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समलैंगिकता – विकृति या सामाजिक अपराध ?

पोस्टेड ओन: 25 Jul, 2011 में

समलैंगिकता के ऊपर गत कुछ समय से निरंतर बहस जारी है. इसके पक्ष और विपक्ष में अनेकानेक मत सामने आ रहे हैं. हाल के कुछ वर्षों में समलैंगिकता को लेकर एक आश्चर्यजनक उत्साही प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जिसके समर्थन में कई गैर-सरकारी संगठनों सहित तमाम समुदाय व कुछ उदार कहे जाने वाले व्यक्ति खड़े हो रहे हैं. समलैंगिकों के हितों में आवाज बुलंद करने वाली नाज फाउंडेशन नामक संस्था तो बाकायदा समलैंगिकों के अधिकारों और समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करवाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है और उसे आंशिक रूप से सफलता भी मिल चुकी है.


नाज फाउंडेशन की याचिका पर वर्ष 2010 में दिल्ली उच्च न्यायालय का फ़ैसला आया कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से समलैंगिक रिश्ता बनाते हैं तो वह सेक्शन 377 आईपीसी के अर्न्तगत अपराध नहीं होगा. बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी धारा 377 के कुछ प्रावधानों को रद्द करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. परन्तु गौर करने वाला पहलू यह है कि न तो दिल्ली उच्च न्यायालय ने और न ही उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिक विवाहों या विवाहेत्तर समलैंगिक संबंधों को विधिमान्यता दी है और इस मामले पर अभी उच्चतम न्यायालय में विचार चल रहा है.


परन्तु समलैंगिकता के समर्थकों ने जिस तरह का उन्माद, जश्न और उत्सव पूरे देश में मनाया, गे-प्राइड परेडें निकालीं,  वह कई बातों पर सोचने के लिए विवश करता है. समलैंगिकता के विरोधियों की चिंता यह है कि समलैंगिकता को जिस तरह रूमानी अंदाज में पेश किया जा रहा है, उससे कहीं जिसे विकार के रूप में लिया जाना चाहिए, उसे समाज सहज रूप में न ले बैठे, अन्यथा भविष्य में समाज में कई बीमारियां और कई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं. उल्लेखनीय है किसी विषय को मुद्दा बनाने से लोगों में उसको जानने-समझने का कौतूहल एवं उत्सुकता बढ़ती है, जो कि उस बात का प्रचार करती है.


समलैंगिकता के विरोधी मानते हैं कि “समलैंगिक व्यभिचार मूल रूप से उन व्यक्तियों से संबंधित होता है जिन्होंने मनोरंजन और विलास की सारी हदें पार कर ली हों. ऐसे लोगों को किसी भी कीमत पर कुछ नया करने को चाहिए होता है. यही कारण है कि विदेशी संस्कृति में समलैंगिक व्यवहार आम चलन में मौजूद है. समलैंगिकता पश्चिमी रीति-रिवाजों में इस तरह समाहित है कि वहॉ पर इसे सहज रूप से स्वीकार किया जाने लगा है. पश्चिमी देशों के तमाम राष्ट्राध्यक्ष, नौकरशाह, अभिनेता, अभिनेत्रियों सहित व्यापार जगत की बड़ी हस्तियां समलैंगिकता नामक उन्मुक्त पाशविक व्यभिचार में लिप्त पाई जाती हैं. किंतु भारत के संदर्भ में ऐसी स्थिति की कल्पना करना भी भयावह और खतरनाक है.”


उपरोक्त को देखते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने या इसे केवल मानसिक विकृति और बीमारी के रूप में परिभाषित कर सुधारात्मक या दंडात्मक कार्यवाही के औचित्य पर विचार विमर्श को दिशा दी जा सके, इस संबंध में कुछ बेहद संवेदनशील और अनिवार्य प्रश्न निम्नलिखित हैं:


1. आप की नजर में समलैंगिकता एक अपराध है या मानसिक विकृति व बीमारी?

2. क्या समलैंगिकता के उन्मूलन के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की जानी चाहिए?

3. क्या समलैंगिकता को बीमारी व मानसिक विकृति मानकर उपचारात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए?

4. क्या समलैंगिकता को सामाजिक मान्यता मिलनी चाहिए?

5. समलैंगिकता को समाज पर थोपकर, स्वीकार्य कराकर समलैंगिकता के पैरोकार कौन-सी सामाजिक जागरूकता लाना चाहते हैं?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से राष्ट्रहित और व्यापक जनहित के इसी मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है. इस बार का मुद्दा है:


समलैंगिकताविकृति या सामाजिक अपराध ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जारी कर सकते हैं.


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें. उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “समलैंगिकता के लिए दंड” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व समलैंगिकता के लिए दंड – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें.

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गयी है. आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं.


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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68 प्रतिक्रिया

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ravish के द्वारा
August 4, 2014

ladkiyo ko chodkar m un sbi se puchna chahta hu jo itne bde bde lecture de rhe h…ki aap dudh ke dhule ho….aapne aaj tk kisi ldke ko us way me tuch nhi kiya to…agr aap na kh rhe h to m man hi nhi skta..b.coz jitne bi gay guys h…unki same story hoti h…ki unhe unhi ke ghr se..unke..dada…chacha…tayaji…maMa..nana..mosa..bhai ne hi apna target bnaya hota h…and ganvo me aaj bi bude bujurgo dvara hnsi mjak or chutkiyo me ek kishor ko shadi se phle’kche rste’pr chlne ko kha jata h…ot ye kcha rsta kisi ldke ke sath sex krna hota….so plz….ye jo bdi n bdi bate ki ja rhi h vo phle khud ko ache se dekh le…b.coz jo thuk upr ki or uchalte h ..mostly vo thuk unhi pr aakr girta h……or rhi bat bimariyo ki…i mean aids and aall…..to vo to agr safe trike se sex na ho to normal relltion i mean stright guys me bi hoti h…and mostly 70% strights ko hi hoti h……to plz…stop this nonsens……agr hm apni life ko jina chahte h …to aap use apni sunskriti or bhartiy smaj ki grima ko lakr muda na garmaye…b.coz india ke sbi grntho…or yha tk ki mndiro me khi bi ise pap nhi mana ….or ha…ek or bat…gayisum sirf sex nhi.h…..ye feelings h…..ki agr hm kisi ko pasand kr rhe h..or uske sath rh rhe h to galt kya h….mene aaj bi ese logo ko delha h…jinhone ldki se shadi kr li but they can’t live a normal life…..to aap btaiye isme kya acha huaa….vo ldki bi khush nhi h…or ldka bi…agr vo ldka apne hisab se jita to dono khush rhte na….gay kanun is liye nhi mang rhe ki unhe khuleaam sex krna h…blki isliye mang rhe h…ki ager ye legal ho jaye to shayd bhut se ldke kisi ldki ke sath mjburn na rhe..or jin ldko ko unke ghrvalo dvara mar diya jata h…vo bvh jaye…b.coz agr ye inlegal rhega to aaj bi ma bap smaj ke dr se apne bete ko ya to mar denge ya fir mrne ko mjboor kr denge…we want ki agr koi jeena chahta h to use jine do…use bi khuli sanse lene do…koi pap to nhi kiya esa jnm lekr…jra hme bi to jee lene do…hme bi to jee lene do

vinay bhatt के द्वारा
August 2, 2011

एक पूर्ण स्वस्थ इंसान वही है जो पूरी तरह से मानसिक, अध्यात्मिक और शारीरिक रूप से परिपक्व है और समाज के साथ पूर्ण सामंजस्य बना के चलता हो…आधुनिक विज्ञानं कहता है की इस प्रकार स्वस्थ मनुष्य की कुछ मूलभूत आवश्यकताएं होती है …..प्यास, भूख, नींद, आराम, काम और विपरीत लिंगी सेक्स … और जिस इंसान में ये तत्त्व नहीं वो किसी न किसी रूप में बीमार है ..अत:एव विज्ञानं की दृष्टि में समलैंगिक व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ नहीं…..

Doctor Jyot के द्वारा
August 1, 2011

one should go to the root of this issue. BIOLOGICALLY male & feamle body get mature for reproduction during PUBERTY/Teenage, but socially it is to be used for reproduction and sex after MARRIAGE. In between years hormones & media expores creates stress among youth to experiement with same gender due to easy access then difficult with opposite gender. Then habit develops. Sex experimentation and masturbation is going to be there more & more now.

S.M.Masum के द्वारा
July 31, 2011

किसी भी इंसान के जीवन मैं सेक्स की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता .किसी को सेक्स की कम ख्वाहिश होती है किसी को अधिक कोई सेक्सोहॉलिक होता है तो कोई इसका सही ज्ञान ना होने से मनोविकृति का शिकार हो जता है. जवानी मैं क़दम रखते ही प्राकृतिक रूप से मर्द और ओंरत को अपनी सेक्स की इच्छा पूर्ति करने के लिए एक दूसरे की ज़रुरत हुआ करती है लेकिन बहुत से लोग अपनी सेक्स की इच्छा पूर्ती के लिए बहुत से अप्राकर्तिक तरीके भी अपनाया करते हैं. इनमें से समलैंगिकता एक भी एक अप्रकर्तिक तरीका है और अप्राकर्तिक तरीके अपनाने से बहुत से रोग शरीर मैं लग जाते हैं और सेहत चली जाती है. समलैंगिकता को एक जन्मजात शारीरिक दोष और मानसिक रोग भी बताया गया है जो की सत्य नहीं है. इसमें संदेह नहीं कि यह बुराई मानव समाज में सदियों से मौजूद है, वैसे ही जैसे, चोरी और इनके उन्मूलन के प्रयास किये जाने चाहिएं न कि इन्हें सामाजिक स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए. कोई भी व्यक्ति जन्म से ही समलैंगिक नहीं होता है, बल्कि लोग उचित मार्गदर्शन के अभाव में ये बुराइयां सीखते हैं. अक्सर जिन पिछड़े इलाकों मैं गाँव मैं आसानी से वयस्क युवकों को अपनी सेक्स की इच्छा पूर्ति के लिए लड़कियां नहीं मिलती या शादियाँ देर से होती है वहाँ समलैंगिकता के मामले अधिक मिलते हैं . इनमें बहुत शादी के बाद बदल जाते हैं और बहुतों मैं यह आदत जीवन के अंत तक लगी रहती है. समाज मैं और सभी धर्मों मैं भी समलैंगिकता हमेशा से अपराध समझा जाता रहा है और सच भी यही है जैसे नशा, चोरी इत्यादि सामाजिक बुराईयाँ हैं उसी श्रेणी मैं समलैंगिकता को भी गिना जाना चाहिए. इस्लाम धर्म मैं भी समलैंगिकता को अपराध कहा गया है और उदाहरण के तौर पे कुरान मैं एक घटना का ज़िक्र किया गया है जिसमें कौम ए लूत का ज़िक्र है. समलैंगिकता की बीमारी एक पूरी कौम को लग गयी थी यदि यह मानसिक बीमारी होती तो पूरी कौम को ना लगती कोई इक्का दुक्का इसका शिकार होता.चूंकि की यह अपराध है और इसके उन्मूलन के लिए कड़े क़दम ना उठाये गए तो एक दिन इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड सकते हैं.

