जागरण जंक्शन फोरम

देश-दुनियां को प्रभावित करने वाले ज्वलंत और समसामयिक मुद्दों पर जनता की राय को आवाज देता ब्लॉग

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Jagran Junction Forum


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क्या अब कांग्रेस के दिन लद गए हैं?

Posted On: 12 Jun, 2014  
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क्या संजय बारू की किताब से भाजपा को राजनीतिक लाभ होगा ?

Posted On: 14 Apr, 2014  
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क्या बिहार में अब नीतीश का दौर खत्म हो चुका है ?

Posted On: 1 Apr, 2014  
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कौन बनेगा काशी का सरताज – मोदी या केजरीवाल?

Posted On: 18 Mar, 2014  
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21 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

श्री अरविन्द केजरी वाल इतने महत्वकांक्षी हैं उनकी नजर दिल्ली के रास्ते प्रधान मंत्री बनने की है हर मुख्यमंत्री अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं यह काम कम अपना विज्ञापन अधिक कर रहे हैं अपने आप को एक मात्र मोदी जी का प्रतिद्वंदी सिद्ध करने की कोशिश करते हैं |काम कम बखान ज्यादा अपनी भूल संविधान के अनुच्छेद 191का उलंघन कर संसदीय सचिवों की नियुक्ति के विरोध के बाद दिल्ली विधान सभा में बहुमत के बल पर कानून पास करना राष्ट्रपति महोदय ने विधेयक लौटा दिया विलाप शरू हर मौके पर राजनीति इन्हें पहले देश का संविधान पढना चाहिए था |अपने हर मेंबर को भी यही सिखा दिया है जब भी प्रेस से मुखातिब होते हैं हाथ में एक कागज जरुर होता है जैसे प्रूफ ले कर आयें हैं |प्रेस में अपनी बात कहते हैं तुरंत खिसक जाते हैं दूसरे की कभी नहीं सुनते जैसे तानाशाह हैं |

के द्वारा: Shobha Shobha

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

मेरे बिहार के लोगो बहुत बढ़िया जो आज विकाश किया उसको भी गली दे रहे हो अगर नितीश नहीं होते तो सोचे की उस टीचर का क्या होता जो आज टीचर हे जिनके घर में आज उसी टीचर के पैसे से घर में दो टाइम का रोटी मिल रहा हे आज भूल गए अगर नितीश नहीं होते तो आज सायद उनके घर में आज इतनी कमाई नहीं होते आज पता नहीं आज कहा होते कही प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे होते या फिर डेल्ही जैसे सहर में गली सुन के कमा रहे होते भूल गए नितीश के कामो को भूल जाओ लेकिन एक बात सुन लो आज के युग में महंगाई और बढ़ेगा ये बीजेपी कुछ नहीं करेगी देख रहे हे न क्या हो रहा हे देश घूमना हो रहा जिसकी अपनी घर आचे नहीं होते वो पहले अपनी घर को शम्भल ले उसके बाद दुषरे का घर देखे नितीश से आचे कोई बिहार का विकाश नहीं कर सकता

के द्वारा:

केजरीवाल जरूर मोदी की राजनीति ख़त्म कर सकता है लेकिन दिल्ली चुनाव की तरह ही लड़ना पड़ेगा ! 1. टीवी मिडिया बाइक हुए चैनलों की तरह वर्ताव करे दिन रात केजरीवाल की खुजली की भी तारीफ़ करे ! 2. मुलायम , मायावती , लालू , नितीश कुमार , ममता बनर्जी , जय ललिता , कोंग्रेश , बीजू पटनायक , सीपीएम , सीपीआई , टीआरएस , एम आई एम , पीडीपी . नेशनल कॉन्फ्रेंसः , इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठन अगर अपनी आहुति अगर केजरीवाल रुपी यज्ञ में दे दें और चुनाव न लड़े ! 3. सारे देश में बिजली पानी , वाई फाई , टैक्स फ्री कर दें और घर के पैसे से सरकार चलायें ! 4.सभी बेरोजगारों को सरकारी नौकरी दे दें ! 5. पढ़ाई और मेडिकल १०० % फ्री कर दें ! इसके बाद वो आसानी से प्रधान मंत्री बन सकते हैं और अगर वो दिल्ली में अपने किये वादे पूरे कर दिए तो मैं समझता हूँ अगले प्रधानमंत्री केजरीवाल होंगे ! ५४३ सीटों में से ५४३ सीटें जीतेंगे ! कोई ये न कहे की मोदी के भक्त ऐसी बाते झल्लाहट में कर रहे हैं इसलिए बता दूँ मैंने इतना सब दिल्ली के इलेक्शन में देखा है यही हुआ है ! वास्तव में केजरीवाल एक पागल और सनकी है अगर केजरीवाल १ साल सरकार चला ले बहुत बड़ी बात है ! उसके पास चोरों और बदमाशों की फ़ौज है जो किसी दिन खुद ही केजरीवाल को ठिकाने लगा देंगे !

के द्वारा:

मुझे केजरीवाल के कुछ कृत्य प्रारम्भ से ही नही भाए जिनका उल्लेख आपके माध्यम से अपेक्षित है - (१) बिजली के खम्बे पर चढ़कर कनेक्शन काटना और कहना कि बिजली का बिल मत देना I (२) दिल्ली का सीएम बनने के बाद सचिवालय की रेलिंग पर बैठकर लोगों को सम्बोधित करना | (३) लोगों के मध्य सामान्य नागरिक बनकर नया मानदंड स्थापित करने का आश्वासन देना किन्तु किसी भी कारणवश ही सही उसको पूरा न कर पाना I (४) जन सामान्य के लिए सब कुछ त्यागने का भाव प्रदर्शित करना किन्तु हकीकत की जमीं पर अपने ही आदर्शों के प्रति सामंज्यस्य न बिठा पाना I (५) केजरीवाल मैं परिपक्वता की कमी है | अच्छा हो वह मूल्य निष्ठ जीवन और आदर्शों के सम्मान हेतु गंभीरता तथा स्थितियों से सामंजस्य बिठाने की योग्यता हासिल करें | मुझे केजरीवाल पर जितना विश्वास था अब मैं उतना ही सशंकित तथा निराश हूँ | मैं कैसे कहूँ कि ऐसे व्यक्ति को राजनीति करनी चाहिए या नही |

के द्वारा: Bhola nath Pal Bhola nath Pal

ladkiyo ko chodkar m un sbi se puchna chahta hu jo itne bde bde lecture de rhe h...ki aap dudh ke dhule ho....aapne aaj tk kisi ldke ko us way me tuch nhi kiya to...agr aap na kh rhe h to m man hi nhi skta..b.coz jitne bi gay guys h...unki same story hoti h...ki unhe unhi ke ghr se..unke..dada...chacha...tayaji...maMa..nana..mosa..bhai ne hi apna target bnaya hota h...and ganvo me aaj bi bude bujurgo dvara hnsi mjak or chutkiyo me ek kishor ko shadi se phle'kche rste'pr chlne ko kha jata h...ot ye kcha rsta kisi ldke ke sath sex krna hota....so plz....ye jo bdi n bdi bate ki ja rhi h vo phle khud ko ache se dekh le...b.coz jo thuk upr ki or uchalte h ..mostly vo thuk unhi pr aakr girta h......or rhi bat bimariyo ki...i mean aids and aall.....to vo to agr safe trike se sex na ho to normal relltion i mean stright guys me bi hoti h...and mostly 70% strights ko hi hoti h......to plz...stop this nonsens......agr hm apni life ko jina chahte h ...to aap use apni sunskriti or bhartiy smaj ki grima ko lakr muda na garmaye...b.coz india ke sbi grntho...or yha tk ki mndiro me khi bi ise pap nhi mana ....or ha...ek or bat...gayisum sirf sex nhi.h.....ye feelings h.....ki agr hm kisi ko pasand kr rhe h..or uske sath rh rhe h to galt kya h....mene aaj bi ese logo ko delha h...jinhone ldki se shadi kr li but they can't live a normal life.....to aap btaiye isme kya acha huaa....vo ldki bi khush nhi h...or ldka bi...agr vo ldka apne hisab se jita to dono khush rhte na....gay kanun is liye nhi mang rhe ki unhe khuleaam sex krna h...blki isliye mang rhe h...ki ager ye legal ho jaye to shayd bhut se ldke kisi ldki ke sath mjburn na rhe..or jin ldko ko unke ghrvalo dvara mar diya jata h...vo bvh jaye...b.coz agr ye inlegal rhega to aaj bi ma bap smaj ke dr se apne bete ko ya to mar denge ya fir mrne ko mjboor kr denge...we want ki agr koi jeena chahta h to use jine do...use bi khuli sanse lene do...koi pap to nhi kiya esa jnm lekr...jra hme bi to jee lene do...hme bi to jee lene do

के द्वारा:

कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के कारण आज़ादी के समय लेकर आज तक के बीच का कुछ समय छोड़ दें तो सारे समय कांग्रेस ही इस देश पर शासन करती रही है. मई 2014 के 16वीं लोक सभा के चुनाव में कांग्रेस को अप्रत्यासित हार का सामना करना पड़ा है. चुनाव परिणामों नें सभी को अचंभित किया है. हार भी ऐसी कि जिसकी कल्पना न तो कभी कांग्रेस नें की थी, और जीत ऐसी जिसकी कल्पना न तो तो भाजपा नें की थी. 543 सदस्यों के सदन में कांग्रेस को कुल 44 सीटों पर विजय मिली। यह संख्या रेकग्नाइज़्ड विपक्ष का स्थान पाने के लिए भी अपर्याप्त है. कांगेस नें कभी यह कल्पना भी नहीं की होगी कि ऐसे बुरे दिन भी कभी देखने पड़ेँगे. भारत के चुनाव के इतिहास में कांग्रेस का यह सबसे निम्नतम स्कोर है. . पिछले तीस सालों में में पहली बार किसी एक दल को अपने बल पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला है. वह दल है भाजपा. भाजपा नें अपने बल पर लोक सभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया है. किसी को भी यह अपेक्षा नहीं थी कि कांग्रेस के विरोध में और भाजपा के पक्ष में इतना तेज तूफ़ान चल रहा है. चूंकि बहुत सी बातें पहली बार हो रही हैं, इस कारण चुनाव परिणामों को समझने की स्वाभाविक उत्कंठा होती है, विभिन्न दलों से पतिबद्ध और मीडिया के लोग अपने अपने तरीकों चुनाव परिणामों का विश्लेषण करेंगे. मैं अपनी समझ के अनुसार चुनाव परिणामों को समझने कोशिश करता हूँ कांग्रेस की हार के अनेक करणों में हैं. सर्व प्रथम है दल का अहंकारी स्वभाव. सल्तनत का अहंकारी स्वभाव तो सबको पता है. नेहरू जी से लेकर इंदिरा जी और राजीव गांधी तक इस परिवार का व्यवहार सामंतवादी रहा है. आज़ादी के आस पास के समय और उसके थोड़ा बाद तक उस समय की पीढ़ी की लॉयल्टी / स्वामिभक्ति इस परिवॉर के साथ रही है.वह सल्तनत के हर प्रका के घमंड नाज नखड़े को बर्दाश्त करती रही है. आजकल की वर्तमान पीढ़ी सामंतवाद में विश्वास नहीं करती है और हर चीज़ को गुण दोष के आधार पर परखना चाहती है. वह अंध भक्ति में विश्वास नहीं करती है.. हमारी पुरानी पीढ़ी हर तरह के नाज, नखड़े, अहम और घमंड को बर्दाश्त करती रही है. सामंतवाद कांग्रेस की नस नस में रच बस गया है. लेकिन वर्तमान पीढ़ी इसके लिए तैयार नहीं है. चूंकि अहंकार पार्टी का चरित्र बन चूका है इस कारण पार्टी के सभी कार्यकर्ता किसी न किसी हद तक इससे प्रभावित रहे हैं. चुनाव के समय टी वी चैनलों पर आने वाले कांग्रेस के प्रवक्ताओं के अहंकार की कोई सीमा नहीं थी सर्व श्री कपिल सिबल मनीष तिवारी, सत्यव्रत चतुर्वेदी, अभिषेक मनु सिंघवी, अपना अहंकार प्रदर्शित करने मेंं एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में शामिल थे. मोदी को गाली देने का जिम्मा बेनी प्रसाद वर्मा नें संभाला हुआ था. सलमान खुर्शीद भी उनसे पीछे नहीं थे मोदी द्वारा एक बार बेटी कह दिए जाने पर प्रियंका नें आसमान सर पर उठा लिया. वोट बैंक की खोज में आतंकवादियों का पक्ष लेकर दिग्विजय सिंह नें हिन्दुओं को इतना आहत किया कि हिन्दू वोट भाजपा की झोली में जाकर गिरा। जाहिर है कि अगर कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक बनाती है तो हिन्दू को भी संगठित होना पड़ेगा. यह स्वाभाविक है,. प्रियंका नें मोदी को नीच कह कर विमर्श का स्तर पाताल तक पहुंचा दिया. ऐसे घमंडी लोग जनता का समर्थन माँगते समय शर्म भी महसूस नहीं करते थे अपने अहंकार और घमंड का परिचय देने में हर कांग्रेसी ने अपना भरपूर योगदान दिया। भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा. अन्ना हज़ारे के जन लोकपाल और बाबा रामदेव के आंदोलन के समय कांग्रेस का व्यवहार अहंकार की पराकाष्ठा पर था. 2G, CWG, आदर्श सोसाइटी, कॉल ब्लाक आंवटन से सम्बंधित भ्रष्टाचार की खबरों से जब जनता का गुस्से से उबल रही थी ऐसे समय थे, हमारे प्रधान मंत्री किन्हीं अज्ञात कारणों से मौन धारण किये हुए थे. यह समझ के बाहर की बात है कि जब देश लुट रहा था उनके सामने निष्क्रिय होने की क्या मजबूरी थी अक्षम नेतृत्व बाकी कोर कसर राहुल नें पूरी कर दी. एक कागज़ पर लिखी हुई बेसिरपैर वाली बातें पढ़कर, कुर्ते की बाहें चढ़ाकर बार बार गुस्से का इज़हार करके उन्होंने ऐसा प्रभाव पैदा किया कि मानो उनके पास कहने को सकारात्मक कुछ भी नहीं है. उपरोक्त . सभी बातों का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस का नाम कीचड में मिल गया. परिणाम तो वही हुआ जो होना था. .

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

के द्वारा:

कांग्रेस को संजीवनी मिल सकती है,गॉवों में जाकर बदलाव करने से.अपनी यात्रा पुनः हर गांव -हर घर से शुरू करने से. गरीबी किसी के घर पर जाकर समझ में नहीं आती,इसे समझने के लिए १०-२० दिन अर्थहीन और साधनहीन होकर जीने में समझ में आती है. गोल्डन बाउल एंड सिल्वर स्पून की कल्चर का अंत करना पड़ेगा. पर्ण कुटी के अनुभवों को आत्मसात करना पड़ेगा.तभी जनता सत्ता में वापस भेज सकती है ,अन्यथा कोई रास्ता नहीं.उलटे -सीधे बयानवाजी करने से केवल पार्टी और गहरे गर्त में ही जाएगी. हाँ ,परिवार वाद भी एक कारण है.जब प्रणव मुख़र्जी जैसे नेता को राहुल गांधी के सामने रिपोर्ट करना पड़े,तो यह पूर्णतः राजनीती का दिवालियापन ही है. शायद यदि मनमोहन सिंह जी की जगह प्रणव मुखर्जी रहते ,तो आज कांग्रेस की इतनी बुरी हालत नहीं होती.

के द्वारा: pkdubey pkdubey

पहले कहते कुछ हैं और बाद में करते कुछ हैं, सरकारी नौकरी की आधे रास्ते में छोड़ी, समाज सेवा करेंगे (अन्ना जी के साथ ) कभी राजनीति में नहीं आयेंगे, राजनीति में आ गए लोगो से दिल्ली मांगी कहा सी एम् बनाये , सी एम् बनगए सीट छोड़ कर भाग गए, कहते थे जितने के बाद सब भ्रष्ट नेताओं को अंदर कर दूंगा, नहीं किया पूरा समये ये दिखने मैं लगा दिया की पुलिश मेरे नीचे काम नहीं करती, फिर कहा सरकारी बंगला नहीं लूँगा ले लिया(अब तो बंगला छोड़ दो भाई), फिर कहा बच्चो की कसम किसी पार्टी का समर्थन नहीं लूँगा, लेकिन ले लिया, फिर कहते है जमानत के लिए बोंड नहीं भरूँगा, बाद में भर दिया, अब कहते है गड्गरी के खिलाफ केश वापस नहीं लूँगा बाद मैं ले लेंगे, केजरी जी को खुद ही नहीं पता के उनको क्या करना है और क्या चाहिए, पहले ठीक से सोचले की राजनीति में क्या करने आयें है, फिर कदम आगे बढायें

के द्वारा:

के द्वारा:

इस बार का मुद्दा जो आपने रक्खा है समसामयिक है ..विचार अलग अलग हो सकते हैं …पर उम्मीद करता हूँ लोग अपनी स्वतंत्र राय जरूर रक्खेंगे …मैं पहले भी अरविंद केजरीवाल के समर्थन में लिखता रहा हूँ, परिस्थितियां बदली है, आम आदमी के समक्ष आत्म-चिंतन की आवश्यकता है और कुछ दिन तो अभी इंतज़ार करने ही होंगे …निष्ठावान स्वयं सेवक(कार्यकर्ता) तैयार करने होंगे. आलोचना सुनने को और उसका निराकरण करने को तैयार रहन होगा. आखिर उन्होंने बेल-बांड भरा ..नहीं पता कानूनी प्रक्रिया क्या है पर उनके पास मशहूर वकील प्रशांत भूषण हैं, क्यों अपनी छीछालेदर करवाने पर तुले हैं. नाम कमाने में बहुत साल लग जाते हैं गंवाने में पल भर भी नहीं लगता. भाजपा और कांग्रेस दोनों ने मिलकर उनका दिमाग ख़राब कर दिया और उसे मटियामेट करने पर तुले हैं. मीडिया भी रुख देखकर ही अपना निशाना बनाता है. मेरी राय में अरविन्द केजरीवाल एंड टीम को आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है और आंतरिक लोकतंत्र भी बहाल किये जाने की जरूरत है. सबकी बात सुनी जानी चाहिए और फैसला सर्वसम्मत्ति से ही होना चाहिए. हड़बड़ी में गड़बड़ी होने की पूरी संभावना रहती है. शांत मन से विचार करें बुद्धिजीवियों और कुछ राजनीतिज्ञों का भी साथ लें अपना संगठन मजबूत बनायें और कम बोलें….कुछ काम कर दिखाएँ उनके चार सांसद हैं वे आपने क्षेत्र की समस्या उठाने और सुलझाने की ईमानदार कोशिश तो करें… फिलहाल इतना ही आगे कभी पूरा ब्लॉग लिखूंगा और आपने पुराने ब्लॉग को भी सम्पादित कर लिंक करूंगा.

के द्वारा:

इस बार का मुद्दा जो आपने रक्खा है समसामयिक है ..विचार अलग अलग हो सकते हैं ...पर उम्मीद करता हूँ लोग अपनी स्वतंत्र राय जरूर रक्खेंगे ...मैं पहले भी अरविंद केजरीवाल के समर्थन में लिखता रहा हूँ, परिस्थितियां बदली है, आम आदमी के समक्ष आत्म-चिंतन की आवश्यकता है और कुछ दिन तो अभी इंतज़ार करने ही होंगे ...निष्ठावान स्वयं सेवक(कार्यकर्ता) तैयार करने होंगे. आलोचना सुनने को और उसका निराकरण करने को तैयार रहन होगा. आखिर उन्होंने बेल-बांड भरा ..नहीं पता कानूनी प्रक्रिया क्या है पर उनके पास मशहूर वकील प्रशांत भूषण हैं, क्यों अपनी छीछालेदर करवाने पर तुले हैं. नाम कमाने में बहुत साल लग जाते हैं गंवाने में पल भर भी नहीं लगता. भाजपा और कांग्रेस दोनों ने मिलकर उनका दिमाग ख़राब कर दिया और उसे मटियामेट करने पर तुले हैं. मीडिया भी रुख देखकर ही अपना निशाना बनाता है. मेरी राय में अरविन्द केजरीवाल एंड टीम को आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है और आंतरिक लोकतंत्र भी बहाल किये जाने की जरूरत है. सबकी बात सुनी जानी चाहिए और फैसला सर्वसम्मत्ति से ही होना चाहिए. हड़बड़ी में गड़बड़ी होने की पूरी संभावना रहती है. शांत मन से विचार करें बुद्धिजीवियों और कुछ राजनीतिज्ञों का भी साथ लें अपना संगठन मजबूत बनायें और कम बोलें....कुछ काम कर दिखाएँ उनके चार सांसद हैं वे आपने क्षेत्र की समस्या उठाने और सुलझाने की ईमानदार कोशिश तो करें... फिलहाल इतना ही आगे कभी पूरा ब्लॉग लिखूंगा और आपने पुराने ब्लॉग को भी सम्पादित कर लिंक करूंगा.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि बाबा रामदेव कि हनीमून वाले बयान से भाजपा को नुकसान होगा या नहीं प्रश्न यह होना चाहिये कि क्या इस तरह की अमर्यादित भाषा का उपयोग बाबाओं को शोभा देता है या नहीं? इस तरह के बयान को किस राजनीतिक दल से भी जोड़ कर नहीं देखना चाहिए. कहने कि आवश्यकता नहीं है कि लोकतंत्र में व्यक्ति विशेष को अपने विचारों को लोगों कि समक्ष रखने कि स्वंतन्त्रा है. परन्तु जिस प्रकार की बात रामदेव ने राहुल गांधी कि बारे में कर रहें हैं क्या वो कोई विचार है? रामदेव ने जिस प्रकार काले धन का मुद्दा उठाया था वो सराहनीय है, मगर उन्होंने ने गांधी परिवार पर जिस तरह का व्यक्तिगत हमला क्या है उससे प्रकट होता है कि वो असल मुद्दों कि काफी दूर चले गए हैं और सिर्फ भाजपा का चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

के द्वारा:

बाबा रामदेव का यह बयान - “राहुल गांधी दलितों के घर हनीमून या पिकनिक के लिए जाते हैं। यदि उन्होंने किसी दलित लड़की से शादी की होती तो उनकी किस्मत चमक सकती थी और वह प्रधानमंत्री बन जाते”: भाजपा के लिए हानिकारक हो सकता है ; या नहीं अथवा उपर्युक्त किसी भी विषय को सिद्ध करे या न करे परन्तु इतनी बात अवश्य सिद्ध हो रही है कि - उनकी सोच कैसी हो गयी है ? इतनी ओछी बात जुबान से कैसे बाहर निकाली ? मेरे विचार से आज उनकी छवि "योग गुरू" की मिटती जा रही है और नयी छवि उभर रही है जो सामाजिक दृष्टिकोण से अच्छी नहीं प्रतीत हो रही है . क्योंकि जो योगी होता है ; उसका हर बात में योग दिखता है; संयम दिखता है - जो उसे दिन-प्रति दिन सम्मान दिलाता रहता है . अत: उनको अपनी पुनः छवि सुधारने के लिए सच्चाई से योग साधना में जुटाना चाहिए . मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

बाबा रामदेवजी विश्वप्रसिद्ध भारतीय योग-गुरु हैं जिनके लिए जनकल्याण धर्म से बड़ा है। उनके सामाजिक सरोकारों की सीमा उन्हें वर्तमान के कई संन्यासियों से अलग पहचान देती है।बाबा रामदेव स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस,बाबा शाहेब अम्बेटकर को अपना आदर्श मानते हैं। समाज को जागरूक करने और कुरीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए बाबा रामदेव ने बहुत मेहनत की हैं। उन्होंने स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक किया है। योग को कंदराओं और आश्रमों से निकाल कर आम आदमी से जोड़ा है, इसका श्रेय उन्हें दिया ही जाना चाहिए। वह भी ऐसे मौके पर जब बहुराष्ट्रिये कंपनियों के बढ़ते शिकंजे के चलते महंगी हुई आधुनिक चिकित्सा गरीब लोगों से दूर होती जा रही है। ऐसे में बाबा ने मुफ़्त का योग देकर देश के करोड़ों लोगों का भला किया है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जो काम तमाम सरकारी कोशिशें नहीं कर सकतीं, उस स्वास्थ्य चेतना का काम बाबा ने कर दिखाया। बाबा रामदेव पिछले 25 वर्षो से लगातार निःस्वार्थ भाव से समाजसेवा कर रहे है उनके योग शिवरो मे 85% स्वास्थ,अध्यात्म,जीवन जीने कि कला आदि कि बाते होती है 10% भारत को बचाने के लिये रास्ट्रनीती कि बाते होती है 5% में देश के लोगो को देश कि सच्चाई बताते है ओर जागरूक करते है रामदेव जी पहले ऐसे सन्यासी है जिन्होंने दलितों का पाद्पूजन किया है और रामदेव जी ने पतंजलि योगपीठ में तो महर्षि बाल्मीक के नाम पर एक धर्मशाला बनाई जहाँ रोज़ हजारो लोग रुकते है और भोजन करते है ये व्यवस्था एक दम निःशुल्क है आज दलितों के नाम पर कांग्रेस ओर मीडिया बाबा को बदनाम कर रही है लेकिन शायद ये लोग नहि जानते कि बाबा ने जो देश कि सेवा कि है उसे ये देश कभी नहि भूलने वाला है देश कि आम जनता बाबा जी साथ है उनके इस बयान का बीजेपी के ऊपर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा बाबा जी से हम निवेदन करेगे कि जिस तरह आपने देश कि सभी समस्याओं को समाप्त करने का संकल्प लिया है उसी तरह इस भ्रस्ट मीडिया को भी सही करने कि जिम्मेदारी ले तब ही इस देश का भला होगा। आप भी लाभ लेना चाहते है बाबाजी के योग का तो आस्था चैनल सुबह 5 से 8 एक बार जरूर देखे। में तो रोज़ देखता हु और करता हु और स्वस्थ रहता हु

के द्वारा:

बाबा रामदेव ने अपने मिशन की शुरुआत जिस महान लक्ष्य ,औसत भारतीय हो स्वस्थ ले निरोगी काया और प्राचीन भारतीय उपचार पद्धति की सर्व स्वीकार्यता ,से भटक कर धन पिपासूवों और राजनितिक अखाड़ेबाज़ो के चंगुल में जा फंसे हैं। अब उनका अपनी ज़ुबान और शरीर सहित दिमाग पर भी नियंत्रण नहीं रहा। एक आदर्श पुरुष के रूप में ,एक नव प्रणेता के रूप में ,एक निःस्पृह, संभाव ,परोपकारी की जो दृष्टि और वाणी उनमे होनी चाहिए थी वह उन्होंने खो दी है। वें एक करप्ट सी डी की तरह सभी को अस्वीकार्य भाषा बोल रहे हैं। राष्ट्र निर्माण ,राष्ट्र कल्याण ,ईमानदार समाज ,मेहनतकश इन्शान बनाने और राष्ट्र को विश्वगुरु बनाने के लिए ऐसी भाषा की तो कतई जरुरत नहीं है। दुनिया को नैतिकता ,शिष्टाचार, सभ्यता और आदर्श का पाठ पढने वाले को दूसरे से कोई अपेक्षा रखने से पहले अपनी भाषा और आचरण सुधारना जरुरी है।

के द्वारा: aryaji aryaji

के द्वारा:

लोकसभा चुनाव - २०१४ के चुनावी अखाड़े में अपनी पतली हालत को देखकर नीतीश कुमार ने अपने छिपे हुए सारे पत्ते खोल दिए और जारी घोषणा पत्र में निजी क्षेत्रो में भी ५० प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कर के एकमुश्त सवर्णो का वोट पाकर सत्ता में पहुंचे नीतीश कुमार ने उनके भविष्य पर कुठाराघात किया है. एक तरफ सवर्णो को लुभाने के लिए बिहार में सवर्ण आयोग का गठन कर लोलीपोप थमा दिया दूसरी ओर अपने चुनावी घोषणा पत्र में ५० प्रतिशत रिजर्वेशन की घोषणा करके उनके लिए प्राइवेट सेक्टर का दरवाजा बंद करवाने का उपाय भी कर रहे है. क्या नीतीश जी बताने का कष्ट करेंगे की पढ़े लिखे सवर्ण युवा कहा जाएँ. और आपको क्यों वोट दें ?

के द्वारा:

बिहार के पहले चरण के चुनाव में jdu एवं नीतीश कुमार की हवा निकल गयी. अल्पसंख्यक वोटो का UPA के पक्ष में ध्रुवीकरण होने के बाद स्वाभाविक रूप से गैर यादव हिन्दुओ के वोटो का ध्रुवीकरण बीजेपी LJP गठबंधन के पक्ष में हो रहा है. इसका सबसे बड़ा नुक्सान नीतीश कुमार को ही होगा. इस बार के चुनाव में वे खाता खोल ले यही बहुत है. विकास के लाख दावे प्रतिदावे के बावजूद बिहार में नीतीश कुमार के गलत फैसले के कारण इस बार का चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर हो रहा है. क्योकि नीतीश जी जब तक बीजेपी के साथ थे बिहार का चुनाव विकास के मुद्दे पर हो रहा था. नीतीश जी, यदि सच्चाई का पता लगाना चाहते है तो उन्हें अभी भी अपने मुठ्ठी समर्थकों एवं चुटकी भर वोटरों से पूछना चाहिए कि मोदी के नाम पर उनका गठबंधन तोडना कितना सही कदम था ? बिहार कि चिकनी एवं मजबूत सड़को पर चल कर नीतीश जी को वोट न देने का मलाल NDA के सारे समर्थको को भी है, किन्तु बिना वोट में हारे नीतीश जी इस सच्चाई को मानने वाले भी तो नहीं है. आशा है नीतीश जी विधानसभा के चुनाव तक इस सच्चाई को समझ जाये कि आपका जनाधार लालू विरोध एवं विकासपरक मतों पर आधारत है न कि नरेंद्र मोदी के विरोध पर आधारित.

