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मराठी बनाम उत्तर भारतीय – राजनीतिक दुराग्रह या हक की लड़ाई

Posted On: 7 Nov, 2011 में

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महाराष्ट्र की राजनीति में निरंतर अपने आप को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश करते हुए शिव सेना ने एक बार फिर मुंबई में रह रहे उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया है। शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने तेवर दिखाते हुए पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में लिखा है कि मुंबई पर पहला हक मराठियों का है। इससे कुछ ही समय पूर्व राज ठाकरे भी मुंबई की सड़कों पर उत्तर भारतीय टैक्सी चालकों के खिलाफ काफी हल्ला बोल कर चुके हैं।


चाहे बाल ठाकरे हों या राज ठाकरे, दोनों ही मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए मराठी बनाम उत्तर भारतीय का विवाद भड़काते रहे हैं जिस पर पूरे देश में जब-तब बहस भी होती रही है। देश के कुछ अन्य भागों में भी ऐसे मामले गाहे-बेगाहे सामने आते रहे हैं जिनमें स्थानीय और बाहरी का विवाद उठता रहा है। इस बार भी शिव सेना प्रमुख के इस बयान ने खासा विवाद पैदा कर दिया है जिस पर पक्ष और विपक्ष में अलग-अलग राय सामने आ रही है।


इस मुद्दे पर मानवाधिकार व संवैधानिक व्यवस्था के समर्थकों का मानना है कि राष्ट्र ने लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था को स्वीकार किया है जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को देश के भीतर कहीं भी आने-जाने, बसने व रोजगार का पूर्ण अधिकार है। साथ ही ऐसे लोग यह भी मानते हैं मराठी बनाम उत्तर भारतीय जैसी बातों को हवा देने का अर्थ है देश में लोगों के भीतर भाषाई आधार पर गहरी खाई पैदा करना और इसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।


वहीं ऐसे भी लोग हैं जो बाल ठाकरे और राज ठाकरे के इन कदमों की प्रशंसा करते हैं। ऐसे लोग ये मानते हैं कि मुंबई हो या कोई अन्य स्थान, वहां के संसाधनों व अवसरों पर उस स्थान की जनता का पहला अधिकार होता है और इस अधिकार का अतिक्रमण हर हाल में रोका जाना चाहिए। ऐसे लोग देश में इस तरह के कड़े कानून लाए जाने के भी पक्षधर हैं जिसमें मूल निवासियों के हकों की रक्षा का प्रावधान हो। यही कारण है कि ऐसे लोगों को मराठी बनाम उत्तर भारतीय विवाद, मराठियों के हक के लिए उठाई गई आवाज लगती है।


उपरोक्त विवाद और मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए कुछ ज्वलंत प्रश्न हमारे सामने खड़े होते हैं, जैसे:


1. क्या क्षेत्रवाद किसी क्षेत्र के विकास के लिए जरूरी है?

2. क्या बाल या राज ठाकरे का यह कदम मराठियों के हित में है?

3. “स्थानीय बनाम बाहरी” जैसे मामले राजनीति प्रेरित होते हैं या जनहित प्रेरित?

4. क्या भेदभाव वाली राजनीति करने वाले समूहों और व्यक्तियों को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


मराठी बनाम उत्तर भारतीय – राजनीतिक दुराग्रह या हक की लड़ाई


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “मराठी बनाम उत्तर भारतीय” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व मराठी बनाम उत्तर भारतीय Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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17 प्रतिक्रिया

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Dario Isabella के द्वारा
March 23, 2017

I want to express my appreciation to you for bailing me out of this particular incident. Because of surfing through the internet and seeing tips which were not beneficial, I was thinking my life was over. Existing minus the solutions to the issues you have solved as a result of this post is a serious case, as well as those which might have badly affected my career if I had not noticed the website. That talents and kindness in touching all the details was invaluable. I don’t know what I would’ve done if I hadn’t discovered such a thing like this. I am able to at this time look ahead to my future. Thanks a lot very much for this skilled and result oriented help. I will not be reluctant to refer your web page to anybody who would need counselling about this issue.

