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क्या बेटियां पराई होती हैं?

Posted On: 9 Jul, 2012 में

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माता-पिता अकसर अपनी बेटियों को पराया धन या किसी दूसरे की अमानत जैसे शब्दों से संबोधित करते हैं। लेकिन जब विवाह के पश्चात बेटी अपने ससुराल चली जाती है तो वहां भी उसे स्वीकार करने वाला कोई नहीं होता क्योंकि वहां उसे दूसरे घर से आई हुई लड़की ही समझा जाता है। जीवन में एक बार ऐसी परिस्थितियों का सामना हर लड़की को करना पड़ता है। वह चाहे कितनी ही आत्मनिर्भर क्यों ना हो लेकिन परिवार के भीतर उसे हर समय अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ता है। वह ताउम्र कभी इस प्रश्न का उत्तर नहीं ढूंढ़ पाती कि जिन माता-पिता ने उसे जन्म दिया वह उनके लिए ही अपनी नहीं है तो उसका अपना घर और परिवार कौन सा है?


नारीवादियों का यह कहना है कि चाहे हम खुद को कितना ही उदार क्यों ना दर्शाने लगें लेकिन हकीकत हमेशा से यही है कि भारतीय परिवारों में बेटे के जन्म को ही महत्व दिया जाता है। पिता के घर में रहते हुए भी बेटी कभी उस आजादी या अपनेपन को महसूस नहीं कर पाती जो उसी घर में उसके भाई को मिलता है। माता-पिता अपनी ही बेटी को अपना समझने की कोशिश नहीं करते। वह यही सोचते हैं कि एक ना एक दिन तो बेटी का विवाह हो जाएगा और वह दूसरे के घर चली जाएगी। शिक्षा के क्षेत्र में भले ही महिलाएं उन्नति कर रही हों लेकिन आज भी उनका अपना परिवार उनकी अपेक्षाओं और इच्छाओं की ओर ध्यान नहीं देता। विवाह से पहले उन्हें अपने ही घर में पराया होने का अहसास करवाया जाता है। वहीं पिता के घर से विदा होकर जब वह पति के घर में जाती है तो उसकी हर छोटी गलती पर दूसरे घर की लड़की होने का ताना दिया जाता है और उसकी हर कमी के लिए उसके माता-पिता को दोषी ठहराया जाता है।


वहीं दूसरी ओर इस विचारधारा से हटकर सोचने वाले बहुत से लोगों का मानना है कि सामाजिक परंपरा और संस्कारों की निरंतरता के कारण बेटा और बेटी में भेदभाव ध्वनित होता है, जिसे मात्र एक अपवाद के रूप में ही देखना चाहिए। अधिकांश मामलों का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक तौर पर विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षणिक क्रोधावेश में अभिव्यक्त की गई भावनाओं ने ही तमाम लोगों को यह महसूस करवया है कि परिवारों में स्त्रियों के साथ परायों जैसा व्यवहार किया जाता है और उन्हें अपना नहीं समझा जाता। यही वजह है कि नारीवादियों के कथित आरोपों की पुष्टि करना असंभव हो गया है। हकीकत यह है कि विवाह से पहले या विवाह के पश्चात उन्हें किसी भी रूप में पराया नहीं समझा जाता। ना कभी उनके पिता उन्हें पराया समझते हैं और ना ही पति या ससुराल वाले उसे अपनाने में कोताही बरतते हैं। उसे घर का एक महत्वपूर्ण सदस्य मानकर सभी अधिकार दिए जाते हैं और यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने कर्तव्यों को भी बखूबी निभाएगी।


महिलाओं के पारिवारिक हालातों पर चर्चा करने के बाद कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने आते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:


1. क्या नारीवादियों का यह कहना कि महिलाओं को पिता और पति, दोनों ही घरों में पराया समझा जाता है, सही है?

2. क्या शिक्षित और आत्मनिर्भर बनने के बाद महिलाओं के पारिवारिक हालातों में कुछ बदलाव आया है?