Amar Singh के द्वारा
July 30, 2011

समलैंगिकता के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व हमें इस और भी ध्यान देने अधिक आवशयकता होगी की उक्त सम्लेंगिक व्यक्ति की वर्तमान समय में मनोदशा क्या है? क्योकि विभिन लोगो के मामले में विभिन निष्कर्ष निकलते है और उन निष्कर्ष की सहायता से एक स्थिति में एक व्यक्ति मनोरोगी हो सकता है अर्थात वह व्यक्ति जो की वास्तव में किसी अन्य लिंग की और आकर्षित होता है और वह स्वयं अन्य लिंग के व्यक्ति की भांति व्यव्हार करने लगता है. इस प्रकार के व्यक्तियों को मनोवैज्ञानिक, फिसिकल उपचार के माध्यम से ठीक किया जा सकता है किन्तु इस विषय में पेचीदापन तब आ जाता है जब इस प्रकार की मनोदशा के नाम का लाभ उठाकर स्वस्थ मानसिक स्थिति वाला व्यक्ति भी रोग के बहाने अन्य व्यक्तियों का शोषण करने लगता है तब उस प्रकार के कृत्य को हम अपराध की संज्ञा अवश्य दे सकते है. क्योकि उस अपराध को करते समय उक्त व्यक्ति की मनोदशा पूर्णता ठीक होती है. जिसे दंड देना ही उचित है. सम्लेंगिकता को सामाजिक मान्यता देने में लाभ कम और जोखिम बहुत ज्यादा होंगे. सबसे पहले जो व्यक्ति वास्तव में अन्य लिंग की और आकर्षित है उसे असल में मनोचिकित्सक की अधिक आवशयकता है, न की उसके जैसे किसी और हमसफ़र की जो खुद उसकी ही भाँती मनोरोग की दशा से गुजर रहा होता है. उदहारण स्वरुप किसी drug अडिक्ट के उपचार के समय doctors रोगी को बलपूर्वक drugs से दूर रखते है और कुछ समय पश्चात रोगी पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर जाता है लेकिन रोग के समय रोगी बार बार drugs की डिमांड करता रहता है, कई बार डॉक्टर को बुरा भला कहता है, मारपीट तक उतर आता है वह सब उसकी ख़राब हो चुकी मनोदशा के कारण होता है. वही दूसरी दशा में यदि वह सम्लेंगिक रोगी न हुआ और वह किसी अपराधिक मानसिकता के कारण सम्लेंगिकता में लिप्त हुआ तब स्थिति और भी भयावह हो जाती है. वह जिस भी किसी अन्य व्यक्ति से यदि वह विवाह करने में सफल हो जाता है तो उस व्यक्ति के अंजाम के बारे में सोचकर भी किसी की भी रूह कंपाने के लिए काफी है. अंत में इसी निष्कर्ष में पंहुचा जा सकता है की सरकार को किसी भी दशा में सम्लेंगिकता को कानून के दाएरे में नहीं लाना चाहिए क्योकि यदि यह क़ानून में आ जाते है तो भविष्य में नए प्रकार के अपराधो का उदभव होगा और उन्हें निपटने के लिए पिछले समस्त सामाजिक व्यवस्थायो को गिराकर नयी व्यस्थाओ को खड़ा करना परेगा, नए सामाजिक प्रश्न उठेंगे, पूरे का पूरा सामाजिक ढांचा गिर जाएगा और सामने सूरसा की तरह मूह खोले खड़ी होंगी समस्याए……

    virendra sharma(veerubhai) के द्वारा
    July 30, 2011

    It is sexual orientation ,genetic predisposition also many a times .Loss of gender ,transvestism at other times .Why do you present a Qn box .let people express .

KRISHNA MURARI YADAV के द्वारा
July 29, 2011

समलैंगिक संबंधों को मान्यता देना प्रकृति के विपरीत होगा. और प्रकृति से जितना दूर जाया जाये उतना ही नुक्सानदायक होता है तथा जितना करीब रहा जाये उतना ही अच्छा. करने को तो व्यक्ति, समाज और राज्य कुछ भी कर सकता है, बहुत से ऐसी चीजों को मान्यता दे सकता है जो प्राकृतिक न हों. लेकिन क्या ये सब मानवता के लिए दूरगामी दृष्टि से फायदेमंद होगा? कब ऐसा हुआ है की हम प्रकृति से धोखा करें और शांति से बैठ जाएँ ? मेरा ख्याल है की जब देलही हाई कोर्ट ने धारा ३७७ में अपना आदेश दिया था तो उसका यह मंतव्य कतई नहीं था की समलैंगिक संबंधो को मान्यता दी जाए, बल्कि उसका इशारा तो इसकी आड़ में होने वाले पुलिसिया जुल्म की तरफ था, मानवाधिकारों की रक्षा के लिए था. और इसके लिए उसे यह धारा ही दोषयुक्त लगी. अभी कल की घटना के बारे में भी यही बात कही जा सकती है. यहाँ पर अदालत ने उन दो लड़कियों के जीवन की रक्षा के लिए ही कहा है. जब जब समाज का विकास होता है, यह जटिल होता जाता है. ये जटिलताएं सभी क्षेत्रों में बढती जाती हैं. इसके उलट विज्ञान के विकास में सरलता आती है. विज्ञान में दो सामान आवेश कभी भी आकर्षित नहीं हो सकते. विज्ञान चाहे जितना ही विकास कर ले, ये नियम नहीं बदल सकता. सरलता प्रकृति है, जटिलता कृत्रिम है. सरलता दीर्घायु है, जटिलता अल्पायु है. पकृति ने हमें अवसर दिया है, दिमाग दिया है. हम चाहे जो करें, भुगतना हमें है. आजकल सबसे भयानक रोग एड्स, हमारे प्रकृति के विपरीत जाने का साक्षी है, इश्वर हमें इसके लिए मन नहीं करेगा, क्योंकि वह हमें बुध्धि पहले ही सौंप चूका है. इसलिए समलैंगिकों एवं उनके शुभचिंतकों के लिए मेरा सुझाव यही है की वे इस अप्राकृतिक कृत्य से दूर हो जाएँ, ज्यादा आधुनिक न बनें. अन्यथा ऐसे-ऐसे रोग पनपेंगे की उसका इलाज इस संसार में अगले हज़ार सालों में भी नहीं मिलेगा. मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं हूँ, न ही मैं विज्ञान का विरोधी हूँ. मैं उतने ही खुले मष्तिस्क वाला हूँ, जितना कोई हो सकता है. पर मैं सादगी का भी उतना ही समर्थक हूँ.और सादगी दीर्घायु होती है. चलो प्रकृति के साथ.

    virendra sharma(veerubhai) के द्वारा
    July 30, 2011

    जब तबियत किसी पे आती है , मौत के दिन करीब होतें हैं । और ये हाथी की सूंड सी जुल्फें सब कुछ लील न लें (समुन्दर के ऊपर बनने वाली सुनामी भी जिसे सी -टोर्नेडो कहतें हैं हाथी की इनवर्तिद सूंड नुमा होती है .

    01ramesh के द्वारा
    July 31, 2011

    I do support the versions given in the above writeup and will support the idea not to interfare in the activities supported by law of nature.

omprakash के द्वारा
July 29, 2011

कल ही याने २८ जुलाई २०११ के दिन गुडगांव की एक अदालत ने दो समलैंगिक महिलाओं (lesbians) के विवाह को मान्यता दे दी है. तय है की इसके खिलाफ समाज के ठेकेदार अपील करेंगें, परन्तु शुरुआत हो चुकी है और बात निकली है तो दूर तलक जाएगी. फिलहाल यह एक बहुत अच्छा और महत्वपूर्ण फैसला है जिसकी जितनी प्रशंसा की जय थोड़ी होगी.

Charchit Chittransh के द्वारा
July 29, 2011

उठाया गया विषय ही कुछ विकृत सा लगता है ! मनोविज्ञान के अनुसार समलैंगिक आकर्षण एक तरह कि यौन मनोविकृति है ! वैसे ही जैसे दैनिक प्रचलित भोजन के स्थान पर फास्टफूड पर जीवित रहने कि चाह ! जिस तरह भोजन का स्थायी विकल्प फास्टफूड नहीं हो सकता वैसे ही समलैंगिकता भी ! यह केवल अनर्गल परिवर्तन के पक्षधरों का प्रलाप मात्र है !