के द्वारा:

इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार में लालू जी के खिलाफ नीतीश कुमार के नेतृत्व में बीजेपी jdu का जो गठबंधन बना था उस से लोगो को काफी उम्मीद थी. किन्तु १६ जून २०१३ को नीतीश जी ने सिर्फ गठबंधन ही नहीं तोडा बल्कि उस सामाजिक विश्वास एवं उसपर आधारित जनादेश को भी तोड़ दिया, जो उन्हें लालू जी के खिलाफ प्राप्त हुआ था. यही कारण है कि उनकी किसी बात पर अब जनता विश्वास नहीं करने वाली. नीतीश जी बिहार के तीन चौथाई वोटरों ने आपको लालू जी के खिलाफ विकास करने के लिए सत्ता सौपी थी, किन्तु आपने सिर्फ अपने जिद के कारण नरेंद्र मोदी का विरोध करके सबसे बड़ा आपने बिहार के युवाओं का वो सपना तोड़ दिया जिसने आप में बिहार को आई सी यु से बाहर निकालने वाले मसीहा की छवि देखी थी. नीतीश जी बिहार को अभी उन सिद्धांतो की कोई जरुरत नहीं थी जिसकी दुहाई देकर आपने गठबंधन को तोड़ दिया और अपनी सरकार कमजोर कर ली. बिहार के लोगो ने आपके नेतृत्व में एक मजबूत सरकार का जनादेश दिया था जिसके साथ आपने विश्वासघात किया. अभी हमारे जैसे करोडो युवाओ को रोजगार की जरुरत है, जिसके लिए केंद्र में एक हिमायती सरकार की जरुरत है और इसके लिए यदि कोई मनगढंत सिद्धांत से परे हटने की जरुरत होती तो हट जाते. पर आपने इस सच्चाई का अंदाजा लगाये बिना सिर्फ प्रधानमंत्री बनने की चाह में पुरे बिहार को रजनीतिक अस्थिरता में झोक दिया. और बिहार की पब्लिक जानती है की कोई कमजोर सरकार जनहित में कोई फैसला नहीं ले पाती. जनादेश की गलत व्याख्या एवं हर हाल में अपने को सही ठहरने की आदत पर जनता आपको सबक सिखाएगी. क्योकि बिहार के अधिकांश लोगो ने सोचा था की बिहार में आपकी और केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बन जाये तो विशेष राज्य के दर्जे के लिए आपके कथनानुसार लड़ना भी नहीं पड़ेगा और जिस हक़ से केंद्र की संप्रग सरकार ने बिहार को वंचित रखा था उसे आप पूरा करते. किन्तु दुर्भाग्य बिहारियों का आपकी महत्वकांक्षा ज्यादा दिनों तक छिप नहीं पायी. और जितना आपने बिहार के लिए किया उस से ज्यादा वसूल लिया. पुरे बिहार को आपने १९९५ वाली स्थिति में ला के खड़ा कर दिया. न आप युवाओ के लिये कुछ कर पाएंगे न अल्पसंख्यको के लिए, न महिलाओ के लिए. विकसित बिहार के सपने को चूर-चूर करवाने ke लिए बिहार के करोडो युवाशक्ति आपको कभी माफ़ नहीं करेगी. आप रोड और हॉस्पिटल पर वोट मांगते है, पर बिहार के लोग ये भी जानते है की इसमें बीजेपी के मंत्रियो का भी योगदान है. आपकी सारी उपलब्धियां साझा है. अकेला कुछ नहीं.

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~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ कौन बनेगा काशी का सरताज – मोदी या केजरीवाल? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ १-क्या आम आदमी पार्टी को विश्वास हो चुका है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली में शीला दीक्षित की तरह वाराणसी में मोदी को पटकनी दे पाएंगे? मोदीजी और केजरीवालजी की आपस में कोई तुलना ही नहीं है.ये तुलना सिर्फ मिडिया कर रही है.केजरीवालजी काशी से खड़ा होके यदि अपनी जमानत बचा लें तो अपने को बहुत भाग्यशाली समझें.सभी पार्टियां यदि मिलकर केजरीवाल का समर्थन कर देती हैं तो यह मोदीजी के लिए और अच्छा है.काशी में घूमकर मैं देख रहा हूँ कि यहांपर घर घर में मोदीजी की चर्चा है.केजरीवालजी पर तो काशी के लोग लोग हंस रहे हैं और कह रहे है की अपना और अपनी पार्टी का लुटिया गंगाजी में डुबोना है तो केजरीवालजी काशी आ जाइये.केजरीवालजी मोदीजी से स्वयं बहुत भयभीत हैं,इसीलिए काशी से चुनाव लड़ने से बचना चाह रहे हैं.केजरीवाल का ये कहना की वो जनता से पूछकर चुनाव लड़ेंगे.ये भी मोदीजी के खिलाफ चुनाव लड़ने से बचने की एक नौटंकी भर है.काशी की जनता को क्या मतलब है,चाहे आप काशी से चुनाव लड़ो या मत लड़ो.आपलोगों की दिनोदिन खुल रही पोलपट्टी से अब काशी की जनता भी भलीभांति परिचित हो गई है.काशी से चुनाव लड़के केजरीवालजी को पता चल जायेगा कि वो कितने पानी में हैं.काशी की जनता उन्हें उनकी असलियत समझा देगी कि मोदीजी के सामने वास्तव में उनकी राजनितिक औकात क्या है.अगर अरविंदजी मोदीजी को शीला दीक्षित जी समझ रहे हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल है और वो दिन में ही मुंगेरीलाल के हसीन सपने देख रहे हैं.काशी में मोदीजी को मात देना असम्भव ही नहीं बल्कि आसमान से तारे तोड़ के लाने जैसा सपना है. २-खुद को धर्मनिरपेक्ष मानने वाली पार्टियां क्या मोदी के बढ़ते कदम को वाराणसी में ही रोक देंगी ? इस देश में धर्मनिरपेक्षता उपहास,अवसरवाद और स्वार्थसिद्धि का एक साधन बन चुकी है.आज जीतने भी खुद को धर्मनिरपेक्ष दल कह रहे हैं,उनमे से अधिकतर दल चुनाव के बाद धर्मनिरपेक्षता को भूलकर राजनितिक अवसरवाद का प्रतयक्ष तमाशा प्रस्तुत करेंगे.सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल यदि काशी में एकजुट हो जाये तो भी मोदीजी भारी मतों से चुनाव जीतेंगे.काशी ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता धर्मनिरपेक्षता के नाटक से उब चुकी है.इस बार वोट लोग जाती और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर देश की बेहतरी और विकास के लिए करेंगे. मुझे तो ये देखकर आश्चर्य हो रहा है कि सारे राजनितिक दलों के नेता सिर्फ मोदीजी के नाम की माला जप रहे हैं.सबके सब मोदीजी से भयभीत हैं.ये भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार हो रहा है कि मोदीजी नाम के एक नेता से सारे दलों के नेता थर थर कांप रहे हैं.सबको अभी से ही अपनी हार दिखाई दे रही है और सब नेता सुर्ख़ियों में आने के लिए मोदीजी को जी भर के कोसने के अलावा और कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं.इस मंच के बहुत से ब्लॉगर भी मोदीजी के नाम से भयभीत हो रहे हैं और मोदीजी को व्यर्थ में ही कोस रहे हैं.मुझे तो पूरा यकीन है कि मोदी जी के नेतृत्व में देश कि अगली सरकार बनेगी और देश का सही ढंग से विकास भी करेगी. ३-क्या भाजपा को भी डर है कि मोदी अगर वाराणसी से चुनाव नहीं जीते तो पार्टी को काफी नुकसान होगा ? काशी से मोदीजी के नहीं जीतने का सवाल ही पैदा नहीं होता है.होता है.इसीलिए यह सवाल ही औचित्यहीन है.आज तो "हर हर काशी और घर घर मोदी" का नारा काशी के घर घर में गूंज रहा है.काशी से मोदीजी की न सिर्फ जीत पक्की है बल्कि उनके विरोधी उम्मीदवारों की जमानत जब्त होना भी निश्चित है.काशी हमेशा से ही भाजपा की जीत का गढ़ रहा है.यहाँ से भाजपा का कोई भी उम्मीदवार खड़ा हो जाये वो जरुर जीतेगा.इस समय इस क्षेत्र के मेयर और तीन विधायक भाजपा के हैं.अब तो देश के इस समय के सबसे लोकप्रिय नेता मोदीजी चुनाव लड़ रहे हैं.इसीलिए भाजपा के लिए कोई चिंता की बात ही नहीं है.जोशीजी के खिलाफ स्थानीय लोगों की जो थोड़ी बहुत नाराजगी थी,वो मोदीजी के खड़े होने से दूर हो गई है.मोदीजी यदि गुजरात से लड़ रहे हैं तो इसमें आपत्ति क्या है ?बहुत से नेता हैं जो दो जगह से चुनाव लड़ रहे हैं. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ आलेख और प्रस्तुति=सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी,प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम,ग्राम-घमहापुर,पोस्ट-कंदवा,जिला-वाराणसी.पिन-२२११०६. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

के द्वारा: sadguruji sadguruji

मित्र; संलग्न लेख 2-3 दिन पहले परिष्कृत कर पोस्ट किया गया किन्तु फीचर नहीं हुआ... पूर्व में 2012 और 2013 के विधान सभा चुनावों के समय इसकी समसामयिक प्रस्तुति का नकारा जाना, वर्तमान आमंत्रित लेखों का भी केवल मोदी संदर्भित होना "जागरण परिवार" के पत्रकारिता धर्म पर प्रश्नचिन्ह नहीं है क्या ??? अगली टिप्पणी में लेख ....है... सम्पादक / लेखक गण के मूल्यांकन हेतु.... चुनाव-2014 के मतदाताओं से प्रश्न... ????? मित्रो; जैसा कि ‘स्वसासन्’ के नाम से स्पष्ट है "आप" और "स्वसासन" दोनों का उद्देश्यवास्तविक स्वतंत्रता की प्राप्ति ही है !वह भी बिना शस्त्र संधान किये बिना सड़कों पर इकट्ठे होकर नारे लगाए ! हालाँकि 'हम भारतीय' वास्तविक कम बनावटी अधिक हैं... ऐसा 2013 में विभिन्न राज्यों में हुए चुनावों के परिणामों से स्पष्ट हुआ ! अभी कुछ ही दिनों पहलेहममें से अधिकांश भारतीय (?) 'मैं भी अन्ना', 'मैं भी अरविंद', 'मैं भी आम आदमी' कहते नहीं थक रहे थे! यानी भारतीय जनमानस90% से भी अधिकबहुमत के साथ "भ्रष्टाचार" के विरुद्ध था! इनमें उन राज्यों के नागरिक भी थे जिनमें 2013 में आम चुनाव हुए थे ! देख लिया सबने किहम भारतीयों की कथनी और करनी में कितना बड़ा अंतर है ??? अभी तक का चुनावी इतिहास भी यही बताता है कि साढ़े चार - पौने पांच साल ‘नेताजी’ के नाम रोते रहने वाला मतदाताचुनाव आते ही अपने अपने बाहुबली / नेता आकाओं का अंधभक्त होउनकी जीत के लिएकमर कस तत्पर हो जाता है! भले चुनाव के पहले उसे कभीउस "बाहुबली / नेताजी " से कोई काम ना पड़ा हो भले उस नेता नेपिछले चुनाव के बाद औरइस चुनाव के सर पर आने से पहले या जीवन में कभी भी उसे कभी कोई महत्व ना दिया हो, भले उसकी स्थितिउन बाहुबली / नेताजी की नजरों में कुत्ते की सी हो मगर उसी मतदाता को उन बाहुबली/नेताजी के द्वारानाम लेकर पुकारने मात्र से या व्यक्तिगत रूप से फोन कर या घर आकरया मोहल्ले की सभा में “अब सब तुम्हारे ही हाथ में है" कह देने मात्र सेऐसी प्रसन्नता मिलती है जैसे कुत्ते की गर्दन परबहुत दिनों बाद मालिक के हाथ फेरने से कुत्ते को होती है ! (.....और कुत्ता निहाल हो मालिक के तलवे चाटने लगता है!) मुख्य राज नैतिक द्वारा दलों का वर्षों से यही दुस्साहस (मतदाता को कुत्ता समझने का) इस जागृत जनमानस वाले माहौल में भीजारी रहा ... हर बड़े राजनैतिक दल के प्रत्याशियों में बड़ी संख्या में गंभीर अपराधों के आरोपी सम्मिलित थे ! कई तो गैर जमानती अपराधों के आरोपी होने कारण जेल में रहकर ही चुनावी रण का संचालन कर रहे थे ! आप में से अधिकांश अन्ना-अरविंद करते हुए "राईट टू रिजेक्ट" और "राईट टू रिकाल"का समर्थन कर रहे थे ! किन्तु जब सामने अवसर था तोरिजेक्ट की जगह सिलेक्ट कर दिखया !!!!!!!!!!!!!! जी हाँ ! "राईट टू रिजेक्ट" शुरु से ही आपके पास रहा है...उनके विरुद्ध उपयोग करने के लिएजिनको जरा जरा से प्रलोभनों में पड़करपिछली बार भी चुनने की गलती आपने की थी! और "राईट टू रिकाल" उनके लिए जो अपनी ताकतऔर गुंडों की सेना के दम पर चुनाव जीतकर आज भीइस गुमान में हैं कि उस क्षेत्र में उन्हें कोई हरा ही नहीं सकता !जो क्षेत्र विशेष की सीट को अपनी जागीर समझे बैठे हैं ! 'राईट टू रिजेक्ट ' और 'राईट टू रिकाल' कानून बनने का ही इंतजार क्यों ??? अभी भी था / है आपके पास...उपयोग करते/ अब कीजिए! स्वयं ही परिवर्तन के सूत्रधार बनते/बनिये ! "राईट टूरिजेक्ट" कानून तब जरूरी होताजब सीमित राज नैतिक दलों को ही चुनाव लड़ने की पात्रता होती! क्या जरूरी है...कि किसी 'विशिष्ट' राज नैतिक दल केप्रत्याशी को ही वोट दिया जाए????? क्या कभी कहीं कोई ऐसा चुनाव क्षेत्र भी रहा है...जहाँ कोई भी "सभ्य / सुसंस्कृत " आप सा उम्मीदवार नव गठित दलों/ क्षेत्रीय दलों/निर्दलीयों में भी ना रहा हो ????? (निर्दलीय को भी विकास मद में उतनी हीसांसद / विधायक निधि मिलती है जितनी अन्य दलके टिकट पर जीतकर आये सदस्य को!)जीतने वाली पार्टी का भी आप केवल अनुमान ही लगासकते हैं !हो सकता है आपके दिए वोट से आपके पसंदीदा दल की सरकार बनी हो और यह भी हो सकता है कि वह दल विपक्ष में बैठा हो !!! फिर क्या जरूरत है... किसी पारंपरिक राजनैतिक दल के 'आपराधिक' प्रत्याशी को ही मन मारकर चुनने की ??? फिर भी चुनना है तो चुनो आगे भी चुनते रहो मगर फिर बड़ते अपराधोंऔर भ्रष्टाचार की दुहाई मत दो !!! क्योंकिभ्रष्टाचार, बलात्कार, हेराफेरी, घोटालेबाजी, लूट, हत्या, गुंडागर्दी, जैसेअपराधी छवि/ पृष्ठभूमि केप्रत्याशी को चुनकर / सत्ता सौंपकर आप स्वयं उन्हेंआपके अपनों के साथ ऐसे अपराध करने आमंत्रित कर रहे हैं!!!!! आप स्वयं भी तो अपराध ही कर रहे हैं ...ऐसे भ्रष्टों को आपके अपनों के साथभ्रष्टाचरण, बलात्कार, लूट, हेराफेरी जैसे अपराध करने का लायसेंस देकर !!! जागिये ! संभलिये !!! कुत्ते मत बनिए !!!!! सदा सोच समझकर वोट दीजिये !!!!!!! अपने मताधिकार कासोच समझकर ही ''सही प्रयोग"अवश्य कीजिये !!!!!!!!!! "सही मतदान आपका महत्वपूर्ण कर्तव्य है! और सर्वाधिक मूल्यवान अधिकार भी है!!!" धन्यवाद !!!!!!!!!!!!!!!!!!! जय हिंद ! जय भारत !!! वन्दे मातरम्!!!!! -Charchit Chittransh- (Global @ Search Engines)

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

श्री नरेंद्र मोदी जी के विरुद्ध यदि सभी दल मिलकर एक प्रत्याशी उतारने का फैसला करते हैं तो यह एक प्रकार से उनकी घबराहट ही कही जायेगी और नैतिक हार भी. श्री अरविन्द केजरीवाल जिस प्रकार की नकारात्मक राजनीति कर रहे हैं उसमे हो सकता है कि तात्कालिक रूप से कुछ व्यक्तिगत लाभ उन्हें हो रहा हो किन्तु देश की उम्मीद जगाकर उन्होंने जिस प्रकार अन्य दलों की तरह कथित साम्प्रदायिकता का राग अलापना आरम्भ कर दिया है उससे वह पूरी तरह बेनकाब हो गए हैं. दिल्ली की सरकार चलाने के स्थान पर आसान रास्ता चुनने वाले केजरीवाल यदि वाराणसी सीट सभी दलों के समर्थन से जीत भी लेते हैं तो भी यह यक्ष प्रश्न रह ही जायेगा कि सभी दलों को भ्रष्ट व नाकारा मानने वाले आप के नेता अचानक बी जे पी को दुश्मन नंबर वन क्यों मानने लगे हैं? जहां तक वाराणसी का सवाल है तो देखना सिर्फ यह है कि मोदी अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को कितने वोटों से हराते हैं?

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आमिर खान का यह कथ्य अनुचित है ..उन्हें राजनीति  जननीति एवं नीति का ज्ञान नहीं है ..... वास्तव में तो हम लोग  अर्थात जनता ही भ्रमित है एवं अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति का हित सरकार को समझती है और वोट करती है .... समाज के व्यापक हित का जन-साधारण को ध्यान नहीं है ..इसीलिये यह समस्या उठती है ... जनता को चाहिए कि किसी भी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत दे ताकि वह स्वतंत्र रूप से कार्य करे उसे किसी अन्य का समर्थन नहीं लेना हो...उसीका पूर्ण दायित्व व जबावदेही हो....यदि वह सरकार देश,समाज व जनता के व्यापक हित में सक्षम नहीं होती तो बदलकर पुनः अन्य पार्टी को पूर्ण बहुमत दे.... ---गठबंधन सरकारों से देश का भला नहीं होता अपितु मतलब परस्त लोग व वजूदहीन पार्टियां अपना स्वार्थ साधन करती हैं.....इसी से भ्रस्त तंत्र का निर्माण होता है ..

के द्वारा: drshyamgupta drshyamgupta

“गठबंधन की सरकार” – Jagran Junction Forum जैसा कि आमिर खान ने कहा कि भारत में कोई भी राजनैतिक पार्टियाँ पूर्ण बहुमत के योग्य नहीं है... और मुझे उनका यह तर्क बिलकुल उचित लगा क्योंकि कोई भी पार्टी आज वास्तविक मुद्दे और देश के विकास को लेकर चुनाव नहीं लड़ रही बल्कि अपने और अपनी पार्टी कि छवि को लेकर मैदान में उतर रही है सभी राजनैतिक पार्टियाँ एक दूसरों पर महज लांछन लगाने में लगे हैं अपनी गिरेहबान में झाँकने कि कोई कोशिश नहीं कर रहा है कि आखिर वो अपने शासन में क्या किये या क्या कर रहे हैं... देश और देश के युवा भविष्य को सभी पार्टियाँ बरगलाने में लगे हुए हैं, सबके अपने अपने अलग मुद्दे हैं अपनी ओर करने के लिए पर कोई देश के विकास और हो रहे विनाश को नहीं सोच रहा बल्कि एक-दूसरे पर इसका ठीकरा फोड़ रहे हैं... भाजपा शासित राज्य सरकार कांग्रेस अरु केंद्र सरकार पर और कांग्रेस शासित राज्य विपक्षियों पर दोषारोपण करने में मशगुल हैं... आज देश में बढ़ रही महंगाई और भ्रष्टाचार केवल केंद्र सरकार नहीं अपितु सारे राज्य के भी कारण बढ़ रहे हैं अगर केंद्र सरकार दाम बढ़ा रहा है तो चाहिए कि राज्य सरकार उनका समर्थन ना करे बल्कि अपने यहाँ उसकी दाम में कोई बढ़ोत्तरी ना कर उनका विरोध करें पर यहाँ तो उनके साथ वो भी दाम बढ़ा कर दिखावे के लिए मंहगाई का रोना रो रहे हैं... खैर महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे अगल हैं फिर भी यह इस चुनाव में ज्यादा महत्वपूर्ण बनते जा रहा है... आज भारत राजनैतिक दलों के लिए युद्ध का मैदान हो गया है जहाँ नेता अश्लीलता के साथ अपराध पर भी उतारू हो चुके हैं... इसलिए आमिर खान के इस कथन का मैं समर्थन करता हूँ... (राजनीति का स्ट्रक्चर खराब नहीं है। हम ही देश को चला रहे हैं तो स्ट्रक्चर बदलने से कुछ नहीं होगा। अभी कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जो बहुमत में आने पर अच्छा काम करे इसलिए मैं तो फ्रैक्चर्ड वर्डिक्ट (खंडित जनादेश) ही चाहूंगा – आमिर खान)

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“भारतीय मीडिया की आजादी” – Jagran Junction Forum जब से सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर आदि) विंग्स के रूप में सामने आया है यह चर्चा और भी बड़ी हो गई है! अभी कुछ दिनों पहले की बात है पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया की आजादी के लिए एक दायरा निर्धारित किए जाने की जरूरत बताई! इन सब में जहां मीडिया को अभिव्यक्ति की आजादी का नाजायज फायदा उठाने की बात दिखती है! जब मीडिया ने साथ दिया भले ही वह सोशल मीडिया ही क्यों न हो और सही खबर समाज तक पहुँचाई तो इस समाज ने सड़क पर उतर कर दामिनी बलात्कार के हत्यारों को भी सजा दिलवाई, कई बार यह सुनाने में आता है कि मीडिया को आज़ादी का दुरूपयोग हो सकता है या समाज में दंगा तक हो सकता है !जनता इतनी समझदार तो है ही कि सच और झूट में फर्क कर सके सोशल मीडिया का ही उदहारण लाइन तो इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है और पिछले कुछ सालों में सही समाचार सही समय पर पाकर जनता और अधिक जागरूक हुई है!पूरी तरह स्वतंत्र रखे जाने की वकालत करने वाले लोग इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए लोकतंत्र की भलाई तथा सही दिशा में इसे चलाने के लिए और आजादी दिए जाने की वकालत करते हैं! ओमप्रकाश प्रजापति 9910749424

के द्वारा:

मीडिया देश के चार पमुख स्तम्भों में से एक है इस स्तम्भ आज़ादी पर रोक लगाने का सीधा सीधा मलब इस स्तम्भ कमजोर करने जैसा है जिसका प्रत्यक्ष या परोक्ष असर देश कि राजनीती पर पड़ता है सर्कार और मीडिया के बीच भ्रम कि स्तिथि नहीं होने चाहिए सर्कार को मीडिया पर भरोसा होना चाहिए यदि उसका मन साफ़ है देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी देश के मीडिया कि छवि तभी बन सकती है जब कि वो आज़ाद हो इस पर मुझे एक वाकया याद आता है कि जब माननीय इंदिरा गांधी कि हत्या हुई थी तो अविश्वास कि स्तिथि में सबने बी बी सी लंदन लगाकर पक्का किया कि खबर सही है और अक्सर यही होता है जब भी कोई बड़ी घटना होती है तो असमंजस कि स्तिथि में विदेशी मीडिया पर भरोसा करना पड़ता है आज यदी हमारा मीडिया आज़ाद हो तो हमारे कर्मठ पत्रकार देश ही क्या विश्वा के किसी भी कोने की खबर सबसे पहले प्रस्तुत कर सकते हैं देश के अन्य मूल अधिकारों की ही भांति ही सही समाचार सही समय पर प्राप्त करना भी देश के नागरिक का मूल अधिकार होना चाहिए फिर उसे इस अधिकार से क्यूँ वंचित किया जाय आज जब देश भ्रष्टाचार से पीड़ित है तो समाज को मीडिया कि स्वंत्रता कि सख्त आवश्यकता है इतिहास गवाह है इस बात का जब जब मीडिया ने साथ दिया भले ही वह सोशल मीडिया ही क्यों न हो और सही खबर समाज तक पहुँचाई तो इस समाज ने सड़क पर उतर कर दामिनी बलात्कार के हत्यारों को भी सजा दिलवाई कई बार यह सुनाने में आता है कि मीडिया को आज़ादी का दुरूपयोग हो सकता है या समाज में दंगा तक हो सकता है तो मैं ये कहना चाहूंगा कि समाज में दंगे कभी भी राजनीनी के शाह के बिना सम्भव नहीं हुए हैं हर जगह दंगों में सत्ता या विपक्ष के राजनेताओं का हाथ होता है और यह स्तिथि तब तक बनी रहती है जब तक इन ख़बरों पर तथा मीडिया पर प्रतिबन्ध बना रहता है मीडिया पर बात आते ही हालात में सुधार शुरू होने लागत है मन कि मीडिया भी बिकाऊ हो सकता है मगर समाचार जनता तक तो पहुँचे बाकि जनता इतनी समझदार तो है ही कि सच और झूट में फर्क कर सके सोशल मीडिया का ही उदहारण लाइन तो इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है और पिछले कुछ सालों में सही समाचार सही समय पर पाकर जनता और अधिक जागरूक हुई है इस सोशल मीडिया में तमाम तरह कि ख़बरें आती हैं पर जनता उन ख़बरों में सही और गलत का भेद करने में सक्षम है तो क्यूँ न प्रिंट मीडिया को भी इस प्रकार की आज़ादी दी जाय जिससे जनता देश की प्रगति में और अधिक सहायक हो सके और विश्वा में भी भारतीय मीडिया अपनी एक अलग छवि के रूप में उभर कर आये

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

MAKING OF A BANANA REPUBLIC Alas! Poor Nido Tania is no more. A youngster, who came from Arunachal Pradesh to fulfill his dreams for a better tomorrow, killed brutally by racist hands. A nation failed to protect her son, a state failed to respond to his desperate cries and ultimately police also failed to reach on time to stop those murderous hands. This happened in Secular Socialist Republic of India. Is our nation true to her logo? The answer is already given by the death of Nido Tania. This case is a case of racism in a very ugly manner. All the state organs remained totally mute because they were also had race in mind. The killers belong to a big fanatic vote bank. All the state organs remained silent, fearing to loose that vote bank. It was some students from Jawahar Lal University and University of Delhi who raised this racial murder which awakened the nation. Otherwise poor Nido Tania’s death would have gone unnoticed. Then reached scion of Gandhi dynasty and ruling Congress Vice President Shri Rahul Gandhi, Chief Minister of Delhi reached after five days of murder, all sleeping Neros and Toms. This is India which counts votes even in coffins. No shame. Nobody can shame a shameless. Although here all claim India is a secular republic and there would be no discrimination on the basis of one’s race, caste, religion, region, region and gender. All lies. What a big farce? Total hypocrisy! There is discrimination at every step. Race is a reality in this nation in one way or the other. This division is the true spirit of the constitution, justice system, system and secular democracy. Back to the home of departed Nido Tania, Arunachal Pradesh and other six states, better known as seven sisters, are also notorious in their racist hate for Hindi speaking people from other part of the country. Hindi speaking people, Biharis, Marwaris, Punjabis etc., bear the burnt of racism in northern states. But all the states organs so far miserably failed to rise to defend them and so far there is no law against racism. North Eastern states are not alone in practicing racial discrimination. In Jammu & Kashmir Hindus and Hindi speaking people are treated very badly and they are repressed in all walks of life. In Kashmir valley all the Hindu population has been wiped out. Large number of Hindus and Pundits has been living in refugee camps in Jammu, Delhi, Chandigarh etc., and places for decades as refugees in their own country and still there is no concern for them. Article 370, which gives special status to the state, is mainly responsible for encouraging racial and divisive forces in the state. In Tamilnadu too, Brahmans face all type of discrimination, abuse and insult. Due to high percentage of caste reservation (69%), Brahmans hardly get any government job and denied admissions in government colleges and institutions. In UP, Bihar, also Brahmans and other high castes people face all type of discrimination due to caste politics. In India secularism has become minority communalism and social justice becomes caste-ism by quota castes. Now one can see caste and communal institutions in every street and corner established and financed by governments. Even now budget is allocated on caste and communal basis. Scholarships, grants, contracts, agencies, permits etc., are allotted on caste and communal considerations. Same is the reality about admissions, employments, promotions, elections, etc., where caste and religion are the most important merit. Now some states are identified with a particular religion or caste groups. Practically Kashmir is an Islamic state, the Punjab is a Sikh state and Mizoram and Nagaland are become Christian states. Similarly U.P., Bihar, and Tamilnadu are become predominantly OBC states. Jharkhand and Chhattisgarh are become ST states. In these states one religion or one caste groups are recognized as state religion or caste. On the same patter there are caste and communal political parties. Samajwadi Party, Bahujan Samajwadi Party, Janta Dal United, DMK, AIADMK, NCP, NC, PDP, Akali Dal, Muslim League, etc., etc., almost all the political parties’ nurture and support one or more religion or caste groups. But irony of this is all swear by secularism and equality. Caste and communalism are realities in this country. Now the situation is so grim that no body has the courage to speak against caste and communal racism. One can see schools, colleges, universities, hostels, commissions, constituencies, states, ministries, departments etc., which have been established to look into the caste and communal interests. Now these privileged caste and religious groups repress and harass non privileged groups. So some how, the death of Nido Tania has shattered the peace of the nation. But there is every possibility that people will soon forget this death as they have the tendency to forget every thing very quickly. UP alone has witnessed more than 100 communal riots but all have forgotten them. Jammu & Kashmir has seen the elimination of entire Hindu population. But all have forgotten it. Similarly nation has also forgotten the three decades of terror in Punjab. No body pays any attention to the racial violence in North Eastern states where intruders from Bangladesh are welcomed but our own countrymen are repressed. If nation wants to give true tribute to Nido Tania and wish to stop such type of racial deaths, first she must do away with all the caste and communal based laws and provisions. Similarly a tough anti racism law must be enacted to stop any type of caste, communal, race, region and language based discrimination. Otherwise only name will be changed and some other unfortunate Nido Tania will meet the departed Nido Tanis in heaven and racist hands will keep on playing their game of death.

