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सोशल मीडिया पर नियंत्रण – अखंड राष्ट्र की जरूरत या अभिव्यक्ति पर हमला ?

Posted On: 30 Apr, 2012 Others में

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हाल ही में पूर्व कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की कथित सेक्स सीडी सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक कर दी गई। सीडी पर विवाद इतना अधिक गहरा गया कि अभिषेक मनु सिंघवी को अपने सभी राजनैतिक पदों से इस्तीफा तक देना पड़ा। यह पहली ऐसी घटना नहीं है जब सोशल मीडिया के कारण सरकार और आम जनता को नुकसान उठाना पड़ा है। हकीकत को दरकिनार कर अगर हम प्रभावों की बात करें तो किसी भी प्रकार का नियंत्रण ना होने के कारण सोशल मीडिया के जरिए ऐसी सामग्रियों का प्रसारण बड़ी आसानी से किया जा सकता है जो देश की एकता और अखंडता को बाधित करने में पूर्ण सक्षम हैं। यही वजह है कि अब सोशल मीडिया पर नियंत्रण लगाने जैसी कवायद जोर पकड़ने लगी है।


परंतु सोशल मीडिया अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा माध्यम और उदाहरण है, इसीलिए अनेक बुद्धिजीवियों का यह मानना है कि अगर सोशल मीडिया को भी नियंत्रित कर दिया गया तो यह अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकार पर आघात होगा।  अनियंत्रित सोशल मीडिया के पक्षधरों का कहना है कि भले ही सोशल मीडिया के माध्यम से अनेक विवादास्पद सामग्रियां सार्वजनिक की जा सकती हैं लेकिन इससे आम जनता अपने द्वारा चुनी गई सरकार और राजनेताओं की वास्तविकता से परिचित हो सकती है। आसपास घटने वाली वारदातों और सामाजिक सच्चाई से भी जनता बिना किसी परेशानी के रूबरू हो सकती है। अनेक बुद्धिजीवियों का मानना है कि सोशल मीडिया पर नियंत्रण लगाकर हम कभी भी हकीकत तक नहीं पहुंच सकते।


वहीं दूसरी ओर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो पूरी तरह नियंत्रित सोशल मीडिया के पक्षधर हैं। इस वर्ग के लोगों का यह साफ कहना है कि बिना नियंत्रण के कभी कोई चीज लाभप्रद नहीं हो सकती। सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्रियों पर कोई निगरानी ना होने के कारण राष्ट्रीय अखंडता पर हर समय खतरा मंडराता रहता है। कभी भी कोई भी व्यक्ति कुछ भी ऐसा संचालित कर सकता है जो सामुदायिक या जातिगत भावनाओं को आहत कर सकता है। सोशल मीडिया पर नियंत्रण रखने की मांग करने वालों का यह भी कहना है कि निजता का पूर्ण हनन अनियंत्रित सोशल मीडिया का बड़ा दुष्प्रभाव है।


ऐसे हालातों में कुछ बेहद जरूरी प्रश्न सामने आते हैं जिन पर चर्चा करना राष्ट्रहित में अनिवार्य है, जैसे:

1. क्या सच में अनियंत्रित सोशल मीडिया देश की अखंडता के लिए खतरा है?

2. क्या वास्तव में सोशल मीडिया हालातों को और अधिक जटिल बना देती है?

3. अगर सोशल मीडिया के माध्यम से हमारे राजनेताओं की सच्चाई सामने आती है तो ऐसे में इसे नियंत्रित करने का क्या औचित्य है?