3. वर्तमान हालातों के मद्देनजर क्या यह कहना उचित नहीं होगा कि अब बेटियों के विषय में अभिभावकों की मानसिकता में परिमार्जन हुआ है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


क्या बेटियां पराई होती है?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “पराई बेटियां” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व पराई बेटियां – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Natwar Singjh Dewal के द्वारा
July 23, 2012

घर में जब बेटी पैदा होती है तो सब कहते हैं लक्ष्मी आई है। और कुछ ही देर बाद लोग कहना शुरू कर देते हैं , अरे यह तो पराया धन है। न जाने किस जनम में हमने किसी से कोई क़र्ज़ लिया था , जिसे हम उस जनम में चुका नहीं सके लेकिन इस जनम में हम बेटी के रूप में वह धन उसको लौटा रहे हैं , जिसे हम बेटी के पैदा होने के बाद खोजना शुरू कर देते हैं। वह लड़का कितनी शान से बारातियों को लेकर हमारे द्वार पर उस धन को लेने आता है जिसे हम बेटी कहकर सारी उम्र संभालकर रखते हैं। बस , जिसकी अमानत है उसके पास सही सलामत चली जाये। भले ही वह पराया धन है लेकिन हमारा मोह सारी उम्र उसके साथ जुड़ा रहता है। जिसे लोग दहेज़ कहते हैं शायद वह एक ब्याज है जो हम उस धन के लिए देते हैं जिस धन को न जाने किस सदी में हमने किसी से लिया था। अगर यह पराया धन न होता तो हम रिश्तों में कैसे बंधते ! मायके की दहलीज़ पार करते ही उसे वह घर बेगाना नज़र आने लगता है जिस घर की सरज़मीं पर उसने किलकारियां लगाईं। उसके आंख से टपकते आंसू उसके दिल की हालत बयां करते हैं , जो भले ही हमें रुला देते हैं , लेकिन हम चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकते। बस भगवान से यही दुआ करते हैं कि जहां भी जाए सुखी रहे। इन्हीं बेटियों से दुनिया आबाद है और अफ़सोस लोग उसी को कटु वचन कह कह कर उसका जीवन इतना घुटन भरा बना देते हैं कि वह मन ही मन अपने दुःख पीती रहती है और उफ़ तक नहीं करती। कैसे लोग हैं हम , क्या हमारा ज़मीर मर चुका है ? जिसके सामने हमें सर झुकाना चाहिए हम उसी को ही झुकाने में लगे हुए हैं। किसलिए ? हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं कि हम मर्द हैं और कुछ भी कर सकते हैं ? हमें अपने आपको बदलना होगा ताकि हमारी छवि धूमिल ना हो जाये और नारी समाज में वही इज्ज़त पाए जिसकी वह हकदार है। इनकी वजह से हम इस समाज में उठना बैठना सीखते हैं। इस धन को पराया मत कहिये , बल्कि भगवान का एक वरदान कहिये जो आपकी ही नहीं उसकी जिंदगी में भी सुख शांति ला सकती है जिसकी वह हमसफ़र बनती है। भगवान की अनमोल कृति “नारी” तुझे मेरा शत शत प्रणाम…

    Natwar Singjh Dewal के द्वारा
    July 23, 2012

    वाह रे बन्दे क्या बात है !!!

    Natwar Singjh Dewal के द्वारा
    July 23, 2012

    क्या सब्जेक्ट है !!!