Priya के द्वारा
July 29, 2011

आश्चर्य तो मुझे लेखक महोदय के विचारों पर हो रहा है; मुलाहिजा फरमाएं – १. हाल के कुछ वर्षों में समलैंगिकता को लेकर एक आश्चर्यजनक उत्साही प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जिसके समर्थन में कई गैर-सरकारी संगठनों सहित तमाम समुदाय व कुछ उदार कहे जाने वाले व्यक्ति खड़े हो रहे हैं. कई वर्षों से दमित, दलित और हर प्रकार से प्रताड़ित कोई समुदाय यदि अपने अधिकारों के पक्ष में हो रही गतिविधियों को लेकर उत्साहित न होगा तो क्या शोक मनाएगा? और ये “उदार कहे जाने वाले व्यक्ति” का तमगा पहना कर लेखक क्या कहना चाहते हैं, कि ये लोकमित्र-गण सिर्फ मुखौटा पहने हुए हैं उदारता का? २. समलैंगिकों के हितों में आवाज बुलंद करने वाली “नाज फाउंडेशन” नामक संस्था तो बाकायदा समलैंगिकों के अधिकारों और समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करवाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है और उसे आंशिक रूप से सफलता भी मिल चुकी है. ध्यान दें – “नाज फाउंडेशन” नामक संस्था तो बाकायदा…” जनाब ने तो मान ही लिया है कि वो लोग कुछ जघन्य अपराध कर रहे हैं समलैंगिकों के पक्ष में बोलकर! ३. न तो दिल्ली उच्च न्यायालय ने और न ही उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिक विवाहों या विवाहेत्तर समलैंगिक संबंधों को विधिमान्यता दी है और इस मामले पर अभी उच्चतम न्यायालय में विचार चल रहा है माफ़ी चाऊंगा, लेकिन न तो समलैंगिक लोग अभी समलैंगिक विवाहों की बात कर रहे हैं, न विवाहेतर समलैंगिक संबंधों को विधिमान्यता देने की: यहाँ मुद्दा महज़ इतना ही है कि यदि दो पुरुष परस्पर इच्छा से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करना चाहें तो वे बेझिझक बंद दरवाजों के पीछे यथेष्ट यौन सम्बन्ध रख सकें, तथा समाज में उन्हें वही अधिकार मिले जो एक पुरुष और महिला को एक-दूसरे से प्यार जताने का मिलता है ४. समलैंगिकता के विरोधियों की चिंता यह है कि समलैंगिकता को जिस तरह रूमानी अंदाज में पेश किया जा रहा है, उससे कहीं जिसे विकार के रूप में लिया जाना चाहिए, उसे समाज सहज रूप में न ले बैठे, अन्यथा भविष्य में समाज में कई बीमारियां और कई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं. एक बार फिर लेखाक महोदय मुझे माफ़ करें, लेकिन वह वाद-विवाद के पक्ष में नहीं लगते: उन्हों ने तो ठान ही लिया है कि समलैंगिकता अपराध है, या उदारता के उन्माद में गलती से लिख गए कि समलैंगिकता शायद एक बीमारी है जिससे व्यक्ति को “ठीक” कर सकते हैं. आगे तो वो यह भी कह रहे हैं कि उल्लेखनीय है किसी विषय को मुद्दा बनाने से लोगों में उसको जानने-समझने का कौतूहल एवं उत्सुकता बढ़ती है, जो कि उस बात का प्रचार करती है. अगर लेखक महोदय एवं उनके तथाकथित साथियों के दृष्टिकोण से आपका नजरिया नहीं मिलता, तो आप भूल ही जाइये कि आप उनके साथ तर्क-वितर्क कर सकते हैं, क्योंकि लेखक महोदय के मन में समलैंगिकता के बारे में जानने-समझने से ही उसके प्रति कौतूहल बढ जायेगा. ये बात अगर उन तमाम बच्चों के माता-पिता को बता दें जो इतिहास एवं भूगोल के नाम से ही गोल हो जाते हैं, तो शायद NCERT और शिक्षा मंत्रालय उनको भारत रत्न ही न दिला दे! समलैंगिकता के विरोधी मानते हैं कि (…अनर्गल बकवास…) मानते हैं – पाठकगण ध्यान दें, वो लोग ये मानते हैं. मानने से क्या होता है! क्या उनकी मान्यता का कोई वैज्ञानिक आधार है? क्या उनकी मान्यताएं अंतर्राष्ट्रीय व्यापक जन-भावनाओं के साथ समसामयिक हैं, या वो अभी भी उन्ही संकुठित, संकीर्ण कूप-मंडूप रूप से जीना चाहते हैं? क्या उनकी मान्यताएं अल्पसंख्यक समुदायों की विवशता के मुंह पर उड़ाई हुई मिट्टी बन जाएँगी? “समलैंगिक व्यभिचार मूल रूप से उन व्यक्तियों से संबंधित होता है जिन्होंने मनोरंजन और विलास की सारी हदें पार कर ली हों.” एक बार फिर मैं माफ़ी मांगता हूँ लेखक महोदय से, लेकिन यदि समलैंगिक व्यभिचार की ही बात उठी है, तो मुझ अनभिज्ञ को कोई यह तो बताये कि समलैंगिक सदाचार क्या होता है? गौरतलब है कि समलैंगिक एक बहुत ही बड़ा शब्द है – समलैंगिक की श्रेणी में आपके दफ्तर में काम करने वाले कई लोग आते हैं (किसी भी लोकप्रिय social networking वेबसाइट पर देख लें, हर बड़ी कंपनी में कई समलैंगिक काम करते हैं). समलैंगिक की श्रेणी में कई आला दर्जे के खिलाड़ी आते हैं – Steven Davies , इंग्लॅण्ड के क्रिकेट खिलाड़ी; Matthew Mitcham, ओलम्पिक स्वर्ण विजेता; कॉमनवेल्थ गेम्स में आये कई खिलाड़ी – सब समलैंगिक हैं. क्या ये सब नपुंसक एवं नामर्द हैं? क्या ये सब मानसिक रूप से विकृत हैं या बीमार हैं? अगर आपका तर्क यह है कि “ये सब तो पापी फिरंग हैं”, तो अपने गिरेबान में झाँक कर देखिये कि आपने देश की कितनी होनहार जनता को आगे आने से रोका है महज़ इसीलिए कि उनको अपने ही लिंग के व्यक्ति आकर्षित करते हैं. ऐसे लोगों को किसी भी कीमत पर कुछ नया करने को चाहिए होता है. यही कारण है कि विदेशी संस्कृति में समलैंगिक व्यवहार आम चलन में मौजूद है. समलैंगिकता पश्चिमी रीति-रिवाजों में इस तरह समाहित है कि वहॉ पर इसे सहज रूप से स्वीकार किया जाने लगा है. बहुत ही अच्छा है – यह ऐसी ही सहज स्वीकृति के लायक है! फ़र्ज़ कीजिये कि आप, लेखक महोदय, को सामाजिक कारणों से विवश किया जाता सामान लिंग वाले व्यक्ति को चाहने को, उससे शादी करने को, उससे प्यार जताने को – क्या आपको घुटन नहीं होती? पश्चिमी देशों के तमाम राष्ट्राध्यक्ष, नौकरशाह, अभिनेता, अभिनेत्रियों सहित व्यापार जगत की बड़ी हस्तियां समलैंगिकता नामक उन्मुक्त पाशविक व्यभिचार में लिप्त पाई जाती हैं. किंतु भारत के संदर्भ में ऐसी स्थिति की कल्पना करना भी भयावह और खतरनाक है.” भयावह और खतरनाक आप जैसे लोगों ने बना रखा है. भयावह और खतरनाक बनाया है मीडिया के द्वारा किये गए समलैंगिकों के कुचित्रण ने. ऐसी स्थिति की कल्पना करना भारत के सन्दर्भ में भयावह और खतरनाक है, लेखक महोदय, लेकिन आपके जैसे परलैंगिकों के लिए नहीं, वरन हमारे जैसे समलैंगिकों, उभयलैंगिकों एवं अन्य लैंगिक अल्पसंख्यकों के लिए — आपका बस चले तो शायद हमें जीने का अधिकार भी न मिले, हाथ पकड़ना तो दूर की बात है. उपरोक्त को देखते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने या इसे केवल मानसिक विकृति और बीमारी के रूप में परिभाषित कर सुधारात्मक या दंडात्मक कार्यवाही के औचित्य पर विचार विमर्श को दिशा दी जा सके, इस संबंध में कुछ बेहद संवेदनशील और अनिवार्य प्रश्न निम्नलिखित हैं हे भगवान! लेखक महोदय, आप मेरी नज़रों में लगातार नीचे गिरते जा रहे हैं – आप एक कृत्रिम दुविधा निर्मित करना चाहते हैं पाठकों के मन में कि समलैंगिकता या तो अपराध है या विकृति है. क्या आपने ये सोचा है (और वैज्ञानिक शोध इस पर मेरे साथ हम-राय है) कि समलैंगिकता एक पूर्णतः सामान्य परन्तु अल्पसंख्यक मनोवैज्ञानिक लक्षण है? कोई अगर दाहिने हाथ की जगह बायें हाथ से काम करना पसंद करे, तो ये तो कोई अपराध या विकृति नहीं है! यौन अपराध क्या होता है, इसकी परिभाषा हमें विधि-विशेषज्ञों से लेना चाहिए – यौन संबंधों के विषय में दुनिया के सभी मनोवैज्ञानिक एवं विधि-विशारद एकमत हैं कि अपनी इच्छा से किया गया कोई भी यौन संबंध व्यक्ति की नैसर्गिक कामुकता का स्वस्थ प्रदर्शन है; निश्चय ही कोई नहीं कह रहा है कि बच्चों को विवश करना दंडनीय नहीं है, लेकिन बहुत ही बेबूझ है कि लोग यह बात सिर्फ समलैंगिक लोगों के बारे में ही क्यों बोलते हैं? क्या इसका कहने का ये मतलब है कि परलैंगिक लोग बलात्कार नहीं करते? छोटी बच्चियां परलैंगिकों की घिनौनी हवस का शिकार नहीं होती हैं? काश ऐसा होता तो ये दुनिया कितनी सुन्दर होती… अंततः, इस घटिया आलेख में कुछ सवाल उठाये गए हैं, जिनका मैं जवाब देना चाहूँगा: 1. आप की नजर में समलैंगिकता एक अपराध है या मानसिक विकृति व बीमारी? उपरोक्त में से कुछ भी नहीं: समलैंगिकता महज़ प्रकृति की एक और अभिव्यक्ति है, जिसको स्वीकार करने से आप बहुसंख्यक लोग हम समलैंगिकों पर एक बहुत बड़ा आह्सान करेंगे और हमारी ज़िन्दगी सरल बना देंगे 2. क्या समलैंगिकता के उन्मूलन के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की जानी चाहिए? कतई नहीं: उलटे, जितने दंड हैं, उनका पूर्णतः निरसन कर देना चाहिए. फ़र्ज़ कीजिये कि आपको परलैंगिक होने के लिए दण्डित किया जाता तो आपको कैसा लगता? फर्क सिर्फ इतना है समलैंगिक एवं अल्पसंख्यक कुदरत ने हमें बनाया न कि आपको, और इसलिए दुनियावी ताकतें आपमें निहित हैं, और हमें सिर्फ अपने अधिकारों के लिए, इसलिए कि हम एक शांत और साधारण ज़िन्दगी जी सकें, इसके लिए हमें आप परलैंगिकों अतः बहुसंख्यकों के आगे भीख मांगनी पड़ती है 3. क्या समलैंगिकता को बीमारी व मानसिक विकृति मानकर उपचारात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए? बिलकुल करी जानी चाहिए: आप दस समलैंगिक लोगों को खड़ा करें और उनसे पूछें कि कितने लोग “ठीक” होना चाहते हैं – मुझे पूरा विश्वास है कि जब तक हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां लोगों को अपने नैसर्गिक लक्षणों को लेकर धिक्कारा जायेगा, तब तक दस में से नौ समलैंगिक बोलेंगे कि उनको कोई ठीक कर दे. बस मुझे इतना ही डर है कि इन भोले लोगों के लिए इलाज समलैंगिकता की तथाकथित बीमारी से ज़्यादा बुरा न निकले: मनोवैज्ञानिक इलाज के नाम पर बिजली के झटके देना, ताने मारना, हानिकारक दवाइयां देना आम बात है. 4. क्या समलैंगिकता को सामाजिक मान्यता मिलनी चाहिए? मिलनी तो चाहिए, लेकिन नहीं मिलने पर क्या रास्ता हो सकता है? हम अस्वीकृत, अवैध ज़िन्दगी जीते रहें, बंद दरवाज़ों के पीछे अपनी तमाम उम्र काट दें, लोगों के अभद्र व्यवहार को झेलते रहें? मान्यता न देना चाहें तो न दें, लेकिन कृपया पत्थर मारना तो बंद कर दें! कृपया मुंह पर थूकना तो बंद कर दें! 5. समलैंगिकता को समाज पर थोपकर, स्वीकार्य कराकर समलैंगिकता के पैरोकार कौन-सी सामाजिक जागरूकता लाना चाहते हैं? समलैंगिक लोग खुद को समाज पर थोपना नहीं चाहते; वो सिर्फ इतना चाहते हैं कि हमें घोर पापी, असंशोधनीय अपराधी नहीं समझा जाये. हमें हमारी ज़िंदगी जीने की आज़ादी मिले, उतना ही बहुत है. अंत में, मैं कुछ मुद्दे आपके सामने पेश करना चाहूँगा: १. कोई चाह कर समलैंगिक नहीं बनता – ये एक मनोशारीरिक गुण है जो जन्म के साथ ही निर्धारित होता है. कुछ लोग चाहकर उभयलैंगिक होते हैं, परंतु सभी समलैंगिक लोगों को औरतों के साथ यौन संबंध स्थापित करने पर मजबूर करना (या तो सामाजिक परिस्थितियों के माध्यम से या कानूनी हथकंडों से) या उनको अन्य वयस्क समलैंगिकों के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने से रोकना – ये दोनों ही लोगों के मूल मानव अधिकारों के ख़िलाफ़ हैं. २. कोई समलैंगिक सभी मर्दों को देख कर लार लार नहीं टपकाता – ऐसा सोचना कि सभी समलैंगिक शकल-अकल देखे बिना सभी पुरुषों कि तरफ आकर्षित हो जाते हैं ऐसा ही कहना है जैसे कि सभी परलैंगिक सभी स्त्रियों को देखकर मान-मर्यादा दरकिनार कर कामुक नज़रों से देखने लगते हैं. बुरा न मानें, लेकिन जैसा लोकभाषा में प्रचलित है, “शकल देखी है आईने में? चले आते हैं मुंह उठाए…” ३. बच्चों के यौन-शोषण को समलैंगिकता के साथ आँकना निहायत मूढ़ या धूर्त चाल है – क्या आप यह सोच रहे हैं कि सभी समलैंगिक बच्चों का शोषण करने की फिराक में हैं, या सभी सिर्फ छोटे लड़कों का ही शोषण होता है? जी नहीं: छोटी लडकियां भी शोषण का शिकार होती हैं, और लगभग सभी समलैंगिक बच्चों को कामवासना से नहीं बल्कि प्रेम और स्नेह भरी नज़रों से देखते हैं.

