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क्या धर्म के आगे कमजोर पड़ जाता है जीने का अधिकार ?

Posted On: 19 Nov, 2012 में

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प्रेगेनेंसी के दौरान मुश्किलों का सामना कर रही एक महिला ने समय पर अबॉर्शन ना होने के कारण दम तोड़ दिया। यह हालिया मामला है आयरलैंड का जहां भारतीय मूल की एक महिला सविता हलपन्नवार ने बस इसीलिए अपने प्राण खो दिए क्योंकि डॉक्टर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को गिराने के लिए मना कर रहे थे। यह जानने के बावजूद कि यह प्रेगेनेंसी उस महिला की जान के लिए खतरा हो सकती है डॉक्टरों ने अबॉर्शन नहीं किया। कारण, कैथोलिक धर्म अबॉर्शन की इजाजत नहीं देता। कैथोलिक देश होने की वजह से आयरलैंड के डॉक्टरों ने यह कहते हुए बच्चे को गिराने से मना कर दिया कि कैथोलिक धर्म के अंतर्गत जीवित भ्रूण को मारना अक्षम्य पाप है। महिला की मौत से शोकग्रस्त उसके पति के अनुसार अगर डॉक्टर समय रहते अबॉर्शन के लिए राजी हो गए होते तो आज उसकी पत्नी जीवित होती। उल्लेखनीय है कि आज से लगभग 20 वर्ष पहले भी आयरलैंड की एक बलात्कार पीड़िता इस कानून की बलि चढ़ गई थी। अविवाहित होने के कारण वह अपने कोख में पल रहे बच्चे को जन्म नहीं दे पा रही थी इसीलिए अबॉर्शन के लिए डॉक्टरों से मिन्नतें करने लगी लेकिन जब चिकित्सकों ने उसका भी अबॉर्शन करने से मना कर दिया तो उसके पास आत्महत्या करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा और उसने अपने ही जीवन का अंत कर लिया। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी आयरलैंड में अबॉर्शन से जुड़े इस कानून को समाप्त करने का प्रयत्न नहीं किया गया।


पहली नजर में भले ही यह मसला शोकाकुल परिवार की दास्तां लगता है लेकिन धर्म और व्यक्तिगत जीवन से जुड़े होने के कारण यह इससे कहीं अधिक गंभीर बन पड़ा है। क्योंकि इस घटना के बाद कैथोलिक कानून पर कई तरह के सवाल उठ खड़े हुए हैं। हालांकि व्यक्तिगत जीवन के लिए धर्म का अपना एक अलग महत्व है और बहुत हद तक इसकी जरूरत भी है लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जिनका मानना है कि कोई भी चीज भले ही वह धर्म पर आस्था ही क्यों ना हो व्यक्ति के जीवन या खुशियों से बड़ी नहीं हो सकती। उदारवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पैरोकारी करने वाले लोगों का कहना है कि धर्म का पालन करना तभी तक सही है जब तक वह व्यक्तिगत खुशहाली और जीवन के आड़े नहीं आता। अगर धर्म का पालन करने के लिए व्यक्तिगत जीवन को ही दांव पर लगाना पड़ जाए तो यह एक कष्टप्रद बात है। कोख में पल रहे उस बच्चे को जीवन देने के लिए, जिसने अभी तक दुनिया में कदम तक नहीं रखा, खुले आसमान के नीचे एक सांस भी नहीं ली, एक हंसते-मुस्कुराते इंसान की सांसें कैसे छीनी जा सकती हैं। कैथलिक कानून के नाम पर यदि किसी महिला का यह जानते हुए भी कि उसकी जिंदगी को खतरा है, गर्भपात नहीं किया जाता है तो यह अपराध है।