के द्वारा:

MAKING OF A BANANA REPUBLIC Alas! Poor Nido Tania is no more. A youngster, who came from Arunachal Pradesh to fulfill his dreams for a better tomorrow, killed brutally by racist hands. A nation failed to protect her son, a state failed to respond to his desperate cries and ultimately police also failed to reach on time to stop those murderous hands. This happened in Secular Socialist Republic of India. Is our nation true to her logo? The answer is already given by the death of Nido Tania. This case is a case of racism in a very ugly manner. All the state organs remained totally mute because they were also had race in mind. The killers belong to a big fanatic vote bank. All the state organs remained silent, fearing to loose that vote bank. It was some students from Jawahar Lal University and University of Delhi who raised this racial murder which awakened the nation. Otherwise poor Nido Tania’s death would have gone unnoticed. Then reached scion of Gandhi dynasty and ruling Congress Vice President Shri Rahul Gandhi, Chief Minister of Delhi reached after five days of murder, all sleeping Neros and Toms. This is India which counts votes even in coffins. No shame. Nobody can shame a shameless. Although here all claim India is a secular republic and there would be no discrimination on the basis of one’s race, caste, religion, region, region and gender. All lies. What a big farce? Total hypocrisy! There is discrimination at every step. Race is a reality in this nation in one way or the other. This division is the true spirit of the constitution, justice system, system and secular democracy. Back to the home of departed Nido Tania, Arunachal Pradesh and other six states, better known as seven sisters, are also notorious in their racist hate for Hindi speaking people from other part of the country. Hindi speaking people, Biharis, Marwaris, Punjabis etc., bear the burnt of racism in northern states. But all the states organs so far miserably failed to rise to defend them and so far there is no law against racism. North Eastern states are not alone in practicing racial discrimination. In Jammu & Kashmir Hindus and Hindi speaking people are treated very badly and they are repressed in all walks of life. In Kashmir valley all the Hindu population has been wiped out. Large number of Hindus and Pundits has been living in refugee camps in Jammu, Delhi, Chandigarh etc., and places for decades as refugees in their own country and still there is no concern for them. Article 370, which gives special status to the state, is mainly responsible for encouraging racial and divisive forces in the state. In Tamilnadu too, Brahmans face all type of discrimination, abuse and insult. Due to high percentage of caste reservation (69%), Brahmans hardly get any government job and denied admissions in government colleges and institutions. In UP, Bihar, also Brahmans and other high castes people face all type of discrimination due to caste politics. In India secularism has become minority communalism and social justice becomes caste-ism by quota castes. Now one can see caste and communal institutions in every street and corner established and financed by governments. Even now budget is allocated on caste and communal basis. Scholarships, grants, contracts, agencies, permits etc., are allotted on caste and communal considerations. Same is the reality about admissions, employments, promotions, elections, etc., where caste and religion are the most important merit. Now some states are identified with a particular religion or caste groups. Practically Kashmir is an Islamic state, the Punjab is a Sikh state and Mizoram and Nagaland are become Christian states. Similarly U.P., Bihar, and Tamilnadu are become predominantly OBC states. Jharkhand and Chhattisgarh are become ST states. In these states one religion or one caste groups are recognized as state religion or caste. On the same patter there are caste and communal political parties. Samajwadi Party, Bahujan Samajwadi Party, Janta Dal United, DMK, AIADMK, NCP, NC, PDP, Akali Dal, Muslim League, etc., etc., almost all the political parties’ nurture and support one or more religion or caste groups. But irony of this is all swear by secularism and equality. Caste and communalism are realities in this country. Now the situation is so grim that no body has the courage to speak against caste and communal racism. One can see schools, colleges, universities, hostels, commissions, constituencies, states, ministries, departments etc., which have been established to look into the caste and communal interests. Now these privileged caste and religious groups repress and harass non privileged groups. So some how, the death of Nido Tania has shattered the peace of the nation. But there is every possibility that people will soon forget this death as they have the tendency to forget every thing very quickly. UP alone has witnessed more than 100 communal riots but all have forgotten them. Jammu & Kashmir has seen the elimination of entire Hindu population. But all have forgotten it. Similarly nation has also forgotten the three decades of terror in Punjab. No body pays any attention to the racial violence in North Eastern states where intruders from Bangladesh are welcomed but our own countrymen are repressed. If nation wants to give true tribute to Nido Tania and wish to stop such type of racial deaths, first she must do away with all the caste and communal based laws and provisions. Similarly a tough anti racism law must be enacted to stop any type of caste, communal, race, region and language based discrimination. Otherwise only name will be changed and some other unfortunate Nido Tania will meet the departed Nido Tanis in heaven and racist hands will keep on playing their game of death.

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परिवर्तन समय कि मांग है इसमें कोई दो राय नही हैं कि एक समय था जिसमे पिछड़ी जातियो का अत्यधिक शोषण होता था और सामान्य जाति वाले उनपर अत्याचार करने में संकोच नही करते थे वे उन्हें अपनी बराबर नही समझते थे या यू कहे कि वे तो उनके साथ ऐसा व्यवहार करते थे जैसे वे इंसान ही न हो ........... पर वो कारण था अशिक्षा का और आज का समय और दौर अलग है आज शिक्षित युवा वर्ग इन सब जाति बंधनो से परे विचारधारा वाले हैं. ये सही था कि पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए उसे आरक्षण बहुत जरुरी था और जिस उद्देश्य से उन्हें आरक्षण का प्राविधान किया गया था हम उसमे लगभग सफल रहे हैं और जो इसका मूल कारण था अशिक्षा उसीके कारण आज भी कई स्थानो पर उन्हें अपना अधिकार नही मिल प् रहा है . किन्तु जिस प्रकार अति हर चीज कि बुरी होती है वैसे ही आरक्षण भी समाज को भेदभाव में बाटने लगा है शायद अब समय आ गया है कि हमे इसमें भी परिवर्तन कि आवश्यकता होगी.......... लिखना तो बहुत कुछ है पर समय .............

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कोर्ट का फैसला – Jagran Junction Forum - मेरी राय़ में कोर्ट का फैसला बिल्कुल सही है।  महिलाएं बेशक पुरूषों के समान शारीरिक बल नहीं रखतीं परन्तु महिलाओं में  मानसिक शक्ति पुरूषों की तुलना में कई  गुना अधिक होती है।  चाहे घर में छोटे-छोटे काम हों या बाहरी दुनिया के बड़े-बड़े फैसले लेने हों महिलाएं हर जगह बड़े विवेक और बुद्धिमानी से काम लेती हैं।   इसलिए य़ह कहकर कि प्राकृतिक रूप से (स्वभावतः) महिलाएं पुरुषों की तुलना में भावुक होती हैं, महिलाएं विवाह पूर्व  प्रेम  और सेक्स संबंधों में अपनी भागीदारी को अपनी कमजोरी और पुरुषों द्वारा  शारीरिक शोषण का नाम नहीं दे सकतीं।  यदि महिलाएं बराबरी और अपना हर फैसला खुद लेने की चाह रखती है तो ऐसे में उनके द्वारा लिये गये फैसलों के  लिये वो किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकतीं हैं।

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“Jagran Junction Forum” जिस सरकार को अभी केवल एक माह ही बिता है उसे कोई इतनी जल्दी केसे भ्रस्ट बता सकता है . हम नहीं कहते कि कांग्रेश या भारतीय जनता पार्टी या अन्य कोई क्या कह रहा है . हम(केजरीवाल जीने ) आम आदमी के लिए ही अपने बच्चों कि कसम को तोड़कर आम आदमी का भला करने के लिए ही कांग्रेस के आगे नतमस्तक हो गए .क्यूँ कि अगर वो नहीं झुकते तो शायद दोबारा चुनाव कि मार आम जनता को ही अपने सर पर ही लेनी पड़ती जो केजरी जी कभी नहीं चाहते थे .आप ने कभी भी जड़ को मुद्दा नही बनाया .क्यूँ कि जड़ मैं लगी फफूंदी को समाप्त करने के लिए लोक सभा रूपी जमींन मैं प्रवेश करना पड़ेगा जिसमे अभी देर है . देखिये हांथी को देख कर कुते भोंकते हैं लेकिन हाँथ कभी बिचलित नहीं होता है और अपनी रह पर निकल जाता है सदस्य आम आदमी पार्टी M.NO-9000586442 बस केजरी जी अपनी राह से न भटक जाएँ

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Jagran Junction Forum मेरे मानने से अरविन्द केजरीवाल जी को अब फुक - फुक कर अपना कदम आगे बढ़ाना चाहिए | क्यों कि दोनों बड़ी पार्टियां इनके पीछे पड़ी हुई हैं, साथ ही दिल्ली कि जनता के साथ-साथ पुरे देश कि जनता को एक आशा कि किरण नजर आई है | हाँ यह हो सकता है कि वादों को पूरा करने में वो देर कर दें पर इसका मतलब ये नहीं कि वो पूरा नहीं कर सकते हैं| जनता के पास पहले दो के अलावा कोई विकल्प नहीं था पर अब एक विकल्प और आ गया है| शायद यही कारण है कि सभी पार्टिया अपने पार्टी में साफ-सुथरे आचरण का प्रत्यासी लोगो के सामने ला रही हैं| ये बदलाव अगर आया है तो सिर्फ (आप) पार्टी के कारण| हाँ अरविन्द केजरीवाल जी को समय के अनुसार अपना कदम उठाना चाहिए| MD FAIZ AHMAD PUNE.

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1. अरविंद केजरीवाल का अपने ही राज्य की पुलिस व्यवस्था के साथ संघर्ष कितना जायज है? प्रथम दृष्टया, लगता है कि अरविंद केजरीवाल का अपने ही राज्य की पुलिस व्यवस्था के साथ संघर्ष जायज नहीं है. किन्तु मामला इतना साधारण नहीं है. प्रथम तो, यह पुलिस के विरुद्ध नहीं है. यह राज्य की पुलिस व्यवस्था के विरुद्ध है. यदि एक मुख्य मंत्री अपने राज्य में अपराधों का मूक दर्शक बने रहने के लिए मजबूर हो क्यों कि पुलिस राज्य के नियंत्रण के बाहर है, और पुलिस जिसके नियंत्रण में है वह अपराध के विरुद्ध कार्यवाई करना नहीं चाहते, तो उस मुख्य मंत्री की स्थिति दयनीय हो जाती है. एक अच्छा मुख्य मंत्री कानून की दुहाई देकर चुप बैठने के बजाय कानून में आवश्यक बदलाव की मांग करेगा ही. 2. क्या अराजकता के बल पर समाज में बदलाव लाया जा सकता है? धरना देने को अराजकता कहना ही है, तो यह जानना जरूरी है कि इस अराजकता का जिम्मेवार कौन है. यदि शासन अपना काम नहीं करता और लोगों के साथ अन्याय होता रहता है, तो यह स्थिति अपने में खुद ही अराजकता है. अगर कोई व्यक्ति किसी अपराधी के विरुद्ध शिकायत करता है और इस कारण, अपराधी उस व्यक्ति खुले आम मरवा देता है और उस अपराधी को सजा नहीं होती और जनता जानती है कि उस अपराधी को सजा इसलिए नहीं दी गई कि वह सत्ता के नजदीक था,तो जनता का खून खौलेगा और उचित ही खौलेगा. यदि जनता सड़क पर आकर धरना दे तो, जबतक वह धरना हिंसक नहीं है, जनता का कोई दोष नहीं, सिर्फ सत्ता का दोष है. 3. क्या अरविंद केजरीवाल की इस ‘अराजक’ नीति का खामियाजा अन्य राज्यों को भी भुगतना पड़ सकता है? यह अराजकता नहीं है. जो अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं उसका अच्छा ही परिणाम आयेगा. जनता जागरूक होगी. वह चुप बैठने के बजाय सड़क पर उतरेगी. अपराधी डरेंगे. वे या तो बदलेंगे या सजा भोगेंगे. इसे खामियाजा क्यों कहते हैं? अन्याय के विरुद्ध तो महाभारत लड़ना पड़ा था! 4. मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए क्रांति की आवश्यकता है, तो ऐसे में ‘आप’ की नीतियों को किस हद तक गलत करार दिया जा सकता है? क्रांति की आवश्यकता है, यह अनिवार्य है. ‘आप’ की नीतियों को किसी भी हद तक गलत नहीं करार दिया जा सकता है. अपराधी बदलें, समय रहते बदलें. नहीं तो उन्हें भयानक खामियाजा भुगतना पड़ेगा. जनता को तो ख़ुशी ही मिलेगी. जनता अभी अपराधियों के कहर का खामियाजा भुगत रही है, अगर अपराधी न बदले और जनता सड़क पर न उतरी तो वह भुगतती रहेगी. जनता और भुगतते रहने के लिए तैयार नहीं है.

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“Jagran Junction Forum”  आप कि राजनीती देश के लिए काफी सेहतमंद साबित हो सकती परन्तु इस का पूरा पूरा लाभ केजरीवाल जी को उठाना चैये अन्यथा ये आप कि सबसे महंगी हर साबित हो सकती . जिस सर्कार के पास अपनी फ़ोर्स न हो वो क्या करेगा किसी कि रक्षा के लिए जब पुलिस को बुलाया जाता ह तो वो केंद्र कि आज्ञां का इंतजार करती हहै हाँ एक गलती कि है कि जिस आम जनता कि लड़ाई आप लड़ कर देहली के मुख्यमंत्री बने है उसको किशी भी प्रकार का कास्ट नहीं होने देना होगा आप कहीं भी कोई आम आदमी कि आम सुबिधा को खुद ही रोकेंगे तो आम को आप क्या बिस्वाश दे सकेंगे . आप को अपनी पी पी एस कि नै भर्ती करके देहली राज्य पुलिस फ़ोर्स का गठन कारण ही आम आदमी कि रक्षा होगी

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कितनी गहरी साजिश रची जा रही है इस देश को बंधक बनाने की...... क्या अमेरिका अरविंद केजरीवाल की जरूरत ठीक उसी तरह समझ रहा है, जैसी पाकिस्तान में उसे इमरान खान की थी?यह समझने के लिए अरविंद की पृष्ठभूमि को जानना होगा। कबीर, शिमिरित ली और फोर्ड के अलावा कुछ भारतीय उद्योगपति भी इस मुहिम में शामिल हैं। एक-एक कर तार जुड़ रहे हैं। भारत सहित पूरे एशिया में फोर्ड की सियासी सक्रियता को समझने की बात कही जा रही है। इसकी पहचान एक अमेरिकी संस्था की है। दक्षिण एशिया में फोर्ड की प्रमुख कविता एन. रामदास हैं। वह एडमिरल रामदास की सबसे बड़ी बेटी हैं। एडमिरल रामदास अरविंद केजरीवाल के गॉडफादर हैं। केजरीवाल के नामांकन के समय भी एडमिरल रामदास केजरीवाल के साथ थे। एडमिरल रामदास की पत्नी लीला रामदास ‘आप’ के विशाखा गाइडलाइन पर बनी कमेटी की प्रमुख बनाई गई हैं। रामदास को भी मैगसेसे पुरस्कार मिला है। यहां सवाल उठता है कि क्या एडमिरल रामदास और उनका परिवार फोर्ड के इशारे पर अरविंद केजरीवाल की मदद कर रहा है? एशिया की सियासत में फोर्ड की सक्रियता इस उदाहरण से भी समझी जा सकती है। फोर्ड फाउंडेशन के अधिकारी रहे गौहर रिजवी अब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के सलाहकार के तौर पर काम कर रहे हैं। कबीर, शिमिरित ली और फोर्ड के अलावा कुछ भारतीय उद्योगपति भी इस मुहिम में शामिल हैं। इंफोसिस के मुखिया और फोर्ड फाउंडेशन के सदस्य नारायण मूर्ति ने भी 2008-2009 में हर साल 25 लाख रुपए की आर्थिक मदद केजरीवाल की संस्था को दी थी। 2010 में जब शिमिरित कबीर से जुड़ीं तो नारायणमूर्ति ने मदद 25 लाख रुपए से बढाकर 37 लाख रुपए कर दी। यही नहीं, इंफोसिस के अधिकारी रहे बालाकृष्णन ‘आम आदमी पार्टी’ में शामिल हो गए। इनफोसिस से ही नंदन नीलेकणी भी जुड़े हैं। नीलेकणी ‘बायोमेट्रिक आधार’ परियोजना के अध्यक्ष भी हैं। आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार बनते ही ‘आधार’ को जरूरी बनाने के लिए केजरीवाल ने कदम बढ़ा दिया है। ‘आधार’ और उसके नंदन को कुछ इस तरह समझा जा सकता है। जानकारी के मुताबिक नवंबर 2013 में न्यूयार्क की कंपनी मोंगाडीबी नंदन नीलेकणी के ‘आधार’ से जुडती है। इस कंपनी को आधार के भारतीय नागरिकों का डाटाबेस तैयार करने का काम दिया गया है। मैंगाडीबी की पड़ताल से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। इस कंपनी में इन-क्यू-टेल नाम की एक संस्था का पैसा लगा है। इन-क्यू-टेल सीआईए का ही वित्तीय संगठन है। यहां अब नंदन नीलेकणी और दिल्ली चुनाव के बीच संबंध को देखने की भी जरूरत है। दिल्ली चुनाव के दौरान अमेरिका से भारत एक मिलयन फोन आए। कहा गया कि यह आम आदमी पार्टी के समर्थन में आए। लेकिन यहां कई सवाल उठते हैं। पहला सवाल, इसे भारत से जुड़े लोगों ने किए या फिर किसी अमेरिकी एजेंसी ने किए? दूसरा सवाल है दिल्ली के लोगों के इतने फोन नंबर अमेरिका में उपलब्ध कैसे हुए? यहीं नंदन नीलेकणी की भूमिका संदेह के घेरे में आती है। दरअसल नंदन नीलेकणी जिस ‘आधार’ के अध्यक्ष हैं, उसमें फोन नंबर जरूरी है। इतने ज्यादा फोन नंबर सिर्फ नंदन नीलेकणी के पास ही संभव हैं। यही कारण है कि केजरीवाल की सरकार बनने के बाद दिल्ली के लोगों से ‘आधार’ नंबर मांगे जा रहे हैं। जब अदालत ‘आधार’ को जरूरी न मानते हुए अपना फैसला सुना चुकी है तो केजरीवाल सरकार आधार नंबर क्यों मांग रही है। आखिर उसकी मजबूरी क्या है? इस मजबूरी को इंफोसिस प्रमुख और फोर्ड के रिश्ते से समझा जा सकता है।

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Jgran Junction Forum aap ki arajakta arving kejriwal ek behad satir aadmi hai. jo garibo ki nabj pakarna aur amiro ka manobhaw samajhata hai. wah sabdo ka jaal achchhi tarah bunta hai aur sadharan aadmi ko pata leta hai. dusri taraf wo janta ko gumrah bhi karta hai jaise ki bijli bil ka funda dekhiye , usne kaha ki bijli ka bill aadha kar denge , hua bhhi lekin 400 unit tak hi. matlab ye ekk rajnitik totka hi tha ye koi neeti nahi the bus garibo ko vote lene ka tarika tha. ab paani ke baat karte hai to 700 ltr pani mai samjht hu ki abhi 10% log hi uska faayda utha rahe honge , aur kahi 700 se 1 ltr bhi jyada hua to bill dugna dena parega, ye sav ek chalaki hi thi aur kuchh nahi , iske pichhi sirf vote ka funda tha imandari ka nahi.dusri taraf aap jante hai ki unke chhutbhaiye netao ka dansh kaise log jhel rahe hai. ek apne ko aam aadmi batata hai , kavita gata hai , baat banana janta hai 300 gariya lekar amethi me bhasan karta hai , ande ka mar khata hai. ek kanun mantri hai aur sareaam videshi larki ke ghar me ghus jata hai. ik apne lo aam aadmi kahat hi no 2 ki haisiyat rakhta hai , lal batti ka jal fekkar khud hi badi sarkari gari .li, mayour phase 2 me sandar bangla liye aur kahta tha ki hum lal batti nahi lenge, bangle nahi lenge, kejriwal khud kahta tha ki hame suraksha nahi chahiye matlab usko sabse jyada suraksha chahiye- warna ghat par z+ ki kya jarurat hai , ghar par se bhi suraksha hatwa kyo nahi deta hai, aapne dekha ki wo kaise kanoon ki dhajjiya ura diya. jab pahle se hi 144 lagu tha to wanha jakar dharna dene laga. galat savdo ka istemal kiya, gandantra ka majak ura diya puri duniya ke samne .

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नरेंद्र मोदी कौन सा कार्ड खेले जिससे एक मजबूत सरकार मिल सके |वह विकास की राजनीति करते है जहाँ वोट का ट्रेंड ही अजीब हो धर्म , जाति झूठे वादे ,प्रदेश वाद ,दलित, पिछड़ा कार्ड आदि बातो पर वोट दिए जाते है |सब जानते है मोदी भारत को सफल सरकार दे सकते परन्तु जेसे ही उनका नाम आता है मुस्लिम को भड्काना शुरू कर दिया जाता है |उनकी भावना से खेलना शुरू हो जाता २००२ में क्या हुआ था उसे इतिहास पर छोड दिया जाये देश का ध्यान किया जाये सलमान खान एक एक्टर है अपनी फ़िल्म का प्रमोशन करने गये उन्होंने अपनी फ़िल्म की सफलता को रख कर जो भी कहा हम उनके पीछे पड़ एक ऐसा परिवार जो सेक्युलर है| हमारा मनोरंजन करता है हम क्या है ?जरा सोचिये |

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Srimad Bhagavat speaks “O Mahäräja Parikshit, let me now describe the dynasty of Yadu, the eldest son of Mahäräja Yayäti. This description is supremely pious, and it vanquishes the reactions of sinful activities in human society. Simply by hearing this description, one is freed from all sinful reactions. The Supreme Personality of Godhead, Krishna, the Supersoul in the hearts of all living entities, descended in His original form as a human being in the Yadav dynasty or family of Yadu.( Srimad Bhagavatam 9.23.19-20)” The Supreme Personality of Godhead Shri Krishna chose to appear in this Yadav dynasty. Lord Krishna is Svayam Bhagavan and He is the source of everything. He is the source of Lord Maha Visnu, Garbodakshayi Visnu and Karnodakshayi Visnu. There is no one equal to Him or greater than Him. Thus the Yadav dynasty became so glorious that even hearing the description of this great dynasty frees one from all sins. So as a member of Yadav community, we all have got this great fortune and responsibility to carry on the legacy. The purpose of this website is to remind all Yadav’s of their great heritage and how we can act in such a responsible manner so that it’s beneficial for all of us as well as for the whole world. Jai Yadav! Jai Radha Madhav. Padmanabh Swami Temple, Kerala was constructed by Yadav Kings. Recently, the Government found Treasures inside temple worth several Lakhs crores, making the temple the richest temple in the whole world. Padmanabh Swami- The worshipable Lord of the Yadav's King's of Kerala Tirupati Balaji (Lord Venkatesh)- worshipable deity of the Yadav Kings. Tirupati Balaji temple was built by Yadav King's. There is an attempt by few Christian groups to convert the Yadavs to Christianity. They know that if they are successful in converting this single community then the whole INDIA will become Christian country. They have anyway set the target to make INDIA a Christian country by 2020 and they are very strategically working on it.

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विवाह पूर्व यौन सम्बंध पर कोर्ट का फैसला मै पूरी तरह इस फैसले से सहमत हूँ अपना भला बुरा एक बालिग लड़की को खुद सोचना चाहिए एक खास क्लास है उनकी बात जाने दीजिये ज्यादातर महिलाये धोखा खाती है |देखा गया है बड़े शहरो में लड़के बड़े सपने ले कर आते है पढ़ते है एक अकेले पन की उदासी भी होती है | यहाँ उनके महिलाओ से संबंध बन जाते है कई भावुक लड़किया उनका पूरा ध्यान रखती है नौकरी पेशा पैसा भी खर्च करती है यह सोच कर हमारा एक सुखद भविष्य होगा परन्तु जेसे ही कैरियर बना उनकी आँखे बदल जाती है माँ बाप के अनुसार वह शानदार शादी कर फुर्र हो जाते है विदेशो में इंडियन लड़के ज्यादातर यही करते रहे है |उसी शहर में बौस की लडकी से शादी कर अपना शान दार कैरियर बना लेते है |लड़की रोती रह जाती है | कभी कभी लड़की को लगता है उसने नासमझी में लड़के के साथ रिश्ते बना लिए अब वह अपने जीवन के बारे में नये सिरे से सोचना चाहती है परन्तु उसके पुराने संबंध उसका पीछा नही छोड़ते माँ बाप समझ नही पाते वह क्या करे कानूनी रूप से भी लड़की कुछ नही कर सकती डॉ शोभा भारद्वाज

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जिस कार्य को करने में आपका शरीर व अंतरात्मा एकदूसरे का सहर्ष साथ दें वह गलत नहीं होता है | मंगेतर से यौन सम्बन्ध बनाना बिलकुल गलत नहीं है और इसके इतर बनाना युवती के विवेक पर निर्भर है | आज के आधुनिक दौर में बमुश्किल पंद्रह प्रतिशत युवतियां ही ऐसी होंगी जिन्होंने विवाह पूर्व सम्बन्ध नहीं बनाया हो | 85 प्रतिशत युवतियों में सिर्फ ३० प्रतिशत ऐसी हैं जो सेक्स करने वाले युवक से ही विवाह करती हैं | महिलाओं के लिए सेक्स अब परम्पराओं व प्रथाओं के दायरे में नहीं रह गया है जिस स्त्री का जब मन करता है वह आनंद लेती है क्योंकि एक महिला/युवती के लिए इसकी उपलब्धता सहज व सुलभ होती है| विवाहित स्त्री अगर अपने पति से शारीरिक रूप से संतुष्ट नहीं है तो वह सम्बन्ध बनाने में तनिक संकोच नहीं करती है फिर वह पुरुष उसका पडोसी, माली, ड्राईवर, चौकीदार कोई भी हो सकता है | वर्जनाएं टूट चुकी हैं सार्थक बहस करें

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इस आधुनिक युग मे स्त्री पुरुष के सम्बंध को एक नया नाम दिया है।लिव इन रिलेशन्षिप ।स्त्री पुरुष एक साथ रह कर अपने मन मे उठी कामवासना की जवाला को दबा नहीं सकता। माता पिता या परिवार से दूर रह कर लड़किया अपने आपको स्वतंत्र महशुश करती है। और ये ही उनकी अंतर्वासना का परिणाम है की शादी से पहले सम्बंधो का। सम्बंध होना शरीर की इच्छाओ की परिपूर्णता है। लड़की जल्दी बहकावे और वादो मे आजाती है। सम्बंध के समय दिये गये वादे हवा की तरह होते है और समय मिलते ही फुर्र हो जाते। है। दोनो समझदार है। जब उन्होने समबन्ध बनाये उस समय सामाजिक रिश्तो की, पारिवारिक मूल्यों को एक तरफ ताक मे रख कर धज्जिया उड़ाते हुये अपनी काम वासना की त्रप्ति करते हुये जितने दिन तक निभाना होता है चलता रहता है। और जब बच्चा गर्भ मे आजाता है तब लड़की को होस आता है। वो लड़के द्वारा दिये गये वादो को विवाह करने पर जोर देती है। और अंतिम परिणाम आप जानते है क्या हो रहा है। वादे तो परिवार की उपस्थि मे फेरे लिये गये उस समय भी किये गये होते है। लेकिन जो वादे अंधेरे मे लिये गये उन को किसी को पता नहीं होता। लड़की को एक हथियार मिल गया है। मौज मस्ती करके लड़के के उपर ब्लात्कार का इल्जाम लगा दो क्यो की वो अपने वादे से मुकर रहा है। स्त्री पुरुष के लिये एक ऐसा काम रूपी जाल है जिसमे वह लड़की स्वयम् जाल बन कर भी अपने ही जाल मे फंस कर रह जाती है। ये एक बहुत बड़ी बहश है और इस आधुनिक समय मे स्त्री पुरुष के सम्बंधो पर कितनी ही बहश की जाये। लेकिन दोनो ऐसे सम्बंधो के परिणाम का प्रभाव लड़की को ही भुगतना पड़ता है। उसकी सुरक्षा जरूरी है। या तो लड़किया सवयम समजदार हो जाये और या फिर समाज मे अपना मुह दिखाने के लायक ना रहे। ऐसे जंजाल मे क्यो फंसती है। अदालत का फैसला सही है।ऐसे सम्बंधो को बलात्कार नहीं माना जा सकता . अनैतिक जरूर है। सामाजिक और परिवारिक मूल्यो की इन रिश्तो ने उखाड़ कर फेंक दिया है।

