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प्रोन्नति में आरक्षण - दलितोत्थान की नीयत या वोट बैंक का ख्याल ?

Posted On: 10 Sep, 2012 में

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भारतीय संविधान में आरक्षण की पैरवी करते समय संविधान निर्माता और दलित समाज के मसीहा माने जाने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर ने यह भी प्रयास किया था कि आरक्षण को धीरे-धीरे खत्म भी कर दिया जाए। लेकिन वोट बैंक और जाति के नाम पर होने वाली राजनीति ने आज आरक्षण को एक ज्वलंत मुद्दा बना दिया है।


हाल ही में संसद में प्रोन्नति में आरक्षण का बिल पेश किया गया। यूपी की राजनीति से निकली यह आवाज अब संसद में गूंजने लगी है। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों को प्रमोशन में रिजर्वेशन देने का फैसला किया था। लेकिन इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संविधान की भावना के खिलाफ बताकर नामंजूर कर दिया था। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि संविधान में आरक्षण की व्यवस्था केवल ‘मूल पद पर नियुक्ति’ तक ही सीमित है, इसलिए सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण असंवैधानिक है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि देश में नौकरी कर रहे अनुसूचित जाति और जनजाति के ‘पिछड़ेपन’ का आंकड़ा कितना है, जिसके आधार पर प्रमोशन में रिजर्वेशन की मांग की जा रही है।


पर सरकार ने संविधान में ही संशोधन के जरिए नौकरी में आरक्षण को कानूनी जामा पहनाने की तैयारी कर ली है। अब सवाल उठता है कि ऐसा आरक्षण दिया जाना चाहिए या नहीं?


प्रोन्नति में आरक्षण की मांग करने वालों का कहना है कि सरकार ने नौकरियों में तो दलितों और पिछड़ों को आरक्षण दे उनका सामाजिक स्तर बढ़ाने की दिशा में कुछ कार्य किया लेकिन नौकरी मिलने के बाद अकसर दलितों को उच्च स्तर और बड़े पोस्टों पर पहुंचने के अवसर नहीं मिल पाते। उनके अनुसार आज भी किसी विभाग में उच्च पदों पर दलितों की संख्य नगण्य है।


वहीं दूसरी ओर प्रोन्नति में आरक्षण का विरोध करने वालों का मानना है कि इससे योग्यता और क्षमताओं का अर्थ ही खत्म हो जाएगा। अगर प्रोन्नति में रिजर्वेशन मिलने लगेगा तो जहां एक तरफ दलितों को बहुत जल्दी प्रमोशन मिलेगा तो वहीं दूसरी ओर हो सकता है अधिक कार्य क्षमता वाले अधिकारी का प्रमोशन बहुत धीरे स्तर पर हो। ऐसे लोगों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति प्रशासनिक कार्यों के लिए या किसी बड़े सरकारी विभाग में नियुक्त होता है तो उसे जाति और धर्म से ऊपर उठ कर काम करना चाहिए। उनका कहना है कि पहले ही आरक्षण लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 335 में संशोधन कर अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को अर्हता के तमाम मानकों में छूट दी जा चुकी है। इतना ही नहीं सरकार के इस कदम से असहमत लोगों का यह भी कहना है कि यह मामला सामाजिक पिछड़ेपन का तो है ही नहीं बल्कि यह मात्र राजनीतिक लाभ से प्रेरित है।


प्रोन्नति में आरक्षण दिए जाने के विषय पर उपरोक्त चर्चा के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उठते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या प्रोन्नति में आरक्षण देने से ही दलितों का वास्तविक कल्याण होगा?

2. क्या प्रोन्नति में आरक्षण देने के मामले में जातिवाद पर आधारित राजनीति हावी हो रही है?

3. क्या भारत में आरक्षण योग्यता और श्रेष्ठता को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है?

4. क्या प्रोन्नति में आरक्षण देने से देश में वैसे ही हालात पैदा हो सकते हैं जैसे मंडल आयोग के लागू होने पर हुए थे?

