blogid : 4920 postid : 596

जिस्मानी रिश्तों के लिए क्या ज्यादा जरूरी – समाज की अनुमति या निजी रजामंदी?

Posted On: 3 Sep, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पाश्चात्य देशों की तरह भारत में भी गर्भनिरोधक और कॉंट्रासेप्टिव पिल्स का बाजार दिनोंदिन गर्माता जा रहा है। युवाओं के बीच ऐसी दवाओं की बढ़ती लोकप्रियता उनके जीवन में आते खुलेपन की ओर इशारा करती है। विवाह पूर्व शारीरिक संबंध बनाना आज के युवाओं के दृष्टिकोण में कोई सामाजिक निषेध नहीं बल्कि व्यक्तिगत रजामंदी बन गया है। सेक्स जिसे कुछ समय पहले तक सामूहिक वार्तालाप में भी शामिल नहीं किया जाता था आज उसे धड़ल्ले के साथ प्रचारित किया जा रहा है। हाल ही में मुंबई की एक फार्मा कंपनी ने ‘18 अगेन’ नामक एक ऐसी क्रीम को बाजार में उतारा है जिसकी सहायता से महिलाएं अपना खोया कौमार्य वापिस पा सकती हैं। हालांकि इससे पहले भी सर्जरी की मदद से महिलाएं एक बार फिर से खुद को वर्जिन महसूस कर पाती थीं लेकिन यह सर्जरी भारत समेत अन्य एशियाई देशों के लोगों के लिए महंगी साबित होती थी। ऐसे में 18 अगेन क्रीम, जिसका उपयोग बड़ी सहजता और सुलभता के साथ किया जा सकता है, का भारतीय समाज में प्रवेश करना अपने आप में बहस का मुद्दा बन गया है कि क्या भारतीय समाज में संबंधों की गरिमा और उनका महत्व घटता जा रहा है?


व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की पैरवी करने वाले लोगों का कहना है कि एक वयस्क व्यक्ति किससे और कब शारीरिक संबंध बनाता है यह उसकी अपनी मर्जी और सोच होनी चाहिए। यह पूरी तरह व्यक्तिगत मसला है जिसमें समाज या फिर किसी भी अन्य व्यक्ति को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। व्यक्तिवाद का पक्ष लेने वाले लोगों का यह साफ कहना है कि आधुनिकता के निरंतर बढ़ते प्रचार-प्रसार के बाद भी अगर हम व्यक्ति के जीवन पर इस प्रकार पहरे लगाते रहेंगे तो यह वैयक्तिक रूप से बेहद निराशाजनक साबित होगा। आज की पीढ़ी की जीवनशैली काफी खुलापन लिए हुए हैं ऐसे में सेक्स को परंपरा से जोड़कर देखना हैरानी भरा कदम ही कहा जाएगा क्योंकि इसका संबंध संस्कृति से नहीं बल्कि व्यक्ति की अपनी मर्जी और उसके अपने निजी विचारों से है। उनके साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती करना या संस्कृति के नाम पर उनके आपसी संबंधों को बाधित करना किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं है। कोई दो व्यक्ति अपने संबंध को आगे बढ़ाने के लिए शारीरिक रूप से नजदीक आते हैं तो यह उनकी अपनी सोच है इसमें समाज की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। कई बार प्रेम संबंध सभी सीमाएं पार करने के बाद भी सफल नहीं हो पाता तो आगे का जीवन बिना किसी परेशानी के बिताने के लिए अगर महिलाएं 18 अगेन या ऐसी कोई अन्य क्रीमों का उपयोग करती हैं तो इसके बुराई भी क्या है।


