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कार्टून विवाद – राजनीतिक पैंतरेबाजी या महापुरुषों की अस्मिता का सवाल ?

Posted On: 21 May, 2012 में

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प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा बनाए गए बाबा साहब अंबेडकर के विवादित कार्टून पर दिनोंदिन बहस तेज होती जा रही है। एनसीईआरटी की पुस्तक में प्रकाशित इस विवादित कार्टून का मसला अब तूल पकड़ने लगा है। कार्टून अभिव्यक्ति की एक ऐसी विधा है जिसकी सहायता से एक कार्टूनिस्ट सामाजिक, राजनैतिक या अन्य मसलों पर कटाक्ष करते हुए अपनी बात कहता है। लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की आजादी होती है और यह अभिव्यक्ति किसी भी माध्यम से हो सकती है। बशर्ते इससे किसी के सम्मान को ठेस ना पहुंचे। हालांकि सरकार ने पाठ्य पुस्तकों से इस कार्टून को हटाए जाने का आदेश जारी कर दिया है लेकिन यहां यह सवाल उठता है कि क्या सच में यह कार्टून अपमानजनक है या फिर इसके विरोध के पीछे कुछ और कारण है?


प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर, जिन्हें आज के दौर के कार्टूनिस्ट अपना आदर्श मानते हैं, के द्वारा बनाए गए इस विवादित कार्टून का विरोध करने वाले लोगों का यह साफ कहना है कि इस कार्टून के माध्यम से बाबा साहब अंबेडकर, जो संविधान सभा के अध्यक्ष थे, का अपमान किया गया है। इस कार्टून में यह दर्शाया गया है कि बाबा साहब एक घोंघे के ऊपर बैठे हैं, जिसे संविधान का नाम दिया गया, और उनके पीछे चाबुक लिए जवाहरलाल नेहरू चल रहे हैं। यह कार्टून बाबा साहब अंबेडकर के संविधान सभा अध्यक्ष होने जैसी काबीलियत पर आघात करता है। बाबा साहब दलित नेता थे इसीलिए उनके माध्यम से दलितों पर निशाना साधा जा रहा है। संविधान बनने में हुई देरी के लिए पूरी तरह भीम राव अंबेडकर को ही दोषी ठहराया जाना कतई सहनीय नहीं है।


वहीं दूसरी ओर इस विवाद को गलत ठहराने वाले लोगों का कहना है कि 1946 में प्रकाशित इस कार्टून पर अब बहस करना निरर्थक है। वैसे भी यह कोई यह पहला मसला नहीं है जब किसी प्रख्यात शख्स को कार्टून में उतार कर कार्टूनिस्ट ने व्यंग्यात्मक तरीके से अपना दृष्टिकोण सिद्ध किया है। इससे पहले शंकर द्वारा ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू आदि के कार्टून बनाए गए हैं, लेकिन उनका विरोध किसी ने नहीं किया। कार्टून जैसी विधा में प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कही जाती है। अगर चाबुक और घोंघा किसी को आहत करता है तो ऐसे में शायद सभी कार्टून अभद्र और अपमानजनक हैं। इस कार्टून का उद्देश्य संविधान बनने में हुई देरी के प्रति विद्यार्थियों का ध्यान आकर्षित करना है। उल्लेखनीय है कि भारत की संविधान सभा ने दुनिया की अन्य संविधान सभाओं की तुलना में ज्यादा गहरी और विस्तृत चर्चा की थी, जिसकी वजह से संविधान बनने में देरी हुई। और जहां तक तथाकथित दलित वर्ग की बात है तो बाबा साहब एक अनुभवी, काबिल और पूरी तरह सक्षम शख्स थे। उन्हें दलित या पिछड़ा कहना किसी भी रूप में सही नहीं है। इसीलिए इस कार्टून का दलितों से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है। बल्कि सच तो यह है कि बाबा साहब अंबेडकर का नाम लेकर राजनीतिज्ञ अपने हित साधना चाहते हैं, क्योंकि वह नहीं चाहते कि भविष्य में उन पर आधारित किसी कार्टून का निर्माण किया जाए।


उपरोक्त चर्चा और विभिन्न दृष्टिकोणों को आंकने के बाद हमारे सामने निम्नलिखित प्रश्न उठते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है:


1. क्या कार्टून का सहारा लेकर किसी व्यक्ति विशेष की योग्यता पर प्रश्न उठाना सही है?