5. ‘प्रोन्नति में आरक्षण होना ही चाहिए’ इसके पक्ष में क्या-क्या तर्क दिए जा सकते हैं?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


प्रोन्नति में आरक्षण – दलितोत्थान की नीयत या वोट बैंक का ख्याल ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “प्रोन्नति में आरक्षण” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व “प्रोन्नति में आरक्षण – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dharmendra Prakash के द्वारा
September 15, 2012

आरक्षण न तो सवर्णों का त्याग है और न पश्चाताप और न ही मजबूरी | मजबूरी का नाम तो कभी महात्मा——हो ही नहीं सकता | क्योंकि महात्मा का लोग अर्थ समझते हैं महान आत्मा और जिसकी और इशारा है वह ——-महात्मा था ही नहीं | आरक्षण यदि सवर्णों का त्याग होता तो दलितों को यह हजारों साल पहले मिल गया होता | आरक्षण यदि सवर्णों का पश्चाताप होता, तो भी यह दलितों को हजारों साल पहले मिल गया होता आरक्षण यदि सवर्णों की मजबूरी होती तो भी यह दलितों को हजारों साल पहले मिल गया होता | आरक्षण यदि मजबूरी का नाम महात्मा——होता तो गाँधी इसका विरोध कभी नहीं करते ! चूँकि दलितों को आरक्षण तो १९३१ में ही अंग्रेजों ने दे दिया था | राजनैतिक आरक्षण तब दिया गया जब दलितों की बराबर की हिस्सेदारी की मांग डॉ बी आर अम्बेडकर ने अंग्रेजों से की थी और अंग्रेजों ने इसे लागु करने का मन भी बना लिया था | किन्तु तथाकथित गाँधी ने सितम्बर १९३२ में आमरण अनशन करके दलितों की हिस्सेदारी की मांग को दरकिनार करा दिया | आरक्षण का विरोध व् समर्थन करने वाले सभी को यह समझना जरूरी है की आखिर आरक्षण क्यों दिया गया ? शायद इस प्रश्न का उत्तर गिने -चुने लोग ही जानते होंगे | मेरे पास इसका उत्तर आज भी है किन्तु मैं इसका उत्तर इस लेख में नहीं देना चाहता | फिर भी ऊपर सुझाये गए मत से मैं सहमत नहीं हूँ क्योंकि जब तक इस देश में जाति व्यवश्था कायम रहेगी तब तक अछूतपन बना रहेगा और जब तक अछूतपन रहेगा तब तक बराबरी नहीं आ सकती ! फिर भी आरक्षण का विरोध करने वालों को याद रखना चाहिये कि केवल राजनैतिक महत्वाकांक्षा की खातिर झूंठ का सहारा क्यों लिया जा रहा है कि प्रमोशन में आरक्षण असवैधानिक है ? उनका यह कहना हास्यापद है कि प्रमोशन में आरक्षण मिलने से जूनियर, सीनियर हो जायेगा और सीनियर, जूनियर हो जायेगा | विदित रहे कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन चरित्र प्रविष्टी के आधार पर होता है अर्थात किसी दलित का प्रमोशन भी तभी होगा जब उसकी चरित्र प्रविष्टी अच्छी होंगी | फिर किसी सामान्य व्यक्ति की योग्यता कैसे प्रभावित हो सकती है ? प्रमोशन में आरक्षण श्री मोहनदास करमचंद गाँधी व् डॉ० भीमराव अम्बेडकर के बीच २३ सितम्बर १९३२ में हुए पूना पैक्ट के अनुसार दलितों का अधिकार है और यह अधिकार मिलना ही चाहिए | साथ ही एस० सी०/एस०टी० की भांति उच्च पदों पर पिछड़े वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने के कारण पिछड़े वर्ग का भी प्रमोशन में आरक्षण का प्राविधान होना चाहिए | प्रमोशन में आरक्षण का विरोध करने वालों को भी सदबुद्धि से दलितों के साथ साथ पिछड़ों को भी प्रमोशन में आरक्षण मिले, यही मांग करनी चाहिए | प्रमोशन में पिछड़े वर्ग को भी आरक्षण मिले इस मांग का पूरा दलित समाज समर्थन कर रहा है | यदि उपरोक्त मांग आरक्षण विरोधियों को अच्छी न लगे तो दूसरा विकल्प है कि देश की धन-धरती, शासन प्रशासन, सेना, न्यायपालिका, व्यापार और मीडिया पर काबिज लोग एक बार दलितों को देश की धन -धरती, शासन प्रशासन, सेना, न्यायपालिका, मीडिया और व्यापार में आबादी के अनुपात में बराबर की हिस्सेदारी दे दो |   यदि आरक्षण विरोधियों को दूसरा विकल्प भी अच्छा नहीं लग पा रहा हो तो तीसरा विकल्प है कि फिर पूरे देश में अंतरजातीय विवाह अनिवार्य कर २० साल के अन्दर जाति नाम का समूल नाश कर जाति व्यवस्था ख़त्म कर समता मूलक समाज बना दो | शायद फिर दलितों को प्रमोशन में आरक्षण और नौकरियों में आरक्षण की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी | यदि आरक्षण विरोधी उपरोक्त तीनो विकल्प में से कोई भी मानने को तैयार नहीं है तो फिर देश के मूलनिवासी दलितों और पिछड़ों को तीसरी आज़ादी की लड़ाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए | -धर्मेन्द्र प्रकाश, अध्यक्ष, भारतीय मूलनिवासी संगठन |

