste hai jiski wajah se ham pichle 1500 saalon se videshion ki gullami kar rahen hai aur aage bhi karte rahenge kyonki jin jaation ka 5000 saal se soshan ho raha hai wo kabhi tumhare saath nahi aayengi. woh muslmanon , britishers ki gulaami kar lengi lekin tumhare saath kabhi nahi aayengi.kyuonki musalmaan ya britishers unko jaatisoochak sabd keh kar jalil to nahi karte .

A.K.Tiwari के द्वारा
May 27, 2013

प्रथमतया तो एक ही विचार है की गोली का जवाब गोली हे हो सकता है . नक्सलवादी लोगो की इनकम हजारो करोर रूपया है . वे अवैध वसूली में लगे है . अवाम एक तरह से सर्कार के पैसे से ही सर्कार से लड़ रहे है. इसलिए बेहद कडाई से निबटा जाये . साथ में यह भी सुनिश्चित किया जाये की पैसे वाले विकाश के नाम पर संसाधनों की लूट न कर पाए . आज सारा देश पैसे वालो के लिए नीलामी के लिए उपलभध है . आने वाले समय में गरीब आदमी अमीर को देखते ही लूटने का सोचने लगे , उसके पहले हमें बदलना होगा. abhee पिछले हफ्ते डेल्ही में एक ऑटो वाले ने बहस के बीच कहा था की डेल्ही के जितने भी माकन दिख रहे हैं , आपको क्या लगता है कितने इनमे से ईमानदारी के पैसे से खरीदे गए है . बात सोचने की है.

    har har mahadev के द्वारा
    June 20, 2013

    BILKUL GALAT KAHA APNE. APKO NAXALWADI GALAT ISLIYE NAZAR AATE HAI KYUONKI AAP NADII KE IS KINARE KI TARAF BAIDHEN HAI JARA US TARAF JA KAR DEKIYEH KIS TARAH LOG APNE GUJAR BASAR KAR RAHEN HAIN.KABHI MAUKA MILEN TO KISI DALIT KE GHAR MEIN JAA KAR DEHIYE KITNA DARD SAMAYA HUA HAI.

shambhu goel के द्वारा
May 27, 2013

नक्सल वाद मिटाने के पहले भ्रषटाचार मिटाइये . भ्रष्टाचार ही नक्सल वाद की माँ है . कसम खाएं नेता की भ्रष्टाचार नहीं करेंगे ,नक्सल वाद खुद ब खुद मिट जाएगा . बड़ी बड़ी आफिसें , दस से बीस टन कागजों का पुलिंदा लगता है राष्ट्र की आय व्यय  याने बजट पेश करने में . हवाई यात्राएं होती हैं .लाखों लीटर पेट्रोल जलाया जाता है अफसरों के वाहनों पर , मंत्री जी नयी तकनीक सिखने के लिए विदेश जातें हैं , की बजट घाटा कैसे कम किया जाए ,जब आम आदमी मोंटेक जी के अनुसार ३५ - ४० रुपियों में अपना पेट भर ले सकता है तब नक्सल वाद पनप ही क्यों रहा है . नक्सल वाद नहीं पनपेगा तो पुलिस को नौकरी पर रखने का जस्टिफिकेसन कैसे करियेगा. अखबार वाला ,मिडिया वाला क्या करेगा , कुछ तो न्यूज चाहिए . बड़ी दिक्कत हो गयी सरकारों को क्योंकि इस बार कभी सरकार में रहे आदमियों की न मौत हो गयी .जब आम जनता मरती है आतंकवादियों के हाथ तब सरकारें मतलब शिवराज सिंह पाटिल और अब सुशील कुमार शिंदे अपना सूट बदलते रहतें हैं . श्री मान सलमान खुर्शीद   जी का क्या गया या क्या लगा अपने राष्ट्र की २० किलोमीटर जमीं चली ही गयी तब . ऐसे ही होते रहता है होने दीजिए . फिर वार्ता से समाधान निकाल लिया जायेगा .वार्ता हुई, मिडिया का केमेरा  आया, वार्ता सफल हुई का पैरहन पहने वार्ता बाज़ खड़े हुए , निदान निकल गया .खुर्शीद जी मोबाइल पर देश विदेश बात कर लिए ,हाल चाल पूछ लिया आज का वाकया चुटकियाँ लेते हुए सुनाया गया ,हंसी मजाक हुई ,बात खतम. मिडिया में आ गया की चलो आखिर निदान निकल गया .लोकतंत्र का पहिया घूम रहा है

mohd khalid के द्वारा
May 27, 2013

Abhi aur doodh pilayiye in “aatankwadiyon” oops naksalwadiyon ko.


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