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सजा-ए-मौत कितना प्रासंगिक!

Posted On: 5 Sep, 2011 में

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मृत्यु दंड को जारी रखा जाए या इसे समाप्त कर उम्र कैद की सजा में बदल दिया जाए, यह भारत में बहुत ही विवाद और विचार-विमर्श वाला मुद्दा रहा है। हाल ही में ये मुद्दा एक बार फिर चर्चा में तब आ गया जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के आरोपियों मुरुगन, संतन और पेरारीवलन को 9 सितंबर को दी जाने वाली फांसी पर मद्रास उच्च न्यायालय ने 8 हफ्ते की अंतरिम रोक लगा दी। इसी बीच, तमिलनाडु विधानसभा ने आम सहमति से एक प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति से राजीव गांधी हत्याकांड में मृत्यु दंड का सामना कर रहे तीनों लोगों की पुनरीक्षण याचिका पर विचार करने की अपील भी की है।


मौत की सजा कानून के द्वारा दी जाने वाली सबसे बड़ी अंतिम सजा है लेकिन न्याय के मूल्य उद्देश्यों को देखें तो मृत्यु दंड के मामले में कई विसंगतियां हैं। सजा का मूल उद्देश्य अपराध निषेध, सामाजिक सुरक्षा तथा भय के साथ-साथ अपराधी का सुधार भी है किंतु मृत्यु दंड की स्थिति में अपराधी ही समाप्त हो जाता है तो सुधार की गुंजाइश कहां होगी?


अब तक लगभग सौ देशों ने इस मामले में गंभीर विचार कर संगीन अपराध के दोषी को आजीवन कारावास की सजा को बनाए रखा है लेकिन मौत की सजा खत्म कर दी है। ब्रिटेन की संसद ने भी मृत्यु दंड को अनुचित मानते हुए वर्ष 1998 से फांसी की सजा पर रोक लगाई है। उल्लेखनीय है कि भारतीय दंड संहिता, ब्रिटिश कानून के अनुसार बनाई गई है, अतएव तर्क यह है कि जब वहां फांसी की सजा पर रोक लगा दी गई है तो भारत में भी इस सजा को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।


हालांकि कई विचारकों ने इस सजा का भरपूर समर्थन किया है, लेकिन कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे खत्म करने के लिए लगातार अभियान चलाते रहे हैं। जे.एस. मिल मृत्यु दंड के बडे़ समर्थक थे। उनका मानना था कि इसके बिना समाज में अराजकता फैल जाएगी। एक अमेरिकी न्यायाधीश के अनुसार, फांसी की सजा खत्म करने का अर्थ हत्यारे को एक तरह की गारंटी देना होगा कि वह चाहे जितनी भी हत्याएं करे या जैसे भी अपराध करे, उसकी जिंदगी सुरक्षित रहेगी।


हालांकि भारत में फांसी की सजा ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मामलों में ही दी जाती है। लेकिन जब भी मृत्यु दंड की बात सामने आती है तो विवाद होना स्वाभाविक है। यह विवाद तब ज्यादा उठता है, जब उसके साथ कोई राजनीतिक पहलू भी जुड़ा हो। ऐसे में, भारत में मौत की सजा बनाई रखी जाए या समाप्त कर दी जाए, यह एक जटिल मुद्दा बन जाता है। इस बहस में कई सवाल उठते हैं, जैसे कि-


1. क्या भारत में मृत्यु दंड को समाप्त कर देना सही होगा?

2. मृत्यु दंड खत्म करने से आपराधिक मनोवृत्ति के लोग निर्भय तो नहीं हो जाएंगे?

3. क्या मृत्यु दंड मानवता के विरुद्ध है?

4. यदि मृत्यु दंड समाप्त कर दिया जाए तो अपराध पर कैसे नियंत्रण होगा?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


सजा-ए-मौत कितना प्रासंगिक!


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “सजा-ए-मौत की प्रासंगिकता” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व सजा-ए-मौत की प्रासंगिकता – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jagojagobharat के द्वारा
September 11, 2011

फासी की सजा दिन प्रतिदिन और अधिक प्रासंगिक होती जा रही है लेकिन बड़ी बात यह की जिन्हें फांसी की सजा मिली है उसके पालन में ही वर्षो गुजर जाते है यह नहीं होना चाहिए लोअर कोर्ट से हाई कोर्ट ,हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट और उसके बाद राष्ट्रपति के पास आते आते वर्षो गुजर जाते है जिससे सजा प्राप्त कैदी मानसिक रोगी बन ते जा रहे है .साथ ही यदि अपराधिक प्रविर्ती वाले लोगो के मन से यह भय खत्म हो जाये की उन्हें फांसी नहीं होगी तो समाज में अपराध का ग्राफ और तेजी से बढेगा .