    omprakash के द्वारा
    July 29, 2011

    सम्लेंगिकता पर इतना विस्तृत विवेचन कर आपने असंख्य लोगों का उपकार किया है धन्यवाद

    KRISHNA MURARI YADAV के द्वारा
    July 29, 2011

    प्रिया जी, आपने काफी अच्छा लिखा है. लेकिन आप कल्पना करें कि पूरी दुनियां में रहने वाले सभी मनुष्य समलैंगिक हो गए हैं, कहीं कोई सामान्य जोड़ा नहीं बचा है, तब दुनिया कितने दिन चलेगी. ज्यादा से ज्यादा १०० साल. तो समाज क्यों ऐसा रास्ता अपनाये, या इसे मान्यता दे जिसके द्वारा अपना विनाश बुलाये. माना कि बहुत सी हस्तियाँ समलैंगिक हैं, वे सफल हैं, क्या परमाणु बम बनाने वाले हस्ती नहीं थे , बुद्धिमान नहीं थे? क्या उन्होंने बिना दिमाग के प्रयोग के इतना बड़ा बम बनाया? क्या हर बड़ा खिलाडी या व्यक्ति समलैंगिक है या हर छोटा खिलाडी या व्यक्ति सामान्य? श्री राम शर्मा आचार्य ने कहा है कि बड़प्पन अमीरी में नहीं, ईमानदारी और सज्जनता में निहित है. यह सही है कि समलैंगिकता उतनी ही पुरानी है जितना कि मानव . मैं अपनी इस बात पर हमेशा कायम रहूँगा कि प्रकृति के विपरीत न जाएँ.

    Amar Singh के द्वारा
    July 31, 2011

    इस विषय पर दिए गए जवाबो पर मैं कुछ टिप्पणी करना चाहूँगा:- प्रिया जी के प्रतिउत्तर से ज्ञात होता है की वह स्वयं इस दौर से गुजर रहे है / रही है, उनके भावो की क़द्र करते हुए शमा चाहूँगा की उनके उत्तर को समझ कर एक और दृष्टि से देखा जाना चाहिए. सबसे पहले प्रिया जी ने उन मशहूर हस्तियों के नाम से प्रश्न उठाये है जैसे – Steven Davies , इंग्लॅण्ड के क्रिकेट खिलाड़ी; Matthew Mitcham, ओलम्पिक स्वर्ण विजेता; कॉमनवेल्थ गेम्स में आये कई खिलाड़ी – सब समलैंगिक हैं. क्या ये सब नपुंसक एवं नामर्द हैं? क्या ये सब मानसिक रूप से विकृत हैं या बीमार हैं?, तब यह कहना अनुचित न होगा की यदि वह सब सम्लेंगिक है, तो वह सब वाकई मानसिक रूप से विकृत है और क्या कभी कोई उचे पद पर आसीन व्यक्ति या कोई कोम्मों वेल्थ का खिलाडी मानसिक रूप से विकृत नहीं हो सकता? vahi dusri और जीवन का सर्जन प्राक्रतिक रूप से सदैव स्त्री और पुरुष के माध्यम से होता है. पुरुष बिना स्त्री के जीवन का प्रारंभ नहीं कर सकता. फिर चाहे विज्ञानं टेस्ट टूबे बेबी की परिकल्पना ही क्यों न कर ले. टेस्ट टूबे की तकनीक भी कही न कही स्त्री के गर्भ से ली गयी है. उसमे भी स्त्री का बहुत बड़ा योगदान होगा. अब रही बात इंसान के उभय लिंगी होने का, कोई भी प्राणी तभी उभय लिंगी होता है जब वह सवयम अपनी इच्छा से अपना सेक्स बदल लेता है और बच्चे पैदा करने में समर्थ हो जाता है. इस प्रकार के प्राणी भी समुद्र में पाए जाते है, जो कभी भी अपना लिंग बदल सकते है. किन्तु मनुष्य में यह शक्ति कुदरत ने कभी नहीं दी. न तो मनुष्य अपनी इच्छा से अपना फिसिकल मोडल बदल सकता है, (बिना किसी सर्जरी किये ). इसलिए मनुष्य को उभयलिंगी कहना भी उचित नहीं होगा. एक और प्रिया जी का कहना है की मनुष्य को किसी से भी प्रेम करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए. यहाँ पर मैं इनसे सहमत हूँ की प्रत्येक व्यक्ति को एक दुसरे से अवश्य प्रेम करना चाहिए किन्तु यहाँ मैं इनसे पूछना चाहूंगा की किसी से प्रेम करने के लिए उसके साथ सेक्स करने की क्या आवश्यकता है? व्यक्ति अनेक लोगो से एक ही समय में प्रेम कर सकता है किन्तु यह कही भी आवश्यक नहीं की प्रेम के लिए सेक्स अनिवार्य है. वास्तव में मात्र जीवन उत्पति के लिए सेक्स की आवशयकता है न की प्रेम के लिए. प्रेम को सेक्स में बांधकर प्रिया जी ने अपनी छोटी मानसिकता को ही दर्शाया है. यदि प्रेम समुद्र है तो सेक्स मात्र उसकी एक बूँद. प्रेम आत्मा है तो सेक्स शरीर. बस इतना समझ लेना ही काफी होगा. अंत में बात को यही समाप्त करते हुए यह भी बताना आवश्यक है की यह लोग बीमार तो है ही. और ठीक भी तभी होंगे जब यह अपनी बीमारी मानेंगे, गलत विचारों के मकड़जाल से निकलने को तैयार होंगे क्योकि बताने को तो और भी बहुत कुछ है जो लिखने को छूट गया. और बाते अगली बारी….

    litt के द्वारा
    August 5, 2011

    मै ये तो नहीं जानता कि जिसने ये लेख लिखा है वो कौन है … लेखक है या लेखिका क्योकि नाम स्त्री लिंग है और लेख पुरुष की भाषा में है | खैर , सबसे पहले आप बताएं एक स्वस्थ समाज निर्माण में ( मानसिक और शारीरिक ) कितना सहयोग करना चाहते/चाहती है | जिन यूरोप के लोगो का आप उदाहरण दे रहे/रही है | जरा ठीक से पता कीजिये वहाँ और इस प्रकार के कितने कृत्य है ? आज दुनिया में जितनी भी भयंकर बीमारियाँ है उन सब की शुरुआत वहीँ से हुई है | क्योकि इंसान के पास जब धन हो जाता है तो वो नई-नई युक्तिया सोचने लगता है और गलत कार्य को भी हर संभव तरीके से सही ठहराने की पुरजोर कोशिश करता है | और बेचारा माध्यम वर्ग व गरीब वर्ग उसका अनुसरण करने की कोशिश करता है चाहे वो सही है या गलत | इसका उदाहरण आप वर्तमान में आसानी से देख सकते है | यदि कोई स्टार कलाकार कोई कपडा या किसी स्टाइल को सिर्फ एक दो फिल्म के लिए अपनाता है तो उसके फैन भी उसी का अनुसरण करने की कोशिश करते है और कई बार जघन्य अपराध कर अपनी व् अपने परिवार की जिंदगी खराब कर लेते है | तो क्या ये उन फैन का वंशागत या प्राक्रतिक कारण है | एक बात याद रखिये इंसान हमेशा ८०% देख कर सीखता है | अगर यकीन न हो तो अपने घर या आस-पास के बच्चों को ध्यान से देखना वो अधिकतर क्रिया कलाप देख कर ही सीखते है ना कि पढ़ कर या लिख कर | ……… भूपेंद्र सिंह लिट्ट

saurabh के द्वारा
July 28, 2011

har kise ko apna jeevan apne style se jine ka haq hai.

    litt के द्वारा
    August 5, 2011

    आप की बात ठीक है , अगर कोई आप के घर के सामने नंगा होकर नाचे और कहे कि मुझे अपने तरीके से जीने का हक है तो आप अपने घर के सामने एक स्वस्थ नंगे आदमी को ऐसी हरकत करते हुए देख कर आप क्या करेंगे | याद रखिये जनाब किसी भी इंसान की आजादी वहाँ खत्म हो जाती है जहाँ से किसी दूसरे की आजादी शुरू होती है |

Andy Silveira के द्वारा
July 28, 2011

समलैंगिकता को “पश्चिमी रीती -रिवाजों में समाहित ” कहना बहुत ही हास्यास्पद है , क्योंकि समलैंगिक व्यवहार भारतीय स्त्री पुरुषों में सदैव ही पाई गयी है . स्वतंत्रता के उपरान्त ही भारतीय समाज ने समलैंगिकता के विषय में दमनपूर्वक दृष्टिकोण अपनाया है . भारत में सदैव ही लैंगिकता के विषय में खुली एवं मुखर अभिव्यक्ति हुई है , चाहे वो मूर्तिकला के माध्यम से हो , चित्रकला के माध्यम से हो , अथवा कामसूत्र जैसी साहित्यिक ग्रंथों के माध्यम से हो (कामसूत्र में समलैंगिकता से सम्बद्ध एक पूरा अध्याय था , जिसे बाद में ग्रन्थ में से हटा दिया गया ).भारत को अपने धार्मिक ग्रंथों पर गर्व होना चाहिए जिनमे देवादि जीवों का लिंग परिवर्तन द्वारा रूपांतरण के एवं अन्य स्त्री पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध होने के कई उल्लेख मिलते हैं . अपने लिंग को परिवर्तित करना लैंगिक अस्तित्व का बहुत ही महत्वपूर्ण आयाम है . समलैंगिक व्यवहार के इतने गहरे इतिहास के बावजूद , हाल के समय में ही लैंगिक व्यवहार को लोग अपनी पहचान का हिस्सा मान पाए हैं . परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है के भारत में समलैंगिक व्यवहार नहीं पाया जाता था . यदि भारत के इतिहास में लैंगिकता के मुद्दे पर नज़र फेरी जाए तो हम समलैंगिक व्यवहार को उसका अविच्छिन्न अंग पाएंगे

