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प्रतीकों से छेड़छाड़ – अभिव्यक्ति का तरीका या राष्ट्रीय गरिमा से खिलवाड़ ?

Posted On: 17 Sep, 2012 में

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आजकल देश में अभिव्यक्ति की आजादी और उसकी सीमा को लेकर बहुत गंभीर बहस चल रही है। एक बड़े वर्ग के अनुसार अभिव्यक्ति की आजादी की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए तो वहीं दूसरा वर्ग चाहता है कि अभिव्यक्ति की असीमित आजादी पर लगाम लगे।


देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर नियंत्रण कायम करने वाले कानून की व्याख्या भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 124 में की गई है जिसके अनुसार कोई भी व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सज़ा हो सकती है। यह जुर्म एक गैर जमानती जुर्म करार दिया गया है। हालांकि एक ओर भारतीय संविधान में देशद्रोह एक अपराध है तो वहीं दूसरी ओर संविधान में भारतीय नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी भी दी गई है। कहते हैं एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। कुछ ऐसा ही हाल संविधान में इन दोनों कानूनों की वजह से हो रहा है।


हाल ही में असीम त्रिवेदी द्वारा राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तंभ को लेकर बनाए गए कार्टून के विरोध में उन पर देशद्रोह का केस चलाया गया और इसी के एक दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने बयान दिया कि मीडिया के ऊपर किसी तरह की सेंसरशिप नहीं होगी लेकिन मीडिया को खुद अपने लिए सीमाएं और मानक निर्धारित करनी होंगी। इन दोनों मामलों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कई सवाल खड़े किए हैं जिसमें सबसे अहम है अभिव्यक्ति की आजादी कैसी और कितनी हो?


इस पूरे मुद्दे पर एक वर्ग ऐसा है जो अभिव्यक्ति की आजादी में रत्ती भर भी कमी नही चाहता है। उनके अनुसार हर इंसान को अपनी सरकार का विरोध करने का पूरा हक है और इसके लिए वह किसी भी साधन का प्रयोग कर सकता है। इनके अनुसार दुनिया के कई देशों में अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई पाबंदी नही है तो फिर भारत क्यों अंग्रेजी राज के इस पुराने रुढ़िवादी कानून को ढो रहा है। ऐसे लोगों का मानना है कि देशद्रोह से जुड़े कानून की आड़ में सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार करती है।


तो वहीं दूसरा वर्ग अभिव्यक्ति की आजादी पर नियंत्रण का पक्षधर है। उसके अनुसार अगर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लोग राष्ट्रीय चिह्नों और राष्ट्रीय स्मारकों को असीम त्रिवेदी जैसे लोगों की तरह इस्तेमाल करेंगे तो राष्ट्र की आत्मा को कुचलने का एक दौर चल निकलेगा जिसके परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं। इस वर्ग का मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार तो होना चाहिए लेकिन इसकी एक सीमा स्पष्ट रूप से तय होनी चाहिए।


अभिव्यक्ति की आजादी दिए जाने के विषय पर उपरोक्त चर्चा के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उठते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:

1. क्या अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाना चाहिए और अगर ‘हां’ तो किस हद तक?

2. क्या अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने के पीछे राजनीतिक मंशा है जो नहीं चाहती कि समाज को उनका विरोध करने का कोई हक मिले?

3. क्या “राजद्रोह कानून 124 ए” को भारतीय दंड संहिता से हटा देना चाहिए?

4. अभिव्यक्ति की आजादी कैसी और किस सीमा तक होनी चाहिए?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:

प्रतीकों से छेड़छाड़ – अभिव्यक्ति का तरीका या राष्ट्रीय गरिमा से खिलवाड़ ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “अभिव्यक्ति की आजादी” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व अभिव्यक्ति की आजादी – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum  नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhuwan19 के द्वारा
September 22, 2012

मैं सहमत हूँ |

Vandana Baranwal के द्वारा
September 20, 2012

बढ़ते भ्रष्टाचार, खरबों के घोटाले और उस पर से गलत नीतियां ये सब मिलकर एक युवा को संसद में सड़ांध पैदा होने का सन्देश दे रही हैं तो इसमें उस युवा की क्या गलती है. युवा कार्टूनिस्ट के पास जो अधिकार है वह उसी का तो प्रयोग कर सकता है. वह किसी को सजा तो दे नहीं सकता. http://vandanabaranwal.jagranjunction.com/2012/09/19/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%bf/#comments

ajaykumar2623 के द्वारा
September 19, 2012

सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रतीक तिरंगे का अपमान तो कांग्रेस के चुनाव चिन्ह में है,उसके बाद बीजेपी के चुनाव चिन्ह में राष्ट्रीय पुष्प का. ये अपमान इसलिए कि चुनावी रैलियों में पार्टी के झंडों का काफी प्रयोग होता है. और रैली ख़त्म होने के बाद वही झंडे धूल में, लोगों के पैरों के नीचे रौंदे जाते हैं. अब क्या सज़ा का हकदार केवल एक आम आदमी ही है. ये लोग नहीं http://ajaykumar2623.jagranjunction.com/2012/09/19/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%82/