4. क्या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी की निजता का हनन करना सही है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


सोशल मीडिया पर नियंत्रण अखंड राष्ट्र की जरूरत या अभिव्यक्ति पर हमला ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “सोशल मीडिया पर नियंत्रण” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व सोशल मीडिया पर नियंत्रण Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
August 27, 2012

अभिब्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग होना या करना दोनों हिन् गलत है अतः मेरी राय में यह जो आजादी मिली है उससे बुध्धिजीवी लोगों को जन जागरण एवं जनहित में जानने समझने वाली लाभप्रद बातें हिन् लिखनी चाहिए अपने विचारों को रखने का हक़ हमें जरुर संविधान द्वारा मिला है लेकिन साथ साथ इसका इस्तेमाल अगर कोई सामाजिक सौहार्द को बिगड़ने के लिए करता है तो वह कहीं से जायज नहीं और असंवैधानिक भी है अतः कुछ लिखने से पहले यह सुनिश्चीत कारन जरुरी है की इससे देश के बीच सामाजिक सौहार्द को नुकसान तो नहीं पहुच्नेवाला सरकार भी ऐसे लेखों पर हिन् बैन लगाने की बात करती है हाँ अगर सरकार नेताओं के के बारे में अगर लोग लिखते हैं जो की अक्सर ही लिखा जाता है तो पहले उस बयां में सच्चाई कितनी है इसकी जानकारी भी लेनी होगी और नेता के मामले निजी नहीं हो सकते वह जनता का प्रतिनिधि है उसके द्वारा दिए गए बयां से जनता सधे रूप में प्रभावित होती है जनता का जीवन उसके संवैधानिक अधिकारों का भी उससे सर्कार होता है फिर नेता की कोई बात निजी कैसे हो सकती है हाँ उसके पारिवारिक बातें उसके लिए निजी हो सकते हैं अतः जानत को अभिब्यक्ति की स्वतन्त्र एक संविधान प्रदत्त अधिकार है इस पर सरकारी बैन लगन जानत के अधिकारों का हनन ही मैं समझता हूँ .अगर सोशल मिडिया हालातों को ज्यादा जटिल बनती हैं तो इसकी इजाजत भी नहीं मिलनी चाहिए लेकिन कई बार सोह्सल मिडिया के प्रबह्व से कई सच्चाई भी उजागर होती है अतः मिडिया द्वारा समस्यायों को जटिल ही बना दी जाती है इस तर्क को मैं नहीं मानता . हाँ जरुर जो नहीं लिखने लायक है उसे नहीं लिखना चाहिए साथ ही साथ जिससे हालातों और तथ्यों को सामने लेन में मदद मिलती हो उसे रोकना भी नहीं चाहिए वैसे यह साडी कवायद कांग्रेस पार्टी का घटत्ता जनाधार ही इसका मुख्य कारन है जो सरकार और कांग्रेस नित नए बैन को सोंच रही है पर इससे सच्चाई पर पर्दा नहीं डाला जा सकता जनविरोधी नीतियों का विरोध तो जनता करेगी हीं ऐसा सरकार और कांग्रेस को समझ लेना चाहिए .