    Ajay के द्वारा
    August 26, 2011

    आप का कहना सही है. समलैंगिकता सार्वभौमिक और सार्वकालिक है एवं इसका देश – काल से कुछ लेना देना नहीं है. जो लोग प्रकृति को समझते हैं वो जानते हैं कि प्रकृति कि संरचना ही कुछ इस प्रकार है कि यहाँ हर चीज ‘सीधी’ नहीं है. हर ‘सीधी’ चीज का ‘उल्टा’ यहाँ मौजूद है. या हम कह सकते हैं प्रकृति में किसी भी चीज का अस्तित्व तभी हो सकता है जब उसका विलोम भी मौजूद हो और ये दोनों तरह की चीजें प्रकृति ने ही बनाई है. यही नहीं, बल्कि इस ‘अनुलोम’ और ‘विलोम’ के बीच न जाने कितनी चीजें हैं. ये प्रकृति रहस्य हैं जिन्हें बिना पूर्वाग्रहों से मुक्त अध्ययन-चिंतन -मनन के नहीं समझा जा सकता. यदि किसी का अधिकार छीना जा रहा हो तो तो आप इस तरह छटपटा सकते हैं किन्तु किसी को अधिकार दिया जा रहा हो, तो इस तरह का विरोध गोष्टी अनुचित है. अगर आप लाठी-डंडे से लैस भीड़ यह जानने की चेष्टा कर रहे हैं या ‘ट्रायल बाई मीडिया’ के ज़रिये ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं तो यह पत्थर से तेल निकलने जैसा ही प्रयास होगा. नयी पीढ़ी और नयायालय दोनों इस मुद्दे को समझ चुके हैं. अक्सर अकेली रहने वाली वृध्द महिला को लोग चुड़ैल कह कर पत्थरों से मार डालते हैं. वो ऐसा क्यों करते हैं, यह एक अलग बहस का मुद्दा है किन्तु इससे यह संकेत मिलता है की भीड़ की बजाय न्यायलय में क्यों आस्था रखनी चाहिए.

Ankit P.Bhuptani के द्वारा
July 27, 2011

जाजरन जंक्शन परिवार, मुझे लगता हे की आप को आधुनिक वैग्नानिक तथ्यों का अभ्यास करना चाहिए. जिस तरह से एक सामान्य वक्ती को एक स्त्री की और आकर्षण स्वाभाविक हे, वेसे ही किसी सम्लेंगिक व्यक्ति का अपने समान लिंग की व्यक्ति की और आकर्षित होना स्वाभाविक हे, ये कोई केवल काम वासना की ही बात नहीं हे, व्यक्ति की जेसू दृष्टी होती हे, वेसी ही श्रूषटी बन जाती हे, शायद आपको इसमें केवल सम्भोग ही दिखाई देता हो,पर इसमें एक दूसरेका प्रेम, सहकार, एक प्रेमपूर्ण रोमेंटिक लाइफ भी हे, जो की किसी ‘गे’ के लिए आपने सामान लिंग के वक्ती के लिए प्राकृतिक हे. और फिर भी आप को इसमें अप्राकृतिक लग रहा हे तो कृपया कर के आप आप रुग्वेद के अंत में भगवान देव ने जो खा हे उसका अध्ययन करे. भगवान् जातवेद कहते हे की ” इस साड़ी प्रकृति में जो कुछ भी हे, जेसा भी हे वहा मेरा ही अंश हे, वह परम पवित्र प्रक्रति में जो भी हे वह प्राकृतिक ही हे. ” आशा हे की आप थोड़े मेच्योर होके इस विषय पर पुनह विचार करेंगे. और में आप सब से आहावाह करता हु की आइये हम इक इसे समाज का निर्माण करे झा पर इन्सानको सिर्फ इंसान ही मन जाय और हर किसी को ‘ह्युमन राइट्स’ का अधिकार हो, जहा पर लोगो को उनकी आर्थिक, सामजिक,वर्णभेद, जातिवाग, धर्मवाद और शारीरिक लेंगिक चुनाव के आधार पर ना बाटा जाये. धन्यवाद – अंकित पी. भुपतानी Mail id – krishnas.ankit@gmail.com

Anita Paul के द्वारा
July 27, 2011

अजीब सी बात है कि समलैंगिकता पर बहस हो रही है जबकि ये कोई मुद्दा ही नहीं है. समाज में दोगलों की प्रजातियां पाई जाती हैं जो करेंगी अपने मन-मर्जी की. जिन्हें लताड़ पड़नी चाहिए उन्हें आप बहस की जगह क्यूं मुहैया कराते हैं. समलैंगिकों की वजह से समाज में एक दुविधापूर्ण स्थिति निर्मित होती है. खासकर ये अपनी हवस बच्चों से मिटाते हैं जिसके लिए भयानक सजा ही एकमात्र विकल्प है.

    vivan के द्वारा
    July 27, 2011

    Anita ji, Kya aap batayengi kis samlengik ne bache ko apni hawas ka shikar banaya? Kya aap ye nahi janti k jitne “straight” balatkar hote he usme kitne pratishat ladkiyan 18 se kam umra ki hoti he? or kitne pratishat aise case darj hote he jisme koi na koi ghar ka hi purush ghar ki kisi choti bachi k sath ye kma karta he. Aap kis adhar par keh sakti hain ki samlengik choote bachon ko apni hawas ka shikar banate he. Or samlangik ko manyta dena ka matlab unhe 18 sal se kam umra wale vyakti k sath sex karne ka adhikar dena nahi he, Sec. 377 k tahat, 18 sal k umra ya adhik ayu k do saman ling wale vyaktiyon dwara apsi sahyog se banaya rishta manya he. isme kahi bhi kam umra wale k sath sex ko manyata nahi he. Mujhe taras aata he aapke chhoti, ghatiya soch par. Bhagwan kare apko ek gay beta or lesbian beti ho taki aap bhi usi dard ko samajh sake. GOD BLESS YOU

krishna ji shrivastav के द्वारा
July 27, 2011

व्यवस्था का ध्वंश -jagaranjunction पृथ्वी के अस्तित्व में आने के साथ ही “काम”का प्रादुर्भाव हुआ .विकास के साथ ही धर्म ,अर्थ काम ,मोक्छ मनुष्य जीवन के चार अंग निर्धारित हुए .काम के वशीभूत होकर विपरीत लिंगी की ओर आकर्षण एक प्राकृतिक स्थिति है .नैसर्गिक आकर्षण ही श्रृंगार रस का प्रथम सोपान है .यह आकर्षण विपरीत लिंगियों के बंधन का आधार है .यहीं से परिवार ,कुनबा ,समाज ,देश का निर्माण प्रारम्भ होता है .नियति का चक्र चल पड़ता है .विपरीत लिंगियों के बंधन से ,भारतीय समाज में निरुपित मात्री ऋण ,पित्री ऋण से दोनों उरिणहोते हैं .दोनों के सम्बन्ध से दोनों को शांति सद्भाव की प्राप्ति होती है .कुछ देने का कुछ ग्रहण करने का सुख प्राप्त होता है .समाज में एक व्यवस्था स्थापित होती है .निरंकुश “काम “कितने अपराधों को जन्म दे सकता है यह आजकल के हालात एंव t.v . के ब्रेकिंग न्यूज से समझा जा सकता है .समलैंगिकता से समाज को देश को क्या मिलता है ?इसमें परिवार तो होता नहीं .केवल दो रहते है ,कोई वृद्धि संभव नहीं .कुछ छन के लिए केवल शारीरिक तनाव को दूर किया जा सकता है .इसमें समाज को नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था स्थापित नहीं की जा सकती .केवल उच्छ्रिन्ख्लता को ही बढावा मिलेगा .प्रत्येक इकाई अपने आप में स्वतन्त्र होगी .सामाजिक दायित्व का निर्वहन ,देश के प्रति कर्तव्य केवल किताबों की बातें रह जाएँगी .समाज विध्वंश के कगार पर होगा .विवाह व्यवस्था का ध्वंश होगा .पूरी सामाजिक व्यवस्था चरमरा जाएगी .कुछ सिरफिरे लोंगो को इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती .दो विपरीत लिंगियों के सम्बन्ध नितांत व्यक्तिगत होते हैं इन्हें सार्वजनिक स्थानों पर करने की वर्जना है .यही समाज की शालीनता है .समलैंगिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन परिवार समाज ,देश सभी को नपुंसक बना देगा .न तो समाज रहेगा और नहीं देश .यह व्यवस्था का ध्वंश होगा . ो

Nawal rawat के द्वारा
July 27, 2011

मेरे द्रष्टिकोण समलेंगिकता कोई अपराध नहीं है…… हाँ कुछ लोग इसे मानसिक विकृति ज़रूर मानते है……. इस विषय पर मै सिर्फ इतना कहना कहना चाहूँगा, की हर व्यक्ति की सोच, पसंद, नापसंद एक जैसी तो नहीं होती… जाब हम किसी भोज़नालय मै जाते है तो कोई मांगता है राजस्थानी थाली तो कोई गुजरती थाली तो कोई पंजाबी थाली ……..इसी प्रकार अपनी अपनी रूचि के अनुसार लोग सम्भोग भी करते है कोई विपरीत लिंग वालो के साथ सम्भोग करते है तो कोई सामान लिंग वालो के साथ …. बस इतनी सी बात है की जिसके मन को जो भाता है वो उसी मै रूचि रखता है….. इसको सामाजिक रूप से मान्यता देना उचित है या अनुचित ये तो मै नहीं कह सकता पर …… पर इसको दुत्कारना अच्छी बात नहीं है…..

    Jatin Tomar के द्वारा
    August 5, 2011

    Aur koi nonveg bhi to khata hai…..usi tarah kal kuchh lopg janvaro ke sath bhi sex karne lagenge aur tum use bhi accept kar lena…….kyuki tum sahi ho ya galat kabhi bhi virodh nahi kar pate ….

