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पोर्न स्टार की बढ़ती लोकप्रियता - आधुनिक भारत की जरूरत या नैतिक हमला ?

Posted On: 11 Jun, 2012 में

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बांग्लादेश की विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन का यह कहना है कि जब आप पॉर्न स्टार को एक सेलेब्रिटी बनाते हैं, तो आप एक एस्ट्रानॉट, इंजीनियर या डॉक्टर बनाने की बजाय अपनी बेटियों को भी एक पार्न स्टार बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इंडो-कनाडियन मूल की पॉर्न फिल्म अभिनेत्री सनी लियोन को भारत में जो लोकप्रियता मिल रही है वह वाकई एक चिंता का विषय है। मीडिया द्वारा प्रचारित होने के बाद सनी लियोन को बिग-बॉस में शिरकत करने का अवसर मिला वहीं अब उनकी फिल्म भी रिलीज के लिए तैयार है।


पॉर्न फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री सनी लियोन हों या न्यूड फोटोशूट करवाने वाली कैलेंडर गर्ल पूनम पांडेय, आज भारत के पारंपरिक और सांस्कृतिक समाज में  ऐसी शख्सियतों को अत्याधिक लोकप्रियता मिलने लगी है। बहुत से लोगों का मानना है कि अगर अपनी परंपरागत और रुढ़िवादी छवि को नकारते हुए भारतीय समाज इन कलाकारों को स्वीकार्यता दे रहा है तो इसे एक सकारात्मक लक्षण ही कहा जाएगा। वैसे भी अभिव्यक्ति और काम करने की आजादी हमारे मौलिक अधिकारों में शामिल है। कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से कोई भी काम कर सकता है और किसी भी रूप में अपनी भावनाएं जाहिर कर सकता है। यहां किसी भी तरह के विवाद का कोई औचित्य नहीं रह जाता। सनी लियोन की बढ़ती लोकप्रियता के पक्षधर लोगों का यह भी कहना है कि अगर भारत को भी वैश्वीकरण की धारा में शामिल होना है तो उसे अपनी संकुचित मानसिकताओं को त्यागना ही पड़ेगा।


वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो नग्नता और अश्लीलता के इस बाजार का घोर विरोध करते हैं। पोर्न स्टार को मिलने वाली ख्याति को भारतीय समाज के लिए घातक करार देने वाले विचारकों का मानना है कि भले ही हमें अभिव्यक्ति का अधिकार प्राप्त है लेकिन समाज के प्रति हमारी कुछ नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है। अगर हम इन अभिनेत्रियों को सिलेब्रिटी बनाते हैं तो हो सकता है कल पॉर्न मार्केट और भी विस्तृत होकर भारत में भी खुले तौर पर प्रचारित होने लगे। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में आसानी से पैसा और नाम कमाने के लालच में भारतीय युवतियां सनी लियोन के रास्ते पर ही चल पड़ें। भारतीय समाज बेहद सांस्कृतिक और अपनी परंपराओं के विषय में संजीदा है, जो इसकी एक सबसे बड़ी विशेषता है। मीडिया द्वारा पॉर्न सितारों को सिलेब्रिटी का दर्जा दिया जाना एक चिंताजनक तथ्य है।


इस विषय से जुड़े पहलुओं पर विचार करने के बाद कुछ बेहद चिंताजनक प्रश्न हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना वर्तमान समय की जरूरत है, जैसे:


1. पॉर्न स्टार को मिलने वाली लोकप्रियता का विरोध करना क्या वाकई उसके अधिकारों पर हमला करने जैसा है?

2. अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से पॉर्न फिल्मों जैसे पेशे में आता है या न्यूड फोटोशूट करवाता है तो क्या इसे उसका व्यक्तिगत मसला नहीं समझा जाना चाहिए?

3. भारतीय समाज में ऐसी अभिनेत्रियों को लोकप्रियता दिलवाने में मीडिया की कहां तक जिम्मेदारी बनती है?

4. क्या पॉर्न फिल्मों और नग्नता का परचम लहराने वाली अभिनेत्रियों को भारतीय समाज में स्वीकार्यता देना वैश्विक धारा में शामिल होने के लिए जरूरी है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


पोर्न स्टार की बढ़ती लोकप्रियता – आधुनिक भारत की जरूरत या नैतिक हमला ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “नैतिक हमला है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व नैतिक हमला – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार



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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मधुर के द्वारा
July 25, 2013