vivek sharma के द्वारा
May 6, 2012

महात्मा गाँधी ने कहा था की ” मेरा दावा है कि मानव मन या मानव समाज निर्विवाद सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक कहे जाने वाले भागो में विभाजित नहीं है I सभी एक दूसरे पर आश्रित हैं और एक दुसरे से जुड़े हुए हं I” , महात्मा गांधी ने कहा कि सात बातें हमें नष्ट कर देंगी …..सिद्धांत के बिना राजनीति…. भी उनमे से एक है.. सोशिअल मीडिया पर नियंत्रण हो या न हो ये तो विचार करना जरुरी है ही साथ ही उससे जरुरी बात ये है की सोशिअल मीडिया पर नियंत्रण की जरुरत क्यों महसूस हो रही है और इसकी मांग कर कोन रहा है ? आखिर सोशिअल मीडिया पर बंदिशों की बात तभी क्यों होती है जब इसके निशाने पर हमारी सरकार , कोई वजीर, सरकार का कोई नुमईन्दा या , या कोई ताकतवर व्यक्ति होता है. या इनमे से किसी के काले कारनामो से पर्दा उठता है. सोशल मीडिया पर नियंत्रण की बात सबसे पहले बाबा रामदेव के आन्दोलन के समय चली, उसके बाद अन्ना हजारे के अनशन के समय भी कुछ आवाज़ आई I “जब तक आपने उछाला वो गुलाल था , हमने उछल दिया तो गंदगी हो गया I ” सोशल मीडिया तो समाज का दर्पण है . जब चेहरे पर कलिश लगी हो तो दर्पण साफ़ करने से काम नही चलता, जरुरत सोशल मीडिया पर बंदिश लगाने की नहीं अपना चेहरा साफ़ करने की है . जब ताकत गलत लोगो के हाथो में होती है तब ऐसा ही होता है I अगर कुछ बदलना है है तो उन लोगो को बदलना होगा जो जनता के सेवक होने के नाम पर जनता से अपनी सेवा करा रहे हैं I चूँकि ये मामला अभिषेक मनु के बाद आया है तो ये भी सोचना होगा की अब कैसे हमारी अदालते सिर्फ इस बात पर की दोनों पक्षों में अदालत से बहर समझोता हो गया है इस मामले को निरस्त कर देती हंI ऐसे तो कल कोई भी अगर अदालत से बहर मामला सुलझा ले अदालतों की जरुरत क्या है . इस मामले को अदालत में क्या सिर्फ मीडिया में लाने के लिए किया गया था. ये हमारे सिंधवी जी की वकालत का नमूना नहीं तो और क्या है? कल अगर कोई चोर , लुटेरा, डाकू अपनी खुस्किस्मती से ( और हमारी बदकिस्मती से) माननीय बन जाये और कहने लगे की चोरी करना , लोगो को लूटना तो उसको निजी पेशा है तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे ? चाहे कोई राजनेता हो या हीरो ये हमारे रोल मॉडल होते है अगर इन लोगो को अपनी निजी जीवन की चिंता है तो सामाजिक जीवन में आते ही क्यों है? क्या सिर्फ पैसे कमाने के लिए ? जिसे अपनी निजता की चिंता है वो सामाजिकता से सरोकार न रखे I ब्रिटिश राज में जब सोशल मीडिया नहीं था क्या तब अंग्रेज लोगो को रोक पाए , नहीं ना तो फिर अब क्यों? किसी का मुह बंद करने से अप उसके दिमाग को तो नहीं रोक सकते अगर बदलना है , तो उन लोगो को बदलो जिन्हें जनता की नहीं अपनी निजता की चिंता है I

AK Madhav के द्वारा
May 4, 2012

सोशल मीडिया अगर अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता देता है लेकिन अभिव्‍यक्ति में दूसरे की भावनाएं आहत न हों इसका ख्‍याल और जिम्‍मेदारी उस व्‍यक्ति की होती है। जो सोशल मीडिया का प्रयोग कर रहा है। किंतु इस जिम्‍मेदारी का कौन सा व्‍यक्ति कितना ख्‍याल रखता है। जहां अधिकार होते हैं वहां जिम्‍मेदारियां भी होती हैं।

Ajay Kumar Singh के द्वारा
May 4, 2012

सोशल मीडिया पर नियंत्रण – Jagran Junction Forum सोशल मीडिया पर नियंत्रण कुछ हद तक तो जायज़ है जैसे ऐसे किसी भी समाचार को प्रकाशित या प्रसारित नहीं करना चाहिए जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो और देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो, परन्तु ऐसे परिस्थिति कम ही आती है, ज्यादा खतरा तो हमारी सरकार को और नेताओं को है जिसकी नाकामयाबी और कारगुजारी आम जनता तक पहुँच जाती है और वे अपने बचाव में सही तथ्य नहीं रख सकते, उनकी मस्तियाँ और आलसपन सब के सामने आ जाती है उनके खिलाफ कोई भी आम आदमी अपनी आवाज़ उठा देता है सोशल मीडिया के सहारे, उन्हें उनकी ड्यूटी याद दिल्याई जाती है सोशल मीडिया के सहारे इसीलिए आज सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की बात चल रही है ताकि उन्हें परेशानी का सामना कम से कम करना पड़े और लोगों को उनके कारगुजारिओं के बारे में कम से कम पता चल सके