    Nagjiram के द्वारा
    July 23, 2012

    आज तो नत मस्तक हो रहे हो ………

Nagjiram के द्वारा
July 23, 2012

कोन कहता है यह सब बकवास है 

rakesh shukla के द्वारा
July 16, 2012

बेटियां पराई नहीं होती हैं. समाज की जिम्मेदारी हैं. हम सबकी दुलारी हैं. बेटियों को समाज में इतना प्यार मिले कि बेटियों को हर घर अपना लगे. बेटियों की शादी में खर्च को न्यूनतम करना चाहिए. ज्यादा से ज्यादा धन बेटी के  नाम हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए.   

ajaykumar2623 के द्वारा
July 15, 2012

बेटियां पराई नहीं होती हैं, जरूरत पड़ने पर वो बेटों से काफी अच्छी साबित होती हैं. http://ajaykumar2623.jagranjunction.com/2012/07/14/%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%B9%E0%A5%88/

Chandan rai के द्वारा
July 12, 2012

मानवीय संवेदना के छल का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता की उसके पाले पशुं में उसे मादा प्रजाती में अपनापन नजर आता है ,पशुओं का नर समुदाय मानवीय संवेदना की उपेक्षा का शिकार रहता है, गाय ,बैल ,और जाने कितनी प्राजाति , पुराने समय में बनाये इस घटिया प्रर्था पर मुझे क्षोभ आता है , आज गर बेटिओं की विदाई रोक दे तो देखिएगा ,लोग बेटिओं के जन्म की दुआ मांगेंगे, आज बेटियाँ स्वावलंबी है तो समाज का नजरिया भी बदल रहा है , सच पूछिए तो रिश्ते बस पैसे से चलते है , सायद इसलिय लोग बेटिओं को बोझ और पराया समझते है , जिसने भी इस प्रथा को शुरू किया था , हम आज भी उसके जाल में फसे हुए है

sharma harmesh के द्वारा
July 10, 2012

beti praya dhan hai.Yeh shabad naya nahi hai bahut purana hai.humare smaj ne is shabad ko itna mahtav dia gaya hai ke ab yeh shabad humare dimag,dilor pure shareer me sma gaya hai ke betia praya dhan hoti hai.Tabhi to hum beti ko janam lene se pehle hee mar dete hai.koi mane ja na mane ,har admi kahi na kahi apne manmain kisi had tak yeh shabad anjoey hue hai.Upar se hum sabhi kehte hai ke nahi hum aisa nahi sochte……Karvi sachai ko jhuthlana nahi chahey….Iame raaz hai—-gareeb varg or madhay varg–v-uch-varg.teen classes hai humare smaj kee…..Ek hor jo bahut bari lahnat hai humare smaj ke ,jahalat hai humare smaj ki voh hai DAHEJ—-gareeb varg dusra madhaya varg ko yeh dahej ka dar sta raha hota hai—-Uchh varg ke pass paisa bhee hota hai dahej ke ley or woh iske bal-bute bharur hataya ko bhee tarjeeh deta hai—Kahawat hai kaya nangi nahaegee kaya nichoregee–gareeb varg or madhaya varg kee yeh kamjori hoti hai..khane ke killat—fir parvrish or prhane ke tangi..Yeh unko sta raha hota hai—–bete ke badle main dahej bhee dena parta hai–Agar larka ho to dahej na bhee mile to jayada kharcha nahot a—-yeh humare smaj ke majburi hai—–Mere khayal se log pehle se apne man main yeh sanjoeyn hue hai ke beteia praya dhan hoti hai……dusre pase hum isbeti ko hee kanjak[mata] ka rup bhee mante hai kanjak ki puja bhee kaerte hai.kahi par yehi beti hoti hai ,kahi par yehi behan ka rup hoti hai to kahi par yeh patni ka rup hoti hai.Dab se barah rup ma,mamta,mata ka hota hai——bhagwan bhee kabhi kabhi mamta dekhne ke ley tars jate hai to is mriutu log main aakar mamta ke rup ka swad chakhte hai……………………….yeh hee beti hai jo apne susraal main bee ja kar mayke ke sukh mangti hai….dusree tarf jai to beta,pancho unglee barabar nahi hoti.Par yeh dekha bhee gaya hai suna bhee gaya hai ke beta gadi ko sambhalne ke ley baap ke mout ko bhee udeek raha hota hai….. yehi ek sachi hai. hum isko nakar nahi sakte—–