वहीं दूसरी ओर कुछ धर्म के प्रति अत्याधिक निष्ठा रखने वाले लोगों का कहना है गर्भ में पल रहे बच्चे को मारना एक घोर अपराध और निंदनीय कृत्य है। गर्भ में पल रहा बच्चा जब तक जीवित है उसे गिराया नहीं जा सकता और अगर कोई ऐसा करता है तो वह एक जीव हत्या का अपराधी है। आयरलैंड क्या भारत में भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो अबॉर्शन का यह कहकर विरोध करते हैं कि जब तक बच्चे को बचाने की उम्मीद है तब तक उसे बचाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए, फिर भले ही इस कोशिश में मां की जान खतरे में क्यों ना पड़ जाए। भ्रूण और मां दोनों को ही जीवन का अधिकार है इसीलिए एक की जान लेकर दूसरे को बचाना सही निर्णय नहीं है। ऐसे लोगों के अनुसार बच्चे की जान बचाते हुए अगर मां की जान खतरे में पड़ जाती है तो इसे दैविक न्याय ही माना जाना चहिए।


उपरोक्त मसले के दोनों पक्षों पर ध्यान देने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उठते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति की जान लेना अन्याय नहीं है?

2. धर्म जीवन का आधार होता है तो उसे नकार कर या नजरअंदाज कर आगे बढ़ना किस हद तक सही है?

3. सविता हिंदू धर्म की अनुयायी थी तो कैथोलिक धर्म के कारण उसका अपनी जान से हाथ धोना किस सीमा तक युक्तिसंगत है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


क्या धर्म के आगे कमजोर पड़ जाता है जीने का अधिकार ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “धर्म और जीने का अधिकार”  है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व धर्म और जीने का अधिकार – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

lakshmi के द्वारा
November 29, 2012

कसाब के लिए दिए गए सजा हर आतंकवादियों के लिए एक सबक है | यह बात उन सब व्यक्तियों केलिए चितावनी है जो समाज में आतंक फैलाना चाहते है | इससे उन्हें यह संदेश दिया गया है कि ‘इन्सान रहे राक्षस न बने’| परंतु कसाब जैसे राक्षस को जन्म देनेवाली औरत भी एक माँ है| और भारतीय संस्कृती के अनुसार माँ भगवान का प्रतिरूप है | अत: यह कदापी उचित नहीं कि एक माँ के द;ख़ पर जशन मनाए| इस बात से संतुष्ट होकर कि सत्य जीत गया है हमें मामले को ठडा करा देना चाहिए क्योंकि आकिरकार यह गौतम बुद्ध की जन्म भूमि है | कसाब तो एक कठपुतली है Remote Control तो कही और है | जय भारत

subhash के द्वारा
November 27, 2012

dharm ke fer me doctor apna dharm bhul gye

surendra arya के द्वारा
November 20, 2012

दुनिया के इतिहास में यह बात सर्व विदित है कि जबसे धर्म ने संस्थागत रूप धारण किया है धार्मिक व्यवस्थाओ के आगे जीने का अधिकार गौण ही रहा है .धर्म के नाम पर हत्याए हुई ,बलिदान मांगे गए या फिर मरने के लिए बेरहमी के साथ छोड़ दिया गया .धर्म ने जीने का उदेश्य और मार्ग जरूर बताये किन्तु उनकी विअख्याओ का अधिकार संस्थागत सुप्रीमो के हाथ ही रहा .वहां दया ,रहम जैसी व्यवस्था नहीं रही .सवित जैसे प्रकरणों में धर्म के भिन्न होने या फिर समधर्मी होने का कोई अंतर नहीं होता .वहां शिर्फ़ व्यवस्था ही होती है जिसका पालन ही धर्म है और व्यवस्थाये मानवीय आधारों पर नहीं निर्ममता पर टिकी रह्पाती है .

Jack के द्वारा
November 20, 2012

हाल ही में हुए इस केस में साफ तौर पर यह बात साफ आती है कि आज बीसवी सदी में भी लोगों की मानसिकता धर्म के प्रति बेहद बेकर और घिनौनी है. ना जानें किस धर्म में उन डॉक्टरों को सविता को मरने के लिए छोड़ देने पर विवश कर दिया. ऐसे किसी भी धर्म को चाहे समाज मान्यता दें लेकिन मेरा दिल और दिमाग कभी मान्यता नहीं देगा. मुझे नहीं लगता मैं आज के बाद कैथैलिक धर्म को सही भावना से देख पाऊंगा.


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