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महिलाओं के जीवन का दर्दनाक अंत: दोषी कौन अतिमहत्वाकांक्षा या पुरुष प्रधान रवैया?

Posted On: 13 Aug, 2012 में

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प्यार, महत्वाकाक्षाएं और फिर मौत…….यह है आज के समाज की कड़वी हकीकत. हरियाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन उर्फ चांद से अपने संबंधों को लेकर चर्चा में रहने वाली अनुराधा उर्फ फिजा की संदेहास्पद तरीके से मौत का मामला हो या दिल्ली की एक एयर होस्टेस की आत्महत्या करने जैसी घटना, दोनों ही मसलों ने हमारे समाज के सामने रोंगटे खड़ी कर देने वाली सच्चाई पेश की है. एक ऐसा सच जिसे समझने के बाद हम यह सोचने के लिए विवश हो जाते हैं कि क्या खुद को आधुनिक और उदार कहलवाने वाले भारतीय समाज में आज भी महिलाएं केवल उपभोग की ही वस्तु हैं? हम महत्वाकांक्षाओं को उनके ऐसे हालातों का जिम्मेदार ठहराते हैं लेकिन क्या महिलाओं का महत्वाकांक्षी होना गलत है?


महिलाओं द्वारा अपने ही जीवन का अंत करना या उनकी संदेहास्पद मौत एक दुखद घटना है लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जो ऐसे हालातों के लिए स्वयं महिला को ही दोषी ठहराते हैं. ऐसे लोगों का मत है कि अति महत्वकांक्षाओं और अपने हित साधने के चक्कर में महिलाएं सही-गलत जैसी बातों को नजरअंदाज कर देती हैं. अपनी असीम इच्छाओं को पूरा करने के लिए वह सारी हदें पार कर जाती हैं. अपने भविष्य को सुधारने के लिए महिला यह कदम उठाती है लेकिन धीरे-धीरे वही कदम उसके लिए एक अभिशाप बनने लगता है. नाम और शोहरत पाने की लालसा में महिलाओं को लगता है कि वह अपने फायदे के लिए पुरुष का इस्तेमाल कर रही हैं लेकिन जब उपभोग करने के बाद महिला को दूध में से मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया जाता है तब उसके पास अपने जीवन को समाप्त करने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं बचता. इस तरह के मामलों में महिलाओं को पीड़िता ना मानने वाले लोगों का कहना है कि आत्महत्या करने वाली या संदेहास्पद मृत्यु की शिकार हर महिला को पीड़िता की नजर से देखना और पुरुष को दोषी ठहराना नासमझी होगी.


वहीं दूसरी ओर महिलाओं हितों के साथ पूर्ण सहमति रखने वाले लोगों का कहना है कि कोई व्यक्ति अपनी खुशी से अपने ही जीवन का अंत नहीं करता. अगर कोई महिला ऐसा कदम उठाने के लिए विवश होती है तो हमें उसकी मनोदशा पर विचार करना चाहिए. महत्वाकांक्षा रखना या किसी से प्रेम करना किसी भी रूप में गलत नहीं है, बल्कि यह तो मनुष्य का अधिकार है कि वह अपने जीवन को सफल बनाने के लिए प्रयासरत रहे. लेकिन पुरुष प्रधान भारतीय समाज में महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु की समझा जाता है. यही वजह है कि उसे झूठे सपने दिखाकर, उसका मनचाहा शोषण करने के बाद उसे तड़पने के लिए छोड़ दिया जाता है. हालातों का सामना ना कर पाने के कारण महिला अवसाद ग्रस्त हो जाती है और समाज के ताने उसे आत्महत्या करने के लिए विवश कर देते हैं. महिलाओं को पीड़िता की नजर से देखने वाले लोगों का मत है कि महिला के आत्महत्या करने या उनकी संदेहास्पद ढंग से मृत्यु के बाद अगर उन्हीं को ही अपराधी ठहरा दिया जाता है तो इससे विकृत पुरुष मानसिकता को और अधिक बल मिलेगा और आगे ना जाने कितनी ही भोली-भाली, मासूम महिलाएं शातिर पुरुषों की शिकार बनती रहेंगी.