    bharodiya के द्वारा
    September 15, 2012

    दुसरा विलल्प ही ठीक रहेगा । जीस से १०० टका आरक्षणवाला एक अच्छा सा कोटलेंड बन जायेगा ।

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
September 14, 2012

हमारे असमान भारतीय समाज में जहां एक वर्ग को हज़ारों वर्षों से नीचा समझा जाता रहा है! जिसकी दबी हुयी भावनाए आज भी ज़्यादातर लोगों के दिमाग में व्याप्त हैं, वहां अगर इस वर्ग को आरक्षण तब दिया गया जब गांधी ने उन्हें भावनात्मक रूप से अपनी जान दे देने की धमकी देने के बाद इस वर्ग को मिले विशिष्ट चुनाव के अधिकारों को छीन लिया था! नहीं तो जैसे आज मुस्लिमों के लिए अलग देश है, (जहां वे हिदुओं पर अत्याचार करते हैं) लगभग उसी तरह भारत में ही यह दलित वर्ग होता जिसे स्वयं अपने विकास करने की लिए नीतियाँ बनाने का अधिकार होता तथा किसी आरक्षण की आवश्यकता भी न पड़ती! ऐसे में इतने बड़े अधिकार का त्याग करके इस वर्ग के हाँथ में कुछ प्रतिशत आरक्षण आया, जिससे उसका कब तक भला हो पायेगा? यह इस वर्ग को स्वयं नहीं पता, क्योंकि इसके लिए उसे उसी वर्ग के सर्वाधिक नेताओं की नीतियों पर आश्रित रहना है, जो उन्हें हमेशा से नीच समझते चले आ रहे हैं और आज भी वही मानसिकता अपने ह्रदय में रखते है, जिसके चलते आरक्षण के माध्यम से नौकरी मिलने के बाद भी इस वर्ग के लोगों को भविष्य में पदोन्नति नहीं मिल पाती क्योंकि पहले से उच्च पदों पर विराजमान महानुभाव उसी मनुवादी मानसिकता से ग्रस्त है, जिसके अनुसार शूद्र की छाया भी उन्हें अपवित्र कर देगी फिर उन्हें बराबर की कुर्सी पर या ऊँचे पदों पर वे कैसे देख पायेंगे? कोई कुछ भी कहे सौ बार या बार-बार चिल्लाने से झूठ सच नहीं हो जाता, न ही आँखों पर पट्टियां बाँध लेने से सब कुछ सही हो जाता है, सत्य सत्य ही रहता है, आज तक समाज में किसी उच्च वर्ग के व्यक्ति ने इस जाती-पाती के भेदभाव को मिटाने के लिए सच्चे मन से काम नहीं किया, गांधी ने तो मुंह में राम बगल में छुरी की कहावत चरितार्थ की है, मुस्लिमों को पाकिस्तान की मांग पर कोई अनशन नहीं, जबकि दलितों के अधिकारों के विरुद्ध आमरण अनशन….चलिए फिर भी हमें आरक्षण नहीं चाहिए! किन्तु कितने सच्चे माँ के लाल हैं जो वाकई समाज में समानता के समर्थक हैं,कितने सवर्णों ने अपने नामो से जाती सूचक शब्द हटाये हैं? या क्या अब वे सब अपने नामों से जाती सूचक शब्द हटाने को तैयार है? दलित एवं पिछड़े वर्ग के लोगों से भी यही प्रश्न है की वे स्वयं अब अपने आने वाली पीढ़ी के नामों से जाती सूचक शब्दों को हटायें! यदि ऐसा होगा तो जाती आधारित आरक्षण स्वतः समाप्त हो जाएगा! क्योंकि जाती आधारित आरक्षण की मूल जड़ गरीबी एवं पिछडापन नहीं बल्कि स्वयं जाती है..जो तभी जाती है जब व्यक्ति एवं समाज इसे स्वयं त्याग दे, इसके लिए किसी मंत्री के आदेश या किसी क़ानून का इंतज़ार करने वाले सिर्फ ऐसे ढोंगी होंगे, जो तथाकथित श्रेष्ठता को बरकरार रखते हुए आरक्षण को ख़त्म कर देना चाहते हैं तथा दुसरे वे जो पिछड़ी जाती को कायम रखते हुए शिक्षा और नौकरी में लाभ पाना चाहते हैं….राजनीतिज्ञों के साथ ये दोनों वर्ग असमानता के लिए ज़िम्मेदार हैं ….अब भी कुछ और अधिक पढना हो तो नीचे की लिंक पर क्लिक करें http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/09/11/aarakshan/