आँखे जो देखती है और बचपन जो देख लेता है उसे न भूल पाता है और न ही पूरे जीवन उस से उबार पाता है | ….aur….Ye baat 100% sahi hai………. Internet daily use karne wale kabhi na kabhi porn zarur dekh lete hain aur jyadater ne porn dekhi bhi hoti hai jo…. ek sach hai…….par ye bhi ek utna hi bada sach hai ki porn dekhne ke baad……….. mann mein uska prabhav bhi rehta hai jo vicharon ko dushit karta hai……mann mein wahi sab baaten aatin rehti hain……keval porn hi nahin balki hamare desh mein banne wali half porn jaisi filmen bhi jo khuleaam talkies mein lagti hain….aur jin par censor ki scissors….bhi nahin chaltin hain wo bhi kafi hadd tak jimmedar hain………….bachpan me aisa dekhkar mann me yahi sab aata hai visheskar 13 se 19 saal tak jb app yuva ho rahe hote hain aur body mein changes aa rahe hote hain……Isliye porn ko easy search nahin banne dena chahiye…aur rahi baat yuwaon ko gupt gyan dene ki to jis tarah pyar karne ka koi school naihn hota usi tarah ….sara gyan ek umra aate aate apne aap hi aa jata hai….

Ambalal Soni के द्वारा
June 22, 2012

बांग्लादेश की विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने जो कहा हैं। वो १०० प्रतिशत सच कहा हैं। क्योंकि हमारे भारत में कुछ फिल्म बनाने वाले और कुछ मिडीया वालो ने सनी लियोन और पूनम पांडेय जैसी वेश्याओ के लिए भडवागिरी शुरु कर दि हैं। अगर समय रहते इन भडवो को नहीं रोका गया तो ये कीडे कुछ दिनों में हमारे साधु संतो, मौलवियों और गांधीजी के भारत को थाईलेंड बना देंगे। हमारी सरकार को सिर्फ पैसे से मतलब हैं। हमारी संस्कृति नहीं। क्योंकि की सरकार भी भडवो से भरी पडी हैं।

ashok kumar gupta alias Priy के द्वारा
June 18, 2012

इस आदमी को हजारो बर्ष लगे जानबर से इंसा बनने में अब समय नहीं लगेगा जानबर बनने में अगर करता रही तरक्की इसी तरह. अशोक कुमार गुप्ता प्रिय

shakuntla mishra के द्वारा
June 17, 2012

नंगा होना किसी का निजी शौक हो सकता है समाज की जरुरत नहीं है और नहीं देश की जरुरत है . मुख है विचार प्रकट करने के लिए हर क्रिया एक मायने रखती है उसी तरह नग्नता भी क्या कहती है यह बताने की जरुरत नहीं .आप बंद कमरे में अपने नंगे रहने का शौक पूरा कर सकते हैं .

sombir के द्वारा
June 16, 2012

chalo sukar hai koi to hai jo sanskriti ko achi tarah janta hai nahi aaj kal ki janta ka to najriya hi change ho gaya hai

dharmendra yadav के द्वारा
June 16, 2012

our country is different . because our country does not accept the vulgure speech and other activity directly.

Amit Kumar के द्वारा
June 15, 2012

तसलीमा नसरीन जी अपने लेख मे बहुत सही लिखा है भारत की हाई सोसाइटी की सोच बदल गई है अब वह ऊपर उठने की बजाय नीची गिरती जा रही है इसका उदाहरन सनी लियोंन की लोकप्रियता से लगा सकते है | हम आने वाली पीढ़ी को क्या दे रहे है यह सोचने का विषय है.

अनुज के द्वारा
June 13, 2012

यह न तो ज़रूरत है और न ही नैतिकता पर हमला….. यह हमारी कमजोर और बदलती सोच को दर्शाता है…अगर हम खुद ही सही / गलत का निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं…..तो कोई भी अपनी सोच आसानी से हम पर थोप सकता है… हम खुद के बनाए हुए नैतिक नियमों का पालन नहीं सुनिश्चित कर सकते तो दूसरों को कैसे उत्तरदायी बना सकते हैं.

Ram Avtar Sharma के द्वारा
June 12, 2012

जो भी इस प्रकार की ओरतो क साथ ह १ डे उनकी भी ओरत और बाटी भी इसी प्रकार सा अपनी नागी फोटो को दुनिया क लिया प्रस्तुत करती नजर आयगी समालो अपनी अप्प को और अपनी बचो क जीवन को जेल करो उनको जो इसकी बकालत करती हा ,,,,

Ram Avtar Sharma के द्वारा
June 12, 2012

पोर्न फिलम बनाने बलि कोई स्टार नहीं होती ह या तो १ प्रकार से देह ब्यापार ह जो १ अपरद की श्रेनी मई अत्ता हा अतः इन्ही सजा मिलनी चिया प्र्सेदगी नहीं और हमारी संस्कृति को दुसित करने बलि हा अत हमारे नेताओ कोऊ सरम अणि कहिया असी गन्दी ओरतो की तरफ करते या देश बीर जबानो का हा न की इन गन्दी ओरतो का …

sharma harmesh के द्वारा
June 12, 2012

Agar hum bharat ke sanskriti ko dekhe to yeh sabh hum ko sobha nahi deta.Vaise bhe hum log achhi cheez ke vajai buri cheez ko jaldi grehan karne ke koshish karte hai.Yeh bhe ek karvi sachai hai ke aisa karne se humare smaj or desh par bura parvhav parehga .Isley hume aise batiopn se gurez karna chahey jo hume or humare desh ko pattan ke or ley jai.Aisa karne se humari mansuikta ka pattan hoga,humari sanskriti ka pattan hoga,humare savbhav ka pattan hoga,humari dharmic bhavnao ka pattan hoga.Iska humare smaj par asar parehga. Isley aisa karne se hume gurez karna chahey.