nagi के द्वारा
November 13, 2011

छत्तीसगढ़ में एक कहावत प्रचलित है “उड़िया कपटी, तेलुगु चोर-महामराठी मादर…” क्या बाल और राज इस बात को जानते हैं ? अगर नहीं तो जान लें उनकी कौम को छत्तीसगढ़ में मूल निवासियों से खतरा पैदा हो गया है. ऐसी स्तिथि में क्या उनकी मनसे और शिवसेना वहां जाएगी? मुंबई में रहने वाले उत्तर भारतियों में इस राज्य के निवासियों की अच्छी खासी तादात है. अगर ठाकरे परिवार की हरकतों की प्रतिक्रिया उत्तर भारत में मूल निवासियों ने की तो यहाँ बसे तमाम मराठी मानुस कोप-भाजन का शिकार हो सकता है. दक्षिण भारत के तमाम कट्टरपंथी हिंदी भाषियों के विरुद्ध ज़हर उगलने के बाद अब शांत हैं! क्योंकि वो जानते हैं की उससे कही ज्यादा दक्षिण भारतीय उत्तर भारत में रहते हैं..वन्दे मातरम् —नागेश खरे ‘नागी’ , बांदा 9415170115

anilkumarpara के द्वारा
November 12, 2011

मराठी बनाम उत्तर भारतीय – राजनीतिक दुराग्रह या हक की लड़ाई, ठाकरे परिवार को शायद यह नही मालूम कि हमारे देश की पहचान प्राचीनकाल से ही अनेकता में एकता रही है जो सदियों से ही हर भारतवर्ष के भारत भाषी के ह़्रदय को छूती चली आ रही है वही एकता आज भी हर भारतवाषी के ह्रदय में कूट कूट कर भरी हुई है चाहे वह कश्‍मीर में रहता हो या फिर कन्‍याकुमारी में या फिर उडीसा मे रहता हो या गुजरात में रहता हो उसके मन की एकता को कोई मुल्‍क मिठा नही सकता तब ठाकरे परिवार की मराठी बनाम उत्‍तर भारतीय होने की कहानी भारतीय राजनीति की सबसे ओछी कहानी है जिसे हर भारत वासी सुबह सुनता है और काम पर जाने तक भूल जाता है यह सही है कि हमारी सरकार ऐसे व्‍यक्तियों के विरूद्व कोई कार्यवाही नही कर पा रही जो भारतीयों के मन में एक दूसरे के प्रति खाई आये दिन खोद देते है किन्‍तु हमें गर्व है उन सब भारतीयों पर जो यह कभी नही भूलते कि सूरज जो धूप हमें देता है उसने कभी नही सोचा कि में उत्‍तर भारतीयों को कम धूप दूगॉ और महाराष्‍ट्र में रह रहे भारतीयों को अधिक धूप दूगॉ हमें गर्व है उन भारतीयों पर जो आज भी अनेकता में एकता की मि शाल है इस अतुल्‍य भारत मे हमने जन्‍म लिया है हमें गर्व है भारतीय होने का

Amit Tiwari के द्वारा
November 10, 2011

Nisandeh Baal thakre aur raj thakre vote ki rajneet kar rahe hain aur is ka sikar uttar bhartiy ho rahe hai Mujhe bahut dukh hai ki sarkar aise logo ke khilaf kuch bhi nahi karti ek taraf to hamari sarkar rojgar dilane me puri tarah Asmarth Dikhti hai upar se agar apne hi desh me kisi ko is tarah se parasani ka samana karna pade to yah to ye bahut nindniy hai abhi kuch din pahle Sachin Tendulkar ne bhi kaha tha ki Mumbai sab ki hai us ke bad bal thakre ki tippadiya suru ho gai “Sachin desh ke liye nai apne liye khelte hain” mujhe samajh me nai aata hai ye Baal thakre shahab Desh ko kis taraf le jana chah rahe hain