ajaykumar2623 के द्वारा
September 14, 2012

बेशक आरक्षण पिछडो को आगे बढाने का एक सशक्त माध्यम है. फिर भी कई जगहों पर ये भी देखा जाता है कि एक ही परिवार में कई उच्च अधिकारी जैसे आई ए एस , आई पी एस होते हैं सिर्फ आरक्षण के कारण. जबकि इसके उलट सामान्य वर्ग के गरीब लोग उन पदों का केवल स्वप्न देख पाते हैं. क्योंकि ना तो उनको पढाई में किसी किस्म की सहायता मिलती है, ना ही नौकरी के लिए किसी आवेदन में शुल्क से मुक्ति. अधिक के लिए http://ajaykumar2623.jagranjunction.com/2011/07/19/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AE-%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3/

shalinikaushik के द्वारा
September 14, 2012

सब राजनीति है और कुछ नहीं

ranjiita के द्वारा
September 13, 2012

आरक्षण किसी का उत्थान करने हेतु नहीं अपितु वोट बैंक बढ़ने के लिए उठाया गया कदम है ,जब स्वयं अम्बेड कर जी इसे दस वर्ष में ख़त्म करना चाहते थे तब नेताओं ने राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए इसे बाधा दिया .आज ये हालत हैं की हर कोई आरक्षण रुपी बैसाखी के सहारे ही आगे बढ़ने की सोचता है ,और काबिल लोगो को अवसर नहीं मिलता . आरक्षित वर्ग को किसी एक नौकरी में जाने पर कितनी बार इसका लाभ प्राप्त हो जाता है क्या यह सोचा किसी ने कभी? ज़रा सोचो जब किसी आरक्षित वर्ग के आदमी को कोई नौकरी मिलती है तब; १-उसे किसी प्रशिक्षण लेने हेतु आरक्षण सहित फीस माफ़ी मिल जाती है २- भारती के समय फॉर्म की दरों में छूट मिलती है ३ कट ऑफ़ मार्क्स में काफी छूट मिलती है ४-सीटों की छूट (केवल इसे ही हम आरक्षण मानते हैं) तो मिलनी ही है ५ आरक्षण प्राप्त व्यक्ति के परिवार को भी आरक्षण ज्यों का त्यों मिलता रहता है जबकि वह हर तरह से सक्षम हो चूका होता है उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं होती और जो लोग काबिल होते हैं वह नाकाबिल लोगों का मुह ताकते रह जाते हैं क्या इसके बाद भी पदोन्नति के लिए आरक्षण की ज़रुरत है ?जब आरक्षण मिलते मिलते ६० दसक बीत गए और देश का भला नहीं हुआ तो अब कैसे हो सकता है? इस आरक्षण की देश को ज़रुरत नहीं है इसे ख़त्म होना चाहिए काबिलियत के हिसाब से हर व्यक्ति को अवसर मिलना चाहिए ,यही हमारा संविधान कहता है .आरक्षण संविधान के प्रस्तावना के ही खिलाफ है .और साथ ही हर जगह पर फोरम्स में से जजाती और वर्ग का कोलुम ख़त्म कर देने की आवश्यकता है .तभी देश सही दिशा में उन्नति करेगा . आरक्षण से दलगत वैमनष्यता ही बढती है देश का विकास नहीं. .आरक्षण देश को तोड़ रहा है