Amit Dehati के द्वारा
June 12, 2012

बड़े ही दुःख और शर्म की बात है की लोग मोडेर्निटी में अपने संस्कार और अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं . किसी ने कहा है की ‘ परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जायेगा,,,, हकीकत बात ये है की परदे की चीज़ परदे में ही अच्छी लगती है…. मुझे भविष्य के बारे में सोच कर दुःख हो रहा है की कितना भयानक होगा वो दिन जब रिश्तों की धजियाँ उड़ जाएँगी और वो भी भारत जैसे देश में. भाई बहन नाम का कोई रिश्ता क्या बच पायेगा इस पोर्निटी से…..?????? जवाब चाहिए आप सबसे…. हम अपने जनरेशन को क्या देके जायेगें ….? मैथोलोजी स्टार —-श्री राम, या पोर्नोलोजी स्टार —सनी लिओन …….. आप लोगों से प्रतिउत्तर की अपेक्षा है….

Hem Pant के द्वारा
June 11, 2012

She is absolutely correct.We should stop such promotions.Indian women in Indian dresses may it be saree,Salwar Kameej etc, is more attractive than body exposing porn stars. Hem Pant

pradeep kumar के द्वारा
June 11, 2012

Jagran Junction Forum  पोर्न स्टार को सेलेब्रिटी बनाना बिल्कुल ठीक नहीं कहा जा सकता किन्तु फिर भी उसने कानून का उल्लंघन नहीं किया है तो उसको ignore किया जा सकता है. दुखद तो यह है कि हम रिश्वतखोरों, कालाबाजारियों हत्यारों को भी सेलेब्रिटी बनाते हैं क्योंकि उनके पास अपार धन होता है !

Shubham के द्वारा
June 11, 2012

हेल्लो वुअर्स सनी लियोन हमारे भारत की पहचान बन्ने वाली हैं जहाँ पहले हम पोर्न पिक्स छुपकर देखते थे अब खुलकर देखने में सक्षम होंगे ! सनी को धन्यवाद जिन्होंने हमको ये मौका दिया अगर वो नहीं आती तो शायद लोग पश्चिमी फ़िल्में देखकर मस्तार्बेत करते रहते या हमारे यहाँ बलात्कार के केस बढ़ जाते अब ये नहीं होगा लोग आराम से पोर्न पिक्स देखेंगे और मस्त रहेंगे इससे भारत सर्कार को मनोरंजन कर ज्यादा मिलेगा और सर्कार का वित्तीय कोष भी संतुलित रहेगा सर्कार को भी कोटि कोटि नमन !!!

    Ram Avtar Sharma के द्वारा
    June 12, 2012

    तुम को सरम नहीं अति हा इस प्रकार की स्तात्मेंट देती हुई क्या सर्कार अब इस तरह स जीबन यापन करगी भारत सर्कार को मनोरंजन कर ज्यादा मिलेगा और सर्कार का वित्तीय कोष भी संतुलित रहेगा, क्या तुम इनकोंम, टेक्स नहीं डट

    ye thik nahi hai के द्वारा
    June 16, 2012

    jahaa pahle tum porn film chhup ke dekhte the ab ho sake to apne maa-baap-bahan ke sath dek sakhte ho. tumhara यही मतलब था .