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                                                      उम्मीद.                                                   जनता ने तो वोट देकर ये साबित कर दिया कि मुख्यमंत्री के रूप में सब आप को ही पसंद करते है, , अब आपको यह साबित करना है , कि आप बाकए जनता के शुभचिंतक है | और सभी को आपसे बहुत उम्मीदें लगी हुयी है, दूर् दराज के गांव में अभि भी जसके तस हाल है, देश तो आज़ाद हो गया लेकिन अभी भी गांव में छुआछूत और ऊंच-नीच कि कुरीतिया व्याप्त है, जो समाज और देश के विकास और देश कि एकता व अखंडता में बाधक है | गांव में अभि भी दरिद्र , गरीब , कमजोर वगों को दाऊ-दादागिरी और दवन्गी का शिकार होना पड़ता है . गांब में रहने के लिए उनको चूहे कि तरह दब कर यातना और गुलामी सहना पड़ती है | वह् सिर उठाकर नहि चल सक्ते | गांव में राशन कि दुकान महिने में तीन या चार बार खुलती है | उसमें में भी किसी को चावल नही , तो किसी को शक्कर नही और तो और उन 3-4 दिनों में जो भी राशन ले लिया तो ले लिया नही तो वह् भी गया .लोग आपत्ति भी नही उठाते क्यों कि परिबार बच्चों को पालना यदि कोइ बिबाद बन गाया तो गरीब कि कौन सुनता पुलिस बाले भी तो पैसे बालो को ही सलाम करते है | आपने जैसा कि कहा, कि अब आपको जन जन को खुश हाल बनाना है | दीन दुखी जनता के आंशू पोछना है, और प्रदेश में कोइ भूखा ना रहे इसके लिए आपने उचित मूल्य कि दुकान का राशन तो सस्ता करने का उपाय तो दिया पर इसके साथ साथ ये सब बिसंगतिया पता लगाकर, खोजकर और हटाकर आपको इनको समाज में इज़्ज़त व समानता से जीने का हक भी दिलाना होगा | तभी सही मायनों में खुशहाल और शांतिमय प्रदेश कि कल्पना साकार हो सकेगी | और इससे ही समाज और प्रदेश में एकजुटता का माहौल कायम होगा |

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                                                      उम्मीद जनता ने तो वोट देकर ये साबित कर दिया कि मुख्यमंत्री के रूप में सब आप को ही पसंद करते है, , अब आपको यह साबित करना है , कि आप बाकए जनता के शुभचिंतक है | और सभी को आपसे बहुत उम्मीदें लगी हुयी है, दूर् दराज के गांव में अभि भी जसके तस हाल है, देश तो आज़ाद हो गया लेकिन अभी भी गांव में छुआछूत और ऊंच-नीच कि कुरीतिया व्याप्त है, जो समाज और देश के विकास और देश कि एकता व अखंडता में बाधक है | गांव में अभि भी दरिद्र , गरीब , कमजोर वगों को दाऊ-दादागिरी और दवन्गी का शिकार होना पड़ता है . गांब में रहने के लिए उनको चूहे कि तरह दब कर यातना और गुलामी सहना पड़ती है | वह् सिर उठाकर नहि चल सक्ते | गांव में राशन कि दुकान महिने में तीन या चार बार खुलती है | उसमें में भी किसी को चावल नही , तो किसी को शक्कर नही और तो और उन 3-4 दिनों में जो भी राशन ले लिया तो ले लिया नही तो वह् भी गया .लोग आपत्ति भी नही उठाते क्यों कि परिबार बच्चों को पालना यदि कोइ बिबाद बन गाया तो गरीब कि कौन सुनता पुलिस बाले भी तो पैसे बालो को ही सलाम करते है | आपने जैसा कि कहा, कि अब आपको जन जन को खुश हाल बनाना है | दीन दुखी जनता के आंशू पोछना है, और प्रदेश में कोइ भूखा ना रहे इसके लिए आपने उचित मूल्य कि दुकान का राशन तो सस्ता करने का उपाय तो दिया पर इसके साथ साथ ये सब बिसंगतिया पता लगाकर, खोजकर और हटाकर आपको इनको समाज में इज़्ज़त व समानता से जीने का हक भी दिलाना होगा | तभी सही मायनों में खुशहाल और शांतिमय प्रदेश कि कल्पना साकार हो सकेगी | और इससे ही समाज और प्रदेश में एकजुटता का माहौल कायम होगा |

के द्वारा:

बहुत हद तक आप के विचारों से सहमत हूँ, पर समय को पीछे नहीं किया जा सकता. मोबाइल इनरनेट से बच्चों को दूर रखने के बजाय उनपर निगरानी की आवश्यकता है, मीडिया को भी भोंड़े, अश्लील सामग्री प्रस्तुत करने से बचाना चाहिए साथ ही, सजा का प्रावधान तुरंत होना चाहिए.... एक साल बाद भी त्वरित अदालत सिर्फ सजा सुनकर रह जाती है ...आगे अपील की गुंजाईश और सजा में देरी से सुधार कैसे होगा? न्यायपालिका अभी भी सुस्त रफ़्तार से चल रही है, पुलिश कर्मियों की भी लीपापोती कभी कभी अपराध को बढ़ने में मदद ही करती है. परिवर्तन आया है और अब बड़े लोग भी इसके चंगुल में आने लगे हैं, महिलाएं, पीड़िताएं अवश्य आगे बढ़कर अपनी रिपोर्ट दर्ज कराने लगी है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सिर्फ महिला शोषण मैं ही नहीं पुलिस और कानून का रवैया तो हर मामले मैं लचर है. हमारे देश की कानून व्यवस्था मैं इतने छेद हैं कि छोटे मोटे अपराधी तो दूर की बात बड़े बड़े सूरमा शातिर भी बच निकलते हैं और उदाहरण पेश करते हैं कि खूब बदमाशियां करो कोई नहीं पकड़ेगा. और अगर पकड़ लिया तो लचर और पंक्चर व्यवस्था मैं बच निकलोगे. एक शब्द मैं कहें तो अंधेर नगरी चौपट राजा. दिल्ली गैंग रेप के बाद मीडिया, समाज जरूर जागरूक हुआ है. इस तरह के मामले तो पहले भी बहुत थे लेकिन मीडिया की जागरूकता ने इन मामलों को समाज के सामने ला खड़ा किया है और इसी कारण से यौन अपराध बढे नहीं बल्कि अब जनता के सामने आ रहे हैं. मीडिया की क्रांति से महिलाये निडर हुई हैं और समाज के सामने अपने ऊपर हुए शोषण को बयां करने की हिम्मत जुटा रहीं हैं.मीडिया अपना काम बखूबी कर रही है बस प्रशाशन और क़ानून व्यवस्था के जागने का इंतज़ार है. महिलाओं के प्रति नजरिया कोई एक दिन मैं नहीं बदल सकता. हमारे समय मैं मोबाइल, इंटरनेट, टेलीविज़न पर नकारात्मकता हावी नहीं थी. वीर लक्ष्मी बाई और अहिल्या बाई के किस्से सुना करते थे आज जलेबी बाई के चर्चे हैं पहले अहिल्या बाई के गीत गाये जाते थे आज ये संचार माध्यम हसीनाओं के पोस्टर फेविकोल से चिपका रहे हैं. छोटे छोटे बच्चे मोबाइल पर इंटरनेट लगाकर अश्लीलता का रसपान कर रहे हैं. तो नारी एक वास्तु बन गयी है. ज़रुरत हैं इन संचार माध्यमों के सदुपयोग की. नारी की जननी वाली इमेज वापस लानी होगी समाज मैं धीरे धीरे अश्लीलता जो घुस रही है उसे रोकना पड़ेगा. बच्चो को मोबाइल की जगह अच्छा साहित्य देना होगा. क्यूंकि नारी के अस्तित्व पर खतरा है और चूँकि नारी ही समाज का निर्माण करती है पूरा समाज बर्बादी के चौखट पर खड़ा है. संक्षेप मैं - कानून व्यवस्था को सुचारु करना चाहिए, बच्चो को अश्लीलता देखने से रोकना चाहिए और उन्हें नारी का सम्मान सिखाना चाहिए बाकी मीडिया तो समाज का आइना है वो अपना काम कर ही रहा है.

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केजरीवाल की बाल हठ ............... चूहे को हल्दी की गाँठ मिलने से पंसारी बनने जैसा हो गया आम आदमी पार्टी का हिसाब ,......... बच्चो जैसी जिद्द करते हुए कहते है कि ना खेलेंगे ना खेलने देंगे पिच को करेंगे खराब ! ………………………………….. पहले अन्ना को धोखा दिया अब जनता को धोखा दे रहे है क्योंकि ये है दगाबाज ,......... कॉंग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने से खुल सकता है गुप्त समझोते का राज ! ………………………………….. दरअसल मोदी से घबराकर भाजपा के वोट काटने के लिए कॉंग्रेस ने चली थी ये चाल ,......... कांग्रेस की खिलापत करके भाजपा के बढ़े हुए वोट बैंक मे सेंध लगाएगा केजरीवाल ! ………………………………….. कांग्रेस की चाल उल्टी पड़ गयी क्योंकि केजरीवाल को मिले ज़रूरत से ज़्यादा वोट ,......... केजरीवाल वायदे के अनुसार सरकार चला नही सकते इसीलिए निकाल रहे है सबमे खोट ! ………………………………….. ये तो ऐसे बल्लेबाज है जो खेलने से पहले चाहते है करना मैच का परिणाम निर्धारित ,......... ऐसे प्रेमी है जो रंगरलिया तो मना सकते है लेकिन शादी करने से होते है भयभीत ! ………………………………….. अब तो कॉंग्रेस भी नही चाहती कि लोकसभा चुनाव से पहले सरकार बनाए इनके मित्र ,......... लंबे छोड़े वायदे पूरे नही कर पाएँगे जनता को पता चल जाएगा इनका असली चरित्र ! ………………………………….. केजरी बाबू, दिल्ली से अतिउत्साहित होकर आपने कर दी मोदी को ललकारने की भूल ,......... इसके बारे मे तो यही कहेंगे कि गीदड़ शहर की तरफ तब भागता है जब समय हो प्रतिकूल ! ………………………………….. अवधेश राणा

के द्वारा: avdhesh avdhesh

आप पार्टी का उदय ही कांग्रेस पार्टी कि खुली लूट व देश कि जनता को बेवकूफ समझने व बी जे पी का भी सत्ता भोगने व जनता को केवल अपने वाक् चातुर्य से बेवकूफ बनाने के कारण जनता में उठे आक्रोश का परिणाम था .अभी या पहले जनता में या दूरदर्शन में हो रही बहस में कहीं भी कांग्रेस या बी जे पी अलग नहीं दिखाई पड़ती .कहाँ है वो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जो कि अपने आदर्शों के लिए जाना जाता है व आम आदमी में यह भरोसा है कि बी जे पी को सही रास्ते पर ले जाने में वो अपनी भूमिका निभाएगा .आज देश में इतने गम्भीर विषयों पर बहस चल रही है वो चाहे चंदे में पारदर्शिता कि हो या सार्वजनिक जीवन में सुचिता कि हो लगता है कि बी जे पी का रिमोट कंट्रोल भी देश कि प्रदूषित हवा में रंग गया है वर्ना देश कि इतनी गम्भीर चिंता में स्वयं को अलग क्यों रख रहा है .कहाँ तो वो समय समय पर अपने पत्र के माध्यम से देश को अपनी राय से अवगत करता रहता था .क्या उसको भी राहुल गांधी कि हवा लग गई है . अब जहाँ तक मोदी के करिश्मे कि बात है वो तो अभी तक कांग्रेस के खिलाफ ही सफल हुए हैं क्योंकि कांग्रेस भर्ष्टाचार में इतनी डूबी हुई है कि उसके खिलाफ सफल होना आसान है लेकिन जब सामना होगा आप से ,तीखे व नैतिक प्रश्नो को झेलना आसान नहीं होगा तब देखना होगा क्या उस समय भी कांग्रेस व बी जे पी एक दुसरे का साथ देती हैं .यदि ऐसा होता है तो यह इस देश के इतिहास का नया पन्ना होगा .लेकिन मोदी का करिश्मा तो केवल कांगेस के खिलाफ है केजरीवाल के खिलाफ उनका करिश्मा तो आजकल कि टी वी बहस को देख कर लगाया जा सकता है कि वो कितने हलके साबित हो रहे है .

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BLOGG/JOURNAL- IN INDIA, HINDU RELIGION INDIVIDUAL CASTES ,O.B.C WEAKER SECTIONS ,S.C/S.T DEVELOPMENT ,BUSSINESS , INDUSTRY,TENDER VERY -VERY BIG ROLE OF POVERTY SOLUTION JOIN SUFFICIENT NUMBER LAWYER AND MBBS / MD / MS DEGREE / PROFFESION ........ ... ALSO READ MY BLOG-http :/ / mantusatyam.blogspot.com/2013/08 / ....... BELOW THE BLOGG/JOURNAL WANT TO PUBLISH ........... BLOG DETAIL-concerned, political, economical and social in reference INDIA, HINDU RELIGION caste system social structure, caste power (DABANG), business (INDUSTRY) and development. My content in INDIA like HINDU RELIGION complicated caste system, caste power (DABANG), development or advancement or business (INDUSTRY) in social structure. In INDIA HINDU RELIGION any caste / INDIVIDUAL CASTES sufficient NUMBER of LLB / LLM and MBBS / MD / MS degree or profession very big and very-very IMPORTANT role of advancement or development, power (DABANG) and business are in social structure.In reference of other profession officers and politicians very - very small role or huge difference COMPARISON than LAW and MBBS / MD / MS HINDU RELIGION complicated caste structure of caste development, POWER and business. If individual castes have sufficient number of 10% lawyer MBBS / MD / MS the casts benefit of 10% of sufficient number. SUFFICIENT NUMBER LAWYER WITH MBBS / MD / MS OF HINDU RELIGION OF INDIVIDUAL CASTES FACE / SOLVE ALL ARISE POLITICAL PROBLEM OF DEVELOPMENT. . Its important in other word say it, IN INDIA, HINDU RELIGION GENERAL CASTE (BRHAMAN, BHUMIHAR, RAJPUT, KAYASTH, KSHYATRIYA) or any other caste to now time do huge scale of business, govt tender, land owner etc. Have not possible of without sufficient no. of LAWYER and MBBS / MD / MS degree of individual general castes, HINDU RELIGION, INDIA for the maintain of caste power, advancement / development like huge scale of business, land owner and govt tender. Without sufficient no.of LAWYER and MBBS / MD / MS degree HINDU RELIGION, general caste / and other huge scale of business, INDIA (due to same of complicated HINDU RELIGION, CASTE social structure in INDIA) have many factors / issue arises of huge scale business, huge scale LAND OWNER, GOVT. TENDER etcIts have to said very-very big problem or have not possible. Also it have to say in deep of collaboration of one caste to other caste, HINDU RELIGION, INDIA have sufficient NUMBER of LAWYER and MBBS / MD / MS In some cases it have to seen. Increase of business but it have not increase of own caste power without sufficient no. of LLB / LLM and MBBS / MD / MS degree In under of the self / own HINDU religion (minority CASTES), INDIA of complicated caste structure face very-very basic problem of life concerned of other then development without sufficient NUMBER of lawyer and MBBS / MD / MS DEGREE. Its have not any advantage of more people and its benefit of other profession like politicians and officers. Very-very small chances to join of politicians and officers (few number) two or three) rather then more peoples caste thousands to thousands. It also have to be seen census of India of HINDU RELIGION CASTE development in social structure with time. It have to be seen in INDIA HINDU RELIGION scenario LOW POPULATION caste have to huge benefit in some year join the sufficient NUMBER of lawyer and MBBS / MD / MS degree more development like power business complicated caste social structure rather then SC / ST join the profession politicians and officers in long to long time / year in same conditions.Also they caste have sufficient number lawyer acquire good manage of land owner in caste participate already in past time land have not exist but acquire rather then SC and ST. It have to understand on the concept of constitution of INDIA in political power increase (In political power hidden of economic power) of backward caste in HINDU RELIGION reservation of politicians and officers. In the point of the view NORTH INDIA YADAV caste have sufficient NUMBER of LLB / LLM. Also KURMI caste in BIHAR / JHARKHAND have not sufficient NUMBER but good number of lawyers. Also have some number of M.B.B.S / MD /M.S NOTE-In the point of view LLB / LLM and MBBS / MD / MS not meaning of only court and medicine practice (ONLY) but also have self business by person occupied the degree more to more effective / efficient due to key point / key master of caste power, business, land owner, govt. tender.But which caste have sufficient NUMBER of lawyer and MBBS / MD / MS, by which caste persons LAWYER and MBBS / MD / MS degree or professionals occupied have not done self / own business in the point of diplomatic view of hidden of power of doing business (INDUSTRY) NOTE-In the point of view B.TECH / M.TECH and MBA have not any role of caste POWER, development and business in HINDU religion, INDIA.But only like a simple job also in simple job arises many complicated issue like Industry demand, complicated issue from powerful castes etcBut it have not problem of HINDU RELIGION more population caste in INDIA .......

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ताज़गी लेकर आई नयी सुबह ताज़गी लेकर आए चुनाव परिणाम , देश के भविष्य की उम्मीद जागी लगता है अब अब बदलेगा हिन्दुस्तान ! …………………………………. राजस्थान दिल्ली मे हराकर लोगो ने बंद की कांग्रेसी बड़बोलो की ज़ुबान ! छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश ने भाजपा को जिताकर बढ़ाया मोदी का मान , …………………………………. इन चुनाव प्रिणामो को देखकर लगता है देश के लोगो ने लिया है ठान , मोदी को ही देश प्रधानमंत्री बनाना है मिटाके कॉंग्रेस का नामो निशान ! …………………………………. लगने लगा है भ्रष्टाचार ख़तम होगा जेल जाएँगे लुटूरे और बेईमान , धर्मनिरपेक्षता का ढोंग नही होगा क़ानून होगा सब धर्मो के लिए समान ! …………………………………. अब कोई भूखा नही रहेगा सबको मिलेगी शिक्षा सबको मिलेगा ज्ञान , कोई भी सड़को पे नही सोएगा सबको मिलेगा रहने को मकान ! …………………………………. देश की सीमा सुरक्षित होंगी नही होगा सैनिको के सर कटने का अपमान , कश्मीर को छोड़िए लाहौर को भारत से छुड़ाने के लिए छटपटाएगा पाकिस्तान ! …………………………………. देश मे अपनी तकनीक विकसित होगी देशी उद्योग धंधो का होगा उत्थान , चारो तरफ विकास होगा भारत को फिर से सोने की चिड़िया कहेगा जहान ! …………………………………. दोस्तो ना तो राणा जी खुशी मे भावुक है ना ही है ये कवि की कल्पना की उड़ान , इसके लिए ही तो अंग्रेज़ो से आज़ादी पाई थी और अब मोदी से भी है यही अरमान ! …………………………………. अवधेश राणा

के द्वारा: avdhesh avdhesh

माना केजरीवाल ने दिल्ली के शीला दीक्षित के १५ साल के तख़्त को हिला दिया है लेकिन उसका मुकाबला भाजपा से रहा नहीं रहा ! केजरीवाल को मोदी के समकक्ष खड़ा करना, अभी सूरज को दीपक दिखाना है ! केजरीवाल एक उभरते हुए दिल्ली की आशाओं की किरण हैं जब कि मोदी एक सक्षम अंतर्राष्ट्रीय पहिचान हैं ! हाँ उन्हें एक बार पांच साल के लिए दिल्ली का मुख्य मंत्री बनने का अवसर मिल जाए तो आने वाले दिनों में वह भाजपा के लिए सर दर्द बन सकते हैं ! भाजपा को चाहिए कि अब उसे अपनी पार्टी से भेद की खाल ओढ़े तमाम भेड़ियों को दुष्कर्मियों को भ्रष्टाचारियों, जमाखोरों को बाहर का रास्ता दिखा दें नहीं तो आप उन्हें सता से च्युत कर देगी ! फिलहाल आप को ज़माने में केंद्र तक पहुँचाने में काफी पापड बेलने पड़ेंगे !

के द्वारा: harirawat harirawat

ये जो भी चाहता हो जैसे भी पसंद हो मगर ये बिलकुल ही समाज और देश और धर्म सबके लिए गलत होगा इस से समाज और पवित्र रिश्तों पर बहुत ही असर पड़ेगा देश के संसद या उच्तम न्यायलय को चाहिए के सबको कानून और ऐश कि सभ्यता का सही से पालन हो अगर प्रसाशन और न्यायलय सभी अपनी ज़िम्मेदारी को ईमानदारी से निभाने लगें तो इसकी आवश्यकता खुद ही ख़त्म हो जायेगी और लोग खुद ही इस लिव इन सम्बन्ध से खुद ही नफरत करना शुरू कर देंगे क्युंके जो मज़ा दो पाक रिश्तों कि पाबन्दी में है वो इस आज़ादी में नहीं इस लिए हमारे देश कि यही खासियत है के हमारा देश सब रिश्तों को बहुत ही बखूबी अंजाम देता है और सभी को सम्मान देता है इस लिए इस परम्परा और देश कि गुणवक्ता को ख़तम करने कि कोशिश नहीं कि जाए .

के द्वारा: Imam Hussain Quadri Imam Hussain Quadri

लिव -इन सम्बन्ध आज समाज की आवशकता बन गया है। इसका मुख्य कारण भारतीय न्याय व्यवस्था और भारतीय महिला संरक्षण कानून हैं। कोई भी व्यति जो वयस्क है, उसका सपना होता है की वो विवाह करे और अपना परिवार बनाये, बच्चे पैदा करे और उनका पालन पोषण करे. समाज में एक सम्मानित नागरिक की तरह निवास करे। आखिर आज वो कौन सी परिस्थियां हैं जिनके कारण दो वयस्क स्त्री -पुरुष लिव -इन सम्बन्ध में एक छत के नीचे एक साथ जीवन व्यतीत करने को राजी हो जाते है ? कहीं न कहीं हमारा समाज हमारे TV Serials , लड़किोयो को दी गाइ आजादी, स्वछंदता इनके जिम्मेदार हैं। आज जब भी किसी नव विवाहित जोड़े के मध्य कोइ भी वैचारिक मत भेद उत्पान होता है। या कोई विवाद उत्पन्न होता है तो महिला को पुरुष के अत्याचारो से बचने के लिये भारत मैं कानून है और अधिकतर सभी महिलाएं इस कानून का बेजा इस्तमाल करती हैं और कर रही हैं न्यायपालिका कछुआ से भी धीरे है. जब इस प्रकार के विवाद अदालत मैं पहुँच जाते हैं तो दोनों पक्षो को १०-१५ वर्षों तक इन क़ानूनी पचड़ो मैं अपना जीवन और धन बर्बाद करना होता है। हिन्दू विवाह कानून एक ऐसा कानून है जो आसानी से विवाह को विछेदित करने की अनुमति नहीं देता है। इन अदालतो के चक्कर काट काट कर पीड़ित पक्ष अपने जवानी का बहुमूल्य समय और संसाधन व्यर्थ कर देता है। आज जब समाज मैं महिलाओं के उत्थान के लिये सारा समाज सरकारी तंत्र कार्यरत है महिला शशक्ति करण की बात हो रही है महिला साक्षरता की बाते बहुत ही अच्छा प्रयास है परन्तु दूसरी ओर यही साक्षर महिला छोटी छोटी पारिवारिक विवादो पर अपने घर छोड़ने की धमकी देती है लड़के काके परिवार वालो को कारागार भेजने पर आमादा हो जाती है तब महिला शाश्क्तिकरण का वीभत्स रूप देखने को मिलता है। आज की माहिला जागरूक हो गाइए है परन्तु इसका आर्थ ये नहीं है की वो अपनी दी गई आजादी का दुरूपयोग करे आज महानगरो मैं collage जाने वाली लड़किया, कार्यरत महिलाएं अपने घर से दूर होकर स्वछंद रूप से रहती हैं इनमे से कुछ अपने अकेली पन को दूर करेनी काय लिये एक साथी की तलाश करती है जो की धीरे-धीरे आकर्षण मैं परिवतित हो जाता है और फिर बिना विवाह के शारीरिक आकर्षण, विपरीत लिन्गी आकर्षण, शारीरिक सम्बन्ध मैं परिवर्तित हो जाता है। इस तथ्यों का जीता जगता उदाहरण आये दिन सामने आने वाले MMS हैं। इंटरनेट का व्यापक प्रसार और उस पर उपलब्ध वयस्क सामग्री का बिना किसी रोक टोक के मोबाइल, LAPTOP , कंप्यूटर पर उपलब्ध होना इन सम्बन्धो को प्रोत्सहित करता है। आज के युवा के लिया विवाह पूर्व सम्बन्ध बहुत बड़ी बात नहीं रह गाइ है। इन मसलों पर युवाओं का अपने घर छोड़ देना भाग कर विवाह कर लेना या लड़की द्वारा अर्जित धन पर उसके पिता की नज़र होना या उस स्त्री धन को लड़की के पिता द्वारा अपना धन समझना,विवाह में देरी का कारन है। इन सब कारणो से लड़के लड़कियां के विवाह मैं देरी होती है और जो भी आज इंटरनेट से जुड़ा है कभी न कभी अश्लील फ़िल्म या तस्वीर अवशय ही देखा होगा ये सब बाते बच्चो को शारीरिक सुख की प्राप्ति हेतु अवैध सम्बन्धों की ओर धकेलती हैं। इन्ही सब कारणो से आज भारतीए समाज मैं लाइव-इन रिलेशन का चलन प्रारम्भ हो गया है। शुरू शुरू मैं ये प्रचला महनगा मैं प्ररम्भ हुआ और अब ये धीरे धीरे छोटे शहरों गावो और कस्बो मैं भी पाँव पसारने लगा है। जब एक बार विवाद न्यायलय मैं चला जाता है तो आज कल लोग तलाक के फैसले का इन्तजार किये बिना ही किसी दूसरे के साथ रहना प्रारभ कर देते है क्यूँ की मनुष्य एक समाजीक प्राणी एवं जो भी स्त्री या पुरुष एक बार वैवाहिक जीवन में रह चुके होते हैं उनके लिए अकेले रहना एक सजा से कम नहीं होता है। एक ओर अकेलापन दुसरी ओर मानसिक परेशानी इस प्रकार के सम्बन्धों को बढ़वा देती हैं। दो दुखी व्यक्ति जब इस पाकर के सम्बन्धो मैं प्रप्रविष्ट होते हैं तो दोनों इस के परिणाम और दुषपरिणाम से भली भंति परिचित होते हैं। दोनों एक दूसरे को भवनात्मक, मानसिक शरीरिक समर्थन देते हुए एक दूसरे का साथ देते हुए जीवन निर्वाह करते हैं। अधिकतर मामलों में ऐसे लोग किसी नये जहग पर जा कर नया जीवन शुरू करते है , वे समाज को एक दूसरे का पति पत्नी बताते हैं अब यदि आज के भोतिकता वादी समयं में जहाँ पड़ोसी को पड़ोसी की खबर नहीं होती उसके पड़ोस मैं क्या हो रहा है इस बात का सरोकार किसी को नहीं होता। चाहे समाज इन सम्बन्धों को मान्यता दे या न दे इस प्रकार के सम्बन्धो में रहने वालों को समाज का डर भय नहीं होता है। जब उच्यतम न्यायलय इन सम्बन्धों को मान्यता दे चुका है और अब सरकार को इन सम्बन्धो में रहने वाली महिलाओं और बच्चो की सुरक्षा के लिया कानून बनांने की बात कह रहा तो समाज इनको मान्यता दे या न दे कोई फर्क नहीं पड़ता है इन्हे तो क़ानूनी मान्यता प्राप्त है।

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सामाजिक ब्यबस्था बिखराव कि ओर!!! ठण्ड कि मौसम में राजनीती कि अलाव पर सेकता स्वार्थ कि रोटी कि कुछ टुकड़े आम आदमियों के बीच फेंक नेतावों द्वारा वैतरणी पार करने कि कोशिश। संत -फ़कीर कि चोला पहन अय्याशियों का अड्डा चलानेवाले कुकर्मी का खेल। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पर लगा कलंक कि कालिख। बलात्कारी मीडिया सदश्य द्वारा मचाया गया तहलका। इन सबों के बीच एक ऐसी खबर पर बहस जारी है जो भारतीय सामाजिक ब्यबस्था पर पहली मान्यता प्राप्त चोट होगी। और वह हथौरा " लीव इन रिलेशन " का होगा जिसको कानूनी " वस्त्र " पहनाने कि बात हो रही है। एक तरफ औरतों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ पुरे भारत वर्ष से आवाजें बुलंद हो रही है दूसरे तरफ ऐसे " आवारा " (जिसकी कोई मंजिल ना हो) ब्यबस्थाओं पर कानूनी मुहर लगाने कि बात किया जा रहा है जो समाज और परिवार को विखंडित करने में सक्षम है। समाज एक ऐसी संस्था है जो हमें मानवीय मूल्यों से दर्शन कराकर पूर्ण मनुष्य बनाता है इसलिए अपराधियों के लिए "असामाजिक तत्व" जैसे शब्दों का ब्यबहार करते हैं तथा परिवार सेवा , सुरक्षा , मर्यादा , सहयोग एवं रिश्तों कि पवित्रता को समझाता है। क्या यह संबंध इन मानबीय मूल्यों को समझ पायेगा ? इन सम्बन्धों से उतपन्न संतान क्या कभी भावनाओं कि मर्म को समझ पायेगा ? " माँ -बाप " के अलावा भी रिश्तों कि एक लम्बी कतार होती है ,क्या यह बच्चा उसमे पंक्तिबद्ध हो पायेगा ? कल "गे" और "लिस्बेनियन" भी मान्यता प्राप्त बैबाहिक बंधन में बंधने लगेगे फिर क्या होगा ! जब समाज में छुपे बलात्कारी सैतान नन्हे बच्चे -बच्चियों को नहीं बख्शता ,पवित्र रिश्तों को तार-तार कर देता है तो क्या इनके आर में इनकी दरिंदगी नहीं बढ़ जायेगी ? गे" और "लिस्बेनियन" तो प्रकृति कि देन है , इसलिए इन आवारा रिश्ता (जिस रिश्ते द्वारा वंशबृद्धि ना हो ) कि आवारगी को सलाम और स्वीकार भी परन्तु क़ानूनी मान्यता के खिलाफ हैं हम और हमारी महान संस्कृति भी। परन्तु "लिव इन रिलेशन " तो समाज और परिवार जैसी पवित्र संस्था को एक चुनौती देनेवाली सम्बन्ध है इसलिए यह संबंध तो हरगिज स्वीकार नहीं करना चाहिए। इससे औरतों का शोषण, बच्चों कि असुरक्षा, बुजुर्गों पर जुलम , पारिवारिक मूल्यों का ह्रास और बिखरता समाज के अलावा कुछ नहीं मिल सकता।