2. प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा बनाए गए इस कार्टून पर विरोध जाहिर करना संवेदनशील मुद्दा है या इसे भी राजनीति के लिए उठाया जा रहा है?


3. क्या बाबा साहब अंबेडकर वाला कार्टून एक बहाना है और सांसदों की असली परेशानी कार्टूनों में उभरती उनकी खुद की छवि है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


कार्टून विवाद – राजनीतिक पैंतरेबाजी या महापुरुषों की अस्मिता का सवाल ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “कार्टून विवाद” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व कार्टून विवाद – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार





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12 प्रतिक्रिया

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umeshshuklaairo के द्वारा
May 25, 2012

प्रख्यात कार्टूनिस्ट श्री शंकर जी द्वारा 50 क्र दशक में बनाये कार्टून को लेकर इस तरह का विवाद ही स्वयं में विवादस्पद है… कार्टून तात्कालिक घटनाओं पर व्यंग्यात्मक टिप्पड़ी होते है …….क्या हम आज भी उसी दशक में जी रहे हैं सदी हुयी लाशों को धोने वालों क्या तुमको सड़ांध नहीं आती रही बात किसी योग्य व्यक्ति की काबिलियत पर शक करने की तो भाई थूकने का काम नीचे मुह करके करना चाहिए , ऊपर मुह करके थूकने से क्या होता है सबको मालूम है अब बात करें राजनीतिक पैंतरेबाजी की तो यही लगता है की इन नेताओं को कुछ मसाला मिलना चाहिए और वो अपनी सब्जी बनाने में लग जाते हैं ….चलिए मन की NCERT से गलती हुयी …..सबसे होती है इसको राजनैतिक रंग देकर लोगों के अंदर जो वैमनस्य बढ़ने का काम ये नेता कर रहे हैं वह कहा तक उचित है ….कहा जाता है मतभेद होना उन्नति का रास्ता तैयार करता है लेकिन मनभेद हो जाते ही तरक्की के रस्ते बंद होने लगते है अप सभी से गुजारिश है की खुद इस मसले को अपने अंतर्मन में टटोलें आपको पता चलेगा की आपको क्या करना चाहिए…………..

krishna kant shrivastava के द्वारा
May 23, 2012

आंबेडकर के कार्टून पर विवाद महज़ एक ओछी राजनीती के तहत सोच्घी समझी चाल है. मै सभी राजनितिक दलों व आम जनता का ध्यान कुछ सालो पहले मरहूम हुसैन चित्रकार के उस कार्टून की तरफ आकर्षित करना चाहूँगा जिसमे जगत जननी माँ सरस्स्वती का नग्न कार्टून बनाकर समस्त भारत वंसिओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया गया था, तब उस समय ये राजनैतिक पेंतेरेबाज़ कहाँ थे , उस वकुत किसी ने संसद में हो हल्ला नहीं मछाया था तो आज आंबेडकर के कार्टून पर क्यू ?

umashankarsrivastava के द्वारा
May 22, 2012

देश के किसी भी महा पुरुष का कार्टून बनाना यानि की उनका मजाक उड़ाना है | अगर किसी को कार्टून बनाने का बहुत शौक है तो वो किसी भी जानवर .पशु पच्छी या आम आदमी का बना सकता है |