rameshyadav के द्वारा
September 10, 2011

मौत एक सचचाई है जो न आप के रेके रुकी, न रुकेगी मेरी राय मै इस पर  समय नषट करना बेमानीहै जीवन        मोत ईशवर के हाथ है लेकिन हम ईशवर नही है

laxmikant shukl के द्वारा
September 10, 2011

fansi samapt karna matlab nyay ki hatya karna hai.koi kisi ka khun kar de aur hamara desh ‘janwar kasab’ki tarah use jail me shahi kharche par pale.aise to qatilo ko khuli chchut hai ki jao jitni marji khun karo tum surakshit ho.aaj kal k swarthi neta political lalach me rajiv gandhi k hatyaro ko bacha rahe hain aur vahi fansi ko khatm karne ki kayratapurn bat karte hain.fansi ki saja nahi khatm ho sakti varna isme bhi ramdev&anna ki tarah andolan hoga..jai hind

Santosh Kumar के द्वारा
September 10, 2011

बढ़ती राक्षसी प्रवित्तिओं के दौर में ,.जब मानवता रोज कुचली जा रही है ,..मृत्युदंड समाप्त करना अमानवीय होगा ,…इससे अपराधिओं के हौसले बढ़ेंगे ,..वैसे भी हमारे देश में कितनो को यह दंड मिलता है,.. जिनको मिलता है उनको जल्द फंसी देनी चाहिए ,…..जो राजनीतिक फूटबाल खेला जाता है उसे हर हाल में बंद होना चाहिए . http://santo1979.jagranjunction.com/

vibhav saxena के द्वारा
September 9, 2011

मृत्युदंड अब है ही कहाँ? चाहे राजीव गाँधी को मारने वालो की बात हो या संसद और मुंबई हमले क आरोपियों की, क्या अभी तक किसी को फांसी हुई है? हमारे यहाँ आरोपियों को तो जेलों में भी बड़ी सहूलियतें दी जाती हैं मगर आम जनता की सुध लेने वाला कोई नहीं है.वास्तव में हमारे नेता केवल स्वार्थ की राजनीती में लगे रहते हैं.यही कारन है की बड़े-बड़े दोषियों को आज तक सजा नहीं हो सकी है.भले ही छोटे अपराधों में फांसी की सजा माफ़ कर दी जाये मगर निर्दोषों की जान लेने वाले आतंकियों को फांसी पर न चदाया जाना .हमारी कमजोरी ही मानी जाएगी. .

Amar Singh के द्वारा
September 8, 2011

किसी भी देश में विधि निर्माण का मूल उद्देश्य मात्र यही होता है कि उक्त देश पूर्ण रूप से अपराधमुक्त हो सके। जिससे वहां का प्रत्येक वर्ग समाज में अपनी भागीदारी सुचारू रूप से निभाते हुए देश को समृद्वि की ओर अग्रसर कर सके। कानून की दृष्टि से हम समाज को दो रूपों में देख सकते हैं, एक तो वह जो समाज के उत्थान हेतु विधिमान्य रूप से कार्य करते हैं, दूसरे वह जो स्वार्थपूर्ति के चलते विधि विरूद्व कार्य करते हैं और यहीं से अपराध का उद्गम होता है। विभिन्न अपराधों को रोकने हेतु प्रत्येक देशों ने अलग-अलग विधि निर्माण किये हैं। यहां हम विधि की सबसे कठोरतम सजा मृत्युदण्ड के विषय में चर्चा करेंगे। मृत्युदण्ड को कुछ लोग सही बताते हैं तो मानवाधिकार संगठन इसे मानव के प्रति क्रूरतम व्यवहार मानते हैं। भारत में इस विषय पर गर्मागर्म बहस तब छिड़ी जब तमिलनाडु सरकार ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दोषियों को फांसी की सजा से राहत दिलाने के लिए राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल से दया याचिका पर सिफारिश की। उसके बाद मीडिया ने इस विषय को आडे हाथ लिया और विभिन्न बुद्विजीवी अपने-अपने विचार इस पर व्यक्त करने लगे। अभी यह बात समाप्त भी न हुई थी कि तमिल सरकार के बाद उनके पीछे-पीछे कश्मीर के मुखयमंत्री मो. उमर अब्दुल्ला ने टिविटर पर टिवट किया कि भारतीय संसद में दिसम्बर २००१ को हमला करने वाले दोषी अफलज गुरू को भी फांसी की सजा से मुक्त किया जाना चाहिए क्योंकि यदि अफजल को फांसी होती है तो कश्मीर में मुस्लिम वर्ग के मध्य अशान्ति फैलने की आशंका है। ज्ञात हो यह दोनों केस कहीं न कहीं भारत के विरूद् षडयंत्र रचने और उसके खिलाफ बडे पैमाने पर संगठित रूप से हमला करने के पाये जाते हैं। यदि तमिल सरकार की बात मान ली जाये और राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी से राहत दे दी जाती है तो उसके पीछे और भी कई ऐसे केस राष्ट्रपति के पास दया याचिका के लिए लम्बित हैं जो हत्या, देशद्रोह, सामूहिक हत्याओं जैसे जघन्तम अपराधों के दोषी हैं, वह भी स्वयं को फांसी से राहत हेतु मांग करने लगेंगे। यदि इस सभी को मानव अधिकार के दुहाई पर मृत्यु से राहत दे दी जाती है तो यह आजीवन कारावास भुगतने के उपरांत पुनः अपने पुराने कारनामों को अंजाम देने लगेगें और फिर से लाखों बेगुनाहों की जान लेने में जरा संकोच न करेंगे। फिर उन लोगों के मानव अधिकारों की और उनके जीवन जीने की रक्षा किस प्रकार की जायेगी , यह एक विचारणीय प्रश्न है। http://singh.jagranjunction.com/