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लिव इन रिलेशन एक ऐसा रिलेशन है जिस में आदमी विशष अपनी जिम्मेदार से भागता हुआ नजर आता है. बिना शादी किये साथ रहने का मतलब है कि आदमी विशेष औरत के जिस्म से खिलवाड़ तो कर सकता है लेकिन उस खिलवाड़ से उत्पन किसी भी चीज के सम्बन्ध में उस आदमी की कोई भी जिमेवारी नहीं है. लिव इन रिलेशन वाला आदमी केवल मौज मस्ती में यकीन रखता है और अपनी जिम्मेवारी से भागता है. आजकल हमारी सर्कार में भी कुछ इसी पार्कर हो रहा है यदि किसी आदमी को लिव इन रिलेशन का मजा लेना है तो उसे जिम्मेवारी भी उठानी होगी और जिम्मेवारी उठाने के वास्ते आदमी को उसके साथ आपना सम्बन्ध बनाना ही होगा यह तभी हो सकता है जब वोह आदमी अपने साथी के साथ कानूनी तौर पर रहे वर्ना लिव इन रिलेशन से तो गैर जिम्मेदार लोगों की उत्पति होगी

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लिव इन रिलेशनशिप को कानूनन रोका जाये .. लिव इन रिलेशनशिप अर्थात सम्बन्ध में रहना किन्तु एक ऐसा सम्बन्ध या रिलेशनशिप जिसे जन्म देने वाले मात्र दो लोग एक नारी एक पुरुष उनके न पीछे कोई न आगे कोई जबकि भारतीय समाज एक ऐसा समाज जहाँ ये सम्बन्ध बड़ो के ,मित्रों के अपने बहुत से अपनों के सहयोग से उत्पन्न होता है ,विशेषकर नारी व् पुरुष का ये रिश्ता सामाजिक समझदारी ,पारिवारिक सहयोग के आधार पर निर्मित होता है क्योंकि यहाँ ये रिश्ता मात्र एक नारी व् पुरुष का संयोग न होकर दो परिवारों ,दो सभ्यताओं का मिलन माना जाता है . किन्तु आज ये दुर्भाग्य है भारत का कि यहाँ पाश्चात्य सभ्यता अपने पैर पसार रही है और उसी का असर है पहले 'लव मैरिज 'जैसी विसंगतियां यहाँ के समाज में आना और उसके बाद लिव इन रिलेशनशिप का यहाँ भी पैर पसारना , उस देश में जहाँ सीता जैसी आर्य पुत्री जो सर्व सक्षम हैं ,भूमि से ऋषि मुनियों के रक्त से उत्पन्न आर्य कन्या हैं ,तक श्री राम को अपने वर के रूप में पसंद करते हुए भी अपने पिता के प्रण को ऊपर रखती हैं और माता गौरी से कहती हैं - ''मोर मनोरथ जानहु नीके ,बसहु सदा उर पुर सबही के , कीनेउ प्रगट न कारन तेहि ,अस कही चरण गहे वैदेही .'' अर्थात मेरी मनोकामना आप भली-भांति जानती हैं ,क्योंकि आप सदैव सबही के ह्रदय मंदिर में वास करती हैं ,इसी कारण मैंने उसको प्रगट नहीं किया ,ऐसा कहकर सीता ने उमा के चरण पकड़ लिए .[बालकाण्ड ] आज सीता जैसे आदर्श की कल्पना ही की जा सकती है हालाँकि सीता जैसी आदर्श हमें ढूंढने पर आज भी मिल जाएँगी किन्तु लिव इन रिलेशनशिप जैसी बुराई की आलोचना तो स्वयं ऐसी बुराई के अपनाने वालों के ही कार्यों द्वारा सरलता से की जा सकती है उसके लिए कोई सूक्ष्मदर्शी लेकर बुराई ढूंढने की ज़रुरत नहीं है और न ही सीता राम के आदर्श से इसकी तुलना के क्योंकि ये तुलना तो साफ़ साफ़ इनके आदर्श को गिराना ही कहा जायेगा क्योंकि ये तुलना तो भगवान की शैतान से और अच्छाई की बुराई से तुलना के सामान होगी जो कि सम्भव ही नहीं है . कहते हैं कि लिव इन रिलेशनशिप अपराध या पाप नहीं है किन्तु ये वास्तव में इन दोनों ही श्रेणी में आ जाता है क्योंकि ये सम्बन्ध ,यदि इसे स्थापित करने वाले स्वयं के गिरेबां में झांककर देखें तो कभी भी खुलेआम स्थापित नहीं करते और इसके दोनों सदस्य ऐसे सम्बन्ध अपने अपने घरों से बहुत अलग अलग रहकर स्थापित करते हैं .ये तो विपाशा बासु व् जॉन अब्राहम जैसी बॉलीवुड हस्तियां ही हैं जो इस सम्बन्ध को खुलेआम निभा रहे थे और उनका ये सम्बन्ध आज टूट चुका है और ये फ़िल्मी बातें ही हैं कि आज उनके सम्बन्ध कहीं और स्थापित हो रहे हैं और ये किसी कानूनी अधिकार की भी इस समबन्ध में मांग नहीं कर रहे किन्तु सामान्य नारी पुरुष के साथ यदि ऐसा हो जाये तो वे कहीं के भी नहीं रहते . सामान्य नारी पुरुष एक दुसरे के बारे में जानते नहीं कि जिससे वे जुड़ रहे हैं उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है और एक अज्ञानता भरी सामायिक प्रेम रस में डूबी ज़िंदगी गुज़ारते रहते हैं जो बाद में जीवन की असलियत देखकर जहरीली हो जाती है जब बॉलीवुड हस्ती तक इस मामले में बेवकूफ बन जाती हैं तो सामान्य की तो बात ही क्या करें हेमामालिनी जैसी अभिनेत्री तक को शादी के बाद पता चलता है कि धर्मेन्द्र शादीशुदा और सनी ,बॉबी जैसे बड़े बड़े बच्चों के बाप हैं ,जो समझौता कर वे रह रही हैं जिन कानूनी अधिकारों की अवहेलना कर वे रह ली हैं एक सामान्य नारी के वश की बात नहीं है . जिस देश में कानून द्विविवाह को अपराध मानता है ,दूसरी पत्नी की कानून की नज़र में कोई स्थिति नहीं है वहाँ सबसे छिपाकर रखे जाने वाले इस संबंध की सुरक्षा के लिए कानून की अग्रणी संस्था की चिंता व्यर्थ का कदम है जबकि इस सम्बन्ध पर पूरी तरह से रोक लगायी जानी चाहिए क्योंकि ये संबंध मात्र आकर्षण के आधार पर बनाया जाता है ,दोनों में से कोई भी इस स्थिति में नहीं होता कि एक दुसरे की स्थिति जाने ,दोनों को अपने परिवार का कोई सहयोग मिला हुआ नहीं होता और न ही कोई सामाजिक स्वीकृति ,जैसे विवाह की निश्चित तिथि होती है ,गवाह होते हैं वैसे इसका कोई प्रमाण नहीं होता इसलिए ये संबंध कभी भी हमारे समाज में विवाह से ऊपर स्थान नहीं पा सकता और कभी भी ऐसी खतरे की स्थिति में आ जाता है कि इसका खामियाजा नारी को ही भुगतना होता है या फिर ऐसे सम्बन्ध से उत्पन्न संतान को .ये सम्बन्ध हमारे समाज में क्या विकृति पैदा करेगा ये न्यायालय के निम्न आदेश में भी देखा जा सकता है - 'लिव इन' पर कोर्ट ने सुनाया अनोखा फैसला मध्य प्रदेश के खंडवा में एक लोक अदालत ने अनोखा फैसला सुनाया है। अदालत ने याचिकाकर्ता व्यक्ति से पत्नी और लिव इन पार्टनर के साथ एक बराबर वक्त गुजारने को कहा है। इसके तहत अदालत ने कहा कि व्यक्ति को अपनी पत्नी और लिव इन के साथ 15-15 दिन व्यतीत करना चाहिए। अप्ने आदेश में जज गंगा चरण दुबे ने शनिवार को कहा कि पत्नी, लिव इन पार्टनर समेत तीनों एक ही छत के नीचे रहें और व्यक्ति आपसी सहमति से 15-15 दिन इन दोनों के साथ समय व्यतीत करे।[अमर उजाला से साभार ] अतः इस संबंध को यदि कानून इस संबंध में बनाये जाने की कोशिश की ही जानी है तो इसे कानूनन रोका जाना चाहिए क्योंकि ये केवल नारी या उससे उत्पन्न संतान के लिए ही नही अपितु परिवार ,समाज और हमारे देश की संस्कृति के भी विरुद्ध है जो वसुधैव कुटुंबकम की शिक्षा देती है जबकि ये उसे ''एक नारी व् एक पुरुष ''के संबंध में विभक्त कर देती है . शालिनी कौशिक [कौशल ]

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

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पुरस्कार कभी भी उसे प्राप्त करने वाले से बड़े नहीं हो सकते। विचार करें तो हम पाएंगे कि पुरस्कार व्यक्ति के व्यक्तित्व की विराटता को समाप्त कर देता है. उसे सीमा में बाँध देता है. इसको पाने का मतलब है "THE END" अर्थात तुम्हारी हैसियत यहीं तक थी. आखिर एक तमगा पूरे व्यक्तित्व का मूल्यांकन कैसे कर सकता है. जब तक किसी को पुरस्कार मिलता है उससे पहले ही वह समाज को इतना कुछ दे चुका होता है कि इनाम उसके कार्यों के आगे छोटे पड़ जाते हैं. लोग किसी कार्य को दो अलग अलग मंशा रखकर करते हैं. एक तो वह जिसने अपना कार्य 'पैसा, ऐशो आराम' हासिल करने के लिए किया, और किया भी दूसरा जिसका लक्ष्य चुपचाप समाज को अपना सर्वश्रेष्ट देना था. मेरी दृष्टि में पुरस्कार केवल बच्चों को ही दिए जाने चाहियें . क्योंकि यह उनके सर्वांगीण विकास की निरंतरता को गति प्रदान करते हैं और उनमे आत्मविश्वास जगाते हैं. लेकिन परिपक्व मनुष्य का पुरस्कार के पीछे भागना उनकी मानसिक अपरिपक्वता को दर्शाता है। ख़ास कर तब जब वह इसे प्राप्त करके अपनी मौलिक आज़ादी गिरवी रख दे. पुरस्कार प्राप्त करने वाला गन्दी राजनीती में फंसकर उस तत्कालीन सत्ता का पिट्ठू कहलाता है. जिसके शासन काल में उसने पुरस्कार प्राप्त किया हो. बदले में उसे उम्र भर सरकार का गुणगान करना होगा। ऐसे में पुरस्कारों की क्या मर्यादा रह गयी. बुद्धिजीविओं को इस पर विचार करना होगा। जय हिन्द . !

के द्वारा: AJAY KUMAR CHAUDHARY AJAY KUMAR CHAUDHARY

ब्रश्ताचार के आरोप दैनिक जागरण जंक्शन जब कद प्रषित हुई तब केजीवाल लाल पीले हो रहे थे और कह रहे थे कि दोषिओं को बक्शा नहीं जायेगा. अब कह रहे हैं कि कद फर्जी है. इसका मतलब तो यह हुआ कि कुमार बिस्वास और शाइना आदि कद में फर्जी हैं असली नहीं. अरे भाई हाथ कंगन को आरसी क्या कद सामने है देख लो कौन क्या कह रहा है केजरी वाल के इस बयां से लगता है कि आप भी ब्रश्ताचार में लिप्त है. अन्नाजी ने केजरीवाल को पत्र लिख कर पुछा है कि आंदोलन में तीन करोरे से अधिल धन मिला स्वेयं केजीवाल ने कहा ७४ लाख खर्च हुआ. बाकी धन कहाँ है. इशारे इशारे में एना जी जनता को बता दिया कि कौन क्या है. केजरीवाल का बयां कि आप के सभी नेता निर्दोष हैं याद दिलाता है एक कहावत कि अँधा बाते रेवरी अपनों अपनों को दै. सब एक दूसरे का बचाव कर रहे है दूसरी कहावत है चोर चोर मौसेरे भाई.. केजरीवाल आपने यह कविता कभी पढ़ी है " काजल कि कोड़री में कैसो ही सयानो जाये , एक लीक लागिहै पे लागिहै.

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हाँ, मानक तय किये जाने की सख्त आवश्यकता है लेकिन एक बात अकाट्य है कि मानक कोई भी हों सचिन सबमें पात्र ही पाये जायेंगे | भारत रत्न तय करने के लिए सरकार को एक कमेटी बनाना चाहिए जिसमे सत्तासीन दल का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होना चाहिए उक्त कमेटी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से वरिष्ठतम लोगों को लिया जाना चाहिए मसलन खेल, शिक्षा, समाज सेवा, न्याय व्यवस्था, स्वास्थ.... आदि | सचिन के नाम पर हो-हल्ला मचाने वाले शायद जल्दबाज़ी कर रहे हैं क्योंकि सचिन किसी क्लब के नहीं देश का प्रतिनिधित्व करते रहे और उनकी उपलब्धियों ने भारत की रैंकिंग को हमेशा बेहतर किया है | भारत को क्रिकेट में सर्वोच्च स्थान दिलाने में सचिन का योगदान अतुल्यनीय है |

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आज के समय और सरकार के निर्णयों को देखते हुए यह कहने में कोइ गलती नहीं होगी की वर्तमान में कांग्रेस पार्टी गांधी परिवार की निजि संस्था बन कर रह गई है जहां लोकतांतरिकता नजर नहीं आती वही निर्णय लिए जाते हैं जो गांधी परिवार लेना चाहता है निश्चित तौर पर यह कहना गलत नही हो गा कि चुनावी मुददों और खेल प्रेमियों के वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए यह कदम उठाया गया है यह वेशक सत्य है कि सचिन ने अपने खेल व रिकार्ड का परचम लहराकर देश का नाम क्रिकेट जगत में शीष पर पहुंचा दिया है पर अटल बिहारी बाजपेयी जी द्वारा निर्विवाद देश के लिए दिए गये योगदान का भी अमिट स्थान हैं और वर्तमान में देखा जाए केन्द्र सरकार ने भारत रत्न के मानक ही बदल दिए हैं

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जागरण द्वारा एक बेहद ज्वलंत मुद्दा उठाने के लिए बधाईया !! सबसे पहली बात कि हैम भारत-रत्न पर बात कर रहे हे सचिन पर नहीं इसलिए जज्बाती पाठक मित्रो से विशेष अनुरोध हे कि पहले मामले कि गम्भीरता को समझ कर अपने विचार रखे १-सचिन और अटल जी कि तुलना बे-बुनियाद हे क्योकि दोनों के कार्यक्षेत्र अलग-२ हे ...हा, सचिन को भारत-रत्न देने से पहले निर्णायक मंडल को यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए कि खेल-जगत में देश का सम्मान सचिन से कही जयादा रौशन करने वाला कोई खिलाड़ी छूट तो नहीं गया हे और फिलहाल ऐसा लगता हे कि दो खिलाड़ियो का भारत-रत्न पर सचिन से कही जयादा मजबूत दावा बनता हे ...१-मेजर धयान चाँद जो देश को एक नहीं बल्कि ३ बार ओल्य्म्पिक का गोल्ड दिलवाने के साथ-२ अपने समय के "बेस्ट" थे , !याद करने की कोशिश कीजिए की ध्यान चाँद साहब कितनी बार विफल हुए थे…ढूंढते रह jaaoge) ….२- दूसरे नंबर पर ५ बार के शतरंज विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद साहब आते है जिन्होने अपने दम पर पूरी दुनिया मे भारत का नाम रोशन किया और १४० देशो द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर खेले जाने वाले शतरंज में ये आज उन्ही के कीर्तिमानो का जलवा है की उनसे प्रेरणा पाकर आज देश मे कई सारे ग्रांड मास्टर तैयार हो चुके हे और भारत आज शतरंज कि बेहद मजबूत ताकत बन चूका he !! २-यहाँ अटल जी कि सही तुलना हुई हे और किसी भी एंगल से चेक कर लीजिये उनका भारत-रत्न का दावा बेहद मजबूत हे और उनको दिया भी जाना चाहिए ३-सचिन को भारत-रत्न देने का इससे बेहतर समय कोई हो ही नहीं सकता (लोहा गरम हे, मार दो हथौड़ा....आभार : ठाकुर बलदेव सिंह शोले वाले) मगर ध्यान रहे उनके साथ-२ इस लिस्ट में मेजर धयान चाँद और आनंद को भी अवश्य मिलना चाहिए अन्यथा ये उनके साथ साफ़-2 अन्याय होगा ४-भारत-रत्न कि अब पांच केटेगरी हो चुकी हे (खेल, आर्ट, साइंस, साहित्य और पब्लिक सर्विस) और अब वक़्त आ गया हे कि इस अवार्ड के मानक स्पष्ट रूप से तय हो और केटेगरी विशेष के विशेषज्ञ ही अपनी केटेगरी का भारत-रत्न चुने ...खेल का भारत रत्न चुनते समय फ़िल्मी सितारो को दूर रखे, साहित्य का खेल रत्न चुनते समय खिलाड़ियो को दूर रखे और यदि देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान कि गरिमा बनाये रखनी हे तो नेताओ को भारत-रत्न कि सभी केटेगरी से दूर रखे ....धन्यवाद

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सर्वप्रथम तो यह प्रश्न विचारणीय है कि आखिर सचिन को भारत रत्न क्यों क्या उसने समाज सेवा में कोई उत्कृष्ठ योगदान दिया है या फिर कला के क्षेत्र में कुछ उनका योगदान है या फिर विज्ञानं के क्षेत्र में उन्होंने कुछ नया कर दिखाया है या राजनीती के मैदान में उन्होंने अनवरत देश कि सेवा में अपना समय बिताया है शायद इनमे से कुछ भी नहीं तो किस बात के लिए ये देश का सर्वोच्च सम्मान उन्हें दिया गया है उन्हें शायद ये सम्मान क्रिकेट खेलने कि वजह से मिला है वह खेल जिसे पूरे विश्व में महज पंद्रह या बीस देश खेलते होंगे क्या खेलो में जहाँ देश ओलिंपिक में कुछ ही पदक पता है उस क्षेत्र में उन्होंने देश को गौरवान्वित किया है वह खेल JO कि मात्र कुछ ही देशो में खेला जाता हो उसमे भी पैसे कि खातिर खेलना तो एक नौकरी से ज्यादा कुछ नहीं यदि यह सम्मान खेल के लिए ही दिया गया है तो शायद पहला हक़ मेजर ध्यानचंद को जाता है जिन्होंने देश को कई बार स्वर्ण पदक दिलाकर देश का नाम विश्व के इतिहास में रोशन किया या फिर अभिनव बिंद्रा क्यों नहीं जिसने अपने खर्चे से ट्रैनिंग पाकर देश को पहली बार एकल रूप में स्वर्ण पदक दिलाकर भारत का नाम रोशन किया या फिर विश्व में प्रथम रहकर विश्व में भारत का विजई पताका लहराने वाले पुल्लेला गोपीचंद ,साइना नेहवाल ,विश्वनाथन आनंद ,मिल्खा सिंह ,सान्या मिर्ज़ा ,मेरीकॉम ,गीत सेठी ,क्यों नहीं क्या मात्र इस बात पर कि क्रिकेट का खेल अन्य खेलों में ज्यादा लोकप्रिय है या सचिन इस दौरान देश में ज्यादा लोकप्रिय रहे मीडिया के इस ज़माने में लोकप्रियता का कोई मापदंड नहीं है मीडिया एक सपने देखने वाले बाबा तक को लोकप्रिय बनाकर सर्कार को खुदाई करने पर मजबूर कर सकता है अगर भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान महज लोकप्रियता के आधार पर दिए जाने लगेंगे तो एक समय इसी मीडिया ने अन्ना हजारे को लोकप्रिय बना दिया था या आजकल सबसे लोकप्रिय मोदी चल रहे हैं और हर रोज मीडिया कि सुर्ख़ियों में हैं अब सवाल यह उठता है कि भारत रत्न के मापदंड फिर से तय किये जांय या नहीं ? बनाने को देश का संविधान भी बुद्धिजीवियों द्वारा बनाया गया था परन्तु तब किसी ने ये सोचा था कि इसी संविधान पर चलकर अपराधी भी देश के नेता बनकर देश को चलाएंगे जब देश का संविधान बना था तो कहा गया था कि यह सभ्य लोगों द्वारा सभ्य लोगो के लिए बनाया गया है परन्तु आज जब जाती ,धर्म कि राजनीती में फंसे लोग सभ्य ही नहीं रहे तो संविधान के मानकों का क्या औचित्य इसी प्रकार भारत रत्न के मानक कितने भी बदल लिए जांय यदि उसका पालन करने वालों कि नीयत में खोट होगा तो इसका कोई फायदा नहीं होगा भारत रत्न के नाम तय करने वालों को स्वार्थ कि राजनीती से ऊपर इतना होगा वर्ना भारत रत्न अपनी महत्ता ही खो देगा भारत रत्न कि महत्ता का बेमिसाल उदहारण तो तब होता जब गैर कांग्रेस पार्टी के राज में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी , भारत रत्न हेतु मनोनीत होते तथा कांग्रेस के राज में अटल बिहारी बाजपेयी मनोनीत होते तो शायद इस इनाम कि गरिमा और बड़ जाती यदि इसी प्रकार भारत रत्न बांटे जाते रहे और इस पर मीडिया कि सस्ती लोकप्रियता ,स्वार्थ कि राजनीती ,हावी होती रही तो वह दिन दूर नहीं कि इस सम्मान का ही कोई सम्मान नहीं रह जायेगा मानक तय करने वालो पर कुछ निर्भर नहीं करता वरन मानक का पालन करने वालो में की नीयत पर निर्भर करता है अहीर में बात वहीँ पर आ जाती है कि समाज को बदलना होगा और समाज कोई एक नेता नहीं बदलेगा ये समाज हमी को बदलना होगा हमें स्वयं को बदलना होगा ताकि वो सभ्य लोगो द्वारा बनाया गया संविधान का पालन करने वाले भी हमारे ही समाज के सभ्य लोग हो देश और समाज की खातिर सब कुछ समर्पित करने वालों को किसी भारत रत्न की दरक़ार नहीं होती वो खुद ही जनता के दिलो में बसा करते हैं

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आज के परिप्रेक्ष्य में राजनीती के पटल पर यदि राहुल गांधी कि तुलना नरेंद्र मोदी से कि जाय तो राहुल गांधी का व्यक्तित्व नरेंद्र मोदी के सामने एकदम बौना नजर आता है प्रतिभा के नाम पर यदि राहुल में कुछ है तो शायद यही वे श्रीमती इंदिरा गांधी के पोते तथा श्री राजीव गांधी के पुत्र हैं तभी तो आज कि विषम राजनीती में जब भ्रष्टाचार और मंहगाई से घिरा यह देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा है तो वह कोई मजबूत वादा न करते हुए अपनी दादी और पिता के नाम पर जनता को भावुक कर वोट बटोरने कि कोशिश कर रहे हैं आम तौर पर यह देखा गया है कि देश के किसी भी मुद्दे पर चाहे वह केदारनाथ त्रासदी हो या लोकपाल का मुद्दा वो वो कोई भी प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं नजर आते देश कि अर्थव्यवस्था के बारे में उनकी कोई दूरगामी योजना भी नहीं दिखाई देती वह एक युवा नेता हैं इसमें कोई शक नहीं है परन्तु क्या उनकी सोच भी इतनी युवा है यह सोचने का विषय है अगर उन्हें अपने आप को एक युवा सोच वाले नेता के रूप में ही प्रस्तुत करना था तो जब पूरी दिल्ली दामिनी को न्याय दिलाने में संघर्षरत थी तो वह भी एक देशवासी के रूप में आगे आते और जनता के साथ साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर शामिल होते तो आज पूरा देश उनके साथ होता अनुभव के आधार पर भी यदि तुलना करें तो मोदी के साथ पूरा गुजरात है जहाँ उन्होंने विकास को मुद्दा बनाकर सभी धर्मो को सामान रूप से प्रभावित किया जबकि राहुल गांधी अपने सुशाशन का उदहारण देने के लिए कुछ भी नहीं है एक समय था जब लोकपाल कि मांग लेकर पूरा देश अन्ना हजारे के साथ खड़ा हुआ था तब संपूर्ण देश कि नजर इस भावी नेता कि ओऱ थी परन्तु राहुल गांधी ने एक भी शब्द कहना मुनासिब न समझा यदि ये उस समय समय जनता के सामने लोकपाल के समर्थक के रूप में अपने आप को पेश करते तो आज मोदी कि छवि इनके सामने बौनी प्रतीत होती काले धन के मुद्दे पर भी इस युवा नेता ने चुप्पी साध ली थी जब इन सब मुद्दों पर इन्होने कोई शब्द न कहा तो अंततः ये सरे मुद्दे नरेंद्र मोदी कि झोली में आ गए उन्हें स्वयं मसीहा बनकर इन मुद्दों पर चर्चा करनी पड़ी आज जनता धर्म जाती पिता दादी आदि पारम्परिक मुद्दों से ऊब चुकी है उन्हें मुद्दा विकास का चाहिए यदि आज भी राहुल गांधी एक सुदृढ़ नेता के रूप में उभारना चाहते हैं तो कुछ नया कहे आज देश कि जनता को एक ऐसे नेता कि जरुरत है जो समय आने पर पाकिस्तान को भी आँख दिखा सके उसके पालनहार अमेरिका को भी माक़ूल जवाब दे सके तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में भी देश कि एक साफ और ताक़तवर छवि पेश कर सके राहुल गांधी चाहें तो जनता के सामने अपनी ऐसी छवि पेश करें और देश कि बागडोर संभालें परन्तु क्या वह अपनी ऐसी छवि जनता के समक्ष ला पाएंगे यह तो समय ही बतायेगा इससे वह अपने पिता के सपनो का भारत बनाने में मददगार साबित होंगे

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प्रिय बन्धु आपकी बात सिद्धांत रूप से सही है चुनाव पूर्व सभी पार्टियों एवं चुनाव लड़ रहे व्यक्तियों के सर्वेक्षण अवश्य होने चाहिए और सर्वेक्षणों को जनता के समक्ष प्रस्तुत भी करना चाहिए ही नहीं बल्कि चुनाव आयोग सभी अनिवार्य नियमो के साथ सर्वेक्षणों को भी अनिवार्य कर ही देना चाहिए जिससे की जनता को यह पता चले की कौन कैसा है लेकिन सर्वेक्षणों के आधार पर पार्टियों को हार जीत के दरवाजे पर लाकर खड़ा कर देना ऐसा ही है जैसे किसी को भी आरोपी बना कर बिना सजा पाए उसे जेल के दरवाजे पर खड़ा कर देना भले ही उसने अपराध किया हो या नहीं या न्यायालय से सजा मिली ही न हो फिर भी अपराधी साबित करना ? इस लिए मिडिया द्वारा किसी भी सर्वेक्षण के आधार पर चुनाव के नतीजे बताना गलत ही नहीं एक अपराधिक कुकृत्य है और इसको क़ानून बना कर तुरंत बंद करना ही श्रेयकर होगा ?