vatsal के द्वारा
May 22, 2012

बाबा साहब और भारतीय समाज डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने आजीवन दलितों, उपेक्षितों, शोषितों, पिछडों तथा महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। समाज में व्याप्त गैर बराबरी की भावना दूर करने तथा सामाजिक न्याय दिलाने कें लिए संविधान में अनेक प्रावधान किए। डॉ अम्बेडकर का मानना था कि सामाजिक कुरीतियों को दूर करके ही एक आदर्श समाज की स्थापना संभव है। आज कुछ मौकापरस्त लोगो जो अपने को दलितवादी नेता कहलवाते हैं और वो बाबा साहब के मिशन को नहीं बल्कि उनके माध्यम से आत्मप्रचार ज्यादा करते हैं , कुछ दिन पहले अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब भारत आये थे तब कुछ दलित नेताओं ने उन्हें बाबा साहब की समाधि पर चलने का का आग्रह किया था | आशय ये बताया गया की इससे बाबा साहब के प्रति लोगो का ध्यान आकर्षित होगा…..क्या भारत के इस महान सपूत को अपनी प्रतिष्ठा के लिए किसी विदेशी की रहम की जरुरत है ? बाबा साहब केवल दलितों के नहीं बल्कि पूरे भारत के बारे में सोचते थे वो आजीवन अपने देश और समाज के उत्थान के बारे में सोचते रहे यहाँ तक की उन्हें अपने बारे में सोचने की फुर्सत नहीं थी ..उनका जीवन और लेखन इस बात का प्रमाण है | बाबा साहब मानते थे की भारतीय समाज के सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े लोगो का आर्थिक उत्थान सेज्यादा उनमें आत्मसम्मान , विवेक और आत्मनिर्भरता की जरुरत है , जबतक शोषित वर्ग खुद अपने आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता के महत्व को नहीं समझेगा तब तक वो शोषित रहेगा | कई मामलो में बाबा साहब गाँधी से बड़े थे , गाँधी के हरिजन शब्द पुकारने में उन्होंने कड़ी आलोचना की क्यूँ की ‘हरिजन’ शब्द का अर्थ कुछ और ही होता गाँधी का दलित प्रेम केवल भावनात्मक था उसमें जमीनी हकीकत बिलकुल भी नहीं थी इसलिए उन्होंने कांग्रेस और गाँधी के कथित दलित प्रेम को एक ढोंग कहा | बाबा साहब हिन्दू धर्म के सामाजिक कुरीतिओं और रूढ़िवादिता विरोधी थे उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी अधिक सामाजिक बुराइयाँ हैं और मुसलमान उन्हें ” भाईचारे ” जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं। उन्होंने मुसलमानो द्वारा अर्ज़ल वर्गों के खिलाफ भेदभाव जिन्हें ” निचले दर्जे का ” माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं मे भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है। उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का अक्षरक्ष अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा की भारत को विदेशी धर्म की आवश्यकता नहीं है इस लिए उन्होंने बौध धर्म में दीक्षा ली , उन्होंने कभी भी अपने कार्यो के लिए विदेशी धन की जरुरत नहीं की | हिन्दू धर्म के प्रति कटु आलोचना करने के वावजूद विदेशियों द्वारा इसकी झूठी आलोचना करने पर वो खुल कर विरोध करते थे , कैथरीन मेयो ने जब अपनी पुस्तक में हिन्दू धर्म की आलोचना की तब बाबा साहब ने उसकी गलती तुरंत दिखाई | बाबा साहब विषम परस्थितियों , छुआ-छूत की यातना सहकर , सामाजिक कुरीतिओं और रूढ़िवादिता को झेल कर भी समाज के शोषित और उपेक्षित वर्ग को न्याय दिलाने के लिए जीवन भर संघर्ष शील रहे इसके लिए उन्हें किसी कुर्सी का मोह नहीं था परन्तु आज के अपने को दलित नेता कहलाने वाले लोग जो उनके नाम पर राजनेतिक रोटियां सकते हैं वो साधन संपन्न और धनवान होते हुए भी जमीनी स्तर पर काम करने की इच्क्षा शक्ति का आभाव है, आज दलित केवल उनको संसद की कुर्सी पाने का एक जरिया बन कर रह गया है | भारत में इसाई और इस्लाम में धर्मान्तरित होने वालो में दलित वर्ग लगभग ७० % है और ऐसा क्यूँ है ये ये सभी जानते हैं ….ये सवर्ण हिन्दुओं के लिए शर्म की बात है की वो भारत के क्रमश: विखंडन को देख कर भी सीख नहीं ले रहा , उन्हें उंच-नीच ,सामजिक और आर्थिक भेदभाव सम्बन्धी बुराइयों को दूर करने और सम्पूर्ण हिन्दू समाज की एकता के लिए प्रयतन्नशील होना चाहिए | from VATSAL VERMA ( journalist cum news correspondent)…. MOB -9026560218

