Hindi Blogs, Best Indian Blog

जागरण जंक्शन फोरम

देश-दुनियां को प्रभावित करने वाले ज्वलंत और समसामयिक मुद्दों पर जनता की राय को आवाज देता ब्लॉग

46 Posts

1,650 comments

भूख व कुपोषण से कराहता बचपन – कैसे होगा उद्धार ?

पोस्टेड ओन: 16 Jan, 2012 Junction Forum में

हाल ही में बच्चों में भूख और कुपोषण का पता लगाने के लिए नंदी फाउंडेशन ने देश के छह राज्यों के 112 ग्रामीण जिलों में एक सर्वे कराया है जिसके अनुसार देश में तकरीबन 40 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जबकि 42 फीसदी बच्चों का वजन अपनी उम्र के हिसाब से कम है। रिपोर्ट के परिणाम प्रथम दृष्टया इस बात को जाहिर करते हैं कि भूख व कुपोषण से निपटने के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाएं एक छलावा मात्र हैं जिसमें बढ़ते भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता ने आग में घी का काम किया है।  वस्तुतः भारत में अनेक योजनाएं इस दिशा में कार्य करने के लिए लागू की गई हैं किंतु सभी योजनाएं व्यर्थ ही साबित हुई हैं।


भूख व कुपोषण पर हुए इस अध्ययन ने कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर पक्ष व विपक्ष में बहस को तेज कर दिया है। कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह के अध्ययन का कोई विशेष आधार नहीं है और इसमें एक छोटे से मॉडल नमूने के आधार पर फैसले सुना दिए जाते हैं। ऐसे लोगों का मत है कि आजादी के बाद अब तक की स्थिति में काफी फर्क आ चुका है। गरीबी में भारी कमी आई है और सरकारी योजनाओं का लाभ कुछ कम ही सही लेकिन काफी बड़ी आबादी को प्राप्त हुआ है। ऐसे लोग यहां तक कह रहे हैं आर्थिक उदारीकरण के बाद लोगों की क्रय शक्ति में भारी इजाफा हुआ तो ऐसे में ये कहना कि 40 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, हास्यास्पद है।


वहीं दूसरी ओर इसके ठीक विपरीत ऐसे लोग भी हैं जिनका मानना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ आमजन तक नहीं पहुंच पा रहा है। भूख व कुपोषण से लड़ने वाली आधिकांश योजनाएं भारी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। सरकार बच्चों में भूख और कुपोषण से निपटने के लिए आईसीडीएस योजना चलाती है जिसका कोई भी लाभ बच्चों को नहीं मिल पा रहा है लेकिन इस योजना को चलाने के लिए जिम्मेदार लोगों का घर जरूर भर रहा है। ऐसे लोगों का मानना है कि भूख व कुपोषण से निपटने के लिए एक केन्द्रीकृत राष्ट्रीय योजना के सशक्त संचालन के अलावा जमीनी स्तर पर कार्य करने की महती आवश्यकता है तभी जाकर कोई सार्थक परिणाम सामने आ सकता है।


उपरोक्त के आधार पर कुछ बेहद महत्वपूर्ण सवाल सामने आते हैं जिन पर सार्वजनिक बहस की जरूरत है, जैसे:


1. क्या देश में भूख व कुपोषण की जैसी तस्वीर दिखाई जा रही है वैसी ही स्थिति यथार्थ में मौजूद है?

2. क्या सरकारी योजनाएं भूख व कुपोषण को कम करने की दिशा में अक्षम सिद्ध हुई हैं?

3. यदि सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं हुआ है तो क्या ऐसी योजनाओं का संचलन बंद कर देना चाहिए?

4. आपकी राय में भूख व कुपोषण से लड़ने के लिए कौन सा उपाय आजमाया जाना चाहिए?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


भूख कुपोषण से कराहता बचपन कैसे होगा उद्धार ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “भूख व कुपोषण से कराहता बचपन” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व भूख व कुपोषण से कराहता बचपन Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार


Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 4.29 out of 5)
Loading ... Loading ...