alok chantia के द्वारा
June 11, 2012

हम सब नग्न ही पैदा होते है और सभी जीव जंतु पूरे जीवन ही नग्न रहते है पर मानव ने सस्कृति बना कर एक ऐसा विकल्प टायर किया जिससे कालांतर में हमारा ऐसा मनोवैज्ञानिक विकास किया कि कपडा उतरना सबसे बड़ा अपराध बोध सा हो गया | पर कपडा उतरने के पीछे क्या दर्शन काम कर रहा है उसको भी ध्यान में रख कर ही पोर्न मुद्दे पर एक सार्थक बात रखी जा सकती है | सबसे पहले तो यह बात समझना होगा कि कपडा संस्कृति के एक ऐसे वाहक के रूप में स्थापित हुआ इसने यह सन्देश में सफलता पाई कि मानव के जीवन में नग्नता , प्रजनन , आदि का महत्त्व तो है पर सिर्फ यही एक काम मानव का शेष हो , ऐसा नही है क्योकि संस्क्रती के अनुरूप आने को सामाजिक बनाये रखने और एक जैविक मानव से ज्यादा सांस्कृतिक मानव के रूप में खुद ओ स्थापित करने के लिए यह जरुरी था कि मानव , जानवरों के क्रिया कलापों से इतर एक ऐसी व्यवस्था का पोषक बने जिस से उसमे और जानवर में सीधा अंतर किया जा सके और इसी कड़ी में मानव का कपडा पहनना एक विशेष सांस्कृतिक क्रिया है और इस अर्थ में किसी का भी स्राव्जनिक स्थान पर कपडा उतरना और नग्न प्रदर्शन करना एक अपसंस्कृति का कार्य माना जाना चाहिए | अगर यह एक अप्संस्क्रिरी पूर्ण कार्य इसी को नही लगता तो सड़क पर यौन सम्बन्ध बनाना , प्रजनन करना आदि को भी गलत नही माना जाना चाहिए अपर इन सब से यह बा उभर कर जरुर आती है कि फिर नग्न घूम रहे जानवर और खुले रूप से सम्भोग कर रहे जानवर से हम अपने को अलग कैसे करेंगे ? हो सकता है कि लियों यह कह दे कि यह मेरे व्यक्तिगत जीवन का प्रश्न है पर वह व्यक्तिगत कैसे हो सकती है जब वह अपने शरीर का प्रदर्शन एक समाज में कर रही है जहा का अधिकांश व्यक्ति ऐसी क्रिया पसंद नही कर रहा है | इसका सीधा एक ही जवाब है कि मानव तो नंगे भालू और बंदर का नाच देखता है तो क्या वह भालू बंदर हो जायेगा ? और रही यह बात कि क्यों और क्या प्रबह्व पड़ेगा तो मुझे पियाजे का नैतिकता का सिद्धांत याद आ रहा है जिसने खा कि ५ वर्ष तक के बच्चे को जो भी दिखया या सिखाया जाता है वह आने पूरे जीवन न तो भूलता है और न ही छोड़ता है और यही कारण है कि जब आज का बच्चा पैदा हने के बाद से ही नग्नता देखेगा और उसी के कैलेंडर देखेगा तो आने वाले समय में उसे नग्नता में कोई बुरे ही नही दिखाई देगी और बच्चा पूरी तरह एक पुशु समाज का हिस्सा बनता चल जायेगा | ऐसा नही कि यह सब कोई काल्पनिक बात हो क्योकि आज कल जिस तरह बच्चो में सेक्स के पार्टी रूचि बढ़ी है और जिस तरह से शिचिता में कमी आई है \ बिना विवाह के गर्भपात के केस बढे है उस से तो यही सिद्ध होता है बच्चो में नग्नता का प्रभाव पड़ रहा है और मूल्य घट रहे है | किसी के भी घर में बच्चा जन्म के बाद से ५ वर्ष तक जो रिश्ते समझ लेता है वही रिश्ते वह पूरी सिद्दत से निभाता है और उस उम्र के बाद बने रिश्ते में वह गहराई नही रहती है | लियों क्या यह बता पायेगी कि जिस माँ ने एक बच्चे को अपने वक्ष से लगा कर दूध पिलाया होता है वही माँ एक समय बाद अपने बच्चे से भी अपना वक्ष ढक लेती है क्या वह नही कह सकती इ मई तो इसकी माँ हूँ और मैंने तो इसको जन्म दिया है , दूध पलय है तो इससे क्या श्रम और वह अपने बच्चे के सामने ऐसे ही कड़ी हो जाये पर ऐसा नही है क्योकि माँ जानती है कि संस्कृति सिर्फ जैविक प्रकृति को एक आअकर देने का कृत्य भर है और यह एक ऐसा संघर्ध है जिसमे जैविक इच्छा और सांस्कृतिक इच्छा के बीच एक द्वन्द चलता रहता है और इस द्वन्द में वही जीतता है जिसको मूल्य की सही शिक्षा दी गई है | पर माँ के इस दर्शन को लियों को समझना मुश्किल होगा क्योकि आर्थिकी की दुनिया में पशुता वाले कृत्यों के लिए पैसा मिलने का जो प्रक्रम चला वह भी संस्कृति का एक प्रकार कह कर परोसा जाने लगा और मानव को एक ऐसे झंझावाद की तरह ले जाया गया जहा वह अपने को आधुनिक और समय के अनुसार चले वाला कहलाने के लिए वह सब करने को आगे आने लगा जो संस्कृति बनाने से पहले था | अब यक्ष प्रश्न यही कि अगर मानव को नग्नता में आधुनिकता दिखाई देती है या फिर यह एक व्यक्तिगर कार्य लगता है तो आग से ५ लाख साल पहले नंगा खड़ा जंगल में रहने वाला आदमी तो काफी आधुनिक कहा जाना चाहिए और आज से ४००० हजार वर्ष उर्व उसके द्वारा कपडे पहनने की घटना एक पिच्छ्देपन की बात कहलाई जानी चाहिए \ संसद में लूको नंगा बथना चाहिए | नग्नता कितनी ख़राब है यह इसी से पता चल जाती है कि किसी बड़े अभिनेता ने कभी अपने लड़की को फिल्म में लेन कि कोशिश नही की और अगर उसने इसी फिम अभिनित्री से शादी की तो उसे फिल्म में काम नही करने दिया | अब आप ही सोच ले की नग्नता दिखने वाले खुद इस तरह के काम को कितना ख़राब समझते है और किता इससे परहेज़ करते है | जहा तक बात मीडिया की है तो मीडिया एक आर्थिक कार्य ज्यादा है और इसी लिए उसने संचार के नम्म पर कुछ भी छापना स्वीकार कर लिया इसके कारण जो बाते कभी समाज के लिए गोपनीय हुआ करती थी वह बड़ी आसानी से जनता तक उपलब्द्ध हो गई | बुक स्टाल पर कोई ऐसी किताबो को हाथ नही लगाता था जिस पर किसी नग्न महिला की तस्वीर बनी हो क्योकि उससे समाज में उसका चरित्र गिर सकता था पर आज तो घरो में खुलेआम समाचार पात्र में एक पन्ना ऐसे नग्न तस्वीरो को समेटे आता है और पूरा घर उसको अपने नजरो से होकर गुजारता है तो मीडिया में कही न कही समझ को ज्यादा नग्न होने और नग्नता को सोचने के लिए प्रेरित किया है पर बात यही आकर अटक जाती है कि शराब , सिगरेट सब तो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है पर क्या वह बंद कर दिए गए बल्कि इनकी खपत ही दिनों दिन बढ़ी है और जिनको नही पीना है वो आज भी नही पी रहे है भले कितने विज्ञपन दिखाए जा रहे हो यानि सब कुछ आप पर निर्भर करता है कि आप क्या चाहते है पर फिर भी आँखे जो देखती है और बचपन जो देख लेता है उसे न भूल पाता है और न ही पूरे जीवन उस से उबार पाता है | इस लिए पोर्न स्टार को सोचना चाहिए कि उनका नग्न होना आधुनिकता से ज्यादा पशुता और जंगलीपन है जिससे मानव हजरों वर्षो के प्रयास के बाद निजात पाया था | डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