उपरोक्त चर्चा और वर्तमान परिदृश्य पर विचार करने के बाद हमारे सामने निम्नलिखित प्रश्न उठते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या भविष्य को सुधारने के लिए महिलाओं का महत्वाकांक्षी होना उनके चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाता है?

2. क्या किसी महिला का पुरुष से प्रेम करना या उस पर विश्वास करना गलत है?

3. स्त्रियों के साथ होने वाली ज्यादतियों के लिए पुरुषों को ही अपराधी समझा जाता है लेकिन वर्तमान हालातों के अनुसार क्या हमें अपनी इस धारणा में बदलाव नहीं लाना चाहिए?

4. अगर प्रेम और विश्वास का नतीजा मौत है तो इसके लिए हमें किसे दोषी कहना चाहिए?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


महिलाओं के जीवन का दर्दनाक अंत: दोषी कौन अतिमहत्वाकांक्षा या पुरुष प्रधान रवैया?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “महिलाओं के जीवन का दर्दनाक अंत” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व महिलाओं के जीवन का दर्दनाक अंत – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Niranjan kumar के द्वारा
August 14, 2012

Money power & अतिमहत्वाकांक्षा , dull mind , mental thinking of mad people

nishamittal के द्वारा
August 14, 2012

अनुराधा बाली (फिजा) ,गीतिका ,भंवरी देवी,मधुमिता शुक्ल ,नैना साहनी,शहला मसूद , अनेक फिल्म अभिनेत्रियां,माडल्स,खिलाड़ी और ऐसी ही अन्य अनाम परिचित या अपरिचित युवतियां जिनको हत्या,आत्महत्या का शिकार बनना पड़ता है, गंभीर यौन रोगों से ग्रस्त होकर नारकीय पीडाएं झेलनी पड़ती हैं,या फिर वेश्यावृत्ति और उसका वर्तमान स्वरूप कालगर्ल आदि अनैतिक कार्यों में सदा के सदा के लिए अपने जीवन को होम करना पड़ता है का ये जीवन क्रम सदा ही चलता आ रहा है और शायद ही कभी समाप्त हो सकेगा.नारी का रूप स्वयं उसका शत्रु बना हो या उसकी महत्वाकांक्षाएं ………….मुक्ति तो कभी नहीं मिली.यदि कारण पर विचार करें तो………………… प्राय किसी भी राह पर अग्रसर होते समय दो विकल्प व्यक्ति के समक्ष ,सीधा रास्ता,और शार्टकट अर्थात छोटा या खतरों से पूर्ण.शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार प्राय शीघ्र पहुँचने की इच्छा से शार्टकट ही अपनाया जाता है. वैष्णो देवी की यात्रा पर जाते समय एक बार (बहुत पुरानी घटना है )एक परिवार की युवा पीढ़ी ने शार्टकट से भैरव देव पर जाने का निर्णय हठपूर्वक लिया और दुर्भाग्य से पैर फिसलने के कारण उनमें से एक प्राणघातक गंभीर चोट लगने से घायल रहा लंबे समय तक.ऐसी घटनाएँ प्राय होती हैं और सब परिचित भी होते हैं परिणामों से परन्तु शार्टकट अपनाना कोई छोड़ता नहीं.