16 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vibhav saxena के द्वारा
January 22, 2012

यह बात बिलकुल सही है कि आज देश में भूख और कुपोषण की समस्या चरम पर है.चाहे सरकार कितने भी दावे पेश करे,वास्तव में सभी आंकड़े केवल किताबी हैं.देश के नौनिहाल जिस प्रकार कुपोषण से ग्रस्त हैं,ऐसे में भारत के विकास की कल्पना करना बेमानी ही कहा जायेगा.सरकार का दायित्व केवल योजनायें बनाने से ही पूरा नहीं हो जाता बल्कि उन योजनाओं के सफल क्रियान्वन की जिम्मेदारी भी तो सरकार की ही है.इसे देश के गरीब तबके का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि आज भी अशिक्षा,अन्धविश्वास,निर्धनता और मूलभूत सुविधाओं के अभाव की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं.लगभग सभी सरकारी योजनायें भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी हैं और गरीबी दूर करने की बातें केवल कोरी घोषणाएँ बनकर रह गयी हैं.आज न केवल सरकार बल्कि देश के धनाढ्य वर्ग को भी भूख और कुपोषण की समस्या को दूर करने हेतु आगे आना होगा और एक भ्रष्टाचार मुक्त तंत्र बनाकर सार्थक प्रयास करने होंगे.

ramit sharma के द्वारा
January 21, 2012

india ki rajneeti jindaba iske aage sab barbad or kuch b nahi likh sakte jiiiiiii

vijariyo के द्वारा
January 19, 2012

आज भी गरीब के घर मे चार से दस बच्चे पैदा हो रहे है, आमीरो ने अपनी जन्सन्ख्या पर नियन्त्रन कर लिया है परन्तु गरीब ना अपनी गरीबी कम कर पाया और ना अपनी जनसन्ख्या. और् उपर से नशे की लत.उन्हे जो १०० रुपये मिलते है उनमे से ५० रुपये नशे मे, ४० रुपये खाने मे चले जाते है, भुख मिट नही पाती, और बच्चे भो भी सिर्फ नशा करना सीख पाते है.

alok chantia के द्वारा
January 18, 2012

मनुष्य को अपने शुक्राणु और अंडाणु का प्रबंधन करना होगा …………..मानव जाति ने अपने आनुवंशिक पदार्थो का प्रयोग प्राकृतिक संसाधनों के रूप में पाए जाने वाले पदर्थो में सब से ज्यादा अनियंत्रित रूप से किया है …….बंजर होती जमीन , कटते जंगल , दूषित होती नदिया , दूषित वायु के पीछे यही कारण प्रमुख है कि हमने अपने जन्म को धर्म से कुछ इस तरह बांध दिया कि जन्म ने पृथ्वी को स्वर्ग से ज्यादा नरक बना दिया और ये कुपोषित बच्चे उसी हमारे नरक में सजा पाने वाले मनुष्य होकर रह गए है …………..जन्म लेना नैसर्गिक है पर कुपोषण की हालत देखते हुए कृत्रिम होना चाहिए …इसके प्रबंधन पर सबसे ज्यादा धयान दिया जाना चाहिए ……..शुक्राणु प्रबंधन पर चर्चा होनी चाहिए ताकि लोग जन सके कि उनके एक कार्य से एक बच्चा दुनिया में आकर किस कदर भूखा मरता है …और जिस दिन हम इस मुद्दे पर गंभीर हो गए पूरी दुनिया को कुपोषण मुक्त किया जा सकता है ………….भारत जैसे देश में जन्म पर रोक चुनाव और मत के बीच फसी है …तो मुस्लिम देशो में जन्म के पीछे सबसे बड़ा कारण युद्ध है …………विकशित देश ने इसको समझा और भौतिकता के अधर पर जन्म को महत्व दिया .अखिल भारतीय अधिकार संगठन इस मुद्दे पर चर्चा करके जन्म को बेवजह बढ़ने को राष्ट्र प्रेम और राष्ट्र हानि के रूप में रख कर कुपोषण की समस्या ख़त्म करना चाहता है क्योकि अखिल भारतीय अधिकार संगठन को पता है कि कुपोषण के पीछे अनाज की कमी नही जन्म प्रबंधन में कमी है ….डॉ आलोक चान्टिया