Saroj Chaudhary के द्वारा
September 8, 2011

Nirdosh logon ki hatya karne walon ke saath kisi prakar ki sahanubhuti nahi honi chahiye. jo nirdosh logon ki hatya karte hain unke saath na to nyayalay ko aur na hi manvadhikar sangathan ko kisi prakar ki hamdardi nahi dikhani chahiye kyonki jo nirdosh logon ki hatya karte hain wo maanav hain hi nahi. Aise hatyaaron ko to jitni jald ho sake faansi par latka dena chahiye.

subh के द्वारा
September 8, 2011

fansi ki saja barkarar rakhna bahut jaruri hai kisi aatanki seriel killer ya rapist ka manvadhikar apneaap khatm ho jata hai aur jo manvadhikar ke naam par fansi ka virodh karte hai unko sabse pahle victims ke baare me sochna chahiye

prabhatkumarroy के द्वारा
September 8, 2011

फाँसी की सजा को भारत सरीखे देश में कायम रखना बेहद जरुरी  रहा है. दहशतगर्दी से त्रस्त भारत तो सजा ए मौत के आभाव में बरबाद हो जाएगा.

shatabdimukherjee के द्वारा
September 8, 2011

भारत में फांसी की सजा है लेकिन इससे कोई फर्क नही पड़ता क्योंकि हमारे देश में न्यायिक प्रक्रिया बहुत लम्बी है और कभी- कभी सालों तक अपराधी केवल जेल में बंद अपने फैसले का इंतज़ार करते हैं. मृत्युदंड हटाने से न केवल अपराधियों में निर्भीकता बढ़ेगी बल्कि देश में हो रहे आपराधिक तत्व अधिक बढ़ जायेंगे. राजीव गाँधी की मौत के आरोपी बीस वर्षों से अपनी सजा का इंतजार कर रहे हैं और इन बीस वर्षों में देश में हुए आतंकवादी हमलों की संख्या बढ़ ही रही है. इसका अर्थ यह है कि कहीं न कहीं हमारी न्याय व्यवस्था असफल हो रही है. आतंकवादी हमलों में कई बेगुनाह लोग अपनी जान गवां देते हैं और अगर इनके आरोपियों को मृत्युदंड दिया जाये तो इसमें गलत क्या है? इसका ताज़ा उदाहरण 7 सितम्बर में दिल्ली में हुए आतंकी हमले में देखने को मिला. आम लोग इन हमलों के शिकार हो रहे हैं और अभी तक म्रत्युदंड पर संशय है कि दिया जाये या नही? मृत्युदंड से अपराधियों में डर की भावना रहेगी. देश में न्यायव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक कठोर दंड प्रक्रिया होनी चाहिए जिससे आपराधिक गतिविधियों कम हो सकें. ब्रिटेन में मृत्युदंड को समाप्त कर दिया गया है लेकिन ब्रिटेन के कितने नागरिक आतंकी हमलों के शिकार होते हैं? क्या भारत और ब्रिटेन में हो रहे इन हमलों का अनुपात एक ही है? यहाँ इस वर्ष में 2 आतंकी हमले हो चुके हैं.