nagi के द्वारा
November 10, 2011

ठाकरे परिवार की कुंठा देश के अन्दर गृह युद्ध की स्तिथि निर्मित कर रहा है. एक तरफ तो हमारे राजनेता फिजी और मरिसस में बसे कथित भारतीयों पर होने वाले कथित अत्याचारों के विरुद्ध चीखते-चिल्लाते हैं वही उत्तर भारतीयों के लिए इस प्रकार की दुर्भावना प्रदर्शित कर दोहरी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं. विदेशों में बसे भारतियों के मामले में राष्ट्रीयता अहम् मुद्दा है जबकि यहाँ ऐसा नहीं है. दरअसल यहाँ वोटों का ध्रुवीकरण करने वाले हमेशा इसका दुष्परिणाम भूल जाते हैं. मुंबई में मराठियों को अपने यहाँ नौकरियाँ करवाने वाले गुजरातियों के खिलाफ बोलने में ठाकरे परिवार की बोलती क्यों फटती है? मुंबई में उत्तर भारतीय उन् कामो को करते हैं जिनको किसी और ने नहीं किया. इटली संचालित सरकार द्वारा ठाकरों पर पोटा,मकोका,रासुका आदि न लगाना उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है जितना कसाब और अफज़ल को फांसी पर न लटकाना..वन्दे मातरम् —नागेश खरे ‘नागी’ , बांदा 9415170115

Sarvesh Mishra Mumbai के द्वारा
November 9, 2011

मै भी एक उत्तर भारतीय हूँ, माफ़ी चाहता हूँ आप सब से! मै उत्तर भारतीय नही सिर्फ भारतीय हूँ! उत्तर भारतीय का तमगा तो बाल ठाकरे और राज ठाकरे ने दे दिया है! बाल ठाकरे और राज ठाकरे उत्तर भारतीयों को हमेशा बाहर निकालते है लेकिन जब ताज होटल पर आक्रमण हुआ था तो क्यूँ नही उन कमांडोज को मुंबई से बाहर निकाला जो की उत्तर भारतीय थे और मुंबई को बचाने आये थे! तब ठाकरे परिवार घर बैठ कर टीवी का मजा ले रहे थे और उत्तर भारतीय कमांडोज जान जोखिम में डाल कर मुंबई को बचा रहे थे! ठाकरे परिवार खुद तो मध्य प्रदेश के है, और मराठियों के हमदर्द बनते है! अभी हाल ही में मेरे एक मुंबई के जानने वाले ने मुझे बोला की “मुंबई में रहना है तो मराठी बोलना सीख लो, भैया लोग हम तुम्हारी टैक्सी तोड़ देंगे, मनसे जिंदाबाद” मै पूंछता हूँ कि क्यूँ मराठी बोलना सीख ले जब की हमारे देश की मात्रभाषा “हिंदी” है तो!इस तरह तो कल मै बंगाल जाऊंगा तो मुझे “बंगाली” सीखनी पड़ेगी, “पंजाब” जाऊंगा तो “पंजाबी”, “मद्रास” जाऊंगा तो “मद्रासी”! ऐसे देश विद्रोहियों को देश से बहार निकालनाही पड़ेगा नही तो कल को किसी को भी अपने राज्य के आलावा किसी और राज्य में रहने को नही मिलेगा! मेरा भारत महान

    nagi के द्वारा
    November 10, 2011

    मिश्र जी , ये कुत्ते की मौत न मरे तो कहियेगा. हमारे देश में भगत सिंह और गोडसे जैसों की कमी नहीं है …..

rashid के द्वारा
November 8, 2011

यह बहूत बूरह बात है कि हमारे देश मे ऎसा हो रहा है श

ishwarsinghrautela के द्वारा
November 8, 2011

no one in country make statement for seperation we all are Indian and having all right to get bread and butter from any area of the country equally.

AJAY KUMAR के द्वारा
November 7, 2011

राज ठाकरे की मनसे और बाल ठाकरे की शिव सेना उस वक़्त कहाँ घुस गयी थी जब महाराष्ट्र के होटल ताज में आतंकवादियों ने कब्ज़ा कर लिया था गौरतलब है कि उस वक़्त भी मनसेके लोग मुंबई में उत्तर भारतीयों की जम के धुनाई कर रहे थे . राज ठाकरे ने उस वक़्त आगे आके उस होटल को क्यों नहीं बचाया? क्या वो होटल मुंबई से बाहर था? क्या उस वक़्त उस होटल में सारे उत्तर भारतीय ही थे ? खैर जो भी हो मैंने अक्सर देखा है कि जब भी कोई फिल्म विवादित होती है तो लोग उसे ख़ास तौर पर देखना चाहते है.ताकि वो ये जान सकें कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या था जो इतना बवाल मचा. इसलिए जब भी शाहरुख़ खान कि कोई फिल्म नहीं चल पाने के कगार पे आती है तो बाल ठाकरे का कोई न कोई बयान उस फिल्म के सम्बन्ध में ज़रूर आता है.क्यों? जैसे अभी कुछ दिन पहले शाहरुख़ खान और करन जौहर की माई नेम इज खान के लिए टिपण्णी aayi थी और अभी रा.वन के लिए कहीं ये शाहरुख खान और बाल ठाकरे कि मिली भगत तो नहीं फिल्म चलाने के लिए. खैर जो भी हो जो ये कहते हैं कि मुंबई उनकी है वो अपनी मुंबई की सुरक्षा कने के वक़्त पीछे क्यों रह गए थे. लेकिन उत्तर भारतीयों को आभारी होना चाहिए उन हमलों का जिनकी वजह से उस वक़्त मुंबई में मनसे के लोगों द्वारा उत्तर भारतीयों की धुनाई बंद हुयी थी