    Amresh bahadur singh के द्वारा
    June 11, 2012

    डॉ आलोक चान्टिया जी आप ने बहुत ही सरलता से बहुत ही सही बात रखी है…… इसका मैं पूरा सप्पोर्ट करता हु …..

    Ram Avtar Sharma के द्वारा
    June 12, 2012

    डा जी अप्प नै बिलकुल सही खा हमरे पूर्बज जिन्होनी लाखो सालो सा म्हणत कर क मनुष्य को जानवर सा शब्या समाज मई प्रेवार्तेत किया आज या नागी ओरतो देश को दोवारा उसी जानवर समाज म लिय जा रही हा इन्हे रोकना होगा

    shivam kumar के द्वारा
    June 13, 2012

    mai aapki baato se puri tarah sahmet hu aalok je.kuch besharm logo jinhe bhartiya sanskriti aur ijjat ka mulaya pata he nahi hota wo hi hamare samaj ko ganda karte hai.jisme media ka v bahut bada yogdaan hota hai

    sombir के द्वारा
    June 16, 2012

    alok g aapke baatein mujhe achi lagi sanskriti ke liye koi to hai jo in manav jindagi ko samjh raha hai Thanx

    Deependra Singh Tomar के द्वारा
    April 7, 2013

    डा0 साहब आपने प्रत्येक बिन्दु को गहराई से वर्णित किया है क्योंकि जब तक हमें यह समझ मे नही आयेगा कि यह गलत क्यों है और हमेंक्या करना चाहिये तब तक हम कुछ नही कर सकते रहि बात लियोन के व्यक्तिगत अधिकर की तो अधिकार वहीं तक सीमित होते है जन्हा तक वह दुसरे को प्रभावित नही करते और ये तो पुरे समाज,शहर,देश एवं हमारी संस्क्रति जिसके लिये हमें(भारत) को दुनिया जानती है तो फिर हमे सोचना होगा कि हमें लियोन के अधिकार की ज्यादा जरूरत है या हमारी संस्क्रति की ।

Jolly Uncle Writer के द्वारा
June 11, 2012

आज जमाना ही ऐसे लोगो का है, अच्छा लिखने वाले तो अपने परिवार के रोटी भी नहीं कमा सकते. मेरे ५०० से अधिक लेख छप चुके है, रचनात्मक विषयों पर ६ पुस्तके लिख चुका हूँ, लेकिन फिर भी हर किसी को हर हफ्ते मुफ्त में नए-नए लेख चाहिए. एक अखबार वाला लेख लेता है तो कम से काम १० और उसे मुफ्त में छाप लेते है. जो लोग पोर्न स्टार के बारे में लिखते है, उन्हें होटल में बुला कर पर पैसे भी देते है और दारू भी मिलती है. इस से समाज का कितना नुकसान होता है किसी को कोई लेना देना नहीं. जोली अंकल