Bipin Bihari के द्वारा
September 7, 2011

फांसी की सजा को सिर्फ बरकार ही नहीं रखनी चाहिए बल्कि दफा मौत के कानून को संसोधित कर इसे छः से बारह महीने में ही सुनवाई कर मौत की सजा दे देनी चाहिए ! मनवाधिकार की दुहाई देने वालो से मै पूछना चाहता हु की वेगुनाहो को निर्मम तरीके से मौत देने वालो को क्यों नहीं मानवाधिकार की पढाई पढाते है !

Harmesh Kumar walia के द्वारा
September 6, 2011

भारत में फांसी की सज़ा का प्रावधान है पर देखने वाली बात ये है कि अभी तक ६३ सालों में कितने गुनाहगारों को फांसी की सजा मिल चुकी है? मेरे ख्याल से सिर्फ ११ लोगों को ही. क्या जिन लोगों के साथ जुर्म हुआ है उन्हें इन्साफ मिल सका है?ऐसे में तो ऐसा ही लगता है कि कहीं न कही इस मौत कि सजा के क़ानून में कोई न कोई कमी है . कितने ही फांसी कि सजा पा चुके गुनाहगार जेलों में पड़े सड़ रहे हैं, फिर जब ७-८ साल हो जाते हैं तो यह कह कछूट जाते हैं या सजा उम्र क़ैद में बदल जाती है कि इतने सालों तक जेल काट ली है . क्या येही सजा-इ -मौत का क़ानून है.?

suman dubey के द्वारा
September 6, 2011

हमारे देश में फाँसी तो वैसे ही विरले से विरलतम व जघन्य से जघन्यत्म अपराध में ही दी जाती है। ससंद को बचाने में कितनो ने प्राण गवाएं। कितनों ने मुम्बई में जान गवांई।देश के प्रधानमन्त्री की जान जिन्होने इतने बीभत्स तरीके से ली , उन सबको मानवअधिकारों की दुहाई, दे कर बचाना क्या मानवता है? चाहे अफजल हो या कसाब हमारी लम्बी कानूनी प्रक्रिया वैसे ही इतना समय ले लेती है, , कि इन मानवता के दुश्मनों पर देश का जाने कितना पैसा खर्च हो जाता है। मेरा तो मानना है कि हमारी उच्चतम अदालत के फैसले के बाद आतंकवादी ,देशद्रोही , जैसे मामलों मे देर की ही नही जानी चाहिये ।जिससे देश में राजनीति हो सके ।

Nishant के द्वारा
September 6, 2011

फांसी की सज़ा का प्रवधान हमें hatana नहीं चाहिए क्यों की ये तीन लोगों ने जघन्य अपराध किया है उसके लिए मौत से या ये कहें की फांसी से कम की सज़ा क्या होगी. हमारे देश के प्रधान मंत्री की हत्या करने वालों को राहत दी जाए. और ये जो मानव अधिकार वाले जो लोग हैं क्या वो लोग वही बात कहेंगे जो अभी कह रहे है , नहीं उस वक़्त उनकी बोल कुछ और ही होगी. ये मानव अधिअक्र वालों को एक आतंकवादी जो आपकी देश के प्रधान मंतिर की हत्या करता है और जो अगर कोई अपनी रंजिश की वजह से हत्या करता है उसमे उन्हें अंतर समझना चाहिए.

Umesh Chandra Pathak के द्वारा
September 6, 2011

1 2 व 4. भारत में मृत्यु दंड को समाप्त कर देना ठीक तभी कहा जा सकता है जब इसका विकल्प हो. सजा का प्रमुखतम उद्देश्य अपराध रोकना होताहै. ऐसी मनःस्थितियां भी होती हैं कि मौत से डर खत्म हो जाता है. इसलिए मृत्यु दंड अपराध रोकने का सबसे कारगर उपाय नहीं प्रतीत होता. बल्कि कठोर (अतिकष्टमय) आजीवन कारावास ज्यादा प्रभावी प्रतीत होता है. 3.मृत्यु दंड मानवता के विरुद्ध नहीं होगा यदि वह मानवता के न सुधरने वाले दुश्मनों को दी जा रही हो