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आम तौर पैर यह देखा गया है की इलेक्शन से पहले कई प्रकार के सर्वेक्षण होते रहते हैं जो मीडिया चैनलों के अपने अपने निजी झुकाव के अनुसार राजनितिक पार्टी के जीतने की भविष्यवाणी करते हैं इन सर्वेक्षणों का विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि ये सर्वे में मात्र कुछ इलाकों के बुद्धिजीवी वर्ग को शामिल करते हैं और भारत की राजनीती के इतिहास में बुद्धिजीवी वर्ग का योगदान सबसे कम रहता है वैसे भी जो मीडिया टी आर पी की भूख की खातिर एक बाबा के सपने को भी इतनी बार प्रसारित करता है की सरकार तक को वह बात सच मानकर खुदाई का आदेश देना पड़ता है सपनो को तवज्जो देने वाले इस मीडिया पर भरोसा करना कितना तर्कसंगत और प्रासंगिक है अब तो विभिन्न चैनलों में आने वाले ये सर्वेक्षण जनता के लिए मनोरंजन का प्रोग्राम बनकर रह गए हैं कुछ लोगों का मानना है की इन भ्रामक प्रचारों में पड़कर जनता उलझती है परन्तु ऐसा नहीं है लोकतंत्र में आपका वोट आपकी इच्छा के अनुसार पड़ना है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की वह पार्टी जीतती है या नहीं जनता इन दुष्प्रचारों को मनोरंजन की भांति देखती है और स्वयं में मंथन करती है वैसे भी जो पार्टी जीत रही है उसे पड़ने या न पड़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता आपको तो बस अपने वोट का प्रयोग करना है और अब तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद तो जनता के पास इनमे इ कोई नहीं का विकल्प भी आ गया है जिसको प्रयोग में लाना जनता भली भांति समझती है अब मैं बात करूँगा उस वर्ग की जो भारत की राजनीती में सबसे ज्यादा प्रभाव डालते हैं वास्तविकता में तो सर्वे में दिखाया जाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग या तो वोट डालने नहीं जाता या अपनी विद्वता के मंथन के आधार पर सही पार्टियों में बंट जाता है सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाला निम्न तथा अन्पड वर्ग आज भी धर्म गुरुओं के कहे अनुसार किसी एक पार्टी को वोट दल कर अपने लोकतंत्र के अधिकार की इतिश्री कर देता है या दूसरा बड़ा वर्ग आज भी चन्द बोतलों की या चन्द रुपयों की खातिर किसी एक पार्टी को वोट डालता है हमारे मुल्क में यही वर्ग है जो अपने मताधिकार का सबसे ज्यादा प्रयोग करता है तथा इलेक्शन को आज भी आमदनी तथा मधुशाला जाने का उचित साधन समझता है आज भी इस मुल्क में वोटिंग धर्म ,जाति, क्षेत्र व परिवारवाद के आधार पर होती है आज जब हमारे देश में सभी को विहारों की अभिव्यक्ति का अधिकार है तो इन सर्वेक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता बल्कि यह प्रोग्राम जनता एक मनोरंजक राजनितिक सीरियल की भांति अपनी जगह बना रहे हैं और इनसे राजनीती के प्रति ज्ञानवर्धन भी होता है अंत में भारत में होने वाले इलेक्शन की कटु सत्यता को दिखलाती हुई अपनी चन्द पंक्तियों के साथ इस चर्चा को समाप्त करना चाहूँगा उम्र भर मुफलिसी मेँ जो रोता ही रहा । फटेहाल वो गरीब ए हिन्दोस्तान है जनाब ॥

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दृश्य 1 ******************** गेंदे का पौधा आज बहुत उदास था उसने गुलदावदी से कहा यार तुम्हारी खुशबू मेरी खुशबू से अच्छी है क्या ??? गुलदावदी इतराते हुये बोली, हाँ और नहीं तो क्या…. गेंदे ने बुझे मन से अपना ऑफिस बैग उठाया और दफ्तर की ओर चल पड़ा… पीछे से गुलदावदी ने आवाज़ लगाई आज दफ्तर से जल्दी आना, शाम को मंदिर जाना है… आते वक़्त रास्ते से इन्सानों के कुछ अच्छे बाल तोड़ लाना.… घने देख के ही लेना… और उनमे डैंड्रफ और जुएँ भी न हों…. शाम को लौटते वक़्त गेंदे ने देखा सभी इंसान गंजे ही हैं… “कमबख्त पूजा वाले दिन बालों की बड़ी किल्लत होती है, साले सब सुबह सुबह ही सारे बाल काट ले जाते हैं… ” बड़ी देर बाद खोजने पर एक 4-5 साल की बच्ची दिखी, गेंदे ने सोचा “यार बिना बालों के ये कितनी बेरंग दिखेगी, फिर सोचा अगर इसके बाल नहीं लिए तो आज की पूजा अधूरी रह जाएगी… फिर फटाफट उसके छोटे-छोटे बाल तोड़कर वो घर की तरफ चल पड़ा… “ये बाल चढ़ाने से पूजा ज़रूर सफल हो जाएगी…. ” दृश्य 2 ******************** लंच का समय है, कैंटीन की कुर्सियों पर बैठे बकरे, ऊंट और भैंस अपनी अपनी घास खा रहे हैं… भैंसे ने बात शुरू की, “अरे दोस्तो **** पूजा आ रही है, कैसे मनाना है, कुछ सोचा है ??? ” “सोचना क्या है…” “अरे पिछली बार जो हमने **** जाति के इन्सानों की बलि चढ़ाई थी, सब बेकार हुआ… देवी माँ खुश ही नहीं हुईं… गजब सूखा पड़ा था, साली हरी घास खाने को तरस गए थे… इस बार तो **** की ही बलि चढ़ाएँगे, मैंने पढ़ा है वो इंसान की सबसे ऊंची ब्रीड है…. इस बार माँ जरूर प्रसन्न होंगी…” बकरे ने बात आगे बढ़ाई, “यार इस बार तो अपने त्योहार पर हमने करीब 10000 हाई ब्रीड इन्सानों को इकट्ठा करके बांध रखा है… ” “वाह, क्या बात है…” “हाँ, इस बार **** जरूर खुश होगा, जन्नत नसीब होगी हमारे बकरों को….” ऊंट के चेहरे पर गजब का तेज़ आ गया, “भाईजान, हमने भी तो 10000 गोरे इंसान मंगवाएँ हैं विदेश से, सुना है उसकी बलि देने पर सारी मिन्नतें पूरी हो जाती हैं….” “वाह इसका मतलब मरने के बाद हम सबको ही स्वर्ग मिलेगा…” ये बोलकर तीनों ठहाका लगाते हैं, और पूरा कैंटीन उनकी हंसी से गूंज पड़ता है.. लेखक की चिप्पी … ******************** क्या किसी भी धर्म में ऐसा कोई त्योहार है जिसमे धार्मिक कारणों से छायादार पेड़ लगाने, फूल-पत्तियों के पौधे लगाने, या फिर पशु-पंछियों को आज़ाद करने की रस्म हो ??? इंसान द्वारा किया गया कोई भी धार्मिक अनुष्ठान बिना फूलों को तोड़े हुआ पूरा नहीं होता…. कई अनुष्ठानों में अलग अलग पशुओं की बलि देने की भी प्रथा है… मैं यहाँ किसी धर्म विशेष को उचित या अनुचित ठहराने के लिए नहीं आया, बस सवाल इतना सा है कि उस ऊपर वाले के नाम की धार्मिक गतिविधियों में हम इसे धरती का भला क्यूँ नहीं कर सकते…. धर्म की पूर्ति के लिए पर्यावरण विध्वंस क्यूँ ??? ये उस युग की बात हो सकती है जब पेड़-पौधे और पशुओं की प्रजातियों की सभ्यता ने विकसित रूप ले लिया होगा… सोचिए अगर भैंस, बकरे और ऊंट भी इतने ही विकसित और धार्मिक होते और वे अपने काल्पनिक इष्ट जनक को खुश करने के लिए इंसानों की बलि दिया करते तब इंसानों तुम्हें कैसा लगता ???

के द्वारा: shekhar suman shekhar suman

मंदिरों का पैसा आम आदमी के हित में खर्च किया जाना चाहिए... यहाँ बहुत से लोगों ने टिपण्णी की है की मंदिरों का पैसा सरकार को नहीं लेना चाहिए.. वो पैसा सिर्फ भगवान् विष्णु का है... मैं पूछती हु.. कहा है भगवान् विष्णु?? जब सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि हिन्दू धर्म और देवि देवता नाम की कोई चीज ही नहीं है ये सिर्फ लोगों की आस्था है.. तो फिर इतना अन्धविश्वास क्यों? या तो हिन्दू धर्म के ठेकेदार साबित करे की भगवान् विष्णु है.. और देवी देवता भी है.. या मंदिरों की सम्पति को देश हित में खर्च करे... मेरा तो यह मानना है की देश के इतने बुरे हालातों के लिए मंदिर, मस्जिद, चर्च सबसे ज्यादा जिमेवार है.. हमारे देश में हर साल 10 अरब रुपये से ज्यादा पैसा दान किया जाता है.. मुझे ये कहते हुए भी कोई दुःख नहीं हो रहा की हमारे भारत की सरकार मुर्ख है.. सरकार को चाहिए की एक ट्रस्ट बनाये जहाँ दान देना टैक्स मुक्त हो.. मंदिरों, मस्जिदों और चर्चो में दान देने पर कम से कम 50% टैक्स होना चाहिए.. क्योकि ये मुफ्त का पैसा होता है.. जिस पर देश के चंद लोगों ने कुंडली मार कर रखी हुई है.. अरे मूर्खों जब भगवान् सर्व गुण संपन है एक पल में सब कुछ कर सकता है.. (वेद-पुराणों के अनुसार) तो उसको इतने पैसे की क्या जरुरत है??

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मेरे दोस्तों ये भारत है यहाँ एक से एक गुनाहगार आराम की ज़िन्दगी गुजार रहे हैं और सबसे बड़ी बात है के किसी के बिना कोई काम नहीं रुकता आर जे डी के बाकी लोग अगर इस से सबक ले लेंगे तो जनता ज़रूर पार्टी की मदद करेगी इस पार्टी में सब वैसे ही नहीं हैं मगर एक बात है के अगर सब लोग वैसे ही हो जाएँ तो मुश्किल है वैसे हर पार्टी का कोई न कोई उमीदवार दागी है और शान से जी रहा है कौन सी पार्टी इस दाग से बची है हो सकता है के दूसरा आदमी इस पार्टी को एक अलग शकल दे दे मगर ये पार्टी सम्पर्दायिक नहीं है ये सभी जानते हैं अगर मुखिया की बात है तो जैसा लालू ने किया वैसा पा लिया ज़रूरी नहीं है के सब के सब एक ही जैसे हैं असल चीज़ है के आर जे डी किसी दो समुदाय का खून नहीं करवाती है नफरत नहीं फैलाती है वैसे मैं सिर्फ व्यक्ति को देखता हूँ पार्टी ज़रूरी नहीं के सब एक ही जैसे हों . इस लिए जो जैसा करेगा वैसा भरेगा इतना तय है के राबड़ी देवी इस पार्टी को नहीं चला सकती हैं अगर कोई दूसरा सुलझा हुआ बागडोर संभाले तो मुमकिन है लालू यादव के परिवार में ऐसा कोई नहीं है ये बात सही है .

के द्वारा: Mudassar Imam Mudassar Imam

लालू यादव देश के अग्रणी नेताओं में एक हैं जिन्हें देश में घोटालों के जन्मदाता के रूप में जाना जाता हैं|सीबीआई का कहना है कि ये सामान्य आर्थिक भ्रष्टाचार का ही नहीं बल्कि व्यापक षड्यंत्र का मामला है जिसमें राज्य के कर्मचारी, नेता और व्यापारी वर्ग समान रूप से भागीदार है. लालू यादव को चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने दोषी करार दिया है। यह मामला 1996 में चाईबासा के सरकारी खज़ाने से 37 करोड़ 70 लाख रुपये से भी ज़्यादा की लूट का है। तब बिना चारा सप्लाई के पैसों का भुगतान कर दिया गया था। पिछले 17 साल से यह मामला चल रहा था। इस मामले में सजा का ऐलान 3 अक्टूबर को होगा। इस मामले में आरोपी सभी 45 लोगों को कोर्ट ने दोषी करार दिया है। सात लोगों को तीन साल तक की सजा सुना दी गई। अदालत को सजा के साथ-साथ लूट के पैसे को बरामद करने की व्यवस्था करनी चाहिए।इस लूट के पैसे पर ब्याज लगाया जाये तो आज यह पैसा कई सौ करोड़ बन जाता है। भ्रष्ट नेता ऐसे लूट के पैसे से ही भ्रष्टाचार की राजनीती चला रहे हैं। आर एम मित्तल मोहाली

के द्वारा: mittal707 mittal707

लालू यादव का ये मुकदमा तथा भारत की राजनीती की ये हलचल भारत के लिए एक शुभ संकेत है यह पहल इस तरफ इशारा कर रही की शिक्षा तथा media भ्रष्टाचार पर रॊक लगाने मे प्रमुख भूमिका अदा कर रहे है आज कितना ही बड़ा संतरी क्यों न हो सबको कटघरे मे खड़ा होना पड़ेगा इसी का परिणाम था राहुल गाँधी का पत्रकारों से रूबरू होना और अध्यादेश के खिलाफ जाना | अब रहा राजद का सवाल जहा तक मेरा मत है लालू की पत्नी या बेटा राजद के अस्तित्व को एक नयी दिशा जरुर प्रदान करेंगे ये बात और है नितीश जी की साख और सामाजिक पकड़ मार्ग मे उन्हें विचलित कर सकती है ये बात हकीकत है की कुछ अन्तराल अब लालू जी को सँभालने मे लगेगा परन्तु राजनीती से लालू जी का अस्तित्व ख़त्म hoga असे नहीं हो सकता क्युकी वो एक जमीनी नेता है उनका अंदाज आज तक किसी भी राजनीतिग्य का नहीं हो सका हा कांग्रेस सामने से तो नहीं अपितु जहा तक हो सकेगा अपने को बचाती हुई पीछे से उनका साथ नहीं छोड़ेगी क्युकी इसका जीता जगता नमूना है की इस मुकदमे मे इतनी प्रगति जा कर १७ सालो मे हुई और आगे देखिएगा इसकी चल कछुआ होगी या ----- ये राजनीति भारत की है और ये है भारत के नेता ---

के द्वारा: sonika sonika

सर्वप्रथम तो पूरे देश को बधाई देना चाहूँगा की भ्रष्टाचार के कफ़न में यह फैसला एक कील के रूप में साबित हुआ है शत शत नमन उन वकीलों को ,जिन्होंने ये केस को सही अंजाम तक पहुँचाया उन सी बी आई ऑफिसर्स को जिन्होंने ये जांच की तथा उन जज को जिन्होंने ये फैसला सुनाया इस केस से यह सिद्ध होता है की आज भी देश में ईमानदार ऑफिसर्स की कमी नहीं है रही बात बिहार में लालू के या आर जे दी के भविष्य की तो उसका फैसला तो जनता पिछले चुनावों में ही सुना चुकी है बिहार की जनता को कबकी लालू तथा उनकी पार्टी को राजनितिक मृत्यु के अंजाम तक पहुंचा चुकी है जिसके साथ प्रजा ही नहीं है तो कांग्रेस भी उसका साथ कब तक और क्यूँ देगी अब इस पार्टी को वापस सत्ता में लाना बिहार की जनता के लिए अपने पैर में खुद कुल्हाड़ी मारने के सामान होगा आज जब बिहार एक bar सम्रद्धि की ओर अग्रसर है तो जनता यह आत्मघाती फैसला कभी नहीं लेना चाहेगी सुनकर बड़ा अटपटा लगेगा परन्तु यह बताना लाजमी होगा की इस कारवां के मुख्या प्रणेता थे टी एन शेषन जिन्होंने इस देश को बताया की चीफ इलेक्शन कमिश्नर की शक्तियां क्या होती हैं और इन्हें किस प्रकार प्रयोग किया जाता है बिहार में लालू का किला ढहने की लिए पहली जरुरत थी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव जो की टी एन शेषन के द्वारा किये गए सुधारों से ही संभव हो सका हाँ उन्हें इतना नुक्सान जरुर हुआ की आज वो और ऑफिसर्स की तरह राज्यपाल या किसी अन्य ऊँचे पद पर आसीन नहीं हैं आज जरूरत है बिहार से सबक लेते हुए यु पी की जनता भी सबक ले और जाती की राजनीती से ऊपर उठकर कुछ राजनेताओं की राजनितिक मृत्यु को अंजाम दे तथा इस राज्य को दंगो की राजनीती से उठाकर मुख्य धारा में लाये

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

I MANTU KUMAR SATYAM,Sex-Male,age-29y,Religion-Hindu,Category-O.B.C (Weaker section & minority), caste-Sundi(O.B.C weaker section & minority),Add-MANTU KUMAR SATYAM S/O,SHIVA PRSAD MANDAL,AIRCEL MOBILE TOWER,NEAR JAMUNA JOUR POOL,CASTAIR TOWN ,SARATH-MAIN ROAD, ,B.DEOGHAR,DISTRICT-DEOGHAR, JHARKHAND-814112,INDIA ..POST GRADUATE DIPLOMA IN HUMAN RIGHT ,FROM IIHR,NEW DELHI,SESSION-2012-14(ONE YEAR PG DIPLOMA COMPLETE ) aadhaar card number-310966907373,voter id card detail - DEOGHAR डिस्ट्रिक्ट,झारखण्ड,INDIA,number-MQS5572490 Subject detail- I victim due to caste & race matter on higher education by Hindu religion ,category-general, & caste-BHUMIHAR & RAJPUT of 15 dabang people from JAN-2011 .They related in my home city B.DEOGHAR. They dabang People torture to me, mixed side effect drug,drowsy drug & narco drug mix in my house food -drinking water everyday different technique by forcefully with weapon .me.Threaten of murder to me by with weapon 50-60 time to left the higher education of two join courses 1. M.SCCRRA from SMU-DE & 2.POST GRADUATE DIPLOMA IN CRIMINAL JUSTICE & FORENSIC SCIENCE victim other way to me mention above. They dabang people also some times have capture my assignment & demand draft force fully by weapon. They dabang people effect of my medication,make pressure to doctors.They have capture 20-25 time my medical prescription forcefully by weapon.They also threaten to me of murder of my father ,mother & brother. Due to complain TO CHAIRMAN, NHRC ,NEW DELHI,INDIA on date -2/06/2012 (first complaint ) by e-mail scan copy corresponding fax 4/06/2012 & 2nd complain on date-13/07/2012 .But have to not any support by NHRC,NEW DELHI.For case status find I have TO sent speed post for R.T.I.on date-10/09/2012(speed post no-EJ6O4094804IN) and date-29/11/2012 (speed post no. EJ087877023IN,H.O B.DEOGHAR,DIST-DEOGHAR,JHARKHAND-814112).Also sent R.T.I by e-mail date-01/12/2012. Also above mention matter of My case or F.I.R have not record by authorized staff/officer of town police station B.DEOGHAR ,DIRTSICT-DEOGHAR,JHARKHAND(MY ADDRESS UNDER THE B.DEOGHAR POLICE STATION) I have Contact 50-55 time of the police station . with above mention police station have not accept my complaint , I complaint application sent by speed post self handwritten 10 copy with 30 supporting document (speed post no-EJ605114624IN,H.P.O-B.DEOGHAR,JHARKHAND-814112) on date -21/09/2012 & by e-mail of same self hand written 10 scan copy with 30 supporting document on date-17/09/2012 to JHARKHAND STATE LEGAL SERVICE AUTHORITY ,RANCHI,JHARKHAND . Problem have to til now continue .In sept-2012 I have to join course TWO YEARS POST GRADUATE DIPLOMA IN HUMAN RIGHTS from INDIAN INSTITUTE OF HUMAN RIGHTS ,NEW DELHI ,session-2012-14 & roll no-384 /HR/2012. Also have to make disturbance of study of the course same of mention sent application on JHARKHAND STATE LEGAL SERVICE AUTHORITY ,RANCHI,JHARKHAND by speed post on date -21/09/2012 and by e-mail on date-17/09/2012 mention on above para graph . Therefore I sent next complaint application to SECREITYARY, JHARKHAND STATE LEGAL SERVICE AUTHORITY ,RANCHI ,JHARKHAND on date -14/11/2012 by speed post 5 hand written copy (speed post no-EJ 087860439IN) & now by e-mail (hand written 5 scan copy ) with 18 supporting document Again I sent SPEED POST date-14/11/2012 application by email on date -16/11/21012 & THE SECRETARY JHARKHAND STATE LEGAL SERVICE AUTHORITY,Near AG Office, Doranda , ranchi – 834002,jharkhand,INDIA. I have to mention of they dabang peoples name ,complete address & occupation.Also I have to try to publish news from 1 year it have not support to me by news channel and news paper in local city deoghar,dist-deogha,jharkhand,INDIA but not flash news.also contact to CAPITAL office jharkhand but not support to me flash news. ALSO PUBLISH BLOGG IN JULY- AUG BUT PROBLEM TILL NOW CONTINUE. date-26/09/2013

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आजाद सोशल मीडिया प्रजातंत्र की सबसे मजबूत बुनियाद आजाद सोशल मीडिया प्रजातंत्र की सबसे मजबूत बुनियाद के रूप में उभर कर आई है यह आम जनता की ताक़त है दामिनी बलात्कार का मुद्दा ही लीजिये यह किस्सा भी अन्य हजारों उन मुद्दों की तरह फाइल में दब कर ख़त्म हो गया होता परन्तु इस सोशल मीडिया ने ही इस केस की गंभीरता को समझते हुए पुरे राष्ट्र को न सिर्फ जगाया अपितु हर देशवासी की आत्मा को झकझोर कर रख दिया तथा दामिनी को संपूर्ण न्याय दिल कर ही दम लिया इसी प्रकार जेस्सिका लाल ,प्रियदर्शनी मट्टू ,नितीश कतर जैसे मुद्दे भी सोशल मीडिया के सजग रहते अपने सही अंजाम तक पहुँच सके समय समय पर यह सोशल मीडिया नारी के अधिकारों के लिए लड़ा यदि प्रतिबन्ध ही लगाना है तो इन्टरनेट की पोर्नोग्राफिक साईट पर लगाया जाना चाहिए जिसे देखकर हमारे देश का मासूम अब मासूम न रहकर कुत्सित मानसिकता से ग्रसित बलात्कारी में तब्दील होता जा रहा है जहाँ तक दंगो का सवाल है यह तो jag जाहिर ही हो चूका है की दंगे सत्ता के दबाव में आकर प्रशाशन की निष्क्रियता की वजह से फैले न की सोइअल मीडिया द्वारा इतिहास गवाह है इस बात का की जब जब दंगे हुए किसी न किसी राजनितिक स्वार्थ की वजह से हुए सोशल मीडिया में हर एक आम जन एक सजग पत्रकार की भूमिका निभाता है वह अन्य मीडिया की भांति पक्षपात नहीं करता तथा अपने स्वतंत्र विचार प्रस्तुत करता है उस पर नियंत्रण करना विचारों की अभियक्ति का सेध सीधा सीधा हनन होगा बॉम्बे का उदहारण लीजिये दो लड़कियों के एक राजनेता की मौत पर टिपण्णी देने पर हिरासत में लेने पर स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर विचारों की अभिव्यक्ति का हवाला देते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था किसी के अर्तॊन बनाना कोई निजता का हनन नहीं मन जा सकता यह तो सदियों से होता आया है उल्टा दुसरे रूप में देखा जाय तो यदि आप सही हैं तो आपकी प्रसिद्धि और बदती जाएगी एक समय ऐसा भी था जब नेता साफ़ छवि के हुआ करते थे वे स्वयं पत्रकार से कहा करते थे की बड़े दिनों से उनका कोई कार्टून नहीं बनाया गया किसी पत्रिका में इन सभी बातो से येही निष्कर्ष निकलता है की यह सोशल मीडिया ही है जिसने समय समय पर महिलाओं को न्याय दिलाया महिलायों के हक की खातिर लड़ा सामाजिक बुराइयों को उजागर कर समाज को मंथन करने को मजबूर कर दिया साथ ही साथ आपत्तिकाल में देश को एकजुट किया एक बार मैं फिर इस बात पर जोर देना चाहूँगा की अगर प्रतिबन्ध ही लगाना है तो देश भर में बेलगाम होते फिल्मे अश्लील गाने तथा सबसे महत्वपूर्ण पोर्नोग्राफिक साइट्स पर पुर्णतः प्रतिबन्ध लगाए जिसने हमारे मासूम बच्चों को बलात्कारी और हत्यारा बना कर रख दिया इसे कार्य रूप में परनीत करने से हमारे देश में बलात्कार तथा हत्याओं के प्रतिशत में जबरदस्त गिरावट आएगी और हमारा युवा पथभ्रमित होकर भटकने के बजे मुख्या धरा में आकर देश की तरक्की में महत्वपूर्ण योगदान देने में सक्षम होगा

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हां मेरे विचार से इसबार मोदी पीएम इन वेटिंग’ की परंपरा को जरूर तोड़ेगे आज देश को कठोर कदम उठा पाने में सक्षम व्यक्ति के नेतृत्व की बहुत बहुत जरूरत हैं और वर्तमान समय में ये गुण सबसे ज्यादा मोदी में हैं. उन्हें भी एक मौका मिलना चाहिए मोदी जी को पीएम घोषित करना उत्साह वर्धक फैसला है. कोई भी नेता जनता के सपनों का नेता नही परन्तु मोदी जी जनता के सपनों में खरा उतरते है. इससे वो लोग भी वोट देने जा सकते है जो पहले नही जाते थे और पूछने पर कहते थे, मेरे एक वोट से क्या होगा? जीतना तो उसे है जिसे निम्न क्लास पैसे दारू के बदले वोट देता है. हमें वर्षो से एक धमाकेदार प्रभावकारी नेता की प्रतीक्षा थी वो अब सामने आ ही गया , पूरे देश को उम्मीद है, खासकर शिक्षित माध्यम और उच्च वर्ग को. निम्न वर्ग तो पहले की तरह ही रहेगा उनमे बदलाव की उम्मीद कम ही रहती मोदी जी के बारे में आपके विचार से में सहमत नही,, सुधार के लिए दबंग नेता की जरूरत है, जिसका निर्णय देश हित में ही रहता है. जिसकी सोंच खुली किताब की तरह हो, जो किसी का चाटुकार भी ना हो. ये सारे गुण सिर्फ मोदी में ही है. यदि आप नेहरू खानदान का और मोदी जी का इतिहास भी पढ़ ले. फिर लिखे. एक बात और, मुझे बीजेपी का चमचा या सदस्य समझने की भूल ना करना, क्योकि मैंने भ्रस्ट बीजेपी का विरोध भी किया है और खिलाफ वोट भी दिया है. मेरी आस्था पार्टी के प्रति किसी का अंध भक्त भी नही जय भगवाऩ सिह कादयान 

के द्वारा: laxmikadyan laxmikadyan

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नरेन्द्र मोदी और नरेन्द्र मोदी जैसे नेता में कुछ अंतर के साथ इस बारे में कुछ सोचा या कहा जा सकता है.नरेन्द्र मोदी के अतिमहत्वाकांक्षी , कट्टर छवि वाला और तानाशाही होने का आभास न तो भाजपा के आतंरिक कलह को दूर कर पाने में सफल होगा और और न ही उन्हें भी पीएम इन वोटिंग की श्रेणी से बहार निकल पायेगा. दृढ और कुशल व्यक्तित्व के आलावा भी जिन अपेक्षाओं और खूबियों की ज़रूरत भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री में होनी चाहिए उसकी कमी और कोताही मोदी में भी है. यह बात अलग है कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री में भी ऐसी अपेक्षाओं और खूबियों का आभाव है. यह बात भी समझनी होगी कि मोदी का बॉडी लैंग्वेज और वोयस माडूलेशन दोनों ही काफी आक्रामक है और इसका नकारात्मक असर लोगों पर पड़ता है. यह भी सच है कि मोदी की वर्तमान शैली, सोच, आक्रामकता और अहंकार अगले छ-सात महीनों में भोथरी और अप्रभावी हो जायेगी. महत्वाकांक्षा मिश्रित अहंकार की छवि के अलावा कट्टर और दम्भपूर्ण बयानों और चुनौतियों से उनका जनमानस से शनै-शनै दूर होना ही समय की कसौटी पर सच और खरा उतरेगा.