उपरोक्त समस्त प्रयास तो जोश ,उत्साह तथा उमंग आदि का परिणाम होते हैं परन्तु …………………….जब जान बूझकर अग्नि कुंड में छलांग लगाई जाय ,ये जानते हुए भी कि एक से बढ़कर एक भयंकर परिणाम झेलने पड़ सकते हैं ,और परिणाम भी स्वयं को ही झेलने हैं,दूसरे पक्ष का कुछ भी बाल बांका नहीं होने वाला और वो भी साधन सम्पन्न लोगों का,जो अपने साधनों के दम पर एक दम साफ़ बच जाते हैं.(अपवाद स्वरूप कुछ केसेज को छोड़कर) प्राय इन समस्त घटनाओं के पश्चात विरोध का स्वर बुलंद करने पर क्या उपलब्ध होता है,सिवा बदनाम चर्चा के ? ऐसा नहीं कि शार्टकट का उपयोग केवल महिलाएं करती हैं,करते तो पुरुष भी हैं भुगतना उनको भी पड़ता है परन्तु ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण विडंबनाओं का शिकार सदा नारी को ही पड़ता है जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर भी चाहे वो शिक्षा हो,नौकरी ,व्यवसाय ,पदोन्नति,खेलकूद,या कोई भी अन्य करियर विषयक विकल्प या फिर स्वास्थ्य विषयक समस्याएं सभी क्षेत्रों में शार्टकट अपनाना आज एक फैशन बन चुका है.भागमभाग, आपा धापी के कारण आज सभी आगे आने की दौड़ में सम्मिलित हैं चाहे इस प्रयास में भ्रष्टतम उपायों का सहारा लेना पड़े ,जान जोखिम में डालनी पड़े, उद्देश्य ………………बस रातों रात बुलंदियां छू लें,चर्चित हो जाएँ . परीक्षा में सफलता परिश्रम से मिल तो सकती है,परन्तु अपेक्षित समय तो लगेगा ही,नक़ल अथवा अन्य नम्बर दो के उपाय अपनाकर हींग लगी न फिटकरी. खेल को करियर बनाने वाले खिलाड़ी शीर्ष पर पहुँचने के लिए अनेक अनैतिक उपायों को तो अपनाते ही हैं, ये जानते हुए भी कि स्टेरॉयड आदि लेकर वो अपने शरीर को तो पंगु बना सकते हैं ,यहाँ तक कि जीवन से भी हाथ धोना पड़ सकता है,का सेवन करते है,भले ही प्रतिबंधित होना पड़े बाद में . हमारे सत्ताधीश ,डाक्टर्स ,अधिवक्ता ,शिक्षक ,सरकारी अधिकारी -कर्मचारी अपने अपने क्षेत्र में और स्वयं हम हर पल शार्टकट की तलाश में रहते हैं.और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं. ये शार्टकट बस मानवीय असीम महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने का छोटा व जटिल मार्ग है, जिस पर चलते हुए कोई बिना किसी आपदा का शिकार हुए ही अपने बड़े बड़े स्वप्नों को पूर्ण कर लेता है,और कुछ का अंत वही होता है न घर और न घाट.इन स्वप्नों या महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के प्रयास में यह सत्य कोई स्वीकार नहीं कर पाता कि अपने जिस जीवन को सुखी बनाने के लिए,क्षणिक वैभव के लिए स्वयम को,परिवार तथा अपने जीवन को ही दाँव पर लगा रहे हैं जब वही नहीं रहा तो इन सबका क्या उपयोग. उपरोक्त रहस्य को समझे बिना इन विडंबनाओं से मुक्ति कभी नहीं मिल सकती (अपवाद सर्वत्र होते हैं )