ROHIT के द्वारा
June 11, 2012

सत्य है यदि हम लोग एक पोर्न स्टार को पसंद कर रहे हैं तो बेशक हम ये प्रचार कर रहे हैं की हमें पोर्न स्टार्स आची लगती हैं, और अपने बच्चो को जाने अनजाने में प्रोत्साहित भी कर रहे हैं की वो भी उस को पसंद करें और अपना कैरिएर बनाये, इसलिए कुछ भी करने से पहले हमें अपने आपको किसी भी चीज के लिए तैयार कर लेना जरुरी होगा, क्योंकि ये जरुरी नहीं है की जो चीज मीठी हो वो जहर नहीं हो सकती, आगे बच्चे अब ज्यादा सम्छादार हैं वो जानते हैं की उन्हें क्या करना है

pds mishra के द्वारा
June 11, 2012

सबसे पहले तो मै मिडिया कि सीमाओ के बारे में कुछ कहना चाहता हु, मिडिया अपनी सीमा को भूलता जा रहा और ऐसी चीजो को जादा उछालता रहता है जिसका कोई जादा औचित्य ही नही है, कोई हिरोईन क्या कर रही है या कैसे कपडे पहनी है या किस कलर के कपडे पहनी है इससे आम आदमी बहोत दूर है लेकिन जब मिडिया इसे प्रचार के तौर पर दिखाती है तो वो लोक प्रिय हो जाता है, आज मिडिया कि ही देन है कि निर्मल बाबा को पहले इतना प्रचार मीला और अरबो रुपये का मालिक बन बैठा. अब आप पूनम पाण्डेय को ही ले लीजिये, उसके बारे में क्या कहू, मै ये नही कहता कि किसी के अधिकार का हनन होना चाहिए, लेकिन आप को भी अपने अधिकार में ही रहना चाहिए .चलिए अब बात करते है सनी लियोन कि……………….. सनी लियोन से पहले मुझे और कोई याद आ गया…………………वीणा मालिक मिडिया कि ही देन है कि लोग बीना मालिक को जानते है और आखिर कार ये बीना मालिक है क्या चीज. इसे मिडिया ने इतना प्रचार प्रसार किया जैसे भारत को एक नयी उचाई देना चाहता हो. अब आते है सनी लियोन पे …………………. हम पहचान दूसरी दूँनिया से अलग होती है, आखिर ऐसा क्या है हमारे पास ,… हमारे यहाँ बेरोजगारी है, कितने लोग भूखे सो जाते है ,कितनो को रहने के लिए घर नही है, जहा देखो वहा करप्सन है, हर जगह गन्दगी का देर लगा हुआ है फिर भी …………………..लोग भारत में आते है और पसंद करते है आखिर क्यूँ……………………………..यहाँ कि सस्कृति उन्हें बहोत अच्छी लगती है, लोग अपने बदन को ढक के रखते है, शादी करने अगले हफ्ते दूसरी शादी नही कर लेते, प्यार अगर कही है तो बस इंडिया में और हम अगर उन्ही देशो कीतरह हो जायेगे तो फरक ही क्या हुआ उनमे और हम्मे. चलिए अब हम दैनिक जागरण के कुछ प्रश्नों के जवाब देते है……………. 1. पॉर्न स्टार को मिलने वाली लोकप्रियता का विरोध करना क्या वाकई उसके अधिकारों पर हमला करने जैसा है? =किसी चीज का बिरोध तभी होता है जब उससे जीवन में कुछ असुभिधायें उतपन होती है, ढकी हुयी चीज हमेसा अच्छी लगती है, खुलने के बाद , खुले हुए डब्बे को कोई नही देखता .हमें नही लगता कि ऐसी चीजो का बिरोध करने उसके अधिकारों का हनन है. 2. अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से पॉर्न फिल्मों जैसे पेशे में आता है या न्यूड फोटोशूट करवाता है तो क्या इसे उसका व्यक्तिगत मसला नहीं समझा जाना चाहिए? =ये उसका ब्यक्तिगत मामला जरुर है जब तक कि यह ब्यक्तिगत मामला उसके घर तक सिमित रहे अगर इससे लीगो को परेशानी होती है तो ये ब्यक्तिगत मामला नही हो सकता. 3. भारतीय समाज में ऐसी अभिनेत्रियों को लोकप्रियता दिलवाने में मीडिया की कहां तक जिम्मेदारी बनती है? =फिर से मै मिडिया के बारे में क्या कहू…………………….मिडिया, लोगो का माध्यम हुआ करता था अपनी कठिनाईयों को सबके सामने रखने का, अब तो बस रंगीन पेपर छापते है……………….अभी भी अगर मिडिया ठान ले तो बहोत कुछ कर सकती है इस देश के लिए………. 4. क्या पॉर्न फिल्मों और नग्नता का परचम लहराने वाली अभिनेत्रियों को भारतीय समाज में स्वीकार्यता देना वैश्विक धारा में शामिल होने के लिए जरूरी है? =जिस दिन हमने ऐसा कर दिया उसके बाद न हम, हम रहेगे और न हमारा भारत, भारत रहेगा और न लोग इस भारत को देखने आयेगे और न यहाँ कि सस्कृति कि सराहना करेगे. जय हिंद जय भारत