Madan के द्वारा
September 12, 2012

आरक्षण – आजाद देश में सबको बराबर का हक मिले इस उद्देश्य से लागू किया था और केवल दस सालों के लिए जिससे दलित व पिछला वर्ग ऊपर उठ जाए और तब इस व्यवस्था को ख़तम कर दिया जाएगा. लेकिन राजनीति ने इस व्यवस्था से वोट बैंक की राजनीति की और इसको लगातार जारी रखे हुए है. ये लोग नहीं चाहते कि दलित व पिछला वर्ग ऊपर उठ जाए और उसकी आरक्षण कि जरुरत ख़तम हो जाए. इन्होने आरक्षण को ठीक ढंग से लागू ही नहीं किया. अगर ये लोग चाहते हैं कि आरक्षण से सभी दलितों व पिछलों को लाभ हो तो इनको आरक्षण के तरीके में बदलाव कि नीति अपनानी होगी. अगर इसी तरीके से ये लोग आरक्षण को जारी रखते रहे तो इसे कितने भी साल लागू करके रखें इससे वंचितों को कभी भी भला नहीं हो सकता बल्कि उलटे समाज में ये लोग स्वर्ण जातिओं के वमंस्य का शिकार होते रहेंगे. क्रीमी लेयर का आरक्षण बंद करके केवल उनको आरक्षण देना होगा जिनको इसका लाभ कभी मिला ही नहीं. जिसको एक बार आरक्षण का लाभ मिल गया उसको कभी भी आगे आरक्षण का लाभ न मिलकर आरक्षण को लाभ उनको मिले जिनको अब तक नहीं मिला. इस तरीके से आरक्षण देने से सब दलितों व पिछलों का कल्याण होगा. ऐसी सोच कर न तो सरकार की है और न ही विपक्ष की. और ये वास्तव में चाहते भी नहीं दलित व पिछले ऊपर उठें. मायावती, रामबिलास पासवान व कांग्रेस कभी नहीं चाहेगी कि सभी दलित व पिछले ऊपर उठे. क्योंकि उसकी राजनीती ही तब तक है जब तक ये दलित व पिछले इसी हालत में रहेंगे. ये उनको आरक्षण का लालीपॉप देकर वोट बटोरते रहेंगे और इनकी राजनीती कि रोज़ी-रोटी चलती रहेगी. ……….. जय हिंद

Vandana Baranwal के द्वारा
September 12, 2012
S N SHARMA के द्वारा
September 12, 2012

प्रोमोशन मे आरक्षण की बजाए भर्ती मे सही अनुपात हो प्रोमोसन आरक्षण कई प्रकार की गलत  प्रथा  को जन्म देगा जैसे एक ही आदमी का भला डबल फायदा कामचोरी ब्लैकमेलींग मेरीट की अमदेखी प्रतियोगी परीक्षाओ से विमुखता आदि अच्छा हो पढाई मे सिर्फ सहायता हो ताकि स्वाभाविक गुणम पनप सकें