shuklaom के द्वारा
January 18, 2012

हमारे यहाँ नेत्रित्व की कमी है आखिर आप एक विदेशी परिवेश में पली बढ़ी महिला यहाँ का नेत्रित्व कर रही आगे उनके संतानों को भी यहाँ के लोगो के मुलभुत समस्याओ की क्या जानकारी हम जबतक भावनात्मक रूप जुड़े हो कर अपने जन प्रतिनिधिओ का चुनाव करते रहेगे इसी मनमोहन सिंह की तरह संवेदनहीन लोगो का नेत्रित्व बर्दास्त करना होगो जो एक ग्रामप्रधान तक का चुनाव नहीं जीत सकता. धूमिल ने कहा है कि मिटटी के तुकडे पर देश का नाम लिख कर खिला देने से कोई देश भक्त नहीं होता है /
हमारे यहाँ योजनाए जरुरत देख कर नहीं चुनाव देख कर बनती है चाहे बात मन.रे.गा.की हो या कर्जमाफी की या अभी बगैर किसी तैयारी के खाद्य सुरछा बिल की लाया जा रहा है तैयारी तो उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव को देखते हुए हुई थी लेकिन समय से पारित नहो हो सका जाहिर है इसमे भी जबरदस्त लुट-खसोट होगी और जरूरतमंद वैसे ही रह जायेगे .जब तक विधिवत वितरद व्यवस्था में ठोस बदलाव किये इसतरह की महत्वकांची यजने बिना पूर्व समीक्चा और तैयारी
की लायी जाएगी उनका यही हस्र होना है.
मनमोहन सिंह को झूठ-मुठ की शर्मिंगी का आवरद छोड़ कर मात्र पुजीपतियो के साथ बैठक करने के सिवा कुछ उन मजलूमों के बारे में भी निगाह डालनी चाहिए जिनके मत से चुन कर आयर है और उनके प्रति उननाकी जबाबदेही बनती है विश्व आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए भुखमरी और कुपोषण पर लगाम लगाना पहली प्राथमिकता होनी चहिओए नहीं तो महाशक्ति तो नहीं हास्य के पात्र अवश्य बनेगे मुगेरी लाल के हसीं सपनों से बहार आने की जरुरत है नहीं तो अपने मुह मिया-मिठ्ठू बनाने वाली बात चरित्रार्थ होगी.

kuldeep2373 के द्वारा
January 17, 2012

कुपोषण का मुख्य कारण देश में चल रही योजनाओं का सही ढंग से लागू न होना है। जैसे आंगनबाड़ी केन्द्रों से वितरित होने वाले राशन का 98% बाजार में बिक जाता है, जो कि बाद में पशुओं के चारे में खिलाया जाता है। गांवों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा केवल कागजों पर ही कार्य करती हैं, गांव की गर्भवती महिलाओं व नवजात बच्चों को पोषाहार देना गलत समझती हैं। आखिर क्यों सरकार इन पर पैसा खर्च कर रही है, समझ से परे है?

    R.C.AGRAWAL के द्वारा
    January 18, 2012

    आपका य़ह सुझाव ठीक है । मेरे विचार से मनरेगा मे मजदूरी बढा कर 150 रुपया प्रति दिन कर देना चाहिये और काम के बदले अनाज योजना लागू करनी चाहिये । 