astrobhadauria के द्वारा
July 10, 2012

बेटे से बेटी भली जो कुलवंतिन होय,नाम चलावे माई बाप को दो घर दियना देय॥ प्राचीन काल से इस कहावत को सुनता आया हूँ और देखता भी आया हूँ आज जब दो बेटियों तीन भतीजियों और चार पोतियों को समझता हूँ तो लगता है वास्तव में प्राचीन इस कहावत का अर्थ सटीक है। जब बेटा दिया जाता है तो बेटी मिलती है रूप बहू का हो जाता है,साथ ही जब बेटी दी जाती है तो बेटे की प्राप्ति होती है,बेटी से अन्जाने लोगों से सम्पर्क बनता है,बेटे से भी अन्जाने लोगों से सम्पर्क बनता है,जिन लोगों को कभी देखा नही सुना नही जाना नही पहिचाना नही उन लोगों से सम्पर्क बनने के बाद जो नये नये अनुभव बनते है उनसे लगता है,दोनो ही अपने अपने स्थान पर बराबर का रूप रखते है,भेद समझने वाले ही दुखी होते है,बेटा अपने काम से चला भी जायेगा लेकिन बेटी अपने काम को छोड कर केवल अपने बडों की सेवा मे ही अपने वक्त को गुजारती है। धन्य हैं वे लोग जो बहू और बेटी में अन्तर नही समझते है।

Rahul Ranjan के द्वारा
July 10, 2012

भारतीय सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक मार्गदर्शन स्त्रियों को पराया धन ही मानती है. पुरातन काल के संपन्न जमींदार और भगवान् के दूतों द्वारा स्त्रियों की ये परिभाषा हमारा समाज कभी भी ख़त्म होने नहीं देगा. क्योंकी ये परिभाषा है स्वार्थ की अगर इसमें परिवर्तन हुआ तो दहेज़ के लिए कोई जगह ही नहीं बच पाएगी जो हम होने नहीं देना चाहते. पराया शब्द होगा तभी तो बानगी का प्रावधान भी बना रहेगा.हम भारतीय हैं ही ऐसे बद से बदतर, जुवां मीठी पर दिल से स्वार्थी.समय समीप आता दिख रहा जब सारे समीकरण इस परिभाषा के विपरीत होंगे. बेटियां न कभी परायी थी और न कभी होंगी. पराये है तो सोच की वजह से वरना बेटीओं के पिता बेटी के विवाह पश्चात ख़ुशी का इजहार गंगा स्नान करने से क्यों करते है? जागरण जंक्सन एवं पूरी टीम को इस गंभीर सामाजिक चर्चा के पहल के लिए अनेक अनेक धन्यवाद…

navodita के द्वारा
July 10, 2012

जी हाँ, पिता और पति, दोनों के ही यहाँ महिला के साथ परायेपन का सलूक होता है. यह बात कटाई सच है…पूरी तरह सच है. यह वही हाल है जैसा की ‘पाकिस्तानी मोहजिरों’ के साथ..न भारत में भारतीय न पाकिस्तान में पाकिस्तानी….काफ़िर और मोहाजिर ही बने रहते हैं. शिक्षित और आत्मा-निर्भर बनने के बाद भी महिलाओं की स्थिति में बदलाव नहीं देखा गया. अगर है भी तो बस इतना की माँ-बाप या ससुराल के पक्ष वाले देखना चाहते हैं की कितना खर्च आ रहा है इस लड़की की कमाई से…उससे आत्मा-निर्भरता के रूप में नहीं देखा जाता. यिक वास्तु के रूप में या कहा जाए यिक ‘कमाऊ वास्तु’ के रूप में. बेटियों के विषय में अभिभावकों के नज़रिए में परिमार्जन नहीं आया है. उनके लिए पढ़ी-लिखी, नौकरी करती हुई महिला भी यिक नारी और महिला के अतिरिक्त और कुछ नहीं. यिक अबला और आश्रित हनी के अलावा उस महिला का दर्जा घर-परिवार में कोई ख़ास बाधा नहीं जाता है. यह यिक दर्दनाक स्थिति है और परिवार-विशेष हो सकती है. लेकिन आमतौर पे यह एक सामाजिक समस्या है.