pooran chand के द्वारा
September 11, 2012

1  हा प्रोन्नति में आरक्षण देने से ही दलितों का वास्तविक कल्याण होगा | सरकार ने नौकरियों में तो दलितों और पिछड़ों को आरक्षण दे उनका सामाजिक स्तर बढ़ाने की दिशा में कुछ कार्य किया लेकिन नौकरी मिलने के बाद अकसर दलितों को उच्च स्तर और बड़े पोस्टों पर पहुंचने के अवसर नहीं मिल पाते। उनके अनुसार आज भी किसी विभाग में उच्च पदों पर दलितों की संख्य नगण्य है। यह सत्य है | २.प्रोन्नति में आरक्षण देने के मामले में जातिवाद पर आधारित कोइ राजनीति हावी नहीं है जैसा की शिक्षा का भी ध्रवीकरण हो चूका है उच्चा जाती वालो के पास पैसा है वो पैसे के बल पर उची शिक्षा में प्रवेश प् लेते है और दलित होशियार बच्चे उची शिक्षा से वंचित रह जाते है | ३. क्या भारत में आरक्षण योग्यता और श्रेष्ठता को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है नहीं ये गलत है| आरक्षण से बरबरी आने लगी | शादियों से गुलामी झेल रहे लोगो को जीने का रास्ता मिला है और ये लोग मेहनत से काम कर देश को ऊपर लेजा रहे है | ४. क्या प्रोन्नति में आरक्षण देने से देश में वैसे ही हालात पैदा हो सकते हैं जैसे मंडल आयोग के लागू होने पर हुए थे? नहीं उस समय लोग भ्रम में थे | उत्तर प्रदेश में सपा सरकार ने जान बुझ बदले की भावना से आरक्षण का विरोध किया है| ५. आरक्षण से समानता के अवसर मिले है जिसे जीवन स्थर सुधार है , गुलामी से दलित मुक्त हो रहे है , ज्यादा लोग शिशीत हो रहे है , दलित स्वयम रोजी रोटी कमाने के लिए सशक्त हो रहा है , सभी में बराबरी आ रही है तो भारत का गौरव दुसरे देशो में बढ़ रहा है |

September 11, 2012

प्रोन्नति में आरक्षण से सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है। माना की दलितों की स्थिति खराब है लेकिन कहीं कहीं तो सामान्य वर्ग की हालत दलितों से भी ज्यादा खराब है। आरक्षण व्यवस्था समाज में जातिवाद और अगड़ी तथा पिछड़ी जातिओं में द्वेष बढ़ा रही है।