Ashwini Verma के द्वारा
January 16, 2012

भूख व कुपोषण से कराहता बचपन – कैसे होगा उद्धार ?
भूख व् कुपोषण निशिचित ही दूर होगा बशर्ते कार्य योजना बनाने से पहले एक सर्वे की जाये इस बात पर की किस स्तर की निति बनानी है. आज जहा भी पोषण पुनर्वास केंद्र खुला है उन केन्द्रों में २ कर्मचारी के भरोसे खोल दिया गया है ५००० रुपया में ५ बिस्तर याने १००० रुपया में १ माँ और १ कुपोषित बच्चा वो भी १५ दिन के लिए, एक तो बच्चा पहले से कुपोषित ऊपर से केंद्र में आकर माँ और बच्चे की खुराक और कम सरकार ये जानना नहीं चाहती की केंद्र में 0 डिग्री तापमान सहने लायक हीटर है या नहीं ३५ डिग्री तापमान के लिए कूलर है या नहीं केंद्र के पास कितनी साफ सफाई है जिस भवन में केंद्र खुला है वो इसके लायक है या नहीं बच्चे का अगर इन कारणों से तबियत बिगड़ जाये तो रात के समय देखने के लिए न तो डॉक्टर है न ही नर्स डॉक्टर नुर्स तो छोड़ो १ चौकीदार भी नहीं होता बच्चो को जिस माहोल की जरुर होती है वैसा उस केंद्र में कुछ भी नहीं होता इस कारन माँ और बच्चा केंद्र में रुकना ही नहीं चाहता और अगर फीडिंग देमोंस्त्रटर किसी तरह उन्हें समझा कर रोक भी लिया तो डॉक्टर के लिखे दवा उपलब्ध नहीं होगी, उसके बाद ग्रामीण महिला की जीतनी खुराक है वो कम से कम १००० रुपया में तो निश्चित ही नहीं मिल सकता सायद सरकार को आज की महंगाई के बारे में पता ही नहीं और कुपोसन को दूर के लिए स्पेसल diet की जरुरत होती है जैसे दूध, फल अंडा मांस हरी पत्तेदार सब्जी इन सबके बाद प्रोटीन पावडर २ बार परन्तु क्या ये सब कभी किसी पोसन पुनर्वास केंद्र में दिखाई दिया शायद कभी नहीं हा दीखता है तो सिर्फ कैसे कोरम को पूरा किया जाये १-२ ऐसे भी केंद्र है जहा के स्टाफ काम तो करना चाहते है पर उनके बस में कुछ होता ही नहीं अगर कोशिश करें तो उनकी नौकरी खतरे में दिखाई देती है क्योकि ऊपर से आर्डर नहीं होते कुछ अच्छा करने के यहाँ मैंने कुछ छिपाने की कोशिस की है.
मेरा अपना सर्वे है अगर इन पोसन पुनर्वास केंद्र का सञ्चालन सही तरीके से और स्थाई तरीके से किया जाये तो निश्चित कुपोसन को दूर किया जा सकता है अब सवाल ये उठता है की सही तरीका क्या है. सबसे पहले तो हर सेण्टर के क्षेत्र में उपलब्ध कुपोषित माँ और बच्चे का सूचि तयार करें फिर एक सिरे से इन्हें १५ दिन सेण्टर में भारती कर उचित पोसन आहार और प्रशिक्षण दिया जाये ताकि वे माताये घर पर उपलब्ध खाद्य सामग्रियों से पोसन आहार ले सके. और भी ऐसी बहुत से बातें है जिन्हें यहाँ नहीं लिखा जा सकता लेकिन कुपोसन ऐसा अभिशाप नहीं जिसे देश से दूर नहीं किया जा सकता सच तो ये है जो कम करना चाहता है वो इन योजनाओ से कोसो दूर रखा जाता है…….अमल करने के उम्मीद से ….. संपादक जी हो सके तो इसे पुब्लिश अवश्य करें

subhash के द्वारा
January 16, 2012

sirf aankdebaaji karne se garibi door hoti to bharat aaj sabse amir des hota kyonki aankdebaaji me humse maahir koi nahi garibi aur bhukh mitegi bhi nahi jab tak hum samsya ka samdhan nahin karenge ……..population ko control kiye bina agar maa annpurna bhi koshish kare to namumkin hai