चन्दन राय के द्वारा
June 11, 2012

१. पॉर्न स्टार को मिलने वाली लोकप्रियता का विरोध करना उसके अधिकारों पर हमला करने जैसा है, जब इस देश में हर किसी को अपनी अभिव्यक्ति की मौलिक स्वीकृति है ,तो निश्चित ही यह नैतिक हमला है, किसी भी विषय को पसंद न पसंद करने का अधिकार हमारा हो सकता है २ अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से पॉर्न फिल्मों जैसे पेशे में आता है या न्यूड फोटोशूट करवाता है तो क इसे उसका व्यक्तिगत मसला समझा जाना चाहिए, क्यूंकि क्या हमने उस व्यक्ति की मुलभुत आवश्यकताओं को या उसकी जरूरतों को पूरा करने के पर्याप्त अवसर पैदा किये है , यदि नहीं तो किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करने का अधिकार हमारा नहीं है

    ramkumar के द्वारा
    June 11, 2012

    good every body is trying to become moral police

    चन्दन राय के द्वारा
    June 12, 2012

    हमारे भीतर ही है अच्छा ,बुरा .सही. गलत हमे इस बात को तलाशना होगा की क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है , जो बाह्य सभ्यता ,संस्कृति के प्रभाव में बिखर जाए , — भारत ही वो जगह है जन्हा काम क्रीडा का सबसे बड़ा ग्रन्थ कामसूत्र लिखा गया , में तो इसे बदलते समाज की उची होती उदार सोच ही कहूंगा जो आज हम हर मेहमान का उन्मुक्त भाव से स्वागत कर रहे हैं ४ पॉर्न फिल्मों और नग्नता का परचम लहराने वाली अभिनेत्रियों को भारतीय समाज में स्वीकार्यता देना वैश्विक धारा में शामिल होने के लिए जरूरी नहीं है , और मुझे नहीं लगता ये सोचकर महेश भट्ट साहब ने ये निर्णय लिया होगा , हमे अपनी दकियानूसी और इक ही भेडचाल में बेवजह चलना बंद करना होगा , सायद यही वजह है की पश्चिमी सभ्यता आज हम से आगे है ================= ३ देखीय इसमें मीडिया कंही से भी जिम्मेदार नहीं , क्यूंकि जो बुरा होगा ख़राब होगा ,वह स्वत ही भुला दिया जाएगा , पर मीडिया को किसी भी विषय पर निर्णायक की भूमिका नहीं अपनानी चाहिए