BECHARA BHARATVASI के द्वारा
July 26, 2011

इतना शोर क्यूँ …………………………..अगर समलैंगिकता विकृति या अपराध है तो इसका जन्मदाता ये समाज भी विकृत और अपराधी है | बचपन से ही जब लड़कियों को लडको से मेलजोल बढ़ने से रोका जाता है और केवल लड़कियों से दोस्ती करने की छूट मिल पाती है तो क्या समलैंगिकता बढ़ने में उनके मां -बाप दोषी नहीं है | जब दहेज़ की लालच में लड़कियों को जलाया जाता है तो क्या नवयौवनाओं को ऐसे पुरुष प्रधान समाज से नफरत नहींकरनी चाहिए शादी की बात चले और नकारे जाने से बार बार अपमानित होने से उनका आकर्षण क्या पुरुषों की प्रति बने रहना ठीक है | क्या स्त्री समलैंगिकता को पुरुष समाज के मुंह के प्रति विरोध के रूप में देखना नहीं चाहिए है | उनसे डरकर ही तो वो हमउम्र सहेलियों की तरफ आकर्षित होती है | लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में इस प्रवृत्ति का बढ़ना में भी समाज उत्तरदायी है लोक लाज शर्म की ऊंची दीवारों और मान मर्यादों को लांघने में सभी पुरुष एक सामान नहीं होते कुछ तो हस्तमैथुन और काम कल्पनाओं का सहारा लेकर जवानी से शादी तक का वक्त काट लेते है तो वहीँ कुछ अपने हमउम्र साथियों की और आकर्षित होते है | समलैंगिकता न टी विकृति है और न सामाजिक अपराध बल्कि ये एक सामान लिंग वाले दो व्यक्तियों का परिस्थितिजन्य आकर्षण मात्र है जिसमे उसे विपरीत लिंग के व्यक्ति से मिलने वाला आनंद भी नगण्य लगता है | ये विकृति समलैंगिकों की नहीं समाज की विकृति है जिसमे समाज अपने रूढ़िवादी कुरूप चेहरे को छुपाने की कोशिश कर रहा है |

subhash के द्वारा
July 26, 2011

jisme aurat ko khush karne ka dam nahi hota vo gay ban jata hai tajjub hai log iska support kar rhe hai independence ka galat fayda liya ja rha hai is vikriti se samaj ko bachana hi hoga

    Praful के द्वारा
    July 27, 2011

    Subhash ji Na to samlaingik auraton ko khush karna chahte hain aur naa hi aap jaise sukshma vichaaron waale logon se support ki apeksha rakhte hain, vikriti bhi prakruti hai aap sahi galat ke faisle khud ki zindagi ke liye lijiye aur doosron ko khud ki zindagi chunne se mat rokiye, aap ko yeh jaan ke tajjub isiliye hota hai kyunki aap yeh jaanne yaa samajahne ki kshamtaa nahi rakhte hain ki aap jis cheez se aakarshit hote hain uske ilaava doosre prakaar ke aakaarshan bhi vaidya hain… kuen ke mendhak waali kahawat to aapne suni hi hogi… parivar mein do maaein ya do baap ho yeh bhi aapko theek nahi lagega… aapke anusaar sirf lakeer ke fakeer ki tarah ek hi parivaar ka swaroop hota hai… jo aap samajh sakein woh theek aur jo aapki samajh ke pare hai woh vikrit… pehle dekhiye… sochiye …samajhiye… aapke ghrina ki wajah kya hai? main agar kisi ladke se pyaar karoon to aapko yeh kaise pata ke main kisi aurat ko khush nahi rakh sakta…. kaiii samlaingik aap jaise logo ke dabav mein aake shaadi karte hain, bachche bhi paida karte hain aur poori zindagi aapki ghrina se darr ke khud ki kudrati chahat ka gala dabaayein baithe rehte hain, agar aap isse vikriti maante hain to kissi manochikitsak se pooch lein ki aisa aakarshan medically maanya hai ya nahi… main bahut kuch bataa sakta hoon lekin uska faaydaa nahi hoga kyunki aapne apni vichaar dhara bana rakhi hai… aap apni ghrina sambhaaliye … main sambhaaloonga mera pyar…. aur mere gay ya straight ya bisexual hone ke liye aapki swikriti ki koi aavshyakta nahi hai…

    subhash के द्वारा
    July 27, 2011

    lagta hai aapki bimari had paar kar gyi hai

    Gautam Yadav के द्वारा
    July 27, 2011

    Aapko Independence ka matalab bhi malum hai???? Bakwas karte hain….

    Gautam Yadav के द्वारा
    July 27, 2011

    Subhash bimari ki had to aapki paar ho gayi hai jo bina iske baare jane hi aap comment karne main lage hue hain…..

    Vishal Soni के द्वारा
    July 27, 2011

    shut up….

    omprakash के द्वारा
    July 27, 2011

    सुभाषजी, लगता है आपके पास औरतों को खुश करने वाली मर्दानगी की डोज कुछ ज्यादा ही है. कहीं ये आपकी मानसिक विकृति तो नहीं. आप बैठे बैठे समाज को बचाने का दिवास्वप्न देखते रहिये. उस से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि समाज की जो गति-मति है वो तो अपने बदलाव के हिसाब से निरंतर चलती रहेगी और आप की सोच के लोग इतिहास के कूड़ेदान में किस कोने में होंगे पता भी नहीं चलेगा. सुभास्जी, जागिये दुनिया बदल चुकी है. इस तथाकथित “विकृति” से समाज को बचाने की बात भूल जाइये वरना आप जैसों को बहुत मुश्किल आने वाली है. जय रामजी की.

    KRISHNA MURARI YADAV के द्वारा
    July 29, 2011

    बहुत अच्छा कहा भाई आपने. आपकी पहली लाइन कुछ ज्यादा ही कठोर है, पर अंतिम तीन लाइनें बहुत अच्छी हैं.सुभाष जी शाबाश!

Vivan के द्वारा
July 26, 2011

I seriously don’t think it as a disease or immoral. I am Gay. And I am like this since my childhood. I was always attracted towards same sex. And people with whom I live understand that it is not just sexual but it is more about emotional bonding. I feel pity on all those and specially JagranJunction Forum who has presented it in very low and immoral manner. It has asked the question where it has tried to impose its thinking by putting two option viz. disease and sin. If it had been an open ended discussion, I would have given serious applause. Let the people speak. Let them put forward their views rather then manipulating their thoughts. P.S. The people in my life who know about me have accepted me with open arms. They love me for what I am as a human being. People should understand that being gay doesn’t mean having sex with random people. It about the personal choice and accepting the fact of being one. There are far bigger issues prevailing in the society then cribbing about individual’s living patter and thinking. Media is considered as fourth pillar of constitution and JagranJunction is totally maligning its image, its stature by giving such topics (closed). RIP jagranjunction.

C.P.SHYAM के द्वारा
July 26, 2011

१. इसे विकृत किया जा रहा है. २. ये समाज का ही दिया हुआ है. सामाजिक अपराध कैसा? क्या कन्या भ्रूण हत्या पर इतना हंगामा हुआ या हो रहा है. नही? जब लिंग अनुपात बिगड़े गा तो ऐसी घटनाये तो सामने आएंगे ही…

ishwarsinghrautela के द्वारा
July 26, 2011

neither of ,like other basic need sex is also aessential requirement , nowadays few of us not having right opportunities at right time so intend to opt this option & thereafter became habitual , therefore need is to make society more educated in sex also.

omprakash के द्वारा
July 26, 2011

जागरण परिवार की बुद्धि को बलिहारी देता हूँ जिन्हों ने समलैंगिकता के विषय में बहस की पहल का सेहरा तो बाँधा परन्तु बेशर्मी की हद तक पूर्वाग्रहों से बाज़ नहीं आये क्योंकि जो मेल आपने भेजी उसमें आपने जो विशेषण इस्तेमाल किये (मसलन……जैसी “अराजक”, “निन्दित” “घृणित प्रवृत्ति” समाज का संतुलन खोता जा रहा है” आदि इत्यादि. आप के अनुसार “विनाश के इस बीज के वृक्ष बनने से पहले” ही आप इसे ख़त्म करना चाहते हैं. क्या इस तरह की बेबुनियाद प्रिजुडिस के आधार पर एक स्वतंत्र बहस का आगाज़ कर रहे हैं इस प्लेटफोर्म पर. आपने इस तथाकथित विष बीज का वैज्ञानिक आधार भी नहीं देखा सम्जः और ना ही हाल के कोर्ट फैसले पर नज़र डाली होगी. जरुरत क्या है आप जैसों को. आप उनलोगों में से हैं जो किताब पढ़े बिना उनकी होली जलाते हैं, “बैन” लगाने के लिए मारकाट करते हैं ऐसा मुझे लगा वर्ना एक स्वतंत्र बहस के आवाहन के लिए मेल लिखते समय इतना जजमेंटल होने की भला क्या जरुरत है. लेकिन आप अपने विचारों से दूसरों की सोच को प्रभावित करना चाहते हैं. लोगों को बताने दीजिये के उन्हें यह गलत क्यों लगता है. आप इसे विष बीज बताने में क्यों लगे है. जनाब अगर थोड़ी भी अक्कल हो और सम्लेंगिकता के विषय में ठीक से अध्ययन करें और नए आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों पर गौर करेंगे तो पायेगें की इस में कहीं भी कुछ भी तो गलत नहीं. अगर मैं शाकाहारी हूँ और आप मांसाहारी हैं तो क्या आप मेरे लिए “घृणित” हो गए. यह सब नितांत व्यक्तिगत चोयिस है और कभी कभी तो विसुद्ध “जेनेटिक” कारणों से है.

    Gautam Yadav के द्वारा
    July 27, 2011

    om prakash ji main aapki baat se sahmat hoon…. mujhe personaly yeh article padhne ke baad yeh feel hua hai ki shayad jagran blog ko bhi yeh nahi pata hai ki samlengikta kya hai had toh yeh hai ki Jagran blog ko toh yeh bhi nahi pata ki Delhi high court ka faisla koun se year main aaya tha inke according delhi high court ka judgment 2010 main aaya tha jo ki bilkul galat hai delhi high court ne apna faisla 2nd july 2009 ko sunaya tha… aur 2nd thing ki jagran blog ne jo samlengikta ka mudda uthaya hai woh ek achhi pehal hai lekin article main jo negative shabd aur bhasha ka pryog kiya gaya hai main usse bilkul santushat nahi hoon….. maine media ke kafi talk show main participate kiya hai but Jagran ke sawal puchhne ka tarika bhi kafi galat hai. aapke sawalo ko dekhkar lag raha hay ki hum koi gunehgar hain aur humse aise sawal puchhe ja rahe hai khas taur per sawal number 5. समलैंगिकता को समाज पर थोपकर, स्वीकार्य कराकर समलैंगिकता के पैरोकार कौन-सी सामाजिक जागरूकता लाना चाहते हैं? What do u mean by समलैंगिकता को समाज पर थोपकर ?? Dude hum kisi per kuchh thop nahi rahe hai just apne rights ke baare main baat kar rahe hain yeh article zaroor kisi homophobic ne likha hai…… im tring to understand tht….

smilingdrop के द्वारा
July 26, 2011

How can U even say its a disease or some bull shit.. U would have understood our sufferings if U were a Gay.. U people make fun of us,, but i really guarantee that each of our tear drop never gonna leave U happy.. this is not the time to make fun of us or just stamp us,, try to understand Us n try to find an option which can bring happiness everywhere.. if U have something called as emotions n feelings then U guys would understnd us or else as always try to spread sadness around..

smilingdrop के द्वारा
July 26, 2011

How can U even say its a disease or some bull shit.. U would have understood our sufferings if U were a Gay.. U people make fun of us,, but i really guarantee that each of our tear drop never gonna leave U happy.. this is not the time to make fun of us or just stamp us,, try to understand Us n try to find an option which can bring happiness everywhere.. if U have something called as emotions n feelings then U guys would understnd us or else as always try to spreak sadness around..