munish के द्वारा
January 16, 2012

कुपोषण के ऊपर प्रधानमन्त्री रिपोर्ट देते हैं और शर्म महसूस करते हैं…..! और जब गरीबी की रेखा का निर्धारण करते समय वो ३२ रूपए निर्धारित करते हैं तो शर्म नहीं आती…….! जब सुप्रीम कोर्ट गरीबों को मुफ्त अनाज वितरण की बात कहती कई तो प्रधानमन्त्री अपने हाथ जेब में घुसा लेते हैं और मजबूर हो जाते हैं लेकिन जब लाखों टन अनाज सड़ने के कारण समुद्र में फेंका जाता है तो मजबूरी ख़त्म हो जाती है तब प्रधानमन्त्री को शर्म नहीं आती…..!
प्रधानमन्त्री जी, अपने खाऊ पिऊ मंत्रियों से थोड़े से पैसे ले लें तो भारत से कुपोषणता की शिकायत अपने आप दूर हो जायेगी और रिपोर्ट देते समय आपको शर्मसार भी नहीं होना पड़ेगा.

    horain के द्वारा
    February 2, 2012

    वाह क्या बात है……जवाब जैसा दिया है काम भी हमे कुछ वैसे ही करने चाहिए..उम्मीद है बुरा तो नही लगा होगा?

suraj के द्वारा
January 16, 2012

इस देश में पूरी-पूरी की व्यवस्था चरमराई हुई है, यहां पर असमानता का महासागर है, यहां आपको चोटी के कमाऊ उद्योगपति मिलेंगे तो वहीं झलकती हुई किसी के बदन की हड्डिया भी दिखेगी.

gourav के द्वारा
January 16, 2012

हमें ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो कुपोषण पर रिपोर्ट तो जारी करता है लेकिन उसे दूर करने के लिए कुछ भी नहीं करता. जिस देश में बच्चों को भरपूर खाने के लिए भोजन न मिले वह देश कभी भी विकसित नहीं हो सकता

Tamanna के द्वारा
January 16, 2012

आंकड़ा कहा तक सही हैं यह बात मायनें नहीं रखती. सच तो यह हैं कि आज भी कितने ही लोग भूख के कारण अपने प्राण त्याग देते हैं. जहां एक ओर अमीरी बढ़ती जा रही हैं वहीं भूख और गरीबी कितने ही लोगों से जीने का अधिकार भी छीन रही हैं. कल्याणकारी सरकारें केवल अपने कल्याण का ही कार्य कर रही हैं. क्या आजादी के इतने समय बाद भारत के नाजरिकों को भरपेट ना सही जरूरी मात्रा में भोजन भी नसीब नहीं हो सकता? यह स्पष्ट करता है सभी सरकारी दावें और योजनाएं कितनी खोखली हैं.

anita के द्वारा
January 16, 2012

एक प्रधानमंत्री का यह बयां कि देश मॆं गरीबी बढ़ रही है और भूख से बच्चें बदहाल है यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री साहब को दिखता है पर आखिर वह घोटालों और कालेधन पर चुप क्यूं बैठते हैं.. जब कभी घोटाला होता है तो यह आदमी नजर नहीं आता, जब कालेधन की बात करो तो इसकी चुप्पी सामने आती है.. आखिर क्या है इस मनमोहन के दिल और दिमाग में..

    s.p. singh के द्वारा
    January 16, 2012

    आदरणीय अनीता जी आपसे केवल एक सवाल कि—–” क्या बता सकतीं हैं कि काला-धन क्या ” और ” किस पैसे को काला धन कहतें हैं ” कृपया मार्ग दर्शन करे आपका अति आभारी रहूँगा क्योंकि मेरी भी जिज्ञासा है काले धन के विषय में कुछ लिखने की/ आशा है आप उत्तर अवश्य ही देंगी .




  • ज्यादा चर्चित
  • ज्यादा पठित
  • अधि मूल्यित