    nagi के द्वारा
    November 10, 2011

    बिलकुल सही कहा आपने अजय जी, इन् B.वालों से पूछिए की मुंबई हमले में आतंकियों पर पहली गोली किसी मनसे वाले ने क्यों नहीं दागी थी ?……………9415170115

    shuklaom के द्वारा
    November 10, 2011

    यही बात सही है की बालठाकरे का परिवार उनकी बहु सिनेमा लाइन में सक्रीय भी है और इसकी संभावना इसलिए और मह्त्व्पुर्द हो जाती है क्योकि अमिताभ बच्चन के बारे ने आलोचनात्मक टिप्पड़ी करने के बाद अब उन्हें भारत रत्न देने का बयां दे रहे हो, कही यह परिवार वसूली में तो नहीं लिप्त हो गया है रहा सवाल मुंबई हमले के समय राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे अपनी मम्मी के आंचल में चुप गए थे क्योकि इन्हें अपनी सुरच्चा की फ़िक्र थी, और इस बात पैर क्यों आश्चर्यचकित है की राज ठाकरे और बालठाकरे संविधान विरोधी बयां दे रहे है क्योकि इसकी शुआत मनमोहन सिंह जो खुद जनादेशाविहिना है उन्होंने देश की ससधानो पैर पहला अधिकार मुसलमानों का है इसी का अनुसरण करते हुए मुंबई की कांग्रेस की संयुक्त सर्कार भी उत्तर भारतियो के विरुध्ध कुछ करने के स्थान पर उत्तरभार्तियो के खिलाफ कानून बहाने में पीछे नहीं रहना चाहती बेहतर होगा जीतनी जल्दी हो सके देश को इन २-२ पासपोर्ट धर महारानी और युवराज के चंगुल से चुदाया जय नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब एक बार फिर आपातकाल का गवाह बनेगा फिर विदेशी नेत्रित्व जब खुद ही देश तोड़ने के कम में लगा हुआ है कही अल्पसंख्यक हिंसा विधेयक लेन पर आमादा है और जनाधारविहीन मनमोहन जो ईमानदारी का हिथियर लिए शिखंडी की भूमिका में देश के संससधानो को और खनिज तथा विनिवेश के नाम बेचने का कुचक्र चला रहे है ये अज प्रधानमंत्री बनाने के लिए जनता के बीच खाली इस लिए हिम्मत नहीं जूता प् रहे है की भी कही राहुल गाँधी के बिहार चुनाव की तरह जनता जूता मार कर जमानत न नप्त करा दे. देश को मुंबई में ठाकरे परिवार नहीं इटली परिवार तोड़ और बेच रहा है ठाकरे खंडन से देश को मुक्त करने की लड़ाई लड़नी चाहिए वर्ना अगली विदेशी आर्थिक गुलामी के लिए तैयार रहिये बहुत दिन लोकतंत्र का मजा ले लिया अब इटली इण्डिया कंपनी का मुलाजिम बनाने को तैयार रहिये या समय रहते चेत जाय ये दिग्विजि सिंह तो राजधराने से ताल्लुक रखते है जो अंग्रेजो का पैर धोते और देश से गद्दारी के इनाम में राज्गाद्डिया पते रहे उसी भूमिका में फिर राजपरिवार के खासमखास भाड़ बने खालिस भडुए की भूमिका में नजर आते है. नेहरू गाँधी की ही पैदयास ने बल ठाकरे को कम्यूनिस्टो की पकड़ ढीली करने के लिए इसी तरह का आन्दोलन प्रारंभ करने के लिए ठाकरे को खड़ा किया ठीक वैसे ही जैसे अकाली दल के प्रभाव खत्म करने के लिए भिंडरावाले को को खड़ा किया था असली मुद्दा ठाकरे नहीं कांग्रेसी दोगली नीत है जिसका परिडाम देश विभाजन के रूप में आ सकता है. इसलिए खास तौर से विदेशी और अर्ध्विदेशियो के हाथ से सत्ता से तत्काल बहार करना आवश्यक हो जाता है.