DR. PITAMBER THAKWANI के द्वारा
August 14, 2012

सही है यह बात तो

razia mirza listenme के द्वारा
August 13, 2012

जब मेरी पोस्ट प्रकाशित होने में कुछ बाधा आने लगी तब मैंने उसे यहीं जवाब देना चाहा। जागरन जंकशन फोरम ने”महिलाओं के जीवन का दर्दनाक अंत: दोषी कौन अतिमहत्वाकांक्षा या पुरुष प्रधान रवैया? पोस्ट लिखकर हम महिलाओं को एक पोस्ट लिखने पर आख़िर तैयार कर ही दिया। मैं इस पोस्ट पर उसी सवालों को जवाब के साथ देना चाहुंगी। क्योंकि मैं एक महिला हुं और ज़्यादातर ऐसी महिलाओं के साथ रहती हुं जो यहाँ कारागार में बंद हैं। 1. क्या भविष्य को सुधारने के लिए महिलाओं का महत्वाकांक्षी होना उनके चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाता है? उ.ज़ी नहिं,महिलाओं का महत्वाकांक्षी होना गलत नहिं है। महत्वाकांक्षी तो हर कोई होता है,पुरुष भी, तो क्या वे चरित्रहिन हो जाते है? 2. क्या किसी महिला का पुरुष से प्रेम करना या उस पर विश्वास करना गलत है? उ. महिला ,पुरुष के मुकाबले में कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील/भावनात्मक होती है। ज़्यादातत महिलाएं प्रेम एक पूजा की तरहाँ करती हैं। तो ज़ाहिर सी बात है वो ज़रुर विश्वास तो करेंगी ही अपने प्रेम पर। 3. स्त्रियों के साथ होने वाली ज्यादतियों के लिए पुरुषों को ही अपराधी समझा जाता है लेकिन वर्तमान हालातों के अनुसार क्या हमें अपनी इस धारणा में बदलाव नहीं लाना चाहिए? उ. बिल्कुल बदलाव लाना चाहिये क्योंकि हर मामले में पुरुष ही ज़िम्मेदार नहिं होते।स्रियाँ भी उतनी ही ज़िम्मेदार हैं। ताली एक हाथ से नहिं बजती। 4. अगर प्रेम और विश्वास का नतीजा मौत है तो इसके लिए हमें किसे दोषी कहना चाहिए? उ. दोनों ही दोषी हैं। एक विश्वासघात के और दुसरा अपना जीवन खतम करने के लिये। उपरोकत सवालों के जवाब तो मैने बहोत आसानी से रख दिये। पर सबसे बडा सवाल तो ख़डा ही है कि “महिलाओं के जीवन का दर्दनाक अंत: दोषी कौन अतिमहत्वाकांक्षा या पुरुष प्रधान रवैया? इसका जवाब निर्भर है कि जो संबंध एक पुरुष-महिला के बीच होते हैं उस पर। क्या वो संबंध सिर्फ प्रेम के लिये हैं या अपने मतलब के लिये???? उस संबंध को “प्रेम” जैसे पवित्र शब्द का नाम देना कैसे सही होगा? वो तो उपभोग ही कहा जायेगा दोनों के लिये। दोनों ही अपने परिवार, अपने समाज और यहाँ तक की अपने आपको एक ऐसे दलदल की तरफ़ ढकेलते जाते हैं, जहाँ से बाहर आनेपर दलदल ही दलदल रहता है। तब तक परिवारों की बदनामी,और समाज की मानसिकता बदल जाती है इन लोगों के प्रति। जो इज़्ज़त इन्होंने कमाई होती है,धूल जाने में कोई देर नहिं लगती। रही बात महिलाओं कि, महिलाओं का महत्वाकांक्षी होना गलत नहिं है। पर अपने मतलब/स्वार्थ को प्रेम का नाम देना गलत होगा। आगे बढने के शोर्टकट का अंजाम भी भयानक होता है। स्वार्थी पुरुष तो ऐसे हालात का फ़ायदा उढायेंगे ही। संभलना तो महिला को है। मेरा तो ये मानना है कि महिलाऎं अपनी शकित से पुरुष के मनोभाव को पढ सकती हैं फ़िर फंस कैसे जाती है? हर वक़्त पुरुष को ज़िम्मेदार नहिं ढहरा सकते। नाम और प्रसिध्धी की लालसा में कईं महिलाएं पुरुष का इस्तेमाल करती हैं ये भी सच है। और वो खुद ही पुरुष के उपभोग का साधन बन जाती हैं पर जब मतलब निकल जाता है तब पुरुष उसे छोड देता है उस महिला के पास अपने जीवन को समाप्त करना एक रास्ता बच जाता है इसमें महिला भी उतनी ही दोषी है जितना कि पुरुष। सारा दोष पुरुष पर लगाना कहाँ का इंसाफ़ होगा?? अगर महिला को शिकायत है कि उसके साथ नाइंसाफ़ी हुई है तो वो कोर्ट की राह अपना सकती है। जीवन को समाप्त करना और उसमें पुरुष को ही दोष देना सही नहिं है। अभी हाल ही में सब से बडा उदाहरन है रोहित शेखर और उसकी मां उज्जवला शर्मा का किस्सा। जिन्हों ने अपने समाज/दुनिया की परवाह न करते हुए एक राजनितीक पार्टी के एक बडे नेता के सामने ट्क्कर लेकर अपनी बात कोर्ट के सामने रख़ी और जीत गये। अगर सच को सामने लाना है तो अदालत के दरवाज़े पर “दस्तक” तो देनीपडेगी। फिर वहाँ दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।