ashokkumardubey के द्वारा
May 22, 2012

कार्टून विवाद Jagran Junction Forum कार्टून विवाद और कुछ नहीं यह आज के नेताओं की ओछी मानसिकता है जिस बाबा साहेब आंबेडकर के कार्टून पर आज साठ साल बाद विवाद खड़े कर रहे हैं हमारे देश के बुद्धिमान नेता शायद इनको कार्टून क्या कह रहा है? क्या सन्देश दे रहा है? इस तथ्य की इनको जानकारी नहीं और जिनका कार्टून बना वे तो उन दिनों इसको गलत नहीं समझा न अपनी मानहानि समझी आज जो बाबा साहेब आंबेडकर को ये दलित नेता बनाकर उनको छोटा कहने का ही इनका मुर्खता पूर्ण प्रयास है बाबा साहेब पूरे समाज के नेता थे वे बुद्धिमान थे तभी उन्होंने भारतीय संविधान को लिखने का एक अतुलनीय काम किया आज जो अपने को दलितों का नेता कह रहे हैं वे संभ्रांत दलित है और इन नेताओं को दलितों की पड़ी नहीं कोई इनको दलितों की फ़िक्र नहीं ये तो दलितों के नाम पर देश का धन जरुर लूट रहे हैं बहन मायावती भी अपने को दलितों का नेता कहती हैं किसको मालूम नहीं उन्होंने अपने शासन कल में करोडो अरबों का ग्रामीण स्वास्थ्य योजना में घोटाला किया कितने लोग मरे गए उनको आत्महत्या पर मजबूर किया आज जाँच हो रही है खुलासा भी जल्द होगा अतः कार्टून का सहारा लेकर किसी ब्यक्ति विशेस की योग्यता पर प्रश्न उठाना कतई सही नहीं यह गलत है वह भी शंकर जैसे कार्टूनिस्ट का उनको तो कई पुराने नेता बुलाकर कहते थे शंकरजी इतने दिन हो गए आपने मेरा कोई कार्टून नहीं बनाया क्यूंकि कार्टून एक सन्देश देता है इसका अर्थ आज के चरित्रहीन बेईमान नेताओं को कहाँ से होगा ये तो भ्रष्ट तरीके से चुनकर आ गए अब इनको कार्टून में ही अपनी इज्जत दिखाई दे रही है अतः प्रसिद्द कार्टूनिस्ट शंकर जैसे महान विद्वान् कार्टूनिस्ट द्वारा बनाये गए कार्टून पर इन नेताओं का विरोध करना इन नेताओं का अज्ञानी होने का परिचायक है और वह कहावत है न “चोर की दाढ़ी में तिनका “: वाही कहावत चरितार्थ कर रहे है आज के नेता और अब कोई मुद्दा बचा नहीं और असली मुद्दे से जनता का ध्यान हट जाये इसके लिए इन्होने यह नया हथकंडा अपनाया है और इसको लेकर राजनीती कर रहे है मेरे विचार से बाबा साहेब आंबेडकर वाला कार्टून एक बहन है और आज सांसदों की असली परेशानी कार्टूनों से उभरती उनकी असली तस्वीर बयां कर रही है क्यूंकि पिछले दिनों जब अन्ना हजारे का आन्दोलन चला तो इनकी औकात जनता को ठीक से पता लग चुकी है और इनको अब अपनी अस्मिता धूमिल होती नजर आ रही है क्यूंकि संसद के भीतर इनका जिस तरह का आचरण रहा है उसे इस देश की जनत ने टेलीविजन पर देखा है नेताओं का क्या हिया चुनाव के समय झूठे वैदे कर लेते हैं सपने दिखाते हैं और चुनाव जीतते ही जनता के सपने टूट जाते है और इनका असली चेहरा सामने आ जाता है और ये नेता हर गलत काम के लिए एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर अपना कार्य काल पूरा कर लेते है. कार्टून हमेशा से अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक रहा है और हमेशा रहेगा और जनतंत्र में अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता हमारा संवैधानिक अधिकार है इसको कोई नेता नकार नहीं सकता अतः इसका पूरजोर विरोध होना चाहिए ये नेता इस देश की जनता से उसका अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीनना चाहते हैं .