RAJEET KUMAR RANJAN के द्वारा
May 2, 2012

ग़.दगी साफ करनॊ तौ परोगी

harish sharma के द्वारा
May 1, 2012

ये सही है की मीडिया देश की अखंडता को बरक़रार रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है, पर इसे देश की धज्जिया उड़ाने में देर भी नहीं लगेगी… अभिषेक मनु सिंघवी की कथित सेक्स सीडी सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक कर दी गई। सीडी पर विवाद इतना अधिक गहरा गया कि उसे सभी पदों से इस्तीफा देना पड़ा .. यार एक बात बताओ क्या अभिमन्यु को अब सेक्स भी मीडिया से पूछकर करना पड़ेगा…… उसकी निजी जिन्दगी अब मिडिया की हवाले है क्या??……. अभिमन्यु अगर एक नेता नहीं होता तो कोई उसका थूक भी नहीं चाटता,,,,और अब जब वो लीडर बन गया तो ये कैमरा लेकर उसकी गहराई में ही घुस गए .. शर्म आनी चाहिए …. …… उसके निजी जीवन को सार्वजनिक कर के तो जैसे मिडिया ने बहुत बड़ा तीर मार दिया ..जैसे भारत वापस सोने की चिड़िया बन गया हो….जैसे आंतकवाद ने दम तोड़ दिया हो ……………………………क्या कुछ ऐसा चमत्कार किया है मीडिया ने ??????? ……………………………अभिषेक के सेक्स का कोनसा दुष्प्रभाव देश पर पड रहा है?? और फिर जग हंसाई से क्या देश की इकोनोमी बढ रही है……!!!! मीडिया के किये हुए अच्छे कामो के लिए उसे बढ़ावा भी दिया जाना चाहिए पर मीडिया किसी की कथित तौर से आजादी और इछाये नहीं छीन सकता है …. आपने कहा की अगर सोशल मीडिया के माध्यम से हमारे राजनेताओं की सच्चाई सामने आती है तो ऐसे में इसे नियंत्रित करने का क्या औचित्य है????? और आप ये भी कहेंगे की किसी का परदाफास करने के लिए सबूत तो चाहिए ना..बिलकुल सही बात….पर सबूत कोर्ट के लिए होते है ना की समाज के लिए … एक आम आदमी क्या कर लेगा और क्या कर देगा ….???….कुछ भी नहीं ….. आप कसाब का case ही ले लीजिये….उसकी चलाई हर एक गोली का सीधा प्रसारण हुआ …..सबको पता था कि कसाब ने कितने लोगों को मार गिराया …………..फिर क्या कर लिया उसका .???…. उसका video तो आज तक youtube पर है…….. अब मुझे बताइए कि अभिषेक ने तो किसी का कत्ल भी नहीं किया ….. “”दुरूपयोग को कभी भी सदुपयोग की आड़ में बढावा नहीं देना चाहिए””

aryan dixit के द्वारा
May 1, 2012

social media par niyantran-jagran junction fourm main samaghata hu ke aaj ke samaj main jitni bhi buraiya hain be na to god ne banai aur na hi kisi neta ne ye sbhi buraiya hamane khud banai hain.hum jab matdan karne jate hain tab hum yah dekhate hain ki kis neta se hame jyada labh milega hum yah nahi dekhate ki hum jis nata ko bot de rahe hain be kaase hain.ak bar ki bat hai jab magasthaneeg bharat aaye the unhone kaha tha ki bharat ke kisi bhi byakti par kabhi bhi chori aur beimani ka aarop na lagaya jai kyoki yha ka pratyek bykti imandar .mughe aaj ke jamane ko dekhakar bahot sharm aati hai. hume to bas social mediya ka hi sahara hai jo hume sac ka samna karate hai.