seemakanwal के द्वारा
August 13, 2012

ये दोनों महिलाएं चलिए माना की बड़े लोगों से उनहोंने सम्बन्ध इसलिए बनाये की उन्हें अति शीघ्र सब कुछ मिल जाये और उन्हीं की गलती थी पर अभी मुम्बई में जो २५ वर्षीय महिला वकील की हत्या उसी के बिल्डिंग के WACHMAN ने कर दी उस पर क्या इलज़ाम लगाये जायेंगे .उस ने किस से प्रेम किया था .या फिर महिलाओं को ये करना होगा किसी पुरुष पे विश्वास ही न करें क्योंकि विश्वास में वास है विष का ,आशा में छुपी निराशा शब्दों के जल में न आना ,इनकी छल से भरी है भाषा .

anugunja के द्वारा
August 13, 2012

भारत देश हमेशा से एक पुरूष प्रधान समाज वाला देश रहा है।यहां जन्म से लेकर मरण तक पुरूषों कि ही प्रधानता रहती है।जब बेटा जन्म लेता है तो खुशी से थालियां पीटी जाती है तथा वो बन जाता है “कुल का दीपक”।शायद यही कारण है कि बचपन से ही मिले विशष्ट स्थान से पुरूष अपने आप को औरत से उत्तम समझते हैं और हमेशा उन्हे अपने वर्चस्व के नीचे दबाकर रखना चाहते हैं।मगर आजकल जो महिलाओं कि निर्ममता से हत्या की जा रही है या उन्हे आत्महत्या के लिए विवश किया जा रहा है,उसके पीछे सबसे प्रमुख कारण महिलाओं कि अतिमहत्वकांक्षी सोंच है।जब महिलाएं अपने ईमान से बिना कोई समझौता किए ,अपने काबलियत के दम पर पुरूषों को पछाड़ कर आगे निकलती हैं तो वहां पड़ता है “पुरूष प्रधान समाज” के मुँह पर एक जोरदार तमाचा।मगर जब औरत अपनी मर्यादा की सीमा को पार कर,जल्द से जल्द नाम,पैसा,शोहरत पाने के लालच में किसी भी हद तक चली जाती हैं,तो वहां होती है एक महिला की दर्दनाक मौत।ये मौत सिर्फ उसकी ही नहीं होती है,बल्कि उसके पूरे परिवार के मान सम्मान की होती है।इसलिए हे भारत की नारी ,तू आगे बढ़कर तोड़ पुरूषों के पुरूषार्थ के घमंड को,पर याद रहे तेरे पैर हमेशा जमीन पर रहे।