वहीं दूसरी ओर गर्भनिरोधक गोलियों और 18 अगेन जैसी क्रीमों की भारत में बढ़ती लोकप्रियता को सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से बेहद घातक समझने वाले लोगों का मत है कि अगर हर कोई व्यक्तिगत विचारों और मर्जी को ही प्राथमिकता देगा तो इससे सामुदायिक एकता और सामाजिक गरिमा को नुकसान पहुंचेगा। भारत में विवाह पूर्व शारीरिक संबंध हमेशा से ही निषेध हैं और रहेंगे। अगर किसी व्यक्ति की गतिविधियां सामाजिक गरिमा पर पर प्रहार करती हैं तो इसे किसी भी रूप में सहन नहीं किया जा सकता। गर्भनिरोधक गोलियों और कौमार्य वापिस दिलवाने वाली क्रीमों की बढ़ती मांग भारतीयों के गिरते नैतिक स्तर को दर्शाती है जो हमारी संस्कृति को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। टी.वी. पर आने वाले इनसे संबंधित विज्ञापन को देखकर युवा पीढ़ी भटक रही है और अगर इस बढ़ते प्रचलन को रोका नहीं गया तो वो दिन दूर नहीं जब पाश्चात्य देशों की भांति भारत में भी लोग बिना किसी शर्म और लिहाज के सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे के साथ शारीरिक निकटता बनाते नजर आएंगे।


शारीरिक संबंधों के क्षेत्र में आने वाले खुलेपन और भारतीय समाज में बाजारों में गर्भनिरोधक गोलियों या 18 अगेन जैसी क्रीमों के औचित्य पर विचार करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उठते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या परंपरा और संस्कृति के बहाने हम वाकई अपनी युवा पीढ़ी की अपेक्षाओं का दमन कर रहे हैं?

2. क्या अब समय आ गया है कि भारतीय समाज अपनी रूढिवादी छवि को त्याग कर एक आधुनिक देश का उदाहरण पेश करे?

3. क्या आधुनिक और खुले विचारों का देश कहलाने का एकमात्र तरीका अपनी शालीनता और सभ्यता को छोड़कर पाश्चात्य लोगों की तरह बर्ताव करना है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


जिस्मानी रिश्तों के लिए क्या ज्यादा जरूरी – समाज की अनुमति या निजी रजामंदी?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “समाज की अनुमति” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व समाज की अनुमति – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




Tags:                                                               

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 3.89 out of 5)
Loading ... Loading ...

11 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abhay63 के द्वारा
October 22, 2012

व्यभिचार शब्द को मानव समाज के शब्द कोष से हटा देना ही उत्तम होगा, रूढिवादी छवि को त्याग कर एक आधुनिक देश का उदाहरण पेश करे? क्या रूढ़िवादी छवी रजामंदी से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने से ही होगी, विवाह जैसी परम्परा की जरूरत भी नहीं रहेगी फिर, परिवार शब्द की अवधारना का क्या होगा, क्या हर स्तर पर निजी स्वतंत्रता ही एकमात्र रास्ता रह जाएगा, नैतिकता के मापदंड भी तो बदलेंगे, जानवर और इंसान में फर्क करने के मापदंडो का क्या होगा, बाजारवाद के क्षेत्र का विकास रजामंदी से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने की वकालत क्यों कर रहा है, नीजी जीवन की सुविधा सदैव क्लिष्ट मानव शक्ति को सृजित करती है, जिसका असर पश्चिमी देशों में पड़ भी रहा है, हम क्या इस असर को सहने के बाद ही समझेंगे,