munna के द्वारा
July 10, 2012

ये एक हिन्दू सामाजिक व्यवस्था है और सुंदर व्यवस्था है सिर्फ सवाल बेटी का नहीं इशसे बहुत रिश्ते बनते है पराया धन न समझ कर अपना धन समझेगे तो सामाजिक व्यवस्था टूट जाएगी या तो आप अपनी बेटी की शादी के लिए दूसरे घर का लड़का अपने घर लायेगे या फिर असभ्य असामाजिक धर्मो की तरह से उशकी शादी भाई भतीजे चाचा मामा से कर देंगे कुछ लोग हिन्दू विरोधी कुछ संसथाये इस विषय को लेकर बहस कर रही है किशी भी तरह ये हिन्दू धर्म का विनाश हो जाये हिन्दू सामाजिक व्यवथा तार तार हो जाये मै खुल कर लिख रहा हु इश्मे इंडिया मीडिया का जादा इन्वोल्व्मेंट है जिसमे दैनिक जागरण सहयोग कर रहा है मै दैनिक जागरण के मालिक से पूचना चाहता हु वो अपनी बेटी को पराया धन समझता है या अपना धन बहुत सारे धर्म है बहुत easy गोइंग है लड़का दूंढा ने की जरूरत नहीं घर मै मिल जाता है जरूरत व्यवथा बदलने की नहीं व्यवस्था का दुरपयोग रोकने की है

Pratibha के द्वारा
July 10, 2012

I don’t believe in this topic of “Praayi” because she is also come same ways from parent. So how is Praayi? Who think that, they will mad.

nikki gupta के द्वारा
July 9, 2012

ये पुराने ज़माने से चली आ रही बेहद घटिया सोच है आज जब इतना जमाना बदल गया है तो क्यों नहीं लोग अपनी इस घटिया मानसिकता को बदलते है,क्या कारण है की १ तरफ हम २१वि सदी में जीने की बात करते है और १ तरफ अपनी इस मानसिकता पर विराम नहीं लगा पाते,आज लडकिय हर जगह लडको से कन्धा से कन्धा मिलकर चल रही है,फिर क्या कारण है की हम सदियों पुराणी परम्परा को जीवित रखना चाहते है,आज उन माँ बाप से पूछिए जिनके लड़के उनको जीने लायक बनाने के बाद मुह मोड़े लेते है तब बेटिया ही माँ बाप का सहारा बनती है,तब उनके दिल्लो से पूछिए की कौन पराया है कौन अपना इसलिए इन घटिया और रुदिबदी सोच को दिल और दिमाग से निकल कर लडकियों को भी ऐसे ही गले लगाइए.मैं आज सलाम करती अपने ममी पापा और उन सभी माता पिताओ को जो १ लड़की को लड़के से ज्यादा मानकर पदाते लिखते है और समाज की इस घटिया सोच से लड़ने की हिम्मत दिलाते है.

    munna के द्वारा
    July 10, 2012

    बहन निक्की ये मीडिया परिवार मे लडके लड़की मे फर्क की बात नहीं कर रहा ये बात कर रहा है लड़की पराये धन की ये हमारी सामाजिक व्यवस्था को तोडने का काम कर रह है कौन कहता है की बेटी अपने पिता माता को भूल जाये मानसिकता बदली है लड़के अपने माँपिता को न समझ कर अपने सास ससुर को काफी इज्जत देते है चाहे नाक सीधे पकड लो या घुमा कर पकरो बात एक ही है पहले अपना बेटा परायी बेटी माता पिता की सेवा करती थी अब नए समाज मे अपनी बेटी और पराया बेटा सेवा करता है लेकिन बेटी पराये घर की ही होती है श्री राधे राधे