SKKJI के द्वारा
July 26, 2011

हम कैसा इतहास बना रहे हैं I अपने देश के कुछ समुदायों को खुश करने के लिए राजनीतिज्ञ चाहे वो किसी भी पक्ष का समर्थन कर रहे हों , पुरे देश की एकाग्रता तो को भंग कर रहे हैं और इस काम मैं पूरी तकक्त से जुढ़े हैं.I यह राजनीतिज्ञ हम मैं से ही हैं I शायद हम ही हैं ? तो हम काया करें I सरकारे हमरी प्रितिबिम्ब हैं तो उन का हर कार्य कौन कर रहा है शायद आप समझ गए हैं I राजनीती का कोढ़ हमें लिले जा रह है और हम मौन देखने मैं व्यस्त हैं I समाधान क्या है क्या हमें लगता है कि हमें दर्शक ही रहना है I क्या हम किसी काम के हैं I यह प्रशन हम अपने से तब पूछें जब हम मैं बुधि हो I हमारी बुधि अभी निद्रावस्था मैं है I अभी ऐसा कुछ ? नहीं हुआ के यह बुधि जागे ? भारत वर्ष पिछले हमारी याद के वर्षों मैं इंडिया हो गया और इस पर भी हमें तोढ़ने कि कोशिश हो रही है बर्मा कटा अफगानिस्तान कटा पाकिस्तान कटा बंगलदेश कटा कश्मीर मिजोरम अरुणांचल काटने कि रह पर हैं बस एक आधी सदी कि बात है I परन्तु हमारी बुधि अभी निद्रावस्था मैं है रहने दो , रहने दो , रहने दो अपनी बुधि को सोने दो इसे आराम कि जरुरत है बहुत थक गयी है शायद ?? ? दुखी मत हो

SKKJI के द्वारा
July 26, 2011

क्या चीनी (white sugar) खाना विकृति है या दिमागी असंतुलन ? ज़रा सोचिये पृथ्वी पर कोई भी जीवधारी चीनी नहीं खाता ! तो फिर ऐसी कोण सी विकृति हमारे विवेक और मस्तिषक मैं है के हम चीनी खाते हैं I ऐसे बहुत से उदहारण हैं जैसे घी खाना, शराब पीना सिगरेट पीना I यह सब काम हम केवल मनोरंजन अथवा विलास के लिए ही करते हैं I यह कहना की हम बुद्धिजीवी हैं और अन्य जीवधरिओं से ज्यादा विवेकशील है और हमारे हर काम उचित हैं तो समलैंगिकता मैं क्या अनुचित है शायद आप यह पढ़ कर मुझे बूरा भाल कहें तो फिर चीनी और घी खाना छोढ़ दें I चीनी खानी है तो गन्ना चूसें शहद खाएं पर सफ़ेद चीनी न खाएं

MAYANK MISHRA के द्वारा
July 26, 2011

Respected DANIK JAGRAN First of all I congrats you to think about the today’s burning topic…  Now a days if somebody (government) make a law for society, then the main motive of that particular law to prevent the crime in the society & aware the society about the crime. But now a days law are frequently misusing by the culprits …………I will give some examples of misusing the laws specially ” DOWRY PROPITIATION ACT 498A” which was introduce in the society to prevent “Dowry-Victim” but now this law is frequently misused by the girls, wife & families just to hares and money-extortion purpose. Specially The law regarding thsh will widely misu law The Hon’ble Supreme Court also commented on the misuse of LAWS. misuse by the culprits (LEADS TO SEXUAL HARASSMENT OF BABY BOY). So In my opinion introduction of LAW regarding this is welcome, because lots of fake case regarding this issue was disposed automatically, but enemy of society, now they are ready to misuse these laws………so beware of this-JAIHIND

MAYANK MISHRA के द्वारा
July 26, 2011

समलैंगिकता – विकृति या सामाजिक अपराध (दोनो)

    Gautam Yadav के द्वारा
    July 27, 2011

    Mayank kal ko agar aapke family main koi aako bole ki woh gay hai to kya aap Apradhi bana doge ya jaan se maar doge??

Manoj Dublish के द्वारा
July 26, 2011

समलैंगिकता क्या है यह बहस का मुद्दा नही बल्कि यह क्यों है इसको भी समझना चाहिये / हस्तमैथुन एक आम आदत है पहले यह पुरुषों में ज्यादा थी परन्तु पाश्चात्य सभ्यता के परिवेश में अब यह स्त्रियों में भी कामन है/ ठीक समलैंगिकता भी एक आदत है जहाँ एक पुरुष एक अन्य पुरुष के साथ सेक्स का आनंद लेता है या फिर एक स्त्री एक अन्य स्त्री के साथ/ जबरदस्ती तो व्यक्ति सेक्स आज अपनी पत्नी के साथ नही कर सकता क्योंकि यह भी बलात्कार की श्रेणी में आता है तो समलैंगिक सम्बन्ध भी एक बीमारी नही बल्कि आनंद लेने का एक दूसरा विकल्प है/ बहुत से व्यक्तियों को आप उनको अपनी बगल के पसीने की बदबू सूंघते या फिर अपने मल द्वार के ही छिद्र को अंगुली से रगड़कर सूंघते हुए देख सकते हैं और तो और बहुत से व्यक्ति अपनी नाक के मैल को भी खा जाते हैं,तो यह उनकी आदत में शामिल है ठीक हमको आपको बुरा लगता है परन्तु यह उनकी आदत है/ जैसे कोई व्यक्ति चाय ज्यादा पीता है कोई सिगरेट पीता है या कोई मांस खाता है तो जरुरी तो नही सभी खावें या उसका विरोध करें/ अब हस्तमैथुन को आप क्या कहेंगे ?एक बीमारी या आदत,बस आपका उत्तर ही आपका प्रश्न है,वीर्यस्खलन से व्यक्ति को अनकहा आनंद मिलता है,और यही आनंद वह समलैंगिकता से भी पाता है,और भैय्या शौक शौक की बात है ,बहुचर्चित एक शायर और विद्वान् श्री फिराक गोरखपुरी भी इस आदत के शौक़ीन थे/ आज वर्जिनिटी की क्या परिभाषा है ?उत्तर यही है कि जिसको काम क्रीडा करने का अवसर नही मिला बस वही आज वर्जिन है,यह केवल स्त्रियों तक ही नही बल्कि पुरुषों तक में मान्य सिद्ध है/ समलैंगिकता का अर्थ केवल सेक्स ही नही बल्कि साथ साथ रहना भी है,बहुत से साथी ऐसे भी हैं जो साथ साथ रहते हैं परन्तु उनके बीच कोई शारीरिक सम्बन्ध स्थापित नही होते/ बोयेज होस्टल में लड़के साथ साथ रहते हैं कभी कभी तो चार चार लड़के भी एक कमरे में रहते हैं तो शाब्दिक परिभाषा में तो यह भी समलैंगिकता है पर ऐसा है नही / फिर अगर कोई पुरुष किसी अन्य पुरुष के साथ यौन सम्बन्ध बनाता है तो दूसरों को इसमें क्या कष्ट है ? लगभग हर विवाहित पुरुष अपनी पत्नी के साथ मुख सेक्स करता है तो इसके विरुद्ध आवाज क्यों नही उठाते?क्या मुखद्वार सेक्स के लिए बना है,अगर मुख सेक्स उचित है तो मलद्वार सेक्स कहाँ से गलत हुआ ?केवल किसी बात को गलत ठहराने के लिए ही विरोध करना जायज नही बल्कि इसके भीतर झांकना चाहिये कि आखिर यह समस्या है क्यों?समझे ! यह समलैंगिकता बीमारी नही बल्कि सामाजिक समस्या है/ एक बहुत बड़े नेता जिसको आजादी का नायक भी कहा जाता है उसमे भी यह गुण था तो के कर लिया उसका ? आज उसके अनुयायी उसके सम्मान में जन्म मृत्यु पुण्य तिथि मनाते हैं /जो कुछ आपकर रहे हैं वह केवल आपकी ही दृष्टि में उचित है,जरुरी नही औरों की में भी हो/ उदाहरण के तौर पर चुनाव के समय आपने एक उम्मीदवार को चुना तो जाहिर है आप अन्य उम्मीदवारों एवं उनकी पार्टी के विरोध में थे,परन्तु सरकार बनाते समय आपके चयनित उम्मीदवार ने उसी दल के साथ समझौता कर लिया जिसके विरुद्ध आपने मत दिया था अब आप क्या करेंगे?कुछ नही कर सकते / इसी प्रकार आप या अन्य कोई कहीं जाकर खुश होता है तो दूसरों को आपत्ति क्यों ?ब्लू फिल्म किसी को अच्छी लगती हैं किसी को नही,सरकार कहती है कि यह अपराध है जबकि सरकारी नेता सारे ही कामांध हैं तो क्या करें? सेक्स रेकिट पकड़ा गया तो दोष लड़की को ही क्यों ?क्या बिना पुरुष के भी यह चल सकता है क्या ?समलैंगिकता एक मानसिक विकृति नही बल्कि सामाजिक समस्या है जिसका कोई उपचार नही है / आज मीडिया की वजह से यह प्रगट हुई है जबकि यह तो पहले से ही होता आया है / गाँव के स्कूल मास्टर अक्सर छात्रों से अपना हस्तमैथुन करवाया करते थे और उनके मलद्वार में अपना शिश्न भी डाला करते थे यह अप्राकृतिक दुष्कर्म की श्रेणी में आता था ,इसलिए अपराध था परन्तु आज जब यह काम स्वेच्छा से हो रहा है तो समलैंगिकता कहा जाने लगा है/ बदलता परिवेश है पता नही आगे आगे क्या होगा?क्या क्या देखने को मिलेगा ?समलैंगिकता निसंदेह एक भयंकर समस्या है परन्तु इसका समाधान इसको कानूनी मान्यता देना नही बल्कि इसको मानसिकता सुधार कार्यक्रम के द्वारा हल करना चाहिये,/

    vijaysinghrajpoot के द्वारा
    July 26, 2011

    मेरी नजर मे सम्लैगिकत एक विकृति है जिसे कि एक समाजिक अपराध की श्रेणी मे ही रखना ही ठीक होगा इसके मान्यता की तो बात ही बेईमानी है क्या बहुत सी ऐसी बाते है जो कि अपराध समझी जाती है जैसे कि ड्र्ग्स तो क्या इसे भी खुले आम करने की मान्यता दे देनी चहिए? समलैंगिकता एक तरह का विदेशी सभ्यता है. जो धिरे- धिरे भारतीय संस्कृति में प्रवेश कर रही है. और खुल कर समाज के सामने आ रही है.