ashokkumardubey के द्वारा
September 11, 2012

दलितों को मात्र आरक्छन दे देने से उनका उद्धार हो जायेगा यह नेताओं की वोट बैंक की राजनीती के आलावा और कुछ नहीं जब से देश आजाद हुवा तब से आरक्छन है और हमारे भारतीय संविधान के रचयिता बाबा भीमराव आंबेडकर ने भी आरक्छन को धीरे धीरे समाप्त करने की वकालत की थी पर हमरे नेता अपनी वोट बैंक की राजनीती के तहत संविधान में संशोधन करके आरक्छन को साल दर साल बढ़ाते जा रहें हैं और उसका परिणाम सबके सामने है आज कितने दलितों का उद्धार इस आर्कछां से हुवा यह दलित समाज भी अच्छी तरह जानता है मेरी राय में तो आरक्छन से दलित और भी पिछड़ा होता जा रहा है क्यूंकि उसको फिर आगे बढ़ने की कोई जरुरत ही महसूस नहीं होती वह सोचे बैठा है पढो न पढो आरक्छन हमें नौकरी तो दिला ही देगा , भाल ऐसे में वह क्यूँ परिश्रम करके प्रतियोगिता में भाग लेकर सबके साथ मुकाबला कर आगे आने की सोचेगा ? अतः आज जरुरत ऐसी पाठशालाओं की ऐसे कालेजों की जहाँ दलितों को मेधावी बनाने के लिए विशेस कोर्से कराये जाएँ इसके लिए जो सरकारी सुविधाएँ उपलब्ध करनी हो वो करायी जाये और उभे प्रतियोगी परीक्छा के लिए तैयार किया जाये फिर उनका भी मनोबल ऊँचा होगा और वह अपने को दलित न समझ अगड़ा समझेगा अपने को किसी से कम नहीं समझेगा अगर सचमुच हमरे देश के दलित हिमायती नेता दलितों का भला चाहते हैं तो दलितों को मुफ्त सिक्छा अछे स्कूलों में दिलाने के लिए शख्त कानून बनाये यहाँ तक की पब्लिक स्कुल के साथ प्राईवेट स्कूलों में जरुर आरक्छन द्वारा उनको दाखिला मिले ताकि वे भी अपने समज की मुख्य धरा में ला सकें और सामान्य विद्यार्थियों की तरह ही दलित विद्यार्थी भी प्रतियोगी परीक्छा में बहग लेकर हर तरह की पढाई करके अपना करियर बना सके ऐसा करने से आरक्छन की उनको जरुरत ही नहीं पड़ेगी अतः प्रोन्नति में आर्कछां देना संविधान और आरक्छन के सिध्धांत के खिलाफ फैसला है और यह नेताओं की सोंची समझी चाल है दलितों को और पिछड़ा बनाने की प्रोन्नति देने के मामले में केवल और केवल जातिवाद पर आधारित राजनीती हावी हो रही है और यह समज को तोड़ने की साजिश नेताओं द्वारा की जा रही है दलितों को मुख्य सामाजिक धरा से अलग रखने की ही यह नेताओं की चाल है . आरक्छन मेधावी छात्रों का मनोबल तोड़ रहा है ,और योग्यता को समाप्त करता जा रहा है अब योग्य लोग मन मरकर निराशा की जिंदगी जीने को मजबूर किये जा रहें हैं दिनोदिन आरक्छन का प्रतिशत बढ़ने से गुणवत्ता संपत हो जाएगी और नकारे लोग नीतियों का निर्धारण करते नजर आयेंगे फिर देश का भविष्य कैसा होगा ? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है समज किसी एक वर्ग को तो ये नेता आरक्छन देकर खुश करने के प्रयास में लगे हैं क्युन्म्की यही उनका वोट बैंक है पर ऐसा करके समाज के एक बहुत बी अड़े वर्ग को आन्दोलन की राह पर धकेल रहे हैं जो इन नेताओं को बहुत भरी पड़ेगा . प्रोन्नति में आरक्छन देने से देश में हालत मंडल आयोग से ज्यादा ख़राब हो सकते हैं क्यूंकि पहले ही आरक्छन की मार से मेधावी छात्र दिशाहीन होकर समज विरोधी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं यह बढ़ता नक्सल्वाद उसीका परिणाम है नेता इस बात को समझे या न समझे अगर तो प्रोन्नति में आरक्छन देने का निर्णय ये नेता लेते हैं तो सबसे पहले तो यह संविधान के विरोध में किया जानेवाला गलत निर्णय है जिसे ये संविधान में संशोधन कर के लाना चाहते हैं पर इसके परिणाम बहुत भयंकर होंगे यह भी ध्यान में रखना चाहिए इन नेताओं को . प्रोन्नति में आरक्छन को सिरे से नकरना चाहिए इसकी वकालत कम से कम मैं नहीं कर सकता कोई सोचेगा मैं सवर्ण हूँ अतः दलित विरोधी बात मैं कह रहा हूँ तो यह उसकी गलत सोंच है मैं तो हमेशा से चाहता रहा हूँ की दलित भी समाज में बराबर का दर्जा पाए और उसका ही पक्छ्धर हूँ और इस उद्देश्य को आरक्छन द्वारा कभी पाया नहीं जा सकता, हाँ! उनको अच्छी सिक्छा मिले ताकि वे सामान्य बिदयार्थियों के साथ प्रतियोगिता में भाग लेकर आगे बढ़ें इसमें ही उनको सम्मान मिलेगा और वे पिछड़े न रहकर अगड़े बनते हुए देखे जा सकेंगे और एक बहुत बड़ा सामजिक भेद मिट जायेगा अपने समाज से जो एक कलंक के सामान है क्यूंकि ईश्वर ने भी सभी ब्याक्तिओं को एक सा बनाया है और सबकी रगों में वाही लाल रक्त दौड़ता है क्या दलित और क्या सवर्ण ..

Uma Kant Tiwari के द्वारा
September 11, 2012

Yeh Matra Vot Bank Ki rajneeti Hai Aur Kuchh Bhi Nahi, Aarakshan Jatigat Nahi Balki Aarthik Sthiti Ke Adhar Per Hona Chahiye, Halaki Mena Manna Yeh Hai Ki Agar Padai Me Aarakshan Diya Ja Raha Hai To Naukriyo Me Kyo ? Jabki Padai Me Aarakshan Dekar yaha Tak Ki Nihsulk Shiksha Bhi Jinhe di Ja Rahi Hai Unhe Naukrio Me Bhi Aarakshan Dena Thik Nahi Hai, Dusri Taraf Yeh Dekha Gaya Hai Ki Kisi Ko Rabdi Malai Khilane Ki Koshish Ki Ja Rahi Hai Aur Wahi Kisi Ke Muh Se Roti Ka Niwala Bhi Chhinne Ka Dussahas Kiya Ja Raha Hai, Sayad Aane wale samay me desh me maha kranti aayegi…