ajaykumar2623 के द्वारा
September 6, 2011

फांसी की सज़ा का प्रावधान भारतीय दंड संहिता १८६० की चर्चित धारा ३०२ में किया गया है. आज हमारे देश में कई लोगों की मानसिकता बन चुकी है की किसी को भी मार दो काट दो कुछ नहीं होगा ज्यादा से ज्याद १४ साल जेल बस. तो जरा आप सोचिये उस पुलिस वाले के बारे में जो एक सम्वेदनशील इलाके में ड्यूटी करता है,क्या उसे मौत का डर नहीं लगता, क्या वो इंसान नहीं है? तो शायद काफी लोगों का जवाब होगा की डर तो सबको लगता है तो उसे क्यों नहीं लगेगा? लेकिन फिर भी वो निडर होकर अपनी ड्यूटी करता है कैसे? इसलिए की अगर उस इलाके में उसे कुछ हो गया तो अपराधी को कानून सख्त से सख्त सज़ा देगा. क्या उस बिचारे की बीवी,बच्चे उससे प्यार नहीं करते? वो बिचारे न तो होली में,न दिवाली में और न ही कभी किसी मेले में छुट्टी पाते हैं, एक मेले में जहां लाखों लोगों की भीड़ जा रही है किसी ने अपने झोले में क्या रखा है कोई कैसे पता लगा सकता है?वो भी तब जब लिक्विड बम का चलन बढ़ रहा है. ऐसे में अगर कहीं धमाका हो गया तो लोग उन पर जाने कैसे कैसे आरोप लगाते हैं? भाई क्या उन्हें अपनी जान जाने का डर नहीं लगता? खैर मुद्दे पर वापस आता हूँ तो फांसी की सज़ा ख़त्म करवाके क्या किसी गुनाहगार के मन में सज़ा का डर बनाया जा सकेगा. और क्या कोई इस बात से अनजान है की आज के समाज में हत्या लूट बलात्कार जैसी घटनाएं किस कदर बढती जा रही है. खैर जो लोग फांसी की सज़ा ख़त्म करवाना चाहते हैं कोई उनसे जाके ये पूछे………. की भाई साहब अगर आपकी बहन या बेटी का बलात्कार हो जाए तो क्या आप उसे ७ वर्ष की सज़ा दिलवाके संतोष कर लेंगे? या कोई आपके भाई,बेटे की हत्या करके उसके ३०० टुकड़े कर दे और उसे महज १० वर्ष की सज़ा हो और राम गोपाल वर्मा उस पर फिल्म बनाए तो आपको बड़ा मजा आयेगा क्या (सन्दर्भ:-नीरज ग्रोवर हत्याकांड, एजे मैथेउ और मारिया द्वारा क्रियेटिव डिरेक्टर नीरज,क्या आप पांचवी पास से तेज़ हैं,की हत्या करके उसकी लाश के ३०० टुकड़े करके जंगले में पेट्रोल डालकर जलाया गया था और अभी राम गोपाल मारिया को हेरोइन लेके फिल्म नोट ए लव स्टोरी बना रहे……………) क्या आप लोग उस बिचारे के बूढ़े माँ बाप का दर्द समझ सकते हैं. हमारी अति सक्रिय मीडिया कहाँ है इस वक़्त…. इसलिए अब फांसी पर आपकी राय क्या है आप जानिए और मुझे भी बताइये अजय कुमार इलाहबाद 8090919542

Krishna Gupta के द्वारा
September 6, 2011

मेरी बात माने कृपया किसी भी घोर अपराधी को फांसी देना बंद कर दें | यह अमानवीय है | कसाब, अफजल गुरु, जैसे अपराधियों को मात्र फायरिंग स्क्वायड का सामना करने दीजिये | यह शायद ज्यादा मानवीय है | इससे हमारे मानवाधिकार संगठन को भी थोडा जोर से चिल्लाने का मौका मिलेगा |