दीपक बिष्ट के द्वारा
May 22, 2012

कार्टून विवाद – Jagran Junction Forum प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर जी द्वारा बनाया गया कार्टून आज के राजनेताओं का प्रतिबिंब है, न कि बाबा साहब अंबेडकर का अपमान है। क्योंकि जब अंबेडकर जी संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में संविधान का निर्माण कर रहे थे तो उस समय परिस्थितियाँ विपरीत और नई थी। एक अच्छे संविधान का निर्माण एक चुनौती थी। इसलिए समय का ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग एक स्वभावीक क्रिया है। किन्तु आज जिस तरीके से संविधान एक घोंघे की तरह रेंग रहा है। इसका जिम्मेदार कौन है, आज के हमारे राजनेता। जो अंबेडकर जी द्वारा परोसे गए विभिन्न पकवानो से युक्त संविधान रूपी थाली के भोजन को अपने हलक से नीचे उतार नहीं पा रहे हैं। तो घोंघे के असली प्रतीक कौन हैं हमारे राजनेता, जिन्हे स्पष्ट रूप से अपनी छवि शंकर जी बनाए गए कार्टून में दिखाई दे रही है। तो उनका तिलमिलाना स्वाभाविक है। और अपनी छवि को बचाते हुए, अंबेडकर जी की छवि का सहारा लेकर दुश्मन पर वार करना यही तो राजनीति है।

dineshaastik के द्वारा
May 22, 2012

मुझे लगता है कि ये नेता कार्टून का विरोध  करके बाबा साहब अम्बेडकर  की भावनाओं का अपमान कर रहें हैं। ये नेता राजनैतिक  महात्वाकांक्षा के लिये कुछ  भी कर सकते हैं। ऐसे नेताओं को मैं देशद्रोही की श्रेणी में रखना चाहूँगा। क्या आप मेरी बातों से सहमत हैं, यदि नहीं है तो क्यों?