के द्वारा: krishna gopal sinha krishna gopal sinha

लोकतंत्र में परम्पराएँ जनता तोडती है नेता नहीं मन की मोदी के नाम पर विवाद है परन्तु इस बात को भी झुटलाया नहीं जा सकता की मोदी के नाम पैर ही भजपा संगठित हो पाई और जनता के मन में भी एक नयी आशा जगी मोदी का नाम हमेशा गुजरात दंगो के साथ लिया जाता raha है और वह भी नकारात्मक छवि के साथ लेकिन इस बात का एक अन्य पहलु यह भी है मोदी नेशनल लेवल पर भी एक दृड़ नेता के रूप में उभरकर भी इन दंगो के बाद ही आये इसमें उन्होंने और पार्टी की भांति वोट बैंक की खातिर किसी एक जाती vishesh का पक्ष नहीं लिया नेता तो अटल बिहारी भी उत्तम थे परन्तु आज देश की जरुरत एक कड़क और ताक़तवर नेता की है की जनता जतिव्दी राजनीती से तंग आ चुकी है वह अब एक ऐसा नेता की तलाश में है जिसका मुख्या मुद्दा विकास हो गुजरात हो इस देश में जनता को धर्म से पहले रोटी की जरुरत है उसे मंदिर या मस्जिद निर्माण से क्या लेना देना जिसका अपना एक घर तक न हो मनुष्य की पहली जरुरत रोटी कपडा और मकान है दंगे फसाद में सत्ता किसी का भी पक्ष ले मरता तो इंसान ही है                      आज देश को भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए एक सख्त नेता की जरुरत है आज जरुरत है इस देश को भी विश्व में एक सशक्त राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया जाय अब ये फैसला जनता के हाथ में है की वह गुजरात की तरह शांति की बहाली के साथ सुख से रोटी कपडा मकान सहित रहना छाहती है या खुद बेघर होकर भगवन और खुद के आशियाँ की खातिर आपस में अपनों का खून बहाना छाहती है हर बार एक कमजोर और लचर नेतृत्व चुनने के बजाय शायद जनता एक सशक्त दबंग और कर्मठ नेता के पक्ष में जाना पसंद करेगी अब यह फैसला जनता के ही हाथ में है की इस प्रकार की छवि वह किस नेता के रूप में देख रही है वैसे भी कहा जाता है कि एक कमजोर मित्र से एक ताक़तवर शत्रु भी भला होता है ऐसा नेता को शायद विपक्ष भी पसंद करेगा

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

1---- HAMARE DESH KO MODI JAISE NETA KI HI JAROORAT HAI. KYOKI HAMNE MANMOHAN JAISE CHUPCHAP NETA KO JAISEKOI GULAM KO GADDI PAR BAITHA DIYA JATA HAI OUR USKE STHAN PAR KOI OUR DESH KI BAGDOR KO CHALATA HAI HAMNE DEKHA HAI. 2---- MODI AGAR MAHATWAKANCHI HAI TO KYA DESH KE LIYE KHATRA HOGA MERA MANNA HAI KI AGAR KOI MAHTWAKANCHI HAI TO DEHA KE LIYE SAHI HAI KYOKI BHARAT JAISE DESH KO MAHTWKANCHI P.M. KI HI JARORAT HAI--------- DESH PAR PAKISTAN KE DWARA KIYE JA RAHE HAMLE KA JABAB DENE KE LIYE MAHTWAKANCHI HONE PADEGA KYOKI ISKI JARORAT HAI NAHI TO HAM DARPOK KI TARAH RAHENGE ISKA UDAHARAN AMEROKA DWARA SIRIYA PAR HAMLA KARNE KI GHOSNA HOTE HI SIRIYA NE APNE SABHI RASAYNIK HATHIYARO KO AMERIKA KO SOUP RAHA HAI USI TARAH SE PAKISTAN KO USKE GHAR ME MARNE KI KOBAT RAKHNE WALA HI DESH KA P.M. HO YAHI BHARAT SE PREM RAKHNE WALE OUR DESH BHAKT CHAHTE HAI. HAMNE APNE SAINIKO KE KATE SIR DEKH KARKE BHI APNI SOCH KO GULAMO KI TARAH RAKHA HAI YAH SOCH KAR HI DIL BHAR AATA HAI KI JO SAINIK DESH KE LIYE LAD RAHE HAI UNKE SAATH AISHA HOTA HAI HAMARE P.M. 4 DIN TAK CHUP RAHTE HAI JABKI AISI GHINOUNI KARYWAHI PAR CHAHE 400 SAINIK YUDHBHOOMI ME LADTE HUE VEERGATI KO PRAPT HO JAI US PAR DESH KO BHI GARV HOTA LEKIN DESH KE P.M. KO ES TARAH SE KAMJORI NAHI DIKHNI CHAHIYE. DOOSRI BAAT HAMNE 10 SAALO ME KEWAL SARKAR KE DWARA KIYE GAYE KARYO ME BHRASTACHAR HI DEKHA HAI OUR JAB ANNA HAJARE NE ISKE LIYE KANOON LANE KI MANG KIYA TO BHI UNKO ISKE LIYE MARNE TAK KA PRAYASH KARANA PADA P.M. KO ESKE LIYE KARYA KARNA CHAHIYE. WAH YAH KAHKAR BACH NAHI SAKTE KI ESME SAHYOGI PARTIYO NE SAATH NAHI DIYA YADI UNME KARNE KA JOONOON HOTA TO LOKPAL BOLL AWAYA PASS HOTA ES PRAKAR HAM KAH SAKTE HAI KI MODI BEST P.M. SAVIT HONGE OUR APNI PARTY KO BHI OUR DESH KO BHI VISWASH ME LAKAR KARYA KAR SAKTE HAI MODI KO KATHOR KADAM LENE ME KOI GUREJ NAHI HOGI WAH PARTY ME VISHWAS BANAKAR CHALENGE OUR DESH KO BHI VISWASH ME LEKAR CHALENGE

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BLOG-Bureaucracy in INDIA in reference of HINDU religion individual castes. BY MANTU KUMAR SATYAM,Religion-Hindu,Category-O.B.C (Weaker section & minority), caste-Sundi(O.B.C weaker section & minority),Add-s/o.SHIV PRSAD MANDAL,AIRCEL MOBILE TOWER, Near jamuna jour pool, near ramjanki mandir,castair town,SARWAN-MAIN ROAD, ,DEOGHAR,DISTRICT-DEOGHAR, JHARKHAND-814112,INDIA . Occupation-One year post graduate diploma in human rights from IIHR,NEW DELHI,2nd year continue. IN INDIA HINDU RELIGION which caste have sufficient no. of lawyer and M.B.B.S/M.D/M.S ,which castes bureaucracy/officer have to give the pressure on govt or say it stop the progress of file Due to which castes face more problem have not basics facility of large no. of people like land owner ,business ,employment position,for the concerned of major file progress stop say it like politicians. For major file also flash in news and many time oppose the officers for above mention bureaucracy which HINDU castes politicians have sufficient no. of lawyer and M.B.B.S indirectly support of the problem. But problem it fight against bureaucracy reality in ground level which people have face the problem. which HINDU castes have not sufficient no of lawyer/M.B.B.S/M.D /M.S not fight on ground level against bureaucracy .Also same above mention say it for individual people file not major community group development concerned file. officers which HINDU CASTES have sufficient no. of lawyer have more resistance to fight against cases . Also give the more many type pressure backward castes people have not sufficient no . of lawyer and M.B.B.S/M.D/M.S to have not done cases against the officers,in Officers which HINDU castes have not sufficient no. of lawyer due to environment pressure of stop the progress of file which by the pressure of which HINDU castes sufficient no. of lawyer and M.B.BS/M.D/M.S. Date-11/09/2013

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सपा की सर्कार हमेशा ही ऐसे विवादों में घिरती रही है दुर्गाशक्ति का ही उदहारण लीजिये यह कोई जाती विशेष का मुद्दा ही नहीं था फिर भी रेत माफिया को बचने की खातिर इस मुद्दे को खुद सर्कार द्वारा जातिगत मुद्दा बनाया गया इस मुद्दे के द्वारा नौकरशाही में एक सीधा सन्देश गया की एक जाती विशेष के किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई भी एक्शन आपकी नौकरी के लिए खतरा साबित हो सकता है परिणाम यह हुआ की मामला उस जाती विशेष से सम्बंधित होने पर प्रशाशन मूकदर्शक बना रहा उ प्र जलता रहा शाशन बंसी बजता रहा यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है की हर बार इस जाती का इस्तेमाल कुछ हिन्दू जाती के नेता ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए किया तथा उस जाती को हर बार एक बर्बर जाती के रूप में प्रस्तुत किया सपा के शाशन का पुराना इतिहास देखा जय तो आंकने बताते हैं की इस पार्टी के सत्ता में आने पर अपराध का आंकड़ा बढता गया अज की राजनीती महज जाती की राजनीती बन कर रह गयी है यदि जनता इस सपा को सत्ता से हटाती है दूसरी पार्टी आयेगी फिर दंगे होंगे अराजकता फैलेगी फर्क सिर्फ इतना होगा की अबकी बार दंगो में दलित शामिल होगा प्रशाशन अपनी मूर्तियाँ लगाएगा जब तक इस देश की जनता जातिगत आधार पर वोट देना नहीं छोड़ेगी तब तक येही तांडव दोहराया jata rahega जो जनता चाँद शराब की बोतलों की खातिर ,लैपटॉप के लालच में ,जातिगत अधर पर बिकती रहेगी इस प्रदेश की स्तिथि में सुधर आना मुश्किल है जनता को यह समझना होगा सत्ता दंगो में किसी भी जाती का पक्ष ले मरता तो इंसान ही है वह भी दोनों जाती का जो जाती धर्म के अधर पर वोट मांगती है उसका सत्ता पर शाशन का कोई हक नहीं है दलित और मुसलमानों को ये समझना होगा जो ये सत्ता के ठेकेदार नहीं छाहते की इन जातियों का विकास हो या इन्हें कोई सिक्षा जैसी बुनयादी सुविधा हासिल हो क्यूंकि जिस दिन ये समाज विकसित हो गया शिक्षित हो गया इनकी सोच दंगो की मानसिकता से ऊपर उठ जाएगी और इनका tathakathit वोट बैंक समाप्त हो जायेगा दोष केवल सपा को दे देने से हम अपनी जिम्मेवारियीं से नहीं बाख सकते दोष हमारा ही था जो हमने इस पार्टी का पुराना रिकॉर्ड मालूम होने के बावजूद इसे ही चुना                    इस दंगे की भूमिका तो उसी दिन बन चुकी थी जब दुर्गाशक्ति को ससपेंड किया गया था सपा ने उसी दिन यह साबित कर दिया था की एक जाती विशेष के आगे नौकरशाही की कोई औकात नहीं है और जरुरत पड़ने पर अगर यह जाती दंगे पर उतर आये तो संपूर्ण सत्ता उसके साथ है इसी वजह से प्रशाशन कोई एक्शन लेने से कतराता रहा अब जनता के हाथ में यह फैसला है की वह कैसे सर्कार छाहती है यदि अब भी जनता नहीं जागी तो फिर आगे और दंगो , के लिए तैयार रहे या जनता के पैसे से मूर्तियों के निर्माण के लिए तत्पर रहे सपा के शाशन पर उ प्र के प्रशाशन पर दंगे एक सवालिया निशान रहेंगे इतिहास में ये सपा की पहचान रहेंगे

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साम्प्रदायिक दंगा ,किसी भी शासन में चाहे एक हो या अनेक उस सरकार के सुशासन और बने रहने पर सवाल खड़े करता है। इस बात का कोई अंतर नहीं पड़ता कि किस राज्य में किस दल की सरकार है। सच तो यही है की हिंशा के लिए किसी साम्प्रदायिक सवाल या कारण का होना जरुरी नहीं है। वह कही भी किसी भी मामूली बात को लेकर साम्प्रदायिक रंग में लिपट कर हमारे सामने खडा होता है । और सच यह भी है कि दिल और दिमाग में जहाँ कही श्रेष्ठता का घमंड और दूसरो के प्रति तुच्छता का भाव होगा वहां दंगे करा लेना या हो जाना सहज प्रतिक्रिया का हिस्सा है। सता किसी की भी और किसी भी विचार धारा पर आधारित होने की घोषणा करती हो ,रुल दो ही तरह से होता आया है ,एक विशवास जीतकर (जो अमूमन स्थाई नहीं रहता ) और विभाजित कर यह रास्ता अपेक्षाकृत सरल है। दंगो को लेकर आरोप- प्रत्यारोप तो राजनैतिक लाभ उठाने के लगेंगे ही ,लोकतंत्र की यही शैली है। वोट बैंक भी धर्म ,जाती ,भाषा और क्षेत्र के हिसाब से खड़े और पोषित किये जाते हैं तब इन से जुड़े सवालों को लेकर बवाल और फिर हिंषा हमें विचलित क्यों करती है ?,

के द्वारा: aryaji aryaji

धर्म जब व्यक्तिक न रह कर संस्थागत स्वरुप पा लेता है तो उसका चरित्र भी तत्काल सत्तात्मक हो जाता है। संस्था को मजबूत और स्थिर तथा व्यापक बनाने के लिए उसके भक्तो का रेजिमेंटएशन आवश्यक हो जाता है और यह कार्य अंध श्रधा के ,या कहो ब्रेनवाश से ही संभव है। इस लक्ष्य को पा लेने के बाद किसी भी संस्था के शीर्ष के निरंकुश और फिर अपराध ग्रस्त हो जाना सहज क्रिया है। इसी लिए भारतीय ऋषियों और मनीषियों ने धर्म की व्यक्तिक स्वतंत्रता का ही पोषण और समर्थन किया। जिस कारण सनातन वैदिक धर्म में 33 करोड़ देवी देवता स्थापित हुए। आज लोग इसे उपहास में लेते है। धर्म में अंध श्रधा और अपराध के बिच के रिश्ते को तोड़ना है तो इस तथ्य की गहराई में जाना होगा। जिसके लिए शायद ,आज हम में से कोई तय्यार नहीं होगा।

के द्वारा: aryaji aryaji

श्रद्धा हमेशा अंधी ही होती है। गलत सही का निर्णय आने के पूर्व ही जिस प्रकार से हमारा समाचार जगत विशेष रूप से इलेक्ट्रानिक समाचार जगत, आधे अधूरे तथ्यों के आधार पर दोषी सिद्ध करने पर उतारू हो जाता है वह उचित नहीं है। यह एक प्रकार से न्यायिक प्रक्रिया को भी कहीं न कहीं प्रभावित करने का काम भी करता है। भक्ति, श्रद्धा व्यक्ति को जीने का आधार प्रदान करते हैं। आज उस पर एक प्रकार से सुनियोजित प्रहार हो रहा है। जो जो भी श्रद्धा और विश्वास के केन्द्र रहते हैं चाहे वो परिवार हो, आध्यात्मिक केन्द्र हों, चिकित्सक हो सभी के प्रति एक प्रकार से अविश्वास पैदा करने का काम आज हो रहा है। ऐसे में समाज कैसे चलेगा। क्या सभी कुछ कानून के द्वारा सम्भव है। जिस प्रकार के कानून आज बन रहे हैं उससे समाज में विषमता और संघर्ष को ही जन्म मिलेगा। जिस प्रकार आरोप लगने मात्र से व्यक्ति को पहले जेल जाना होगा, सुनने में अच्छा लग सकता है, समाचारों की सुर्खियां बन सकता है, लेकिन यही ब्लैकमेल का एक हथियार भी बन सकता है। सामाजिक ताने बाने में अपवाद भी होते हैं, लेकिन अपवादों के आधार पर सम्पूर्ण वर्ग को कटघरे में खड़ा करना कहाँ का न्याय है। कुछ लोगेां के बयानों के आधार पर मानो वह ब्रहम वाक्य हो, निर्णय घोषित करते हुए सजा तक सुना देना, न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करना नहीं तो और क्या है। समाचार जगत को भी अपनी सीमा समझनी चाहिए, ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे समाज की आस्था, श्रद्धा और विश्वास खण्डित हो।

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भादों के महीने में 84 कोसी परिक्रमा? धार्मिक कार्यक्रम अथवा वोटों की सियासत? विश्व हिन्दू परिषद द्वारा 25 अगस्त से 13 सितंबर तक प्रस्तावित 84 कोसी परिक्रमा के नाम पर प्रचारित और बाद में पद यात्रा के नाम से परिवर्तित यात्रा को प्रतिबन्धित करना हर उस सरकार का संवैधानिक दायित्व होता जो प्रदेश में धार्मिक सदभाव के लिये प्रतिबध्द है। समाजवादी सरकार ने भी ऐसा कर अपने संवैधानिक दायित्व को ही पूरा किया है। राजनितिक कारणों और वोटों की लाभ हानि की परवाह किये बग़ैर अखिलेश यादव जी का यह साहसिक निर्णय निश्चय ही प्रशंसनीय है। उन्होनें यह साबित कर दिया कि उनमें विपरीत समय में सही निर्णय लेने की क्षमता है और वे मुलायम सिंह जी के सच्चे वारिस हैं। हमारी जानकारी के अनुसार 84 कोसी परिक्रमा चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से प्रारंभ होकर वैशाख शुक्ल नवमी तक चलती है। आमतौर पर सावन पूर्णिमा स्नान के पश्चात बाहर के मठ मन्दिरों से आये साधु संत अपने गंतव्य स्थान पर रवाना हो जाते हैं। विश्व हिन्दू परिषद भादों के महीने में 84 कोसी परिक्रमा की नई परम्परा शुरू कर शुध्द राजनीति कर रही है और जबरन साधु संतों को अयोध्या में रोका जा रहा है। भा0 ज0 पा0 और विश्व हिन्दू परिषद साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलकर राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं। वे हिन्दू वोटों का धुव्रीकरण चाहते हैं। प्राप्त समाचारों के अनुसार अशोक सिंघल सहित विश्व हिन्दू परिषद के कई नेताओं एवं अयोध्या के कुछ संतों ने मा0 मुलायम सिंह जी और मा0 अखिलेश यादव जी से इस यात्रा के लिए पुलिस संरक्षण प्रदान करने का आग्रह किया था, प्रतिनिधि मण्डल ने स्पष्ट किया था कि इस यात्रा का उद्देश्य अयोध्या में विवादित स्थल पर मन्दिर बनाना भी है। राज्य सरकार ने उपरोक्त प्रतिनिधि मण्डल को समीक्षा के बाद निर्णय लेने की बात स्पष्ट रूप से कही थी। सन 1992 में भी यही लोग सर्वोच्च न्यायालय में शपथ और एकता परिषद मे आश्वासन देने के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय, एकता परिषद, देश और देशवासियों के साथ भगवान राम को भी धोखा दे चुके हैं। देश के संविधान की धज्जियां उड़ा चुके हैं। देश उस नुक़सान की भरपाई आज तक नहीं कर पाया है। अब भी इन पर विश्वास कैसे किया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय में विवाद विचाराधीन होने और 09 मई 2011 के न्यायालय के आदेश में यथा स्थिति की पुन: पुष्टि के बाद मन्दिर निर्माण के लिये यात्रा, आन्दोलन और अभियान की इजाज़त कैसे दी जा सकती है? हिन्दुस्तान जैसे बहुधर्मी और बहुआस्था वाले देश में यह सवाल केवल विश्व हिन्दू परिषद का नहीं है, राजनीतिक लाभ के लिये मनमाने आयोजनों की छूट देने और उनके परिणाम भुगतने से भी जुड़ा है। संघ परिवार, सरकार के इस निर्णय को धार्मिक भावना पर प्रहार बताकर देश को गुमराह कर रहा है। वह यह क्यों नहीं बताता कि इसके पीछे निहित उद्देश्य धार्मिक मान्यताओं पर कैसे आधारित हैं? यह तो प्राचीन परम्पराओं, ऐतिहासिक सन्दर्भों और न्यायालय के वर्तमान यथास्थिति के धुर विरोधी हैं। अत्यंत खेद के साथ हमें यह भी स्वीकार ना चाहिए कि सरकारी सेवाओं, मीडिया, ख़ुफिया और सुरक्षा ऐजेंसियों में भी साम्प्रदायिक मानसिकता वाले कुछ् तत्व मौजूद हैं, सन् 90 में भी इन तत्वों ने सरकार और देश के लिये समस्याऐं खड़ी की थीं और सर्विस नियमों और न्यायालय के आदेशों के साथ सरकार के निर्देशों का भी सरासर उल्लंघन किया था। यह आज भी इसकी पुनरावृत्ति कर सकते हैं। प्रदेश सरकार इन से आज भी जूझ रही है और आगे भी जूझना है। देश के संविधान और “सर्व धर्म समभाव” में विश्वास रखने वाले हर शांति प्रिय नागरिक को भा0 ज0 पा0 और विश्व हिन्दू परिषद के इस निर्णय की कटु निन्दा करनी चाहिए। देश और समाज में सुख, समृध्दि और शांति के लिये “सर्व धर्म समभाव” अत्यंत आवश्यक है। इस महान देश में ऐसा मान ने वाले करोड़ों लोग हैं, इस लिये यह देश धर्मनिरपेक्ष है और निरंतर उन्नति कर रहा है। इस देश के तिरंगे को एक रंग में रंगने की साज़िशें हमेशा विफल हुई हैं। इस बार भी ऐसा ही होगा। हमें ग़द्दारों, बेईमानों, मक्कारों और बुज़दिलों से अपने अज़ीम मुल्क की हिफाज़त करनी है, इसकी गंगा जमुनी तहज़ीब की हिफाज़त करनी है, यह सोच कर कि, “हम तो मिट जायेंगे मगर ऐ अर्ज़े वतन तुझ को, - ज़िन्दा रहना है क़यामत की सहर होने तक !” हिन्दुस्तान ज़िन्दाबाद! - ज़िन्दाबाद!! ज़िन्दाबाद!!!-हिन्दुस्तान पाइन्दाबाद! - पाइन्दाबाद!! पाइन्दाबाद!!! (सैय्यद शहनशाह हैदर आब्दी) वरिष्ठ समाजवादी चिंतक भेल-झांसी (उ0प्र0), पिन-284129. मो.न.0941594354.

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धर्मं के बिना राजनीती दिशावेहीन है.यदि वास्तव में धर्मं का सहयोग हो तो राजनीती भटक नहीं सकती.आज की राजनीती स्वार्थ,तुस्टीकरण,और भय से अभिसिंचित है.भारत एक प्रजातान्त्रिक देश है परन्तु इस डेक के नेता प्रजातंत्र की परिभाषा या तो भूल गए या प्रजातन्त्रीक होने में शंका है.क्योकि इनका व्यव्हार एक तानाशाह या बिगरैल राजा जैसा है.जनता की परवाह किये बगैर जो मन में आ रहा है निर्भीक होकर करता जा रहा है.अपने आप को पद्चुत होने के भय से गलत सही निर्णय ले लेते है.आकुट धन इकठा कर आगे की ५-१० पीड़ी को सिक्योर करने में लगा है. जानबूझ कर ऐसी परिस्थितिया पैदा कर रहे है की लोगो का ध्यान सही मुद्दों से हटकर उसी में उलझा रहे. भारत जैसे धर्म निर्पेक्क्ष देश में न तो हिन्दुओ को और न ही मुसलमानों को एक दुश्रे से डरने की जरुरत है.यह एक प्रायोजित परिस्थिति है.दोनों को अनावश्यक डराकर ये तानाशाह अपनी रोटी सेकना चाहते है और वो बहुत हद तक सफल भी है. मुस्लिम भाइयो को आगे बढ़कर हिन्दुओ का साथ देना चाहिए और हिन्दुओ को मुसलमानों का.८४ kosh यात्रा में यदि कुछ बुद्धिजीवी मुस्लमान आगे आकर साथ देते तो राजनेताओं की गन्दी राजनीती अपने आप धराशाई हो जाती. मुसलमानों में भी कुछ राजनेता गन्दी राजनीती कर रहे है और ऐसी परिस्थिति में दोनों को आगे बढ़ने की जरुरत है.यही एकमात्र समाधान है देश को इस विकत समस्या से निकलने की.देश है तो हिन्दू या मुस्लमान है.देश की हालत ख़राब होगी तो कोई भी पक्क्ष बच नहीं पायेगा.पाकिस्तान में भारत से गए मुसलमानों को काफ़िर कहा जाता है.अपने घर में जो सम्मान है कही नहीं हो सकता.यह देश सबो का है और साथ मिलजुलकर रहने में ही सबकी भलाई है.मुस्लिम को भी इस गिरगिट नेताओ से साबधान रहना चाहिए और हिन्दुओ को भी. छनिक लाभ की लोलुपता में इनके जहासे में न आए,किसी का भला नहीं होगा.सच मुसलमान तो रिश्वत को पाप समझता है फिर नेताओ की तुस्टीकरण भी तो रिश्वत ही है.आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है,आगे बढ़कर पाटने की जरुरत है.प्लीज कामे फॉरवर्ड एंड प्रूफ योरसेल्फ अ रियल इंडियन.

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लेकिन उत्तर परदेश नाकारा सर्कार दोनों बाप बीटा और इनका एक और बाप आजम यह सब उत्तर परदेश को पकिस्तान बनाना चाहते है जहाँ रोज बलात्कार मर्डर अपरहण जबरदस्ती हिन्दू बहु बेटियों का शारीरिक और मानसिक शोषण यह इनकी निति है जो अधिकारी अपनी ईमानदारी से काम कर रहे है यह दोनों बाप बेटे उसको निष्कासित कर रहे है जिन्होंने अपने देश को नुकसान पहुँचाया उन्हें यह हरामी बाप बेटे रिहा कर रहे है यह सर्कार हिन्दू और अपने देश के दुसमन है इनका विनाश जल्दी होगा जब देश के अन्दर जब दूसरी आजादी की क्रांति होगी तब सबसे पहले इन नेताओ को टारगेट करेगे और सरे रह इनको मरेंगे यह हमारी संसकिरिति पर कुठाराघात कर रहे है और केंद्र की नापुन्सक्र माँ बेटे और इनके तलवे चाटने वाले कांग्रेसी पूज्य श्री आश्रम बापू जी को बदनाम कर रहे है इन सबका विनाश जल्दी है क्यूंकि इन्होने ब्रह्मज्ञानी महापुर्ष को बदनाम किया है इनका सर्वनाश और इनका वंस का भी नाश जल्दी है ! इतिहास गवाह है जो भी सत्य और धरम से टकराएगा वह चूर चूर हो जायेगा हम अपने संसकिरित को आंच नहीं आने देंगे इसके लिए हम टायर है और जालिमो का नाश कर देंगे ! मेरी जागरण के लेखोको से निवेदन है की हमारे गुरुओ और हमारे भगवन और हमारी संसकिरिति के लिए इज्जत से लिखे जो भी सब्द लिखे वह मर्यादा में हो जय हिन्द हरी ॐ जय श्री राम राम राम राम राम राम राम राम !

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उत्तर प्रदेश सरकार ने ८४ कोशी परिक्रमा पर रोक लगा कर देश के करोडो हिन्दुओ की आस्था के साथ खिलवाड़ किया .३००-४०० संतो की प्रस्तावित यात्रा पर हजारो की संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई और भेड़ बकरियो की तरह उन्हें गाडियो में लाद कर ले गए . धन्य है ALLAHABAD उच्य न्यालय जिसने संतो को अविलम्ब रिहा करने का निर्देश सरकार को दिया . सपा सरकार वोट बैंक की राजनीती करके हिन्दू आस्था के साथ खिलवाड़ कर रही है आतंकियो को जेल से छोडती है और संतो को जेल में डालती है शर्म आणि चाहिए अखिलेश को अगर विधि व्यवस्था का ख्याल था तो परिक्रमा रोकने के लिए जितने पुलिस बल तैनात किये गए वो साधू संतो की सुरक्षा में लगा देते लेकिन इससे आजम खान के नाराज होने का डर था अखिलेश को इस लिए ऐसा किया गया . राम लला की परिक्रमा हिन्दुओ का मौलिक अधिकार है इसे कोई छीन नहीं सकता . विश्व हिन्दू परिषद् पर जो राजनीती करने का आरोप लगते है उन्हें सपा और कांग्रेस से पूछना चाहिए की आखिर वो इस मुद्दे को क्यों नहीं उठाते क्या हिन्दू उन्हें वोट नहीं देते .

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ये वाकई अदभुत है. जहा नारी और पुरुष को एक दुसरे का पूरक माना गया गई वही पुरुष नारी पे शासन करना चाहते है. उन्हें लगता है उनका शारीरिक बल उन्हें ये हक़ देता है. मुझे न तो इतिहास में कोई ऐसा उदहारण दिखाई देता है जिसमे पुरुष ने स्त्री के लिए कुछ त्यागा हो न वेद में. आज का भी सच यही है की हम पुरुष सत्तात्मक समाज में रह रहे है जहा स्त्री सिर्फ एक भोग की वस्तु है और स्त्री की स्वत्रंता हमेशा आलोचना का विषय रही है. आज अगर कोई महिला अपने पारिवारिक जीवन बसाने के बजाय समाज के हित के लिए कुछ करना चाहती है तो ये समाज उनकी सराहना करने के बजाय उनकी आलोचना करता है, कभी कभी तो लगता है की लोग स्त्रियों को पालतू पशु से ज्यादा कुछ नही समझते जिनका उद्देश्य सिर्फ पोषक परिवार की जरूरतों को पूरा करना है, आज भी अर्धनारीश्वर का उदहारण सिर्फ शिव और पार्वती ही है जबकि कितने युग बीत गये. आज कोई पूरक नही बस जरुरत है.