Bal Bharati के द्वारा
September 5, 2011

जो वाकई हत्यारे है उन्हें फांसी बाद में दी जाय. पहले उन्हें फांसी दी जाय जो इन्हें फांसी से बचाना चाहते है तथा इस दिशा में सतत प्रयत्न शील है. कारण यह है क़ि ये लोग पता नहीं कितने हत्यारों को इस बात का पाठ पढायेगें क़ि ह्त्या और लूट खसोट करो फांसी तो होनी नहीं है. आजीवन कारावास ही होगा. उसके बाद तो भारतीय संविधान की जटिल एवं अस्पष्ट दंड विधान की धाराओं के सहारे जेल से भी छुडा लिया जाएगा. ऐसे लोग पता नहीं कितने हत्यारों को जन्म देगें, इस प्रकार पहले इन्हें बचाने वालो को फांसी देनी चाहिए. दूसरी बात यह क़ि मानवाधिकार आयोग तब कहा रहता है जब ऐसे हत्यारे समूह में मानव वध करते है. इसका मतलब तो यह हुआ क़ि मानवाधिकार आयोग मात्र अपराधियों को शरण देने वाला आयोग है. जो निर्दोष लोग है वे भले मारे जाते रहे. अपराधी लोग निर्दोष लोगो की ह्त्या करते रहे. तथा मानवाधिकार आयोग उन्हें बचाता रहे. मानवाधिकार आयोग की आज्ञाओं का पालन करने के लिए निर्दोष लोग बाध्य है अपराधी नहीं. अगर मानवाधिकार आयोग किसी को फांसी देना नहीं चाहता तो वह निर्दोष मारे गए लोगो की जिन्दगी क्यों नहीं उन अपराधियों से वापस मांगता? असल में इन आयोग के सदस्यों के भाई भतीजे, बीबी बच्चे तो मारे नहीं जाते. आयोग उस समय कहा था जब तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी डाक्टर रुबिया को बचाने के लिए उन दो खूंखार अपराधियों को जेल से बरी कर दिया गया जिन्हें पकड़ने के लिए सेना के कई जवान शहीद हो गए. लेकिन जम्मू काश्मीर यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर को छोड़ने के लिए एक अपराधी को मुक्त नहीं किया गया और दूसरे ही दिन उनकी कत्ल की गयी लास बरामद हुयी? कारण यह था क़ि डाक्टर रुबिया एक सत्तारूढ़ मंत्री की बेटी थी जबकी वाईस चांसलर न तो किसी पार्टी से सम्बद्ध थे और न ही कोई मंत्री. दूसरी बात यह क़ि सांप को चाहे कितना भी मीठा दूध पिलायें उसका ज़हर ही बढेगा उसके ज़हर में कोई कमी नहीं होगी. इनको सुधारने के लिए दी गयी शिक्षा इनके आपराधिक मनोवृत्ति को ही बढ़ावा देगी और कोई सुधार नहीं होगा. ध्यान रहे सुधारने वाले को ही सुधारने का मौक़ा दिया जाना चाहिए. चोर, गिरहकट एवं धोखेबाज़ तो हो सकता है सुधर जाय. किन्तु मानव बधिक कभी सुधर नहीं सकते. ध्यान रहे शरीर के जिस अंग में मेलिग़नेंसी डिटेक्ट हो जाय उसे काट कर शरीर से अलग कर देनी चाहिए. उसके इलाज़ के चक्कर में शरीर का दूसरा अंग भी सड़ जाएगा. ऐसे लोगो को फांसी से बचा कर सुधारने की नसीहत देने से उनमें और ज्यादा जोस खरोस से ह्त्या करने का मनोबल इकट्ठा होगा. तथा और दिल लगा कर ह्त्या के काम को अंजाम देगें. अगली बात यह क़ि एक कमपौनडर को सुधार कर, उसे और ज्यादा पढ़ाकर एक डाक्टर तो बनाया जा सकता है किन्तु एक वकील को और ज्यादा वकालत पढ़ाकर उसे डाक्टर नहीं बनाया जा सकता. ऐसे हत्यारों को सुधारने का एक मात्र और सशक्त उपाय यही है क़ि उन्हें बिना विलम्ब किये तत्काल खुली जगह पर सारी जनता को एकत्र कर के सबके सामने क्रूरतम ढंग से मौत के घाट उतारना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसा एक और अपराधी न जन्म लेने पाए. यदि एक हत्यारे को फांसी से बचाया गया तो दस निर्दोष लोगो की ह्त्या तत्काल निश्चित हो जायेगी. यदि एक हत्यारे को फांसी देने से दस लोग डर के मारे ह्त्या करने से बच जाएँ तो वह अच्छा है या एक अपराधी को जीवन दान देने से दस लोगो की ह्त्या हो वह अच्छा?

helplineua के द्वारा
September 5, 2011

वाह रे मेरा भारत महानऔर वाह रे जयललिता जिसमें से देश द्रोह की बू आ रही है देश के प्रधानमंत्री की हत्या और हत्यारे को फांसी न हो अगर ऐसा होता है तो देश का दुर्भाग्य होगा मैं तो कहता हु की ऐसे लोगों को सरेआम फँसी दी जनि चाहिये और उनका बचाव करने वालों के खिलाफ केस करना चाहिये