amitabh shrivastava के द्वारा
May 22, 2012

“कार्टून विवाद” Jagran Junction Forum समय ठहरता नहीं है, समय की तस्वीर से उस दौर के हालात जाने जा सकते है. किन्तु यह आवश्यक नहीं कि बीता हुआ कल, आज को खराब या बेहतर कर सके. हां हम गुजरे कल से नसीहत ले सकते है..या गुजरे कल की खुशहाली पर सुखद अहसास किया जा सकता है किन्तु जो बीत गया उसे वैसा ही रहने दिया जाए तो ठीक होता है. मगर ऐसा होता नहीं. मानवीय अवगुणों में प्रमुखता से जो तत्व सक्रीय है उनमे बीते समय की खामियों को ज़िंदा करके उस पर बहस-मुबाहस होती है. ठीक बाबा साहेब आम्बेडकर के कार्टून विवाद की तरह. दर असल जिस कार्टून को लेकर हंगामा मचा है उसे एक वर्ग विशेष के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा है. जबकि उस वक्त जब यह कार्टून प्रकाशित हुआ था तब वर्ग विशेष की मानसिकता वश इसे छापा नहीं गया था. संविधान में होने वाली देरी और चूंकि बाबा साहेब आम्बेडकर इस संविधान के निर्माता के रूप में प्रमुख थे इसलिए उनका कार्टून बनाया गया था. संभव है उस वक्त कोई भी संविधान निर्माण का मुखिया होता तो उसे काटरूनिस्ट शंकर अपनी तूलिका से खींचते. बहरहाल, आज जब पाठ्य पुस्तक में उस कार्टून को प्रकाशित किया गया तो बवाल मचाना ही था. किन्तु यह देखना भी सर्वोपरि होगा कि किस सब्जेक्ट के तहत उस कार्टून को पुस्तक में जगह दी गयी ? अफ़सोस यह है कि हम वस्तु स्थिति को हाशिये पर रख कर अर्नगल प्रलाप करने लगते है. वैसे भी इस दौर की राजनीति अपने सबसे बुरे दौर से गुजरती दिखाई देती है..ऐसे में आम्बेडकर के कार्टून को मुद्दे के रूप में बना लेना कोई बड़ी बात नहीं थी. देश में दलितों के नाम पर होने वाली राजनीति ने दलितों का उद्धार कम उन्हें बहकाया अधिक है..उन तक ठीक ठीक चीजे पहुंचने ही नहीं दी गयी. वे भ्रमित ही रहे. उन्हें भ्रमित बनाए रखना राजनीति बाजों का शगल है. पाठ्य पुस्तक जो बच्चो के मन-विचारों का विकास करती है, उन्हें जानकारी और ज्ञान प्रदान करती है उसके जरिये भी राजनीति करना इस देश के लिए घातक सिद्ध हो सकता है और अफ़सोस यह है कि इससे बचा नहीं जा रहा. आम्बेडकर कार्टून विवाद इसी राजनीति से जन्मा एक बवाल है. गंभीरता से इस मुद्दे को समझना होगा किन्तु गंभीरता शेष है कहा ? अन्यथा विवाद जन्म ही नहीं लेता. जिस कार्टून पर बवाल है उसके बाद खुद आम्बेडकर ने अपने एक वक्तव्य में स्पष्ट किया था कि आखिर संविधान निर्माण में देर कैसे हो रही है? क्यों हो रही है? इसके बाद के शंकर द्वारा बनाए गए कार्टून उपलब्ध नहीं हो सके वरना संभव था कि उन चित्रों में अपने पहले चित्र का खंडन भी करते शंकर दिखाई दे जाते. देखा यह जाना चाहिए था या पूछा यह जाना चाहिए था कि आखिर इस वक्त उस कार्टून को प्रकाशित करने का क्या प्रायोजन था? तुरंत बर्खास्तगी या बवाल में घी डालने से बेहतर यही था. निश्चित रूप से पुस्तक में दलितों की भावना को ठेस लगाने की कोई मंशा नहीं रही होगी..किन्तु यह समझाए कौन? अब जब बवाल मच ही गया और कार्टून को पुस्तक से अलग भी कर दिया तब..विवाद को जस का तस बनाए रखने का भी कोई औचित्य जान नहीं पड़ता. हालांकि इस विवाद ने एक बहुत बड़ा प्रश्न भी खडा कर दिया है. आज जिस तरह से हमारे नेताओं ने कई सारी योजनाओं को ठन्डे बस्ते में डाल रखा है उस पर भी एक तरह से यह कार्टून तीखा प्रहार करता जान पड़ता था..लिहाजा इस वजह से भी विरोध उनके लिए जरूरी था जिन्होंने आग में घी डालने का काम किया और इस प्रकरण की दिशा घुमा दी गयी. मुद्दे राजनीति के लिए आवश्यक होते है. संवेदनशील मुद्दे हो तो इसे सोने पे सुहागा माना जाता है क्योंकि लोगो की भावनाओं के साथ खेल कर वोटो की जुगाड़ इस देश की पुरातन क्रिया है. कार्टून मुद्दा इतना भी बवाली नहीं था जितना इसे बना दिया गया . चूंकि संवेदना इससे जुडी हुई थी इसलिए इसकी गरमाहट में हाथ सेंकने का ही काम हुआ . बावजूद इसके मुझे फिर यह कहना होगा कि वक्त ने जो पीछे छोड़ दिया है उसे ताज़ा अगर किया भी जाना है तो उन अच्छी और प्रगतिशील तस्वीरो को उठाया जाए जिनसे देश का हर कोण से विकास हो…शेष जो अधूरे भारत का इतिहास दर्शाता है उसके पुनर्जीवन की हम क्यों मंशा पाल कर रखे? बाबा साहेब के बेहतरीन कार्यो को अगर देखा जाता तो अधिक उचित होता . बहरहाल. कार्टून विवाद से शीघ्र निकल जाना चाहिए और तमाम वर्गों में एक बात प्रसारित होनी चाहिए कि हमें देश का स्वस्थ विकास करना है. अगर राजनीति इस ओटले पर खडी होकर बुलंद हो तो हम सुखद राष्ट्र की कल्पना कर सकते है.

Ajeet Singh के द्वारा
May 21, 2012

Political Parties/Leaders are not bothering about it, but they are showing interest on Dr. Babasaheb Ambedkar’s cartoon Issue because they are trying to get attention from public, and they are trying to escape from other issues in which they are directly/indirectly involved, If you ask about Baba Saheb’s Life History, some of them can’t speak about it because they don’t know and after some time if somebody ask them to raise issue on any other’s cartoon, they will be ready because now they come to know that this “Cartoon” word also can become a good issue to be in limelight in public, They are trying to become a God of Dalits/Poor people by sitting inside the AC Rooms or Debate in Parliament or speech about previous govt., for false commitments/failures and with some new commitments in the front of public/media that’s all. Public is happy by reading news that we are going to get some good in new govt., and leader is happy that if I m getting into any controversy public will support me and vote me in the election, They can use/spend that money on themselves very easily which comes from govt. to spend on public facilities, and after that also if public/opposition ask for work and that money, they will start begging from central govt. and if central provides the money they will try to save it or spend only 25% out of it. It is not with any one political party it is with maximum parties because all are has to spend money on next election. This is the chain of corruption: -> Central ->Election -> Commission -> Political Parties -> Leaders -> Candidates, and at the end public they don’t have choice, have to choose someone of them only either he/she is from criminal background / corrupted, Someone should be there who can take responsibility to ensure that selected candidate is neat and clean as per the rules and that body should not have any interference/influence from Govt./Party Here public is not getting anything leader is not losing any thing. Thanks you Yours An Indian