Kunwar Amit Singh के द्वारा
August 13, 2012

आज ना जाने ऐसे कितने केस उजागर होते हैं जहाँ वासना के खेल में लिप्त कोई नेता,,अफसर,,या अन्य का नाम आता रहता है. ऐसा लगता है की आज की पीढ़ी के नर और नारी को भगवान् ने सिर्फ एक ही काम के लिए पृथ्वी पे भेजा है,,और वो बस उसी में व्यस्त एवं मस्त हैं.कहीं सी.डी . पकड़ी जाती हैं,,कही नालायक लोग अपने घर की सी.डी. सिर्फ पैसे के लिए दुनिया को दिखा रहे हैं. ,,कहीं आत्महत्या कर रही हैं नारियां,,इन सभी केसों में नर और नारी बराबर के जिम्मेवार होते हैं, लेकिन इसका एक पहलू यह भी है की आज कुछ नारियों ने जीवन में तरक्की पाने के लिए अपनी ”देह के दरवाजे” को खोलना ज्यादा आसान उपाय मान लिया है,,एक महिला वकील जज बनने की खातिर अदालत में ही अपनी देह समर्पण कर देती है ,, बहुत से ऐसे केस इसी जल्दी तरक्की पाने से प्रेरित हैं. पुराने जमाने में कुछ मजबूर नारिया अपनी देह का इस्तेमाल अपने परिवार का पेट पालने के लिए करती थी,,आज भी है कुछ,,पर आज अधिकाँश ये अपने शौक पुरे करने के लिए करने लगी हैं.ऐशो आराम की जिंदगी जीने की चाहत में अपनी जरूरतें इतनी बढ़ा ली हैं की वो सही रास्ते पे चलकर पूरी नहीं हो पाती और फिर वो ये गलत राह पकड लेती हैं.ब्यूटी पार्लर,महंगे फोन,लम्बी गाड़ियां,ब्रांडेड वस्त्र,महंगा खाना,,आदि ऐसे शौक हैं जो कुछ अमीरों की देखा देखि माध्यम वर्ग की लडकियां भी पालने लगी हैं,,और इन्हें पूरा करना उनके परिवार के बस में नहीं होता तो वो छुपा छुपी इस राह पे चल पड़ती हैं और कभी कभी ऐसे लोगों के चंगुल में फंस जाती हैं जो उनका जीवन नरक बना देते हैं. कुछ आमिर लडकियां/औरतें सिर्फ अपने शौक के लिए यह राह अपना लेती है,,उन्हें हर रोज नया जिस्म चाहिए अपनी तृप्ति के लिए. आज नारी विकास की राह पे है,हमें गर्व है इसका,लेकिन मैं यहाँ अपने छोटे से शहर में ही देखता हूँ की कुछ लडकियां जो नौकरी के लिए ”पेईंग गेस्ट ” के तौर पर रहती हैं,,उनके यहाँ शाम होते लम्बी गाड़ियां आने लगती हैं,,सब गलत नहीं हो सकती,,पर जो नारियां घर से बाहर रहकर इस तरक्की और स्वतंत्रता का गलत इस्तेमाल करती हैं वो ऐसे हादसों का शिकार बन जाती हैं,और अपने ”देह के दरवाजे” खोल देती हैं,,और नर तो हमेशा इस दरवाजे के खुलने के इन्तजार में रहता ही है…………………………कुंवर अमित सिंह.

DR. PITAMBER THAKWANI के द्वारा
August 13, 2012

जागरण जंक्शन परिवार ने हमलोगों के लिए नई “जागरण जंक्शन कैटेगरी” बनाने की सूचना दी है पर हमारे द्वारा इसमे भेजने में मुश्किलें आ रही है,पुनर्वेश के जरिये भी हमने सम्पादक महोदय से इस बारे में मदद की गुहार की है पर कोई समाधान नहीं सुझा रहे हैं ,क्या आप बता सके हैं की हम कहाँ गलती कर रहे हैं?

    pitamberthakwani के द्वारा
    August 14, 2012

    जागरण परिवार ने हल भेजा है मैं आभारी हूँ उनका ! क्या न सुन्दर व्यवस्था है इस समाचार पत्र की. एक बार फिर धन्यवाद


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