    आर्यन दिक्षित के द्वारा
    May 2, 2012

    अनामिका जी, नमस्कार आपने सोशल मीडिया के लिये पति पत्नी का जो उदाहरण दिया उसनेँ आपके व्लाँग मेँ चार चाँद लगा दिया। क्रपा करके मेरे व्लाँग के दर्शन करेँ।

U C Pathak के द्वारा
May 1, 2012

सोशल मीडिया पर नियंत्रण – अखंड राष्ट्र की जरूरत या अभिव्यक्ति पर हमला ? 1.स्वतंत्र अभिव्यक्ति लोकतंत्र में अत्यंत पवित्र विचार है और वास्तव में देश की अखंडता के लिए अति आवश्यक है. हालाकि, गाली भी एक तरह की अभिव्यक्ति है जो कि, उचित ही, हमेशा निंदनीय रही है. अभिव्यक्ति के अनेक रूप ऐसे हैं जो कि देश/समाज/व्यक्ति के लिए नुकसानदेह हैं. उन्हें रोकना ही होगा. इसके लिए समाज और sarkar को milkar prabhavi kadam उठाने ही honge. अनियंत्रित सोशल मीडिया देश की अखंडता के लिए खतरा है यदि वह गैर जिम्मेदार होगा. 2. हाँ ऐसा दिखता है कि सोशल मीडिया हालातों को और अधिक जटिल बना देती है. 3. हमारे राजनेताओं की कुछ तरह कि सच्चाइयाँ सामने आना जरुरी हैं जिससे पता चले कि क्या वह किसी तरह के अपराधी तो नहीं रहे हैं और क्या वे हमारे प्रतिनिधि बनकर विधायिका में या किसी अन्य जिम्मेदार पद पर बैठने के योग्य हैं कि नहीं. दूसरी ओर, किसी की निजता में गैर जरुरी हस्तक्षेप का किसी को हक़ नहीं. 4. नहीं, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी की निजता का हनन करना सही नहीं है.

Anamika (sunita) के द्वारा
April 30, 2012

सोशल मीडिया पर नियंत्रण – Jagran Junction फोरम बहुत अच्छी बात है की सोशल मीडिया के जरिये हम घिनौनी छुपी हुई वास्तविकताओ से भी रु-ब -रु हो पाते हैं. लेकिन इस सत्य के साथ ये भी एक कटु सत्य है कि हमारे देश की एकता और अखंडता पर खतरा मंडराने लगेगा. लेकिन जैसे एक इमानदार पति -पत्नी का रिश्ता एक विश्वास का रिश्ता होता है और एक दुसरे से अपनी सारी अच्छी बुरी बातें सांझा करते हुए भी कुछ ऐसे मुद्दे छुपा लेते हैं जिन से उनके आपसी रिश्ते मजबूत होने की बजाय खतरे में पड़ जाये…उसी तरह इस मीडिया और पब्लिक का होना चाहिए. और इतनी तो उम्मीद की जा सकती है मीडिया से की वो इतनी समझ रखती ही है कि कोई मुद्दा कहाँ तक पब्लिक में लाना जरूरी है. अगर इस सब का ध्यान रक्खा जाये तो सोशल मीडिया की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए. कृष्ण भी कहते हैं कि अगर एक सच्च सौ लोगों का नुक्सान पहुंचा रहा है तो उस सच्च से एक झूठ अच्छा. अनामिका अनमिक७५७७