aryasanskritikendra के द्वारा
May 21, 2012

कार्टून विवाद – Jagran Junction Forum अगर कार्टून के माध्यम से बाबा साहब अंबेडकरका अपमान किया गया होता तो बाबा साहेब स्वयम इस पर अपना विरोध प्रगट करते | ।, जो संविधान सभा के अध्यक्ष थे, इस कार्टून में यह दर्शाया गया है कि बाबा साहब एक घोंघे के ऊपर बैठे हैं, जिसे संविधान का नाम दिया गया, और उनके पीछे चाबुक लिए जवाहरलाल नेहरू चल रहे हैं। यह कार्टून बाबा साहब अंबेडकर के संविधान सभा अध्यक्ष होने पर यां उनकी काबीलियत पर आघात नहीं करता करता अपितु संविधान बनने में देरी पर कटाक्ष करता है | आज जब देश ऐसे हालत में गुजर रहा है की केंद्रीय सरकार भ्रष्ट, निकम्मी, बेबस और सब तरफ से फेल साबित हो रही है, तो कुर्सी पर बने रहने के लिये रूलिंग पार्टी की चंडाल चौकड़ी जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से हटाने के लिये और संसद का वक़्त बर्बाद करने के लिये गड्ढ़े मुर्दों को उखाड़ रही है | दलित नेता बाबा साहब के माध्यम से दलितों को उक्साया जा रहा है | मायावतीजी की राजनितिक माया को भी इस से फ़ायदा ही फ़ायदा है | श्रदये भीम राव अम्बेडकरजी जैसी महान हस्ती को विवाद में लाना सराहनीय नहीं है | १९४६ का कार्टून विवादका मसला ही नहीं है और ऐसे तो हर कार्टून पर विवाद खड़ा किया जा सकता है | बाबा साहब अंबेडकर को दलित कहनेवाले केवल अपनी रोटी सेकना चाहते हैं, अपना वोट बैंक कायम रखना चाहते हैं यां फिर आम जनता को बहकाना चाहते है | असल में भ्रष्ट राजनेता अपनी बिगडती हुई छवि और डूबती हुई नय्या से बेहद परेशान है |