    AJAY KUMAR के द्वारा
    November 13, 2011

    http://ajaykumar2623.jagranjunction.com/2011/11/12/क्या-यही-है-देशभक्ति/

s.p. singh के द्वारा
November 7, 2011

महोदय, 1. क्या क्षेत्रवाद किसी क्षेत्र के विकास के लिए जरूरी है? यह विषय तो ऐसा है जिस पुर बहुत कुछ कहा और लिखा भी जा सकता है, परन्तु क्षेत्रीयता के आधार पर किसी क्षेत्र का विकास हो सकता है, इसको मानने में कोई हर्ज क्योंकर हो सकता है, क्योंकि हम अगर किसी आदिवासी क्षेत्र के विकास की बात करे तो पहले तो हमें उस क्षेत्र के गरीब मजदूर स्थानीय लोगों की समस्याओं के विषय में ही विचार करना होगा तो फिर क्षेत्रवाद के किस रूप में अलग कर सकते है, ? 2. क्या बाल या राज ठाकरे का यह कदम मराठियों के हित में है? लेकिन अगर हम सुदूर झारखंड, छत्तीस गढ़, असाम आदि क्षेत्रो की बात करे तो सही परन्तु अगर बात महाराष्ट्र की करे जहाँ ठाकरे परिवार का स्थायित्व ही इस बात पर निर्भर करता है की वह मराठी हित के बात करे चाहे मराठियों को उससे फायदा होता हो या नहीं – इस परिवार की राजनीतिक आधार ही मराठी वाद है ? लेकिन उनका यह कदम मराठियों के हित में नहीं है भारत सब का है और बहुत से मराठी महाराष्ट्र से बाहर भी अपनी जीविका कमाने जाते है और अगर स्थानीय नागरिक यह कोई सरफिरा नेता इनका विरोध करने लगे तो इन ठाकरे लोगों को कैसा लगेगा ? 3. “स्थानीय बनाम बाहरी” जैसे मामले राजनीति प्रेरित होते हैं या जनहित प्रेरित? यह केवल राजनितिक अजेंडा मात्र है जन-हित से इसका कुछ लेना देना नहीं है नेताओं का भीड़ जुटाने का मन्त्र है ? सबसे सरल धर्म, फिर जाति, उसके बाद “स्थानीय बनाम बाहरी” 4. क्या भेदभाव वाली राजनीति करने वाले समूहों और व्यक्तियों को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए? ऐसे लोगों का इलाज केवल यह है की इनका बंध्यकरण करके काला पानी भेज दिया जाय जहाँ ये अपने जैसे और गंदे लोग पैदा ही न कर सके ? प्रतिबंध से कुछ नहीं होगा उलटे प्रचार मिलेगा ?

Tamanna के द्वारा
November 7, 2011

ठाकरे बंधुओं ने शायद मुंबई को भी एक अलग राष्ट्र बनवाने का सपना संजो लिया है. वे शायद अब उत्तर भारतीयों और गैर मराठियों को मुंबई में एक टूरिस्ट की तरह ही देखना चाहते हैं वह भी पासपोर्ट और वीजा के साथ. पर वह यह भूल गए है कि मुंबई पर पहला हक हर भारतीय का है. मुंबई पूरे देश की है. कोई भी जब चाहे वहां जा सकता है. राज ठाकरे या बाल ठाकरे किसी को भी अपशब्द कहने और धमकियां देने का अधिकार नहीं है.

    tejwani girdhar के द्वारा
    November 8, 2011

    आप ठीक ही कह रहे हैं, साहस के लिए धन्यवाद

ajay के द्वारा
November 7, 2011

शिव सेना से पैदा हुए राज ठाकरे की राजनीति एक तुच्छ राजनीति है जो ज्यादा दिन तक कामयाब नहीं हो सकती है.


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