    MAYANK MISHRA के द्वारा
    July 26, 2011

    मेरी नजर मे सम्लैगिकत एक विकृति है जिसे कि एक समाजिक अपराध की श्रेणी मे ही रखना ही ठीक होगा इसके मान्यता की तो बात ही बेईमानी है क्या बहुत सी ऐसी बाते है जो कि अपराध समझी जाती है जैसे कि ड्र्ग्स तो क्या इसे भी खुले आम करने की मान्यता दे देनी चहिए? समलैंगिकता एक तरह का विदेशी सभ्यता है. जो धिरे- धिरे भारतीय संस्कृति में प्रवेश कर रही है. और खुल कर समाज के सामने आ रही है.

    MAYANK MISHRA के द्वारा
    July 26, 2011

    Respected Manoj Ji Now a days if somebody (government) make a law for society, then the main motive of that particular law to prevent the crime in the society & aware the society about the crime. But now a days law are frequently misusing by the culprits …………I will give some examples of misusing the laws specially ” DOWRY PROPITIATION ACT 498A” which was introduce in the society to prevent “Dowry-Victim” but now this law is frequently misused by the girls, wife & families just to hares and money-extortion purpose. The Hon’ble Supreme Court also commented on the misuse of LAWS. So I my opinion introduction of LAW regarding this is welcome, because lots of fake case regarding this issue was disposed automatically, but enemy of society, now they are ready to misuse these laws………so beware of this-JAIHIND

Bajrang Lal Choudhary के द्वारा
July 26, 2011

1- Yeh manav ke patan ki parakastha hai. 2- Saja nahin balki medical Relief ki jarurat hai. 3- samajik manyata samaj ke liye ghatak sabit hogi. 4- iske samarthak bhi dimag ke kisi kone men is bimari se grasit hain.

    Gautam Yadav के द्वारा
    July 27, 2011

    Bajrang ji Medical relief ki jarurat aapko hai aur yeh dhyan rahe ki kahin apke ghar main aapka beta bhai bhanja ya koi bhi gay ho to kahin aapka patan na shuru ho jaye….. Aap log bina ish vishye ke baare main jaane kaise koi bhi comment de sakte ho pls pehle padho iske baare main aur aap khud bhi jiyo aur hamein bhi jine do.

amit के द्वारा
July 25, 2011

समलैंगिक..एक सामान लिंग वाले लोग दो लोगों के बीच प्रेम होना कोई अपराध नहीं हैं यदि इस पर गौर करें तो कुछ हद तक किसी निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता हैं लेकिन जो मैं लिखने जा रहन हूँ उससे कुछ लोग सहमत भी हो सकते हैं और नहीं भी कभी कभी कुछ घरों में बच्चों को बचपन से ही सारी सुख सुविधा दी जाती है लेकिन उन्हें कुछ चीजों से महरूम होना पड़ता है और वो है प्यार उनके साथ बैठकर उनकी बातों को समझना उनके दोस्तों के बारें में जानना घर से किसी प्रकार का सहयोग न मिलने पर उनकी ज़िन्दगी किताबों में और दोस्तों में खो जाती और वो लगातार आप से दूर होते चले जाते हैं ये बातें लड़के और लड़की दोनों के लिए हैं और इसी बीच उन दोस्तों में से कोई एक ऐसा दोस्त बन जाता है जिसके साथ घूमना खाना सोना उससे अपनी सारी परेशानी शेयर करने का मन करने लगता है और कहीं वो दोस्त उसकी छोटी बड़ी समस्या का हल निकाल देता है और वो भी उसी समस्या का शिकार है जिससे आप जूझ रहे तो नजदीकियां और हों जाती हैं और ये नजदीकी कब प्यार में बदल जाती हैं पता ही नहीं चलता इस प्यार का पर्दा आँखों पर ऐसा चढ़ जाता है जिसके पीछे और आगे सिर्फ और सिर्फ उस दोस्त का ही चेहरा नज़र आता है जिससे वो प्यार करता है इस प्यार की दुनिया बिलकुल अलग है इन्हें किसी की परवाह नहीं होती विदेशों में तो इसे कब की मान्यता दे दी गयी है आखिर आप ने अपने कोई न कोई कमी तो जरूर की होगी जिसकी वजह से उसे किसी और का सहारा लेना पड़ा और वो जब अपनी ज़िन्दगी का फैसला खुद कर रहा है तो हम और आप उसमे बाधा क्यूँ उत्पन की जाये उसे भी तो अपने ढंग से जीने का अधिकार है और कोर्ट की तरफ से भी मान्यता मिल गयी है तो उसमे हम सब क्यूँ बाधक बने अगर हम इस बदलते युग में अपने आप को भी बदलना चाहते हैं तो इस सच्चाई को भी अपनाना होगा अगर इस पर लगाम लगाना है तो उन लोगों पर लगाया जाये जो अपने बच्चों का खायाल नहीं रखते उने अकेला छोड़ देतें हैं उनकी दुनियां में सजा के हकदार तो वो हैं जिनकी वजह से इस बीज ने पौधे का रूप धारण किया और जब वृक्ष का रूप धारण करने लगा तो इसकी तरफ सब की नज़र दौड़ गयी लेकिन अब बहुत देर हों चुकी है……..

    MAYANK MISHRA के द्वारा
    July 26, 2011

    Respected Amit Ji Now a days if somebody (government) make a law for society, then the main motive of that particular law to prevent the crime in the society & aware the society about the crime. But now a days law are frequently misusing by the culprits …………I will give some examples of misusing the laws specially ” DOWRY PROPITIATION ACT 498A” which was introduce in the society to prevent “Dowry-Victim” but now this law is frequently misused by the girls, wife & families just to hares and money-extortion purpose. The Hon’ble Supreme Court also commented on the misuse of LAWS. So I my opinion introduction of LAW regarding this is welcome, because lots of fake case regarding this issue was disposed automatically, but enemy of society, now they are ready to misuse these laws………so beware of this-JAIHIND

    Nawal rawat के द्वारा
    July 27, 2011

    अमित जी मई आपकी बात से पुन्यतय सहमत हू…….. वाकई जो आपने कहा वो सो फीसदी सच है….

Shishir के द्वारा
July 25, 2011

मेरी नजर में समलैंगिकता को विकृति समझना खुद ही एक दिमागी विकृति है. हमें दकियानूसी विचार-धाराओं से उबर कर उन बातों पर ध्यान देना चहिये, जिससे देश के हर नागरिक को खाने, रहने और पहनने की दिक्कत न हो.

    MAYANK MISHRA के द्वारा
    July 26, 2011

    मेरी नजर में समलैंगिकता एक दिमागी विकृति है. हमें दकियानूसी विचार-धाराओं से उबर कर उन बातों पर ध्यान देना चहिये, जिससे देश के हर नागरिक को खाने, रहने और पहनने की दिक्कत न हो.

UDAY के द्वारा
July 25, 2011

मेरी नजर मे सम्लैगिकत एक विकृति है जिसे कि एक समाजिक अपराध की श्रेणी मे ही रखना ही ठीक होगा इसके मान्यता की तो बात ही बेईमानी है क्या बहुत सी ऐसी बाते है जो कि अपराध समझी जाती है जैसे कि ड्र्ग्स तो क्या इसे भी खुले आम करने की मान्यता दे देनी चहिए? उदय chaurichaura.com, realbhojpuri.com,

Gaurav के द्वारा
July 25, 2011

मेरी नजर में समलैंगिकता मनुष्य सभ्यता के पतन का एक स्वरुप है | जानवर भी अपने मेल या फी मेल होने का अहसास रखता हैं परन्तु मनुष्य आज कल ये भी भूलते जा रहे की बो भगवान के बनाये नियमो का उलंघन कर रहे है |

    Ravinder Kumar के द्वारा
    July 26, 2011

    गौरव जी आप की बात मैं दम हैं आप सोला आने सच कहा हैं

    Gautam Yadav के द्वारा
    July 27, 2011

    gaurav aapke ish statement se mujhe lagta haiki aap ek anpadh hain….. aapki jaankari ke kiye main bata doon ki ek research study ke anusaar 5 se 10% janwar samlengik hote hain.

    Jatin Tomar के द्वारा
    August 5, 2011

    Mr. Gautam, you always seem to believe that 5 to 10% is enough to prove one thing whatever it is…..i think you don’t study later part of reports saying about animals…..chimpanzee shows the most close behavior to human and they do have gays…..but science does also says that it is the problem of genes that causes it and those species have been proved more prone to extinction who have more gene problem….homosexuality is basically a gene problem….it is not normal that is basic outcome of research by magazine SCIENCE….yes there are research that say it is normal but it is same as saying white lion is normal….it is beautiful and of similar power but unable to survive in it’s natural environment and so does applicable to gays….

shaktisingh के द्वारा
July 25, 2011

समलैंगिकता एक तरह का विदेशी सभ्यता है. जो धिरे- धिरे भारतीय संस्कृति में प्रवेश कर रही है. और खुल कर समाज के सामने आ रही है.

    Anil Kumar के द्वारा
    July 25, 2011

    समलेंगिगता एक विक्रति भी है और दिमागी प्रोबलम भी है। मेरे अनुसार समलेंगिगता के मूल कारणो की खोज करने की बहद जरूरत है। वैसे यह एक आदत भी हो सकती है जो एक जनरेशन से या किसी दूसरे से अगले व्यक्ति में ट्रांसफ़र होती जा रही है, एक बात और है कि इस तरह के ’सिम्पटम्स” बचपन में ही पनपते है, जो नजर अंदाज कर दिये जाते है और आगे जाकर यह एक समलेंगिगता जैसी दिमागी बिमारी का रूप ले लेती है।

    parmaal के द्वारा
    July 25, 2011

    samlangigta ko manyta milne se chhote bachhon ka yon shoshan suru ho jayega.

    M K JAIN के द्वारा
    July 26, 2011

    समलेंगिगता एक विक्रति है ya दिमागी प्रोबलम है YE TO MUJHHE NAHIN MALOOM ,PAR YE KAHANA SARASER PAKHAND HAI KI YAH विदेशी सभ्यता है मेरे अनुसार समलेंगिगता ARAMBH SE HAMARE DESH MAIN RAHI HAI.mAIN TO ISKE BARE MAIN BACHPAN SE HI SUNATE AA RAHA HUN, PAR ISE AB LOG KHUL KAR SWEEKAR KARNE LAGE HAIN. Ham sachai ko sweekar kyon nahi karte ?Pakhand hamari sabse badi बिमारी है।

    Gautam Yadav के द्वारा
    July 27, 2011

    Sakti singh ji main apki baat se bilkul sehmat nahi hoon agar aap bharat ka itihaas utha ker dekhe toh tum Mahabharat main shikhandi ke baare main padho tumhe pata chalega ki homosexuality ka itihaas kitna purana hai and read abt Khajuraho’s temple to tumhe pata chalega….. you no hum logo ka problem yahi hai ki agar koi aaker humse kuchh pucche to hum uske baare main bina soche samjhe bolenge jaroor beshak se aapko uska matlab bhi na pata ho pir bhi…. so pls read some information frst even i have so many Straight frnds jo ki homosexuality ko support karte hain u can meet my parents my family jo ki mujhe support karti hai itna hum bhi ishi samaj ka ek hissa hain yaar we r nt criminal…..




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