VJ SHARMA के द्वारा
April 30, 2012

सच्छाई से डरने वाले अपनी गलतियों को छुपाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.किसी भी खबर पर अंकुश लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला है.कानूनन किसी भी खबर की प्रमाणिकता का आधार होना चाहिए.सोसिअल मीडिया पर आयी हुई खब़र बिना पहचान के नहीं चपनी चाहिए .इसका पता तो आसानी से चल ही जाता है के खबर किसने दे है तो इसे रोकने से तो यह और जिज्ञासा पैदा कर देती है और अंतत सबकी नज़रों में आ जाती है.अन्नाजी के आन्दोलन से सर्कार ने sms पर यह सोचकर नियंत्रण लगाया था की कुछ ही लोगो को एक साथ किसी भी बात का पता चले पर शायद उसका असर उल्टा ही हुआ क्यूंकि रास्ते और तलाश लिए जाते हैं.अपनी नाकामी को दूर करने के बजाये आप दूसरों को कब तक गलत ठेराओगे .

mukesh के द्वारा
April 30, 2012

आपने प्रश्न किया है कि क्या अनियंत्रित सोशल मीडिया देश कि अखंडता के लिए खतरा है ? सोशल मीडिया पर अरसे से समाज को विभाजित करने वाली शामग्री आ रही है लेकिन तब नेताओ को चिंता नहीं हुई, बल्कि वो इसका लाभ लेते रहे क्योंकि देश कि अखंडता उनके अजेंडे में है ही नहीं. वो तो जब अभिषेक सिंघवी नामक सत्ता के दलाल की काली करतूत फेसबुक पर डाल दी गयी तो निजता की रक्छा का राग अलापा जा रहा है. क्या सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ता और नामी महिला वकील के बीच न्यायधीश के दायित्व के लिए सोदेबाजी निजी कार्य है? आज मीडिया कई प्रकार के दबाबो में कार्य करता है, विशेष कर सत्ताधारी नेताओ के विरुद्ध मुह खोलने से बचता है. कर्णाटक के पोर्न कांड को कई दिनों तक लगातार दिखाने वाला मीडिया, जाने क्यों सिंघवी की सी डी पर मुह नहीं खोलता. ऐसे में यदि सोशल मीडिया पर प्रतिबन्ध लगाया गया तो प्रभावशाली लोग किसी का भी चरित्र हनन करते रहेंगे और उनकी तानाशाही के चंगुल में देश फस जायेगा.