तनूजा भटनागर के द्वारा
September 18, 2012

- असीम और इंडिया अगेंस्ट करप्शन हैं भारत गणराज्य के बागी – विश्व के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले समतावादी लोकतान्त्रिक राष्ट्र भारत का आदर्श है अशोक चक्र जो कि प्रतीक है उस आदर्श का जो कहता है “सत्यमेव जयते” अर्थात “सत्य की विजय हो” अथवा “सत्य ही धर्म है” और ऐसे आदर्श पर आधारित है भारतीय लोकतंत्र. इसी आदर्श को स्थापित करने के लिए हमारे राष्ट्र-ध्वज में अशोक चक्र को केन्द्रीय स्थान दिया गया है. यही वह आदर्श-वाक्य है जिसने भारतीय गणराज्य को विश्व में सर्वश्रेष्ठ लोकतान्त्रिक देश के रूप में मान दिलाया है. कौन हैं ये लोग जो सरकार की आलोचना की आड़ में भारत के लोकतान्त्रिक संविधान और उसके प्रतीकों पर हमले करते कह रहे हैं कि “भारत में सत्य ही धर्म नहीं बल्कि भ्रष्टता ही धर्म है”? और भारत के राष्ट्र-चिन्ह को अपनी इस घृणित मानसिकता से दूषित कर रहे हैं और भारतीय लोकतंत्र को भ्रष्ट बताकर दुष्प्रचार कर रहे हैं? क्या यह हम सभी भारतीयों का अपमान नहीं है? क्या यह हमारे देश का अपमान नहीं है? क्या कोई भी भारतीय इस अपमान को सहन कर सकता है? यह ना सिर्फ देश के विरुद्ध अक्षम्य अपराध है बल्कि हम सभी देशप्रेमी नागरिकों का घोर अपमान है . आज के ग्वालियर से प्रकाशित अखबार दैनिक जागरण के मुख्पृष्ठ पर प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने असीम त्रिवेदी की गिरफ़्तारी पर कहा है कि “असीम त्रिवेदी की गिरफ़्तारी गंभीर अपराध है. कार्टूनिस्ट की गिरफ़्तारी के पीछे शामिल नेताओं और पुलिस अधिकारीयों को गिरफ्तार किया जाना चाहिये”. मार्कंडेय काटजू का यह बयान ही काफी है उनकी देश-विरोधी संविधान-विरोधी विध्वंसक मानसिकता को समझने के लिए और अब डा. बाबासाहब आंबेडकर डेमोक्रेटिक राईट्स फोरम – डी. आर. एफ. (डा. बाबासाहब आंबेडकर लोकतान्त्रिक अधिकार फोरम) उनके इस वक्तव्य को आधार बनाकर उनके विरुद्ध राष्ट्रद्रोह और देश के प्रशासन के विरुद्ध विध्वंशकारी दुष्प्रचार करके क़ानून व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के प्रयास का अपराध करने के लिए कानूनी कार्यवाही कर उन्हें राष्ट्रद्रोह में गिरफ्तार कराने पर विचार कर रहा है. इसी तरह इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सर्वेसर्वा अरविन्द केजरीवाल और उनके गिरोह के सदस्य दलील दे रहे हैं कि असीम ने यह कृत्य सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने के लिए किया है. क्या ये बीमार मानसिकता वाले लोग बता सकते हैं कि क्या राष्ट्र-चिन्ह सरकार का प्रतीक है या देश का? यदि इन्हें सरकार की नीतियों से विरोध है या सरकार की कार्यवाहियों से विरोध है तो ये सरकार की उन नीतियों का विरोध करें. देश के आदर्शों का अपमान करने के कुप्रयासों को राष्ट्रद्रोह नहीं तो और क्या माना जाए? इससे इनकी संविधान-विरोध की मानसिकता उजागर हो गई है. संविधान और क़ानून के अंतर्गत यह कृत्य किस प्रकार राष्ट्रद्रोह है? इसे समझने के लिए संविधान का अनुच्छेद ५१-अ देखें जिसमें प्रत्येक भारतीय नागरिकों के संवैधानिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है. हर कोई बस अपने संवैधानिक अधिकारों की बात करता है किन्तु यह सोचने की जहमत कोई नहीं उठता कि देश के प्रति