Darshan के द्वारा
September 6, 2012

जिस्मानी रिश्तों के लिए ज्यादा जरूरी है समाज की अनुमति नाकि निजी रजामंदी | परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है | शारीरिक संबंध व्यक्तिगत मामला नहीं है | हाँ रिश्तो में पवित्रता है तो बिना शादी के भी पुरुष – स्त्री पति – पत्नी हैं | शास्त्रों में ऐसे मिलन को गंधर्व विवाह बल्कि स्वयम्बर भी कहते हैं | परन्तु नापाक रिश्तों में खोट, स्वार्थ और व्यभिचार होता है जो समाज के लिए कलंक हैं | इस्लामिक शादी में निकाह होते वक़्त स्त्री पुरुष कि मंज़ूरी भी ली जाती है जबकि इसमें पहली पत्नी की भी खुली मंजूरी होनी और दुसरे निकाह का कारण समाज को स्पष्ट और स्वीकार करने लायक होना चाहिए | मानव मननशील प्राणी है | जो सोचता है वही कहता है और जो कहता है वही करता है | मनुष्य योनी पशु की भांति भोग योनी नहीं है अपितु अभ्युदय के लिए कर्मयोनी है | मनुष्य के अतिरिक्त बिना सोच – समझ के अन्य सभी जीव भोगयोनी में हैं | मनुष्य को अच्छे कर्मो द्वारा ऊपर उठना है न की निषिद कर्मो द्वारा गिरावट की तरफ जाना है | मानव जाती की वैदिक आर्यन संस्कृति आदेश करती है ‘ मनुर भव: ‘ अर्थात मनुष्य बन | त्याज्य रूढ़ियों से बाहर निकल हम सबको सब से पहली, पुराणी और शुद्ध – पवित्र अपनी मूल वैदिक आर्यन संस्कृति को पहचानना चाहिए | हमें अपने संस्कारों, मुल्यों और गारिमा की रक्षा के लिये विशिष्ट पहचान वाली वैदिक सभ्यता के अनुसार चरित्र का निर्माण करना चाहिए | इसके उलट ब्रांडेड सभ्यताएं तो कहती है मुसलमान – इसाई – हिन्दू बुद्धिस्ट बन | जन्मना अजायते शूद्रः अर्थात जन्म से सभी शुद्र होते हैं | संस्कारात द्विज उच्यतें अर्थात संस्कारों से ही व्यक्ति सभ्य यां चरित्रवान बनता है | अपनी और अपने माँ – बाप क़ि इज्ज़त का ध्यान लड़के – लड़कियों और औरतों – मर्दों सब को रखना चाहिये | यह भी ध्यान रखना चाहिये, क़ि कोई मेहमान, रिश्तेदार यां कोई ऐरा – गैरा बुरी हरक़त के लिये मौका तो नहीं ढूंढ रहा | फैशन करना बुरा नहीं किन्तु नंगापन समाज में स्वीकार नहीं होना चाहिए, क्यूंकि यह गैर – सामाजिक और पाशविक आचरण है | आ बैल मुझे मार यानि अपने शरीर का प्रदर्शन करके मुसीबत और अपराध को न्योता देना है | स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है जबकि स्वछंदता गैजुमेराना असमाजिक हरकत है | अपनी और अपने माँ – बाप क़ि इज्ज़त का ध्यान लड़के – लड़कियों और औरतों – मर्दों सब को रखना चाहिये | यह भी ध्यान रखना चाहिये, क़ि कोई मेहमान, रिश्तेदार यां कोई ऐरा – गैरा बुरी हरक़त के लिये मौका तो नहीं ढूंढ रहा | अबला नारी की पहले पिता, फिर पति और उसके बाद पुत्र रक्षा करता है |

pankaj kumar srivastava. के द्वारा
September 4, 2012

अगर इस जीरह को आधार मान लिया जाए कि एक वयस्क व्यक्ति किससे और कब शारीरिक संबंध बनाता है यह उसकी अपनी मर्जी और सोच होनी चाहिए। तो वो घडी उस भारतीय व्यक्ति का विनाश की घडी न हो कर भारतीय समाज की विनाश की घडी होगी,पाश्चात्य देशों की तरह भारतीय समाज की न तो संरचना है,न हीं जरुरत .आज भी समाज में ममेरी,फुफेरी,चचेरी भाई-बहनों की पाक रिश्ता बचा है.क्या ये पाक रिश्ता इसके जद में न आ जाएगे . न्यायसंगत की परिभाषा उस पल क्या होगी .आज भारतीय परिवार की सबसे बडा आधार शादी है यदि यही सब होने लगा तो शादी के क्या मायने रह जायंगे .मुझे श्रीराम जन्मभूमी-न्यास के अध्यक्ष रामचंदरदास परमहंशजी की बात याद आ गई.आपने कभी कुते-कुतियों,गदहों-गदहियों की शादी की बात सुनी है.अरे शादी जिस्मानी रिश्तो का नाम भर नहीं है ये तो दो पाक रिश्तो के मिलन का नाम है.विदेशी रमनी और देशी रमनी का अंतर उनकी नजर में काफी रोचक थी .विदेशी रमनी काँच की पयाली सी है,जिसे हर बार धोकर इसतेमाल किया जा सकता है, लेकिन भारतीय रमनी मिटटी की पयाली के समान है.जो एक बार ही उपयोग में आना अपने जीवन का आधार समझती है.भाई मैं तो इतना ही कहूँगा कि विदेशी सोच विदेशियों को ही मुबारक.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 4, 2012

