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वर्तमान गठबंधनों में टूट-फूट और तीसरे मोर्चे के गठन की संभावना पर क्या है आपकी राय?

Posted On: 24 Sep, 2012 में

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इन दिनों देश में भारी राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल रही है। डीजल, एलपीजी सिलिंडर और रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर सरकार की ऐसी किरकिरी हुई कि उनसे उनके अपनों ने ही नाता तोड़ने का फैसला कर लिया। जिस गठबंधन के दम पर सरकार देश चला रही थी उसी गठबंधन में आज दरार देखने को मिल रही है। ममता बनर्जी ने समर्थन वापस ले लिया है तो वहीं मुलायम सिंह ने भी सरकार को तेवर दिखाए। लेकिन गठबंधन की वजह से सिर्फ यूपीए ही नहीं एनडीए भी परेशान है। एनडीए गठबंधन की अहम पार्टियों यानि शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना ने एफडीआई पर भाजपा से अलग कांग्रेस की राय का समर्थन किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगा वह उसे अपना समर्थन देंगे। घटक दलों की इस आपाधापी ने देश के दो बड़े गठबंधनों की सूरत बदले जाने के संकेत दिए हैं।


यूं तो राष्ट्रपति चुनावों के समय से ही देश में नए गठजोड़ बनने और पुराने गठबंधनों में दरार की नींव पड़ चुकी थी। राष्ट्रपति चुनावों में जहां यूपीए की अहम घटक दल मानी जाने वाली टीएमसी ने प्रणब दा को समर्थन देने में आनाकानी की तो वहीं सपा भी आखिरी मौके पर सरकार से सहमत हो पाई थी। वहीं दूसरी ओर एनडीए को भी इस समय अपने घटक दलों की “बेवफाई” झेलनी पड़ी थी। राष्ट्रपति चुनावों में एनडीए की घटक मानी जाने वाली शिवसेना और जनता दल (यू) ने यूपीए के उम्मीदवार को समर्थन दिया था।


राजनीतिक जानकार मानते हैं कि घटक दलों के बीच बिखराव की आपाधापी ने देश के राजनीतिक हालातों में परिवर्तन के दौर को जन्म दिया है। इसे देखते हुए 2014 के चुनावों में उम्मीद की जा सकती है कि गठबंधन की नई सूरत हमें देखने को मिले। हो सकता है यूपीए के कुछ घटक दल एनडीए में जा मिलें या फिर एनडीए के घटक दल यूपीए से हाथ मिला लें। इन बात की भी संभावना है कि टीएमसी, सपा और बसपा, वामपंथी पार्टियां तीसरे मोर्चे का गठन कर लें। राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता और यह बात गठबंधन पर पूरी तरह लागू होती है। पर सवाल यह है कि आने वाले सालों में देश में नए गठबंधन देखने को मिलेंगे या नए गठबंधन की हवा चुनाव आने तक थम जाएगी?


इस विषय पर कुछ लोगों की राय है कि 2014 के आम चुनावों तक घटक दलों की उठापठक खत्म हो जाएगी और देश में राजनीतिक विश्वसनीयता कायम होगी। उनके अनुसार अभी हर घटक दल आने वाले चुनावों में अपने रुतबे को बढ़ाने के लिए तमाम चालें चल रहे हैं लेकिन उपयुक्त समय आने पर सभी शांत हो भाई-भाई बन जाएंगे।


तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों का मानना है कि यह राजनीति का एक संक्रमण काल है। इस बात की पूरी संभावना है कि 2014 में नए गठबंधन बनकर उभरेंगे जो कहीं ना कहीं घटक दलों में राजनीतिक विश्वसनीयता का संकट पैदा करेंगे। दल बदलने की प्रथा जो हमारे देश में बहुत पुरानी है वह 2014 के चुनावों में अपना भीषण रूप दिखाने को तैयार है। इंतजार है तो बस 2014 के आम चुनावों का।


घटक दलों के बिखराव से देश की राजनीति पर होने वाले प्रभावों पर उपरोक्त चर्चा के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उठते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या देश में नए राजनैतिक समीकरणों की संभावना परिलक्षित हो रही है?

2. क्या 2014 के संसदीय निर्वाचन के पूर्व यूपीए और एनडीए गठबंधनों में गहरी टूट-फूट हो सकती है?

3. देश की राजनीति में तीसरे मोर्चे की कितनी संभावना है? क्या तीसरा मोर्चा व्यवहार में सफल मोर्चा बन सकता है?

4. क्या घटक दलों में बिखराव का संकेत सिर्फ दिखावा है और 2014 के चुनावों से पहले सब कुछ ठीक हो जाएगा?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


वर्तमान गठबंधनों में टूट-फूट और तीसरे मोर्चे के गठन की संभावना पर क्या है आपकी राय?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “घटक दलों का बिखराव” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व घटक दलों का बिखराव – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum  नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepa singh के द्वारा
September 29, 2012

आज की राजनीती समाज सेवा का क्षेत्र नही र्हाज ये केवल अपना उल्लू सीधा करने का मंच बनकर रह गया है. पहले राजनितिक लोगो को जो भारत रत्न से पुरुस्कृत किया गया तो तो उनका क्षेत्र समाजसेवाखा गया जो सही मायनो में समाजसेवा करते भी थे. पर आज राजनीती समाज क लिय नही बल्कि खुद क लिय सेवा क रूप की जाती है. इसी राजनीती जिसमे सत्ता प्राप्त करने के लिय नेता कितना भी गिरा हुआ स्टार का हथकंडा क्यों न हो अपनाने से नही चुकते उन्ही हथकंडो म सर एक है जोड़ तोड़ की राजनीती . आज जो दल मेरा मित्र कल वही मेरा शत्रु बस किसी भी तरह सत्ता मिल जीतो देश को लूट कर स्वयम की सेवा कर ली जाय.और अगर ये खा जाय केकी ये वर्त्तमान राजनीती की प्रस्तावना हो सकती है तो इसमें गलत कुछ भी नही.

mohan yogi के द्वारा
September 25, 2012

  वर्तमान में भारतीय राजनीति एक नए व अनोखे दौर से गुजर रही है | सभी राजनितिक दलों में विखराव देखने को मिल रहा है | ऐसा लगता है वर्तमान में किसी भी पार्टी में एक सुखद समाज व संपन्न राष्ट्र की सोच नहीं है |किसी भी तरह अपने वोट बैंक को बचाने की चिंता सभी में देखने को मिल रही है | जातिवाद ,छेत्रवाद,भाषा,व मज़हब के आधार पर अपने -२ वोट हथियाने की होड़ लग रही है | सच कहूँ तो सहीदों के सपनों की हत्या हो रही है | ऐसे में तो वर्तमान राजनीति के ही विकल्प की आवश्यकता है | मेरी यह भविष्यवाणी सुरक्षित रख ली जाये कि २०१४ में भारतीय राजनीति को एक नई दिशा मिलेगी | कोई एक नई पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आकर सबको चौंका देगी , और भारत को सहिदों के सपनों का भारत बनाने में सक्ष्यम होगी | यद्यपि वर्तमान पार्टियाँ विरोध करेंगी पर आम जनता का भरोषा उस पार्टी को रहेगा | मोहन योगी एक चिन्तक, हल्द्वानी, जि.- नैनीताल (उत्तराखंड)

सुनिल के द्वारा
September 25, 2012

दल बदलू नेताओं ने इस देश की राजनीति को गंदे कीचड़ की तरह कर दिया है

Hemendra के द्वारा
September 24, 2012

hello

Ankit Gupta के द्वारा
September 24, 2012

Very Nice Article!


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