हमारे संवैधानिक कर्त्तव्य भी है. जबकि असीम और उसके जैसी मानसिकता वाले देशद्रोहियों ने तो अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों के विपरीत जानबूझकर देश के सम्मान के विरुद्ध कुकृत्य किए हैं. जिस “फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन” की दुहाई ये लोग छाती पीट पीटकर देते रहते हैं, क्या अपने देश की और अपने देश के संविधान की अवमानना करना भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है? क्या अपने माँ-बाप को गालियाँ देना उचित है यदि उन्होंने परवरिश में कोई कमी कर दी हो तो? और असीम जैसे लोग यदि अपने माँ-बाप को गालियाँ देना चाहें तो ठीक है ये उनका घर का मामला है. किन्तु वे “फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन” की आड़ लेकर पूरे देश को अपशब्द कहने का अधिकार नहीं रखते, यही है राष्ट्रद्रोह. “फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन” क्या है इसे जानने के लिए संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (अ) और १९ (२) देखें. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्त्ता कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी ने भारतीय लोकतंत्र को प्रतिबिंबित करने वाले भारतीय राष्ट्र-चिन्ह का कार्टून बनाकर क्या अपने माता-पिता का ही कार्टून नहीं बना डाला है? क्या उसके माता पिता ने उसे यह आदर्श सिखाया है कि “भ्रष्ट ही धर्म है”? भारतीय राष्ट्र-चिन्ह के साथ लिखे गए आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” को बिगाड़कर “भ्रष्ट्मेव जयते लिख देना, और अशोक स्तंभ के शानदार चार शेरों की जगह भेड़ियों की शक्ल बना देना, यह किस विचार को दर्शाता है? क्या असीम और उसके समर्थक यह कहना चाहते हैं कि भारत देश का आदर्श-वाक्य “भ्रष्ट्मेव जयते” है? और क्या भारत देश में सभी भेडिये रहते हैं? क्या असीम के माँ-बाप ने उन्हें यही सिखाया है कि भ्रष्ट बनो और भेडिये की तरह कायर और धोखेबाज बनो? उन्हें उनके माँ-बाप ने यदि उन्हें यह सिखाया है तो यह उनके घर का मामला है, किन्तु वे यह बात सभी भारतीयों के लिए कह रहें हैं तो यह सभी नागरिकों और देश का घोर अपमान है. क्या उसके माता पिता ने उसे यह आदर्श सिखाया है कि “असत्य ही धर्म है”? यदि ऐसा है भी तो भी उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वो हम सभी भारतीयों का यह कहकर अपमान करें कि “भारत के लोकतंत्र में भ्रष्टता ही धर्म है” या कि “भारत का लोकतंत्र भ्रष्टता का तंत्र है”. यह साफ़ तौर पर भारत गणराज्य के विरुद्ध बगाबत है और असीम त्रिवेदी, इंडिया अगेंस्ट करप्शन और उनके समर्थक राष्ट्रद्रोही हैं. ये भारतीय समाज में आपसी वैमनस्य फैलाने की साजिश करके अपने निहित राजनीतिक स्वार्थ पूरा करना चाहते हैं. सरकार का यह संविधानिक कर्त्तव्य है कि वो इन राष्ट्रद्रोहियों से सख्ती से निपटें और इन्हें जेल की दीवारों के पीछे पहुंचाकर देश में शांति और सौहार्द्र को कायम रखे. साथ ही सभी देशप्रेमी भारतीयों को इनका सामाजिक बहिष्कार करके इन्हें अलग थलग करना होगा ताकि ऐसे राष्ट्रद्रोही देश में वैमनस्य ना फैला सकें और हम “विविधता में एकता” के आदर्श को कायम रखते हुए “समता – सर्वधर्म समभाव – सत्य ही धर्म है” के अपने राष्ट्रीय आदर्श पर गर्व कर सकें.