एक अच्छा मुद्दा,,,,,,,,,,आज के समय में इस पर बहस होना बेहद जरुरी है,,,,,,,,,,,,ऐसा मुद्दा लाने के लिए जागरण जंक्सन टीम को धन्यवाद

Sarfaraz Hussain Khan के द्वारा
September 3, 2012

जिस्मानी रिश्तों के लिए निजी रजामंदी ज़रूरी है न की समाज की.

aartisharma के द्वारा
September 3, 2012

समाज की अनुमति ..jagran junction forum.. समाज ..यानि की आम की लोगों का समूह..हम जिस समाज में रहते है यह हर तरह के लोग है.सबकी हर विषय मे अपनी अपनी और अलग अलग राय है..लेकिन हम भी समाज का हिस्सा होते हुए उसे नकार नही सकते.हमारा मन आशाओ,आक्शंशाओ और तरीश्नाओ से भरा हुआ है.मन तो चंचल है इसमें अनेक प्रकार की इच्छाए जागृत होती है और मरती है.सब इच्छाओ की पूर्ति संभव नही है.और न ही इच्छाओ का कोई अंत है.मन हमारे बस में नही है.मेरे नज़रिए से जिस्मानी रिश्तो के लिए समाज की अनुमति बेहद जरुरी है..यदि नियम,कायदे और कानून ही नही होंगे और आदमी सब कुछ कार्नर के लिए स्वतंत्र होगा तो हमे उस समाज में रहने का या उसका हिस्सा बनने का कोई अर्थ नही रह जायेगा..आधुनिक युग में यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है की हमे यदि समाज में रहना है तो सभ्य तरीके से जीएन चाहिए और सेक्स तो बहुत ही बड़ा मुद्दा है.यदि इस पर समाज की मोहर न हो तो हम घर घर में यही खेल होता देखंगे..समाज की परिभाषा ही बदल जाएगी..आप अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा देने के लिए अच्छे से अच्छे और महंगे से महंगे और अपनी हैसियत से बढकर स्कूल में डालते है .जबकि बच्चे का पहला स्कूल उसका घर होता है.कुछ बाते अगर परदे के पीछे रहे तो ही अच्छी लगती है.यदि यही सब होने लगा तो शादी के क्या मायने रह जायंगे ..जिस्मानी जरुरत पूरी करने के लिए समाज में शादियो का प्रचालन हे जो दो आत्माओ का मिलन ही नही दो परिवारों का भी मिलन होता है.यदि शादी से पूर्व ही जिस्मानी रिश्ते बना लिए जायेंगे तो शायद किसी को शादी की जरुरत ही न पड़े.आज की पीड़ी पहले ही बहुत खुलापन लिए हुए है इसे में इन रिश्तो पर मोहर लगाना न्यायसंगत नही है..आपति करने पर युवा पीड़ी का अभी ये हाल हे तो मान्यता देने पर तो बिलकुल ही खुलापन आ जायेगा,समाज की तस्वीर ही बदल जाएगी आप अपनी बहु,बेटी,माता पिता भाई ,बहन किसी के साथ कही जा नही सकते ..अभी तो केवल अँधेरी गलियां ,पार्क या सुनसान जगह इन आशिकों का अड्डा है फिर तो ये घर घर की कहानी हो जाएगी..कोई लगाम न हो तो जानवर भी बहक जाता है हम तो फिर भी इंसान है..इस तेज़ी से बदलते समाज में ,मा बहन की जो भूमिका हे वो निरर्थक होकर रह जाएगी.में इस बात से इनकार नही करती की इंसान को जिस्मानी रिश्तो की जरुरत नहीं है लेकिन हमारे समाज में इसकी भी एक उम्र और सीमा तय की गई है.यदि समाज की रजामंदी महत्वपूरण न हो तो आप अपने बच्चो को भी नही रोक पाओगे एसा करने से…अभी हमारे भारत देश में जब शादी से पहले जिस्मानी रिश्ते बनाने की अनुमति नहीं है,तब इतना बुरा हाल है की ओरत क्या छोटी बच्चिया तक तो सुरक्षित नहीं है,बुज़ुर्ग ओरतो को भी नही बक्शा जाता ..तो सोचिये अनुमति मिलने पर क्या हश्र होगा इनका…फिर तो कोई कानून नाम की चीज़ ही नही रह जाएगी .आप किसी पर ऊँगली नही उठा सकता ,किसी की थाने में रिपोर्ट नही कर सकते,किसी को मना नही कर सकते ..बस केवल चुप रहकर तमाशबीन बन सकते है..क्या आपने इसे ही समाज की कल्पना की है ..इस धरती पर जहा श्रीराम ने जन्म लिया,कृष्ण ने जन्म लिया जहा सेंकडो मंदिर,मस्जिद ,गुरूद्वारे और चर्च है..जहा घर घर में सुबह उठाकर पुजाका नियम या भगवान का किसी न किसी रूप में सिमरन है….इसी धरा की ये दुर्गति ..में तो बिलकुल सहमत नहीं हु..सेक्स की पूर्ति के लिए हमारे समाज में शादी का नियम है जो साथ साथ हमारा वंश बड़ाने का भी कार्य करती है .ये एक स्वाच और आदर से परिपूरन नियम हे फिर इससे पहले जिस्मानी रिश्ते बनाकर क्या मिलेगा..शरीर की भूख तो कभी खत्म ही नही होगी तो क्या इसके लिए समाज के लोगो को,नियमो को दाव पर लगाना ठीक होगा.मेरे हिसाब से ये न्यायसंगत नही है ..फिर शादी जेसी परम्परा का कोई मायने नही रह जाता ..अनेतिक और गेर क़ानूनी रूप से बनाये गये रिश्ते ही भारत में एड्स जेसी बीमारी के जन्मदाता है…क्यूंकि स्वीकृति मिलने पर एक से सबंध नही रहेगा ,अनेको से होगा जो इस स्वछंद भारत की गरिमा पर धब्बा होगा…आधुनिक दिखने के और भी तरीके है..पर ये तो केवल मनोरोग ही है…और स्वीकृति मिलने पर लाइलाज हो जायेगा..अपने सुखद भविष्य के लिए ऐसी सोच को त्यागना ही बेहतर होगा. त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी हु . धन्यवाद् .