Tamanna के द्वारा
September 5, 2011

फांसी के डर के कार व्यक्ति कोई भी घृणित काम नहीं करेगा, ऐसा सोचना थोड़ा अटपटा प्रतीत होता है. क्योंकि जो लोग ऐसे काम करते है निश्चय ही वह यह सब परिस्थितिवश, या फिर विकृत मानसिकता और दिमागी असंतुलन के कारण ही करते हैं. जिसकी वजह से उन्हें यह भी होश नहीं होता कि उन्होंने किया क्या हैं, ऐसे में वे फांसी से क्या डरेंगे. दूसरी बात, किसी के जीवन को समाप्त कर देने से आप उसको मिलने वाली यातनाओं से मुक्ति दिला देते हैं, और अगर किसी ने आपराधिक वारदात को अंजाम दिया है तो उसे मार देना उसे सजा नहीं मुक्ति देना होगा. ऐसे व्यक्तियों में सुधार करने की उम्मीद करना पूर्णत: निरर्थक है. इससे कहीं बेहतर है कि उन्हें जीवित रख कर हर समय उन्हें अपनी गलती का अहसास करवाया जाए. फांसी सजा का अंत नहीं उस अपराधी को मिलने वाले कष्टों और यातनाओं का अंत हैं. इसे समाप्त किया जाना ही हितकर है. इसके विपरीत सजा के नियमो को मजबूत और कठोर बनाना चाहिए, ताकि कोई भी ऐसे अपराध करने से पहले फांसी के बारे में नहीं जेल में दी जाने वाली यातनाओं के बारे में सोचें. इसका एक मार्मिक पहलू यह भी है, कि परिवार के एक व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले अपराधों की सजा पूरा परिवार भुगतता है जो पूरी तरह निर्दोश होत है, फांसी की सजा उस अपराधी पर कोई प्रभाव डाले या नहीं लेकिन परिवार को भावनात्मक रूप से बहुत क्षति पहुंचाती है.

    Krishna Mohan Singh के द्वारा
    October 29, 2011

    कठोर यातनाओं को तुम अमानवीय कहकर फिर चिल्लाओगे …….

shaktisingh के द्वारा
September 5, 2011

देश के बड़े अपराधियों चाहें वह कासाब या फिर अफजल हो या राजीव गांधी के हत्यारे, इनकी मृत्यु दंड़ को लेकर इस देश छोटे बड़े राजनीति दल राजनीति कर रहे हैं. जो किसी भी देश की कानून व्यवस्था के लिए सही नहीं है.

bharodiya के द्वारा
September 5, 2011

1. क्या भारत में मृत्यु दंड को समाप्त कर देना सही होगा ? बिलकुल नही, बल्की जो जो राजकिय बाधाएं आती है उसे समाप्त कर देना चाहिए । राष्ट्रपति को बीचमे नही लाना चाहिये । 2. मृत्यु दंड खत्म करने से आपराधिक मनोवृत्ति के लोग निर्भय तो नहीं हो जाएंगे ? दंड का भय शरिफो के लिए है , ईस से शरीफ, शरीफ बना रेहता है । अपराधी को कोई फरक नही पडता । अपराधी पेहले से निर्भय होते है, तभी तो अपराध करते है । दंड का मतलब बनता है अपराधी को मानव समुदाय से निकाल बाहर करना । 3. क्या मृत्यु दंड मानवता के विरुद्ध है ? अपने हिसाब से मानवता की व्याख्या मत करो । आये दिन नये वाद निकलते जाते है । मानवाधिकार वाले का अपना वाद है । कल आप ये भी कहोगे की जेल की सजा मानवता और स्वतंत्रता के खिलाफ है । ईन की सहानुभुति हमेशा अपराधी के साथ ही देखने मे आई है । 4. यदि मृत्यु दंड समाप्त कर दिया जाए तो अपराध पर कैसे नियंत्रण होगा ? अपराध बढ जायेंगे । मर्तंडे जी आपकी बात से सहमत हु । तालिबानो का यही एक पहलु है जो पसन्द आता है ।