alok chantia के द्वारा
May 21, 2012

The recent controversy over the cartoon of Babasaheb Ambedkar sitting on a snail and Pandit Nehru whipping it from behind, indicating that Ambedkar had made the process of making the Constitution slow, whereas Nehru was for hastening it, created a massive ruckus in Parliament, cutting across all political parties. The cartoon, drawn by P. Shankar Pillai in 1949, was brought into an NCERT political science school textbook in 2006. The reaction of Dalits to the inclusion of the cartoon in the textbook has been amazingly uniform: they have seen it as a deliberate undermining of Ambedkar’s stature; they have seen it as trivialising their prophet. For them, he is not just a Constitution-maker, as he is to Hindu intellectuals. A bit of context here is useful. In the recent past, any attempt, howsoever small, to desecrate Ambedkar’s statues in any part of the country—there are thousands across India—has led to a riot-like situation. This has not been witnessed even in the case of statues of leaders like Mahatma Gandhi and Jawaharlal Nehru because they are seen just as great leaders—and nothing more—by their ardent followers. Being mostly Hindus, their gods are elsewhere. However, for a large number of Dalits, Gautam Buddha is God and Ambedkar is a prophet who established a spiritual relationship between the Buddha and them (Two other comparable, but more established, prophets are Jesus and Mohammed). For many insensitive, upper-caste intellectuals, he is just a leader or an intellectual, a lesser mortal than Gandhi. For consultants to the National Council for Educational Research & Training (NCERT) like Yogendra Yadav and Suhas Palshikar, he is a lesser mortal than even Lohia (they are Lohiaites). How and why did Ambedkar cross the stage of a mere leader and intellectual in the mind of Dalits? How did he acquire the status and stature of a prophet? As in the case of the old Arab tribes, the Dalits of India were godless untouchables—exploited, worshipping local idols, living in oppression and superstition—at the time Ambedkar arrived on the socio-political scene of India. If Prophet Mohammed introduced the abstract Allah to self-destructive tribes, Ambedkar introduced Buddha to soulless Dalits. Rama and Krishna, who were seen and referred to as gods by Hindu nationalist leaders, were never seen as the liberators and saviours of Dalits. Though Jesus and Mohammed used the politics of liberation and salvation, their organisation remained spiritual. On the other hand, Ambedkar worked as a leader and as an intellectual, wrote volumes, among which is the Constitution of India, but finally realised that religion is the source of liberation here and salvation hereafter. He created a new religion—Navayana Buddhism. Through this process, he even liberated Buddha from imprisonment in the Dashavatar. Unlike the other prophets, Ambedkar never performed miracles, but his birth, growth, education, and finally his pitting of Buddhism against Hinduism itself appear miraculous. If Jesus giving spiritual water to a Samaritan woman in exchange for well water is a miracle, if Mohammed civilising the Arab tribes is a miracle, Ambedkar reviving Buddhism as the answer to iniquitous Hinduism is a miracle. Nehru—like some other intellectuals—thought Ambedkar’s Buddha and Dhamma would be an innocuous book. But that book is attaining the stature of Buddhism’s holy book. Gandhi and Nehru now remain upper-caste heroes and agents of the state, whereas Ambedkar is a prophet of the poorest of the poor—the Dalits. The difference between a prophet and a leader is that a prophet becomes a living hope of liberation and salvation of the poorest of the poor. That is what Buddha, Jesus and Mohammed are. They always stood by the poorest of the poor. They too never peeped into the houses of the rich and the exploiters. Ambedkar did the same. Ambedkar infused soul into a soulless people. As Buddhists, they now walk with their head high. In drawing his cartoon, Shankar could not even imagine this. He was just an upper-caste man living off fun pictures. That is okay with Gandhi and Nehru. That funny game cannot be played with prophets who changed the lives of poor people, who were hitherto never allowed to be human beings. Yes, prophets too play politics. But their politics is meant to liberate the oppressed. Ambedkar did that without any compromise at any stage of his life.

    aryasanskritikendra के द्वारा
    May 21, 2012

    कार्टून विवाद – Jagran Junction फोरम अगर कार्टून के माध्यम से बाबा साहब अंबेडकरका अपमान किया गया होता तो बाबा साहेब स्वयम इस पर अपना विरोध प्रगट करते | ।, जो संविधान सभा के अध्यक्ष थे, इस कार्टून में यह दर्शाया गया है कि बाबा साहब एक घोंघे के ऊपर बैठे हैं, जिसे संविधान का नाम दिया गया, और उनके पीछे चाबुक लिए जवाहरलाल नेहरू चल रहे हैं। यह कार्टून बाबा साहब अंबेडकर के संविधान सभा अध्यक्ष होने पर यां उनकी काबीलियत पर आघात नहीं करता करता अपितु संविधान बनने में देरी पर कटाक्ष करता है | आज जब देश ऐसे हालत में गुजर रहा है की केंद्रीय सरकार भ्रष्ट, निकम्मी, बेबस और सब तरफ से फेल साबित हो रही है, तो कुर्सी पर बने रहने के लिये रूलिंग पार्टी की चंडाल चौकड़ी जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से हटाने के लिये और संसद का वक़्त बर्बाद करने के लिये गड्ढ़े मुर्दों को उखाड़ रही है | दलित नेता बाबा साहब के माध्यम से दलितों को उक्साया जा रहा है | मायावतीजी की राजनितिक माया को भी इस से फ़ायदा ही फ़ायदा है | श्रदये भीम राव अम्बेडकरजी जैसी महान हस्ती को विवाद में लाना सराहनीय नहीं है | १९४६ का कार्टून विवादका मसला ही नहीं है और ऐसे तो हर कार्टून पर विवाद खड़ा किया जा सकता है | बाबा साहब अंबेडकर को दलित कहनेवाले केवल अपनी रोटी सेकना चाहते हैं, अपना वोट बैंक कायम रखना चाहते हैं यां फिर आम जनता को बहकाना चाहते है | असल में भ्रष्ट राजनेता अपनी बिगडती हुई छवि और डूबती हुई नय्या से बेहद परेशान है |


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