allindianrightsorganization के द्वारा
April 30, 2012

सत्ता ध्र्सराष्ट्र की तरह अंधी होती है और वह सदैव इस प्रयास में रहती है कि उसके हाथ में सत्ता बनी रहे भले ही वह हर अनैतिक कार्य करे पर ऐसे समय में मीडिया कि भूमिका उस संजय कि तरह है जो कुरुक्षेत्र की हर घटना का सही वर्णन करके सच का साथ दे और सत्ता पर उन लोगो को बैठने का मौका दे जो जनता के लिए जीना चाहते है| आज के दौर में जब जनता मत दान जैसे सबसे महत्वपूर्ण और प्रजातंत्र की रीढ़ का मतलब नही समझ रही है तो उसको क्या मतलब कि देश में कौन सा ननगा नाच नेता कर रहे है और फिर सच की खोज करने वालो की जिंदगी यह कितने दिन सुरक्षित है यह इमानदार लोगो की हत्या और शोषण से स्पष्ट है | शेषण ने इस देश को सुधरने का ही तो प्रयास किया पर एक भी नेता ऐसा नही मिला ज उनको राष्ट्रपति बनाया जाने पर सहमति जताते और इसी से राजनितिक डालो के चरित्र और उनकी असली मंशा सबके सामने नंगी खड़ी है | ऐसे में मीडिया ही एक ऐसा साधन साधन बचता है जिसके सहारे देश की जनता को सच मालूम होता है और देश के नेताओ को भी यह खौफ रहता है की कही मीडिया को न पता चल जाये अगर आज मीडिया न होती तो क्या बंगारू लक्षमण जेल के पीछे जा पाते ? अरुशी कांड आज इस लिए जिन्दा है क्योकि मीडिया ने उसे उठाया | मनु सिंघवी जैसे भोले दिखने वाले नेता का असली चेहरा हम क्यों जन पाए क्यों कि मीडिया ने उसको सामने लेन में मदद की| नेता और प्रशासन में पतन का परिणाम है कि जब भी किसी माध्यम से जनता के जागरूक होने का डर नेताओ में पैदा होता है तुरंत इन्हें संसोधन की जरूरत समझ में आने लगती है | चुनाव आयोग ने इन पर शिकंजा कसा तो इन्हों ने उसको बहु सदसीय बना दिया | जन सुचना अधिकार अधिनियम से इनकी पोल खुलने लगी तो उसके लिए संसोधन की बात करने लगे | इन्हें जनता का खर्च ३२ रूपए का दिखाई देता है और इसी लिए महंगाई बढ़ाते चले जा रहे है अपर अपने भत्ते काफी कम दिखाई देते है और बिना किसी विरोध के उसको संसोधन करते है | क्या जनता और अपने स्तर को नेता एक जैसा समझ पाए है | नही इसी लिए जब ये जनता के सामने नंगे होते दिखाई देते है तो कपडा पहने या लोग कानून बना कर अपने चरित्र को ढकने का प्रयास करते है | इनके चरित्र को उसी से समझ लिया जाना चाहिए जब अपने लिए इन्हें अपराध सिद्ध न हो जाने तक अपने पार्टी के उम्मीदवार शरीफ लगते है और ये उसके लिए कोई कठोर कानून नही बना प् रहे है क्योकि पैसा और बहुबल पर जीते जाने वाले चुनाव का दौर ख़त्म हो जायेगा और जनता अपने मन मंथन से शरीफ लोगो को चुनने लगेगी तब सुख राम , शिबू शोरेन , जय ललिता , लालू प्रसाद आदि का क्या होगा पर एक आम आदमी के लिए इनको याद है अपराधी करण नही होना चाहिए और भारत का चाहे प्रवेश का मामला हो या फिर कही नौकरी का मामला , हर जगह यह कालम बना रहता है कि आप पर कोई अपराधिक मुकदमा तो लंबित नही है या आप सजा पा चुके है या कभी कोई दंड मिला हो , निष्काषित हुए हो | क्या यह नेताओ के लिए दोहरा चरित्र का उदाहरन नही है जो अपने लिए हमेशा वही कानून बनाते है जिससे उनका फायेदा होता रहे | ऐसे में क्या कुछ कहने की जरूरत रह जाती है कि इनको सामाजिक मीडिया से इतना डर क्यों सताने लगा है ??????? देश में कितने नेताओ की लड़की का अपहरण होता है ??????? कितनो के साथ बलात्कार होता है ? कितने के घर डाका पड़ता है ??? कितने के घर नही है ?? कितने गरीब है ??? कितने भूख का मतलब जानते है ???? क्या इस से मतलब साफ़ नही कि देश से डाकू क्यों खत्म दिखाई देते है क्योकि उनके बस पद बदल गए है और इसी लिए ये बाहुबली मीडिया पर नकेल डाल प्रजातंत्र में तानाशाही का प्रयोग करते और हम एक नपुंसक राष्ट्र के लिए जीने वाले सिर्फ बीज बन कर रह जाते है क्योकि विरोध करने की ताकत तो ये नेता कब कि छीन कर हमें सिर्फ खेतो में काम करने वाला बैल बना चुके है | अब जागने की जरुरुत है और मीडिया को बचने के लिए आवाज उठाने की जरूरत है …डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

sapna के द्वारा
April 30, 2012

आज सोशल मीडिया एकता का परिचायक बन चुका है. भ्रष्ट और कुशासन को रोकने के लिए एक वरदान साबित हुआ है. इसलिए इस पर नियंत्रण व्यक्ति के अधिकारों पर नियंत्रण होगा.


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