Martanday के द्वारा
September 5, 2011

दंड अगर कठोरतम नहीं होगा तो किसी के मन में दर नहीं होगा और अपराध में बढ़ोतरी होती ही रहेगी | अपराधी को पता रहेगा की चाहे कोई भी अपराध करे ज़िंदा रहेगा और कुछ दिनों बाद छूट कर सीना चौड़ा करके घूमेगा और हो सकता है की वह चुनाव में जीत कर मंत्री बन जाए | जैसे की फूलन देवी २१ लोगों का खून किया था आत्मसमर्पण कर दिया बस हो गया सब कुछ माफ़ और मंत्री बन गयी | आप खुद सोचो, एक लड़का एक लड़की के मुह पर तेज़ाब फेंकता है और कुछ दिनों बाद छूटकर शादी कर के खुले आम घूम रहा है, यह खान का न्याय है ? क्या उस लड़के को कठोर से कठोर सजा नहीं मिलनी चाहिए आप खुद विचार करें ? एक १० साल की फूल जैसी बच्ची के साथ एक दरिंदा बलात्कार करता है और उसको मार डालता है, ऐसे दरिन्दे को आप धर्म कथा सुनाएंगे और आशा करेंगे की वह सुधर जाएगा | मिलावटखोर नकली दवाइयां बनाकर लोगों की जान ले रहे है आप उनको माफ़ करने की हिमाकत करते हैं | सजा तो तालिबानी स्टाइल का होना चाहिए जैसा करोगे वैसा भरोगे | चोरी की है हाथ काट दो, नकली दवाई बनाने वालों के परिवार का इलाज़ भी नकली दावा से करना चाहिए, खाने में मिलावट करने वालों को उन्ही का बनाया हुआ खाद्य पदार्थ खिलाना चाहिए, बलात्कारी को अँधा कर उसके जननांग काट देना चाहिए, खूनीओं को बीच बाज़ार में तड़पा – तड़पा कर मारना चाहिए जिससे लोगों की रूह काँप जाए | आपराधिक चरित्र वाला कभी भी नहीं सुधरेगा चाहे कुछ भी कर लीजिए | अरब देश में कठोर सजा मिलती है इसीलिए वहां कोई पड़ी हुई चीज़ में भी हाथ नहीं लगता है अपराधी अंजाम जानता है इसलिए अपराध भी कम होता है वहीँ अमेरिका में बच्चे भी खुले आम गोली चलते हैं | मौत की सजा बरक़रार रखनी चाहिए और उसको तामील करने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए | वन्दे मातरम

    ugra nath nagrik के द्वारा
    September 6, 2011

     jagran junction forum * मृत्युदंड के पक्ष में एक बहुत बड़ी दलील यह है कि अपराधी को जीवन दान देने से पीड़ित परिवार को उनके साथ अन्याय होता अनुभूत होता है । लेकिन राजीव गाँधी की हत्या के मामले में तो ऐसा नहीं है । जब पीड़ित सोनिया गाँधी परिवार स्वयं ही हत्यारों को सजा -ए -मौत नहीं देना चाहता तो फिर अपराधियों को क्षमादान देने में हर्ज क्या है । यह इस खास मामले में मेरा खास तर्क है । वैसे भी किसी भी अपराध के लिए किसी के भी द्वारा मृत्युदंड दिए जाने का कोई औचित्य नहीं है , इसमें शक-सुबहा की क्या बात है । राज्य को भी यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए । गौर करें , इसी अधिकार से वह सुकरात को ज़हर, भगत सिंह को फाँसी देता है ।

    Onika Setia के द्वारा
    September 6, 2011

    martandyji नमस्ते, मैं आपके विचारों से सहमत हूँ , मेरा ख्याल है की अपराधी को उसकी अपराध के आधार पर सजा मिलनी चाहिए तभी सही इंसाफ होगा, और अन्यलोगों को भी सबक मिलेगा.. माफ़ी केवल छोटे से कसूर की होती है बड़े अपराध के लिए नहीं. गलती करना और बात है तथा गुनाह या अपराध करना और बात. उदहारण :- चोरी करना छोटी गलती है इसके लिए समझा देना ठीक है मगर किसी का खून करना गुनाह माना जायेगा, इस आधार पर तो मुलजिम को मौत के घाट ही उतार देना चाहिए.और वोह भी भरे चोराहे पर सार्वजानिक जगह पर ताकि सारे अपराधी समाज को सबक मिल सके.किसी की जिंदगी बर्बाद करने वालों को, किसी को घुट-घुट के खून की आंसू पीकर जीने पे मजबूर करने वालों को या किसी के परिवार को रोता बिलखता बेसहारा छोड़ने वाले ऐसे दरिंदों को बिलकुल समाज में खुला नहों छोड़ना चाहिए. और खासकर जब राजीव गाँधी की बात है, उनकी हत्या देश की बहूत बड़ा नुकसान है उनके जेसे सर्वगुण संपन शख्शियत की जिंदगी सारे देश की जिंदगी थी वोह एक अमूल्य निधि थे उनका बेरहमी से खून करने वाले दरिंदों को फांसी के सजा ज़रूर मिलनी चाहिए.

    rameshyadav के द्वारा
    September 8, 2011

    आज का भीषण विसफोट कॉड केनदर सरकार क  बदनीयति  कुसीॆ कि लालस का नतीजा हैै भारत मे मृतयुदॉड किसीभी      रुप मे  समापत नही करना चाहिए कयौकिभारत एक सवेदनसिल देश है  हजारो निगाहे इसकीओर बदनियति सेआखे बिछाएहैमृतयुदॉड समाप््कर देने असमाजिक ततव निभॆय हो जायेगेगलुीदददििदिोतुावीो


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