    Dr Sumit Gupta के द्वारा
    September 3, 2012

    I am totally agreed with ur ideas,nicely written

Ravi के द्वारा
September 3, 2012

I am not convinced with this Parveen Boby’s case was different. One must know how to make friends and how to keep relations. Many tradition follwing ladies died in the same situation. Ravi

ishwar के द्वारा
September 3, 2012

personal acceptence

Dr Sumit Gupta के द्वारा
September 3, 2012

Samaj ki Anumati- Jagran Junction Forum As every body knows that there is no end to human desires ,one new desire come up as earlier one is fulfilled. So during ancient times polygamy i.e. having multiple sexual partners was common,so it was difficult to prove for women that who was the father of children born out of such relations ,so nobody was ready to support such children ,this had lead to lots of problems for the women their children as well as the society. Then the concept of marriage came just to ensure monogamy as well as liability for male to support materialistically to female as well as their progenies that means society ruled that if you want sexual relationship you will have to support her & family for life. This is tradition which became culture of the society. Now in the name of modernization of society , freedom of sex is advocated as in western countries. But I will tell u the harms of the freedom of sex. Loss of concept of marriage i.e. there will be nobody to look after peoples especially females in their golden years or prolonged illness like cancer as people will condemn them and make new relationships as soon as youth charm is over. In short nobody will take their responsibilities, the classic example is Parveen Bobby who was in free sexual relationships in her youth with multiple partners (not to name them)& had plenty of money with but her dead body was recovered many days later by a milkman . Western society is ruled by market so they are ruining our society just to sale their products, Promoting products like 18 again is just to promote infidelity so that they can sale their other products like condoms, beauty products etc. So that women in 40+ will use these products. So in my view this is like mrig trishna & can never be satisfied. So modernization does not mean forgetting our culture but to remove bad practices in society like purdah, caste system,discrimination etc Dr Sumit Gupta Dental Surgeon Noida 03/09/2012

    pitamberthakwani के द्वारा
    September 3, 2012

    dear dr, guta ji, tatally agreed with u r ideas,u r 100% correct ,thanks. u r this comment is great contribution to whole indian society. thanx once again.


topic of the week



latest from jagran