bharodiya के द्वारा
July 9, 2012

भाई साहब बारबार ईस लेख को जनता के सामने लाने के पिछे क्या मकसद है । साईट के हर पन्ने पर, २ महिने से, ईस का बोर्ड लगाने के पिछे क्या मकसद क्या है । दुनिया में भारत ही अकेला देश नही । सब देशमें लड्किया होती है । पहले ये बताओ दूसरे देशों की लडकियों को क्या माना जाता है । क्या वो लोग अपने ही घरमें लडकियों को ब्याहते हैं । भारतीय लोगों का दिमाग ईतना भी खाली नही हो गाया है की तिर कहां निशाना कहां नही समज सकता ।

    munna के द्वारा
    July 10, 2012

    ये एक हिन्दू सामाजिक व्यवस्था है और सुंदर व्यवस्था है सिर्फ सवाल बेटी का नहीं इशसे बहुत रिश्ते बनते है पराया धन न समझ कर अपना धन समझेगे तो सामाजिक व्यवस्था टूट जाएगी या तो आप अपनी बेटी की शादी के लिए दूसरे घर का लड़का अपने घर लायेगे या फिर असभ्य असामाजिक धर्मो की तरह से उशकी शादी भाई भतीजे चाचा मामा से कर देंगे कुछ लोग हिन्दू विरोधी कुछ संसथाये इस विषय को लेकर बहस कर रही है किशी भी तरह ये हिन्दू धर्म का विनाश हो जाये हिन्दू सामाजिक व्यवथा तार तार हो जाये मै खुल कर लिख रहा हु इश्मे इंडिया मीडिया का जादा इन्वोल्व्मेंट है जिसमे दैनिक जागरण सहयोग कर रहा है मै दैनिक जागरण के मालिक से पूचना चाहता हु वो अपनी बेटी को पराया धन समझता है या अपना धन बहुत सारे धर्म है बहुत easy गोइंग है लड़का दूंढा ने की जरूरत नहीं घर मै मिल जाता है जरूरत व्यवथा बदलने की नहीं व्यवस्था का दुरपयोग रोकने की है भाई भदोरिया जी ये सोची समझी गयी हिन्दू समाज के विरुद्ध रणनीत है ये जितने भी हाई FI मीडिया फॅमिली है ये सब साले आपस मे दूषित परिवार हो गए है अब इनके दिलो मे ग्लानी पैदा हो गयी है तो अब पूरे समाज को दूषित करना चाहते है ये दिन मे कुछा और रात मे कुछा और होते है

sagar के द्वारा
July 9, 2012

अगर बदलाव की बात की जाए तो समाज में महिलाओं को लेकर जो सोच थी उसमें परिवर्तन देखने को मिल रहा है. उसके पिछे कई कारण हो सकते है. लेकिन अभी उनती स्थिति अच्छी नहीं है जिसे हम कह सके की यह एक संतुलित समाज है.

rahul के द्वारा
July 9, 2012

बेटियों को लेकर भारतीय मानसिकता कुछ इस तरह है कि यहां शुरू से ही बेटियों को पराई माना जाता है. यह पराई ही सभी तरह की सामाजिक विषमताओं की जड़ है. अगर बेटिया पराई नहीं होती तो उनकी तुलना बेटों से नहीं होती, अगर बेटिया पराई नहीं होती तो दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, भ्रूण हत्या नहीं होते.

Jack के द्वारा
July 9, 2012

पराया नहीं, ‘धन’ होती हैं बेटियां, संवरते हैं जिनसे दो घर, बेटियों को जो पराया धन मानते हैं उन्हें बेटों से क्या सुख मिलत है वह अच्छी तरह जानते हैं और सबसे बड़ी बात ब्नेटियों को पराया बनाने में हमारी शादी परंपरा का ही सबसे बडा हाथ है. बेटियों को तो अनंत काल से ही पराया माना जाता है

    munna के द्वारा
    July 10, 2012

    सुंदर अति सुंदर लिखा


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