umeshshuklaairo के द्वारा
June 11, 2012

नैतिक और अनैतिक के बीच हमारी संस्कृति : सनी लियोन के परिप्रेक्ष्य में भारतीय संस्कृति में स्वांगीकरण का विशेष गुण है ..हमने विभिन्न संस्कृतियों का विभिन्न काल खण्डों में अंगीकरण किया है जिसे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है ..तरह तरह के लोगों को मिलाते मिलाते आज हम उस जगह पर आ गये है जहाँ हमारा मूल स्वरुप कुछ इस कदर वीभत्स हो चूका है की हम स्वयं उसे पहचान देने से कतराने लगे हैं .. खैर बात सनी लियोन जैसी शख्शियतों को सामाजिक मान्यता देने एवं उनकी स्वीकार्यता की है ..पूछा गया है की आधुनिक भारत की ज़रूरत या नैतिक हमला यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित है की भारत सदैव से आधुनिक विचारधारा का रहा है तथाकथित आधुनिक लोगों के ज्ञान विज्ञानं आचार विचार सब भारतीय संस्कृति से कहीं न कहीं प्रेरित हैं यदि वो हमारे ज्ञान का प्रयोग कर रहे है तो स्पष्ट है की हम विकसित एवं आधुनिक हैं… अब बात करें नैतिक हमले की तो यह भी कुछ तर्कहीन लगता है ……हमारे ग्रन्थों में यौन संबंधों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गयी है फिर चूक कहाँ हो गयी ?.अपने अन्दर झांकिए और बताइए की कब अपने अपनी संतानों से यौन सम्बन्ध की चर्चा की …दरअसल हम पता नहीं किस रूप में विकसित हुए की हमारी सोच संकीर्ण होती गयी …जब बच्चे अपने निकटस्थ लोगो से इस विषय में जानकारी नहीं पते तब वे इधर उधर से कोशिश करते है क्यूंकि कन्या रजस्वला होने के बाद और बालक वीर्य संवर्धन आयु के बाद स्वतः ही कौतुक हो उठता है इन विषयों को जानने के लिए ऐसे में हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन न करके अपनी जिम्मेदारी से बचते है ..यहाँ तक की कभी कभी झुंझलाहट में बच्चो को डांट भी देते हैं ….कुंठित बाल मन और उत्सुक हो उठता है … यहीं से आरंभ होती है स्वाध्याय की पाठशाला जहाँ वह इस ज्ञान को एक विकृत रूप में ग्रहण करता है और उसका पोषक बन जाता है किसी संस्कृति पर हमला कोई एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता और यदि संस्कृति के पहरेदार इतने ही सजग होते तो आज इस स्थिति पर चर्चा करने की आवश्यकता ही न बनती किन्तु फिर भी जो हो रहा है वह चिंता का विषय है …हम किसी की आजादी या व्यक्तिगत जीवन से कोई वास्ता नहीं रखते , हमें रखना भी नहीं चाहिए आप नग्न चित्र बनवाएं या नग्नावस्था में अपने घर के अन्दर कुछ भी करें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तात्पर्य कही भी सांस्कृतिक माहौल को दूषित करना नहीं है …ये सामाजिक प्रदूषण है जो उस घाव की तरह है जिसमे मीठा मीठा दर्द होता है जिस प्रकार सम्भोग की अवस्था के दर्द को आनंद में परिवर्तित कर लिया जाता है मस्तिष्क के अन्दर ही अन्दर उसी प्रकार इस सामाजिक दर्द की स्वीकार्यता भी बनती जा रही है ……… मीडिया ने कभी भी इस विषय को संजीदगी से लिया ही नहीं हर काल में चाहे वह देवकी रानी के उभरे वक्षों का चित्रण रहा हो चाहे नूतन और बीना के अर्ध नग्न पोस्टर,मन्दाकिनी पूजा बेदी के अश्लीलता पूर्ण चित्र या फिर आज पूनम पाण्डे और सनी लियोन कभी मीडिया ने अपने इस कृत्य का दुष्परिणाम सोचा ही नहीं … आज तो वह स्थिति आ गयी है की जो भी परोस दो सब ठीक है …मीडिया का जनमानस पर प्रभाव सभी जानते हैं ऐसे में मीडिया का सहारा लेकर आगे बढ़ जाना कोई मुश्किल नहीं वरण सर्वसुलभ रास्ता है ऐसी सभी अभिनेत्रियों का सिनेमा जगत में एक स्थान तो बनता है किन्तु वास्तविक रूप से दिलों में जगह बनाए के लिए उन्हें भी स्वयं में अमुल चूल परिवर्तन करना होता है .. मुद्दा इनकी स्वीकार्यता का है ही नहीं ,न किसी की निजता में हस्तक्षेप का, मुद्दा तो है “ये कहाँ आ गए हम?” क्या हमारी सामाजिक संरहना के तंतु इतने शिथिल हो चुके हैं की हम परस्पर किसी संवेदनशील विषय पर चर्चा भी नहीं करते बस देखते रहते हैं और कुछ समय बाद ये कह कर स्वीकार कर लेते है की “अरे भाई अब तो ऐसा ही होता है ” ऐसा ही होता है तो क्यूँ नहीं आप अपनी पुत्री को प्रेरित करते है की वो भी एक पोर्न स्टार बन जाये और आपका लड़का भी ऐसा ही करे या जिगोलो बन कर जीवन यापन करे… पहले के समय की वैश्यावृत्ति जो एक प्रांगन तक सीमित थी आज उसका प्रांगन विस्तृत होकर हमारे आपके बच्चों के मस्तिष्क तक आ गया है संभवतः पुलिस की रेड में पकड़ी जाने वाली लड़कियां और लड़के इस दिशा में कदम बाधा चुके होते हैं …तो आज हम किसी सनी लियोन को क्यूँ कोसें ? अपनी गलती नज़रंदाज़ करना सबसे बड़ी मूर्खता होती है जो आज का समाज करता जा रहा है खास कर यौन शिक्षा के मामले में ….. मीडिया थोडा संयम बरते और हमारे समाज के जागरूक लोग मिलकर इस व्यथा से लड़ने के रास्ते खोजें वरना आने वाले दिनों में हर घर में सनी लियोन ही जन्म लेगी या फिर जैसा की तंज़ानिया में हो रहा है : वहां के ५ वर्ष के बच्चे भी माता पिता से लड़ कर ब्लू फिल्म देखने जाते हैं —ऐसा ही कुछ अपने देश में भी होने लगेगा आज वक़्त है हर किसी को अपनी जिम्मेदारी खुद से समझनी होगी और ये विश्वास रखिये की आपकी इस समस्या को ख़त्म करने के लिए कोई रोबिनहुड नहीं आने वाला ..आपको स्वयं लड़ना है और जीतना है ताकि गर्व से कहा जा सके की हम सबको अपनाते हैं सब कुछ नहीं…..


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