हेम चन्द्र पांडे के द्वारा
September 11, 2012

सरकार वोट बैंक की राजनीती से प्रेरित है इसलिए प्रौन्नति में आरक्षण देना चाहती है कांग्रेश और भाजपा के सभी लोग जो की देश में मुख्य पार्टिया हैं प्रौन्नति में आरक्षण के साथ हैं क्या ये लोग अपनी घटिया राजनीती में ये भूल गए हैं कि आरक्षण ने देश के सभी कर्मचारियों को दो हिस्सों में बाँट दिया है आज नहीं तो कल हड़ताल तो ख़त्म हो ही जाएगी पर क्या फिर से सभी कर्मचारी एक साथ ऑफिस में बैठ कर बिना किसी भेद भाव के काम कर पाएंगे सरकार अपने लोक लुभावन वादों से उन लोगो को मुर्ख बना रही है… ………………………….@hcpanday.jagranjunction.com

Subhash Chandra के द्वारा
September 11, 2012

आरक्षण कबिलियत पर मिलनी चाहिए न कि आरक्षण पर ।

R P Pandey के द्वारा
September 10, 2012

केवल वोते बैंक का ख्याल. इस सरकार ने अब तक किया क्या .केवल लूटा और लोगो में बिभेद पैदा किया .यहाँ के दलितों का तो भगवान ही मालिक है .समझ में नहीं अत की दलितों की संख्या ३० करोर है जब की नौकरी १ करोर से भी कम .अगर सभी नौकरी दलितों को ही दे दी जाय तो भी २९ करोर का उत्थान कैसे होगा .

    bharodiya के द्वारा
    September 11, 2012

    उत्थान की बात कौन करता है पांडे जी, १ करोड में से थोडे को नौकरी मिलती है तो ईस के बदले पूरे ३० करोड वोट मिल जाते हैं । वोट का महत्व है उत्थान का नही । उत्थान नेता को अपना करना है ।

kaverii के द्वारा
September 10, 2012

 वोट निति में सब चलता है.खुद जिओ और दूसरो को मारो ,यही राजनीती है .पब्लिक सब जानती है पर वोट रिजेक्ट करने की अनुमति नहीं है ,यह भी तो राजनीती है.किसी का ताज तो किसी का सर्वनाश !

डॉ. एच. सी. सिंह के द्वारा
September 10, 2012

पदोन्नति में आरक्षण का अभियान विशुद्धरूप से वोट बैंक की राजनीति को ध्यान में चलाया जा रहा है और यह किसी प्रकार से दलितोत्थान का मुद्दा नहीं. जब संविधान में आरक्षण की ही व्यवस्था अस्थाई तौर पर की गई थी तो प्रोमोशन में आरक्षण का तो कोई औचित्य ही नहीं. अब जब सरकार दलित वोटों के लिए संविधान संसोधन करने पर आमादा है तो मुलायम सिंह की मुसलामानों के लिए १८% आरक्षण हेतु संविधान संसोधन से कैसे मुकरा जा सकता है. वह दिन दूर नहीं जब पंथ के आधार पर मुसलामानों के आरक्षण सभी क्षद्म-पंथनिरपेक्ष पार्टियां वोट बैक के लिए खुलकर अभियान चलायेंगी. और यहीं से देश के तीसरे विभाजन की नींव पड़ेगी क्योंकि मांग तो पंथ के आधार पर संसद एवं विधानसभाओं में भी आबादी के हिसाब से सीट आरक्षण की भी उठेगी. और ये सत्तालोलुप दल कुछ भी करने को तैयार हो जायेंगे.

ishwar के द्वारा
September 10, 2012

There is a need for evaluation of reservation in education because this is not being utilised properly as the child falls under reservation category may avail the facility maximum four semester in one class & upto attening an age of 25 yrs & child after enrolment in the class first may get online payment for his lodging & boarding with a minimum & maximum amount of ceiling & after attening the age of 25 years he may be registered for employment preference is given in employment & thereafter a maximum two year support to understand the job afterward no support at all except if he again become jobless minimum 10days payment as scedule in NAREGA

Sanjeev के द्वारा
September 10, 2012

सरकार का बस चले तो वह जल्द ही बसों की सीटों पर भी आरक्षण देंगी.. नालायक सरकार, भ्रष्ट तंत्र और लाचार देश


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