डॉ. एच. सी. सिंह के द्वारा
September 18, 2012

राष्ट्रीय प्रतीकों के साथ अभिव्यक्ति के नाम पर छेड़छाड़ की आज़ादी नहीं दी जा सकती. और बहुत से माध्यम हैं जिससे अपनी बात को समाज एवं राष्ट्र के समक्ष रखा जा सकता है. यह अभिव्यक्ति की आजादी का ही नमूना है कि अरुंधती रॉय जैसे लोग कश्मीर को लेकर बयान देते हैं कि भारत ने उस पर अबैध कब्ज़ा कर रखा है. जिस अभिव्यक्ति से राष्ट्र एवं राष्ट्र की अस्मिता को अघात पहुचे उससे बचाना चाहिए.

    ragini के द्वारा
    September 20, 2012

    aapki bat sahi hai Do.sinh. rashtriy pratiko ke sath abhivyakti ke naam par chhedchhad nahi di ja sakati. agar aisa hi hai to model poonam pande ne Tiranga pahna tha to virodh kyon?

snsharmaji के द्वारा
September 18, 2012

अगर यही मापदण्ड है तो सबसे बडी अपराधी कांग्रेस है 65 सालो  से ऱाष्ट्रीय  झण्डा अपना  रखा है जब जी चाहे सफेद पटी पर हाथ छाप देते हैं जब जी चाहे सोनिया का फोटो  अजीब गदर फण्ड है एक मामला नकली पासपोर्ट का बालकृष्ण पर दरज किया था जब राहुल गान्धी राउल विनसी के नाम  से  पासपोरट बनवा सकता है तो उस पर मुकदमा क्यो नही

sushma के द्वारा
September 17, 2012

प्रतीकों से छेड़छाड़ से मेरी राय है की ये एकदम अनुचित है . यदि हम अपने प्रतिको के प्रति सम्मान को ही बचा नहीं पायें तो फिर हम किस बात के भारतीय .दरअसल अपने गुस्से को प्रकट करने के और भी तरीके है .इस प्रकार के कृत्या करके आखिर आप क्या जताना चाहते है.की आप बहुत बुद्धिमान है. या आप ओरो से अलग है. प्रतिक हमारे प्रतिबिम्ब है.हमारे भारत को जानने का जरिया है अगर हम इसके रूप को ही कुरूप बनाकर प्रस्तुत कर दे तो हमारा ही क्या अस्तित्व रहेगा.ये हमारे गौरव है और हमें हर हल में इनकी मन मर्यादा बनाये रखनी होंगी.

subesinghsujan के द्वारा
September 17, 2012

देश के प्रतीकों से छेडछाड पर प्र्रतिबंध होना ही चाहिये। वो देश का नागरिक ही क्या है। जो अपनी अभिव्यक्ति के लिये देश पर कीचड उछालकर ही अभिव्यक्ति कर पाता हो। इसका अर्र्थ तो यह हुआ कि वह व्यक्ति ही सम्पूर्र्ण नहीं है तो उसे देश के सम्मानीय प्र्रतीकों पर बेहुदा लिखने व बोलने का क्या हक है। हम इस तरह अगर हर आज़ादी देते गये तो लोग कल दूसरों को मारने पर भी कहेंगे कि यह मेरी आज़ादी पर निर्र्भर है कि मैं किसी को भी मारूँ,यह तो मानवीय दृष्टिकोण से ही खारिज़ हो जाएगा। फिर तो मानव, मानव नहीं कहला सकता।आजादी की अपनी सीमा है। जिस जगह आदमी सही बात कह रहा है। वहीं आज़दी दा समर्र्थन होना चाहिये। यह कानून के दायरे में ही रहना चाहिये। सूबे सिंह सुजान

ALOK KUMAR SINGH के द्वारा
September 17, 2012

प्रतीकों से छेड़छाड़ – अभिव्यक्ति का तरीका या राष्ट्रीय गरिमा से खिलवाड़ ? या कानून संख्या १२४ अ में शंसोधन ? बहस किसपे हो देश के कानून संरक्षकों को यह जबाब देना आवश्यक है, एवं जनता को भी इस विषय पे चर्चा करनी चाहिए.

arpansinghsomvanshi के द्वारा
September 17, 2012

यू. पी ए. सरकार का समस्त कार्यकाल घोटालो से भरा है जिसके कारण पूरे देश में सरकार के प्रति लोगो में आक्रोश है देश की जनता सरकार की नीतियों से हताश और परेशान है पूरा देश अपनी मांगो को लेकर सड़क पर आ गया है । यह एक जनाक्रोश है लोगो का महंगाई के प्रति, भ्रष्टाचार के प्रति। असीम त्रिवेदी ने इसी जन भावना को एक रूप दिया है अपने कार्टून के माध्यम से, इसी जन भावना का नतीजा है असीम को गिरफ्तार किये जाने के बाद लोगो का अपर जनसमर्थन मिला। और जहाँ तक बात प्रतीकों से छेड़छाड़ की है तो ये विरोध के तरीके और भावना पर निर्भर करता है।

bharodiya के द्वारा
September 17, 2012

आम आदमी गुस्से का मारा बंदुक ना उठा ले ईस लिए बोलने की आजादी का हक्क दे दिया था, हर देश में । जीस से आदमी की भडास निकल जाए । गाली से कोइ नेता मर नही जाता, गोली से जरूर मरता है । सरकारमें अकल ही नही है की पाबंदी की सोचती है ।

सुनिल के द्वारा
September 17, 2012

अभिव्यक्ति की आजादी में हम रति भर की भर कमी नहीं चाहते हैं. यह सरकार जब हमारा खूब चूसने का कोई भी रास्ता नहीं छॉड़ना चाहती तो भला हम उसकी बुराई करने के लिए किसी भी हथियार का इस्तेमाल ना करने के लिए क्यों बाधित है…. यह सरकार निक्कमी है.. आजाद भारत की भ्रष्टतम सरकार है और तो और इसके सहयोगी भी बेहद भ्रष्ट है,.


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