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ज़हन मेँ बसी उसके अटूट देशभक्ति है नारी तू नारायणी तू दुर्गाशक्ति है सियासत के लिए आज एक सवाल बन गयी ईमान की सबसे बडी मिसाल बन गयी हर इन्साँ के दिल मेँ बसा खयाल बन गयी खनन माफिया की देख जिसको फूक सरकती है नारी तू नारायणी तू दुर्गाशक्ति है भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ललकार बन गयी नौकरशाही मेँ परिवर्तन की बयार बन गयी इस मुल्क के रंगमंच का बडा किरदार बन गयी रानी झाँसी की रुह भी तुझी मेँ बसती है नारी तू नारायणी तू दुर्गाशक्ति है तू रहेगी अटल तो देश मेँ बदलाव आयेगा जाति की राजनीती मेँ ठहराव आयेगा होगी भोर अन्धकार सिमट के रह जायेगा जहाँ को बदलने की तुझमेँ ही तो इच्छाशक्ती है नारी तू नारायणी तू दुर्गाशक्ति है दीपक पाण्डे नैनीताल

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इस मुद्दे पर अपनी कविता द्वारा विचार प्रकट करना चाहूँगा इसे परने के बाद आप भी निर्णय ले की क्या सही है या क्या गलत गूँगी चीख आज गर्भस्थ बच्ची की कथा सुनाउँगा यम की भी रूह काँप उठे वो बताउँगा मासूम थी वह गर्भ मेँ उम्र दस सपताह थी पलटती थी अँगूठा चूसती धडकन एक सौ बारह थी जैसे ही एक औजार ने कोख की दीवार को छूआ डर से वह सिकुड गयी जाने यह क्या हुआ धीरे धीरे उस गुडिया के अंग यूँ कटे बारी पहले कमर की थी फिर पैर भी कटे औजार से बचने का प्रयत्न कर रही थी वो बुरी तरह सहम गयी थी अब धडकन थी दो सौ दो पन्द्रह मिनट के इस खेल मेँ हर कोशिश थी जारी सब कुछ कट गया अब सिर की थी बारी मुख खोल जिन्दगी की माँग रही वो भीख थी शायद वो उसकी आखिरी गूँगी चीख थी दीपक पाण्डे J N V नैनीताल

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भाजपा----लालक्रष्न आडवानी   --आडवानी जी वर्तमान राजनीती मैं भाजपा के लिए ही नही वरना सारी भरतीय राजनीतिक पार्टीयौं के लिए आधार  स्तम्भ साभीत हौंगे खासतौर से य़दि भाजपा उन्हैं नजरअंदाज करती है तो सबसे ज्यादा हानि भाजपा को ही होगी भाजपा,को चाहिए कि उन्हैं सोनिया गांधी की तरह महत्व देकर चुनाव का बिगुल बजाए । जब   कांग्रेस  ने,एक अनुभव हीन गैर भारतीय हिन्दी ना जानने वाली   महिला,, को पार्टी को संगठीत करने के लिए महत्व दिया और अपने लक्ष्य मै सफल हुई पार्टी तो सशक्त हुई ही सत्तारूढ भी हुई और आज सोनिया गांधी  दुनियां की सशक्त महिलाओं मै स्थान ऱकती हैं  । भजपा एक अनुभवी को महत्व ना देकर एक महान गलती कर रही है पिछले दो लोक सभा चुनाव से भी सबक नहीं ले रही है फिर प्रधानमंत्री के पद को लेकर मारामारी कर रही है वही अन्य घटक भी अपने- अपने प्रत्यासियौं के साथ मैदान मैं आ रही हैं ।   -पिछले चुनावों की तरह ही इस बार भी अपने आप को कमजोर दर्षा रही है-- अपनी चुनावी रणनीतियों को इस तरह लागु कर रही है कि विपक्ष वैसा ही कर रहा है जैसा वो चाहती है जहां तक लग रहा है कि पिछले चुनावों की तरह इस बार भी वही--- ढाक के तीन पात--- ही हौगे।       -----अतः भाजपा कुछ अच्छे परिणाम चाहती है तो प्रधान- मंत्री पद के लिए मारामारी ना करके वयोब्रध्ध अनुभवी नेता को-महत्व देते हुए  चुनाव की घोषणा- तभी कुछ हासिल कर  सकती है।

के द्वारा: hcsharma hcsharma

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,,,,भारत  मैं कुपोषण----एक सत्य है इसके लिए हमारी,सरकारी नीतीयां हीं पूरी तरह जिम्मेदार हैं हम विकासोन्मुक्त नीतियां बनाते हुए सामान्य गरीब जन को अनदेखा उपेक्षित कर देते हैं या नीतियां बनती भी हैं तो कार्य रुप नहीं दे पाते है या उसका कुछ अंश ही मिल पाता है जब कुछ संभलते हैं तब तक मंहगाइ अपना मुंह और बडा चुकी होती है सरकारी नीतियां सिर्फउच्च वर्ग  सरकारी कर्मचारीयों को लक्ष्य करके ही बनाई जाती हैं ।पिछडे देशों से हमारे देश की तुलना  वास्तव मैं एक सत्य है हम कितने ही विकसित क्यों ना हो जायें वह प्रतिशत दस से अधिक नहीं हो सकेगा,, हमारी भौगोलिक स्तिथी कम क्षेत्रफल मैं अधिक आबादी विकाश का कुछ अंश ही लाभ ले पाता है गरीब वहीं का वहीं रहता है।--- आजादी के बाद हमें विकास की वास्तविकता तो स्वीकारनी होगी हमारा विकास भौतिक रूप मैं काफी हद तक हो चुका है किन्तु हैं यह भी स्वीकारना होगा कि हम नैतिक पतन मैं भी काफी विकसित हो चुके हैं गरीबी नये रुप मैं जहां की तहां है।विकास का पूरा लाभ पाने के लिए धन आवश्यक है और धन के लिए अनैतिकता आवश्यक हो चुकी है ,यह एक सत्य बन चुका है। यहां तक कि हमारी सरकारैं भी इस सत्य को आधार मानकर कार्य रूप देती हैं भुखमरी कुपोषण पहले अपना अपनी पार्टी का कुपोषण दूर करना होता है-- विपक्ष-- बुद्रधीजीवियों--जनआक्रोस से कुछ ना कुछ हासिल हो जाता है उसी मैं सन्तोष कर लेते हैं------- विकास आवश्यक  है- हम इसी से गौर्रवान्रवित हौंगे------ हम विकसित   राष्टर बनैं---  भूखे पेट भी हम सन्तोष कर लैंगे   ओम शांति शांति शांति,,,,,,,,,,,,।

के द्वारा: hcsharma hcsharma

कया इनसानी लालच की बजह से प्रक्रती नाराज हो सकती है।------------------प्रत्क्ष  रूप से यह पूर्णतः सत्य प्रतीत होता  है  हम विकास के नाम पर जो कर रहे हैं वो ही इस का कारण है  परंतु   एक सीधा सा सत्य है कि विकास जब जब अपने चरम पर महसूस होता है फिर नीचे को फिसलता है  यह एकोनोमिकस का भी नियम है मनुष्रय की अब तक की विकास यात्रा कुछ इसी तरह की है। भगवान ने गीता मैं कहा है जो कुछ हो चुका है जी हो रहा है और जो होने वाला है  वह सब प्रक्रति के,नियम  के अनुसार सुनिषचित है जो अब किनहीं कारणों से अब  म्र्रत्यू को प्राप्त हुए नजर  आ रहे है उनको प्रक्रती अपने नियमानुसार  कर्म फलानुसार पहले ही निष्रचय कर चुकी है फिर भी मनुषय अपने स्वभानानुसार अपनी गलतीयौं को सुधारता आगे बढता रहता है,विज्ञान के नियम एक साषवत हैं शायद यह उन मनुषयों के कर्म ही रहे हौंगे  जो उनहैं वहां खिंच कर ले गये उनहैं आत्म चिंतन करना चाहिए किसी पाप को करके धन के अभिमान लेकर प्रायषचित कर लैंगे यह भाव ना रखकर पाप से ही दूरी रखैं ।,,,,,,,   मन चंगा तो कठौती मैं गंगा   ,,,,,,,यही भाव लेकर भुकतभोगी वापस आए हैं  जो चले गये वो भगवान के धाम मैं म्रत्यू पाकर मोक्ष्य पा गये भगवान अवष्य ही उनको और उनके परिजनों को शान्ति  प्रदान करेगा ।हम इस त्रासदी से अवष्य ही चिंतन करते हुए भूल सुधार करेंगे-------   इतने  बडे अनन्त आकार के  ब्रंमांड मै यह बहूत ही  तुच्छ घटना है जो कहीं भी कभी भी होती रहती हैं जो प्रक्रती के नियमानूसार-होती ही रहती हैं कब कहां किसके साथ हो जाए  कुछ नहीं कहा जा सकता है  हम जितना भी सावधानी वरतै   प्रक्रती नये रूप मै अपना रूप दिखाली रही है,,,,,, प्रलय ,,,,,महाप्रलय,,,,,,, अन्तरिक्ष्रय मै होने वाली  कितनी महा-महानतम प्रलय सब एक साष्वत है इन पर किसी का कोई बस नहीं हो सकता।..,,,,हम य़ही चाह सकते हैं ,,,,,,,,,,,,ओम  शांति शांति शांति

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In my opinion it is useless to think about what Nitish Kumar had thought when he decided to snap ties with BJP whether about keeping his vote bank of the so called minority intact or to make his dream come true about the office of the PM of India once when third front under his stewardship starts moving or something else. It is not BJP that I shall vote for this time but I definitely would like all Indians not to cast aspersions on Narendra Modi if he makes his way to the PM's chair .We require a strong,development minded man unlike Nitish Kumar whose growth rate is dependent only on his dreams when he sees two three power plants coming , two three bridges are being constructed but only in dreams . I may not be able to clarify my views about development of Narendraji and Nitish but in my own words I may be allowed to compare the two. In Bihar if Nitish even thinks or dreams that two bricks have been put cement and sand on , a net growth rate of 1% is seen on the statistical data of growth rate , but in Gujarat even when 10 kms long ten bridges are already operational and Modiji is really constructing one more 10 km long bridge to be completed within 1 year , the growth rate will be a meager 0.001 % . We should ourselves see then where it is growth and where it is no growth. Nitish finds it very easy to make statements about Narendra Modiji but in reality the height of Mr Nitish is not even equal to an inch in front of Narendra Modiji's actual or political height of 5'5''. Nitish Kumar has in his cabinet persons like Narendra Singh who is a die hard womaniser, corrupt from head to foot , Shyam Rajak , an off-shoot of Laloo, a person who stinks of corruption from all pores of his physique , Renu Kumari Kushwaha , a some time concubine of Nitish later made minister to realize her capital back in shape of money against giving away her youthful days on the laps of Nitish. Ans so on and so on . BJP in Bihar under Sushil Modi is nothing but BJP in the state once NAMO is nominated a candidate for Prime-minister ship is numero uno and shall leave all the dreams of Nitishji shattered. Every Indian is for NAMO and for Nitish one has to be called a sympathizer of Pakistan ,can we dream of another one more Pakistan inside the territory of India which is the ultimate dream of Nitishji.

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इंसानी लालच के साथ साथ हो रहे विकास जंगलो का पतन नदियों नालियों (गधेरे) को शोषण के साथ बढ़ता पाप इस महाप्रलय की जननी है ! तपो भूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड जहाँ तीर्थ यात्री कभी मात्र उस प्रभु के जाप के साथ चला करते थे वहां अब अपने सुखों का आनन्द लेने के साथ साथ अयाशी के लिए जा रहे हैं पाप बढ रहा है विकास हो रहा है सारे पहाड़ हिल चुके हैं जंगल के जंगल साफ हो चुदे हैं पानी के बहाव को रोकने सरे रास्ते बंद हैं जिससे पानी का तेज बहाव ताभाही मचा रहा है ! यह आज की प्राकृतिक भीषण आपदा है पहाड़ों में कोई बरसात ऐसा नहीं होता जिस बरसात मैं गाँव की गाँव नहीं बहते हैं ! जिस के लिए विकास के साथ विनाश पर रोक के साधन भी ढूढने हैं वृक्षारोपण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है !

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मेरा जन्म बिहार में हुआ है और बिहार को बहुत करीब से देखा है नितीश कुमार एक बात बार बार कहते है बिहार का विकास मौडेल ही चलेगा | आप सब पढ़े लिखे लोग है विकास का मतलब क्या होता है, किसी प्रदेश या जिला का विकास होता है तो क्या किसी खास वर्ग के लिए होता है ४ लेन रोड बनेगी तो क्या हिन्दू ही उस पर चलेगा बिजली घर बनेगा तो क्या हिन्दू को ही बिजली मिलेगी हॉस्पिटल बनेगा तो क्या सब क्या इलाज नहीं होगा फिर विकास का अलग –अलग मौडेल कैसे हो सकता है अलग – अलग राजनीति हो सकती है | कुछ लोग टोपी टिका की राजनीति में अपना मन लगते है ८ साल के शासन में आज भी पुराने १५ सालो की याद दिला कर वोट मागते है और टीवी पर अखबार में आ कर बिहार का विकास मौडेल की बात करते है सब को साथ लेकर चलने की बात करते है, जो अपने गठबंधन को साथ लेकर नहीं चल पाया उसे सब को साथ लेकर चलने की बात नहीं करनी चाहिए | जनता को विकास की बात करके आपने वोट माँगा जब आप फ़ैल हो गए और आप देख रहे है अब इस बात पर वोट नहीं मिलेगा तब आप ने नया पैतरा किया और सोच चलो सब सेक्युलर – सेक्युलर खेल रहे है में भी खेलता हु | कमसे कम लोग विकास की बात तो नहीं करेगे |

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कया भाजपा से अलगाव नीतेश को आतमघाती है----------------नहीं---नीतेश के दोनों हाथों मै लडडु हैं  वोट बैंक के लिए किया गया यह तमाशा बहूत सोची समझी चाल के तहत जोड घटाना गुणाभाग करके किया है ईसमैं नीतेश को कहीं भी हानी नही है सारे परतीदवनदीयो को धरासायी करने वाला निरणय हैहिनदु मुसलमान वोटरो लुभाने वाला यह निरणय हर ओर से नीतेश लाभदायक होगा --मुसलमान वोटरो को वांटकर सीधा लाभ भाजपा को देगा वहीं मुखय  परतीदवनदी लालू को पसत करत हुआ अपने लिए कांगरेस का साथ मिले ना मिले अपने रासते वापस अपने साथी भाजपा मैं भी महतव  बनाए रखेगी  कागरेस को भी मजबूरन तालमेल बनाना पड सकता है  चाल समझते हुए कागरेस अभीखामोश है

के द्वारा: hcsharma hcsharma

BILKUL SAHI KAHA APNE . NAXALWAAD KI JADH HAI CORRUPTION AUR CORRUPTION KI JADH HAI CASTE .corruption is desh mein kabhi mudda ho hi nahi sakta. is desh ke jadatar logon ke liye sirf ek hi mudda chalta hai aur woh hai jaatiwad ka mudda.azadi ke baad general category ke logon ne satta, prashashan, aur business mein kabza kar liya aur wahi ab jab obc aur sc st ko mauka mila hai to wo bhi dono haath se paisa collect kar rahein hai.isme galat kya hai .aur ise paise se woh apni aur apni jaat ka bhala kar sakte hain.jo log corruption ko khatam karne ki baat kar rahein unse mera sirf itna kehna hai ki hindustan se caste system khatam kar dijiye corruption automatic khatam ho jayega. kyonki har jaati ke govt employees aur neta corruption isiliye karte hai ki isse woh apni aur apni jaati ka bhala kar sakein kyuonki ek jaati ka neta ya govt employee doosri jati ki madad karne se raha aur madad toh door usko aise chkrawyuh mein fasa denge ki woh kabhi us sadme se bahar hi nahi aa payega. aaj jo savarn bhai jaatigadh aarakshan ka virodh karte hain unse mera sirf itna kehna hai ki jati khatam kar dijiye aarakshan automatic khatam ho jayega . is desh ka sabse badi beemari caste hai jiski wajah se ham pichle 1500 saalon se videshion ki gullami kar rahen hai aur aage bhi karte rahenge kyonki jin jaation ka 5000 saal se soshan ho raha hai wo kabhi tumhare saath nahi aayengi. woh muslmanon , britishers ki gulaami kar lengi lekin tumhare saath kabhi nahi aayengi.kyuonki musalmaan ya britishers unko jaatisoochak sabd keh kar jalil to nahi karte .

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निश्चय ही यह नीतीश कुमार के लिए आत्मधाती होगा जैसा कि १८ जून को बिहार की जनता ने विस्योस्घट द्त्वास के रूप में सफल बिहार बंद कर साबित कर दिया है हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि वह की जनता पुरे देश में राजनितिक रूप से सरधिक जागरूक है तमाम तरह के घोटालो से घिरी बेशर्मी की सीमा लांघने वाली कांग्रेस जो मुल्य वृद्धि तथा संसाधनों को लुटाने वाली साथ ही विदेशी ताकतों के आगे शर्मनाक ढंग तरीके से घुटने ताकने तथा देश को अपमानजनक ढंग से पाकिस्तान एवं चीन के सम्मुख आत्मसमर्पण करने के साथ गठबंधन कर के नीतीश कुछ हासिल कर पायेगे इसकी संभावना कतई नहीं है नीतीश के साथ कांग्रेस के साथ जाने के आलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है और यही कांग्रेस तथा बिहार की समस्त खामियों के लिए जिम्मेदारी से बाख नहीं सकती इसका खामियाजा तो उन्हें उठाना ही होगा . अभी १९ जून को हेअद्किनेस टुडे के सर्वेक्चाद में नीतीश को मात्र ७ सीटो का अनुमान लगाया है मोदी को जिस तरह हौअ बना दिया है वह अभी जैसा महाराज गंज के लोकसभा चुनाव में स्पस्ट रूप से सामने आ चूका है इस चुनाव ने यह भी दिखाया है कि बिहार के मुसलमानों का नीतीश से मोहभंग हो रहा है वही सव्र्दो का वोट भी नीतीश के खिलाफ जायेगा महाराजगंज ने यह भी साबित किया है कि कांग्रेस जो स्वर्गीय संसद के बेटे को टिकट देने के बाद भी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाया. जहा तक अतिपिचादा वर्ग का सवाल है तो जैसा कि सुशिल मोदी ने आरोप लगाया कि नीतीशएक अतिपिचाड़े वर्ग के प्रधानमंत्री बनाने की रह में बाधा कड़ी कर रहे है वह बिहार जैसे जातिगत समूहों के लिए विख्यात बिहार में उ७नक सिक्का चलन संदिग्ध है नीतीश का दावा कि सिर्फ अतिपिचादा वर्ग में जन्म लेने से कोई अतिपिचादो का नेता नहीं बन सकता यह दलील थोथी है क्यों कि मोदी चाय के ठेला लगते हुए यहाँ तक का सफ़र पहुचे है रहा सवाल संघर्ष का तो वे खुद सामंती कुर्मी संप्रदाय से सम्बन्ध रखते है और उनका क्या योगदान रहा है यह तो विश्वनाथ प्रताप सिघ ने बिना किसी संघर्ष के मंडल आयोग की सिफ़ारिशो को लागु किया जिसमे इन जैसे पिचादो का कोई योगदान नहीं है हां यह जरुर है कि सत्ता की मलाई खाने के लिए ही संघर्ष करते रहे है पिचादो से घी लड़ते रहे है चाहे लालू हो या उपेन्द्र कुशवाहा कांग्रेस का बिहार में लालू से ही गठबंधन की संभावना अधिक है क्यों कि नीतीश के पास न तो बी.जे.पी के तरह कोई संगठन है और नहीं अब वैसी विश्वनीयता किस लिए कांब्ग्रेस उनके साथ जाएगी क्या कांब्ग्रेस के लोगो को ज्ञात नहीं कि लालू की तरह अंध भक्त कभी भी नहीं हो सकते किसी भी परिस्तिथि में लालू हमेशा कांग्रेस के पाकच में रहे है यह भी समझ से बहार है कि मात्र एक चुनाव में मुसलमानों का समर्थन प् कर किस तरह उन्हें अपना परंपरागत वोट मानते है मई समिकरद लालू के साथ ही रहेगा कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि नीतीश के लिए अंगूर खट्टे ही रहने की संभावना अधिक है.

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निश्चय ही यह नीतीश कुमार के लिए आत्मधाती होगा जैसा कि १८ जून को बिहार की जनता ने विस्योस्घट द्त्वास के रूप में सफल बिहार बंद कर साबित कर दिया है हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि वह की जनता पुरे देश में राजनितिक रूप से सरधिक जागरूक है तमाम तरह के घोटालो से घिरी बेशर्मी की सीमा लांघने वाली कांग्रेस जो मुल्य वृद्धि तथा संसाधनों को लुटाने वाली साथ ही विदेशी ताकतों के आगे शर्मनाक ढंग तरीके से घुटने ताकने तथा देश को अपमानजनक ढंग से पाकिस्तान एवं चीन के सम्मुख आत्मसमर्पण करने के साथ गठबंधन कर के नीतीश कुछ हासिल कर पायेगे इसकी संभावना कतई नहीं है नीतीश के साथ कांग्रेस के साथ जाने के आलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है और यही कांग्रेस तथा बिहार की समस्त खामियों के लिए जिम्मेदारी से बाख नहीं सकती इसका खामियाजा तो उन्हें उठाना ही होगा . अभी १९ जून को हेअद्किनेस टुडे के सर्वेक्चाद में नीतीश को मात्र ७ सीटो का अनुमान लगाया है मोदी को जिस तरह हौअ बना दिया है वह अभी जैसा महाराज गंज के लोकसभा चुनाव में स्पस्ट रूप से सामने आ चूका है इस चुनाव ने यह भी दिखाया है कि बिहार के मुसलमानों का नीतीश से मोहभंग हो रहा है वही सव्र्दो का वोट भी नीतीश के खिलाफ जायेगा महाराजगंज ने यह भी साबित किया है कि कांग्रेस जो स्वर्गीय संसद के बेटे को टिकट देने के बाद भी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाया. जहा तक अतिपिचादा वर्ग का सवाल है तो जैसा कि सुशिल मोदी ने आरोप लगाया कि नीतीशएक अतिपिचाड़े वर्ग के प्रधानमंत्री बनाने की रह में बाधा कड़ी कर रहे है वह बिहार जैसे जातिगत समूहों के लिए विख्यात बिहार में उ७नक सिक्का चलन संदिग्ध है नीतीश का दावा कि सिर्फ अतिपिचादा वर्ग में जन्म लेने से कोई अतिपिचादो का नेता नहीं बन सकता यह दलील थोथी है क्यों कि मोदी चाय के ठेला लगते हुए यहाँ तक का सफ़र पहुचे है रहा सवाल संघर्ष का तो वे खुद सामंती कुर्मी संप्रदाय से सम्बन्ध रखते है और उनका क्या योगदान रहा है यह तो विश्वनाथ प्रताप सिघ ने बिना किसी संघर्ष के मंडल आयोग की सिफ़ारिशो को लागु किया जिसमे इन जैसे पिचादो का कोई योगदान नहीं है हां यह जरुर है कि सत्ता की मलाई खाने के लिए ही संघर्ष करते रहे है पिचादो से घी लड़ते रहे है चाहे लालू हो या उपेन्द्र कुशवाहा कांग्रेस का बिहार में लालू से ही गठबंधन की संभावना अधिक है क्यों कि नीतीश के पास न तो बी.जे.पी के तरह कोई संगठन है और नहीं अब वैसी विश्वनीयता किस लिए कांब्ग्रेस उनके साथ जाएगी क्या कांब्ग्रेस के लोगो को ज्ञात नहीं कि लालू की तरह अंध भक्त कभी भी नहीं हो सकते किसी भी परिस्तिथि में लालू हमेशा कांग्रेस के पाकच में रहे है यह भी समझ से बहार है कि मात्र एक चुनाव में मुसलमानों का समर्थन प् कर किस तरह उन्हें अपना परंपरागत वोट मानते है मई समिकरद लालू के साथ ही रहेगा कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि नीतीश के लिए अंगूर खट्टे ही रहने की संभावना अधिक है.

के द्वारा: shuklaom shuklaom

लाल कृष्ण आडवानी की प्रासंगिकता और देश प्रधान मंत्री की कुर्सी दोनों बिलकुल विपरीत बातें हैं. एक बार भाजपा नहीं अपितु दो बार देश हार चूका है  जब संप्रग सरकार देश में काबिज हुई . यह कैसा आडवानी है जो नरेंद्र मोदी को देश स्तर का चुनाव का चीफ बनाया गया और पहले तो इसने बिमारी का बहना बना लिया फिर अपने पार्टी के विभिन्न पदों से स्तीफा दे दिया .इस व्यक्ति का स्तीफा स्वीकार कर लेना चाहिए था .  आज जनमानस की ही नहीं पर भारत माँ की भी पुकार है की नरेंद्र मोदी जी जैसा एक प्रधान मंत्री बनें . चूर चूर कर दिया  देश को .आज तक अटल जी के अलावा जितनें भी प्रधान मंत्री किसी भी पार्टी के बनें .शर्म आनी चाहिए सभी राजनेताओं को जो अपनी जुबान पर नरेंद्र मोदी विरोधी शब्दों की मिसाइल दाग रहे हैं . सचमुच में नितीश कुमार जैसा बौना व्यक्तित्व को कोई हक नहीं रह गया है नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति पर किसी भी तरह का व्यंग्य करे . न नितीश की कोई नरेंद्र मोदी के बारे में अच्छी बात चाहिए .इस व्यक्ति की नरेंद्र मोदी जी के लिए कोई अच्च्ची बात भी मान्य नहीं है क्योंकि हमारे नरेंद्र मोदी जी इन सब के कायल नहीं हैं . वो एक राष्ट्र नेता हैं और न नितीश का प्रेम न ही इसके दुराव भरी बात से कुछ होने वाला है .आडवाणी भले मान ले की नितीश का बिहार मोडल या नितीश एक बहुत उच्च कोटि के नेता हैं , यह व्यक्ति तो अन्धों में काना राजा है .बिहार के लालू और रामविलास दोनों ही महा निकृष्ट व्यक्ति हैं ,जनता इन दोनों को लाखों किलोमीटर दूर फेंक चुकी है क्योंकि दोनों ही महा गिरे हुए और बहुत बड़े चोर हैं , इनको हरा कर नितीश ने गद्दी ले ही ली है तो क्या बहुत बड़ा काम कर गए. बार बार यह कहना की गुजरात तो विकसित था और इसमें विकास करना आसान है .अरे भाई बिहार में निगेटिव ग्रोव्थ  थी , यहाँ के मुख्य मंत्री सिर्फ स्वप्न में एक इंट जोड़ते हैं तब १% ग्रोथ रेट बढ़ता है . गुजरात में वास्तविक धरातल पर १० पुल १०-१० किलोमीटर लंबे बनते हैं तो ०.१ ज्ञ ग्रोथ भी नहीं हो पाता. अब आप दोनों राज्यों की वास्तविक विकास दर स्वयं जोड़ लें . लाल कृष्ण आडवानी को सिर्फ प्रधान मंत्री बनाने से मतलब है . अगर अटल जी के साथ सच्चा प्यार है तो नरेंद्र मोदी को ही प्रधान मंत्री बनाया जाना चाहिए.

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आज देश को व भाजपा को नरेन्द्र मोदी में उम्मीद की एक किरण दिखाई दे रही है . निश्चित तौर पर मोदी जी ने गुजरात का कायाकल्प कर दिया . हरेक का अपना- अपना समय होता है . अडवाणी जी का अपना समय था . वे एक सम्माननीय व्यक्ति हैं . आज सवाल उनकी प्रासंगिकता का नहीं है. वे अपने कार्य के लिए हमेशा जाने जायेंगे. किन्तु आज देश हित व जनता की भावनाओं व उनके दिल की आवाज़ को सुनते हुए साक्षी भाव रखते हुए अगर वे मोदी जी को खुले दिल से भाजपा की कमान सौंपते हैं तो अडवाणी जी के लिए सब के दिल में इज्ज़त और बढ़ जाएगी . साथ ही भाजपा पार्टी और मजबूत होगी . हमारी सोच स्वस्थ और ईर्ष्या से परे रहनी चाहिए . आपसी कलह से जनता का पार्टी पर से विश्वास टूटता है.

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आडवाणी प्रासंगिकता का प्रश्न नही, आखिर उनके नेतृत्व में दो चुनाव लड़े, हार का आत्ममंथन भी हुआ, भाजपा विचारधारा की पार्टी है हिदुत्व, राष्ट्रीयता, स्वदेशी, धर्म, संस्कृत आधारित विचारो की ! और एक पार्टी के सोच में, एक व्यक्ति की सोच कभी सर्वोपरी नही हो सकती, एक बुद्धिजीवी, सकारात्मक सोच के लिए जाने वाले नेता मने जाते है आडवाणी जी, उनका कहना पार्टी गलत दिशा में जा रही, ये उनको खुद गलत साबित करती, पार्टी पिछले दशक से वाजपेयी जी के बाद उन्ही के कदमो पर जनता के सामने है ..अब पद की महत्वकांक्षा में आन्तरिक कलह हास्यापद है ..आधुनिक सोच की अव्यश्कता है ! विकास और देश के बात करे, मोदी जी दूरगामी सोच के व्यक्ति है ..देश को विकास और प्रगति की पथ पर ले जाने की अव्य्श्कता है .. अत: वक़्त के परविर्तन को स्वीकार करे आडवाणी जी !

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नाक्स्सल्वाद को समाप्त करने के लिए पहले यह विचार में लेना अतंत आवश्यक है की इसके जड़ में क्या है सबसे पहले हमें डॉ.भीमाराव अम्बेडकर द्वारा २५जन्वरि १९५१ के संविधान सभा में दिए गए महत्व्पुर्द भाषण जिसमे उन्होंने चेतावनी देते हुए आग्रह किया था की ' कल हम एक ऐसी व्यवस्था में प्रवेश करने जा रहे है जिसने हम एक व्यक्ति एक वोट को मान्यता दे रहे होगे वाही दूसरी तरफ आर्थिक और सामाजिक कारणों से सामाजिक रूप से इंकार क्र रहे होगे समाज के इब अंतरविरोधो को जितने जल्दी समाप्त करेगे अच्चा होगा नहीं हाशिये के बंचित लोगो द्वारा इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था को उकड़ फेकेगे जिन्हें हम लोगो ने इतने बलिदान के बाद बनाया है/ हमें तो संविधान निर्माताओ ने ही इस स्थिति को भाप लिया था तथा आदिवासियो एवं समाज के हसी के लोगो की पूरी व्यवस्था किया गया था मुख्य धारा के अनुसूचित एवं पिचादो को तो कुछ मिला परन्तु मुख्य धारा से अलग रहने वाले आदिवासिओ को उनके संविधान प्रदत्त अधिकारों से भी बंचित रखा गया जो आज भी जरी है भारत सर्कार के ग्रामीद विकास मंत्रालय के रिपोर्ट के अनुसार आजादी के बाद बाद ४०%आदिवासिओ का एक या एक से अधिक बार विस्थापन हुआ है परन्तु कही भी उन आदिवासिओ के पुनर्वास की व्त्वस्था भी नहीं की गयी दूसरा मुद्दा मजदूरी का है जिसकी वजह से भी मजदूरों में असंतोष होता है क्योकि मजदूरों को संविधान प्रदत्त न्यनतम मजदूरी से भी बंचित रखा जाता है योजना आयोग द्वारा गठित समिति ने भी स्वीकार किया है की नक्सल समस्या कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है वरन पूरी तरह आर्थिक और सामाजिक समस्या है तथा यह भी कहा गया की नक्सलियो के पास अच्चा-खासा जनाषर है प्रत्येक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी और विपक्च अगेर गिरोह बना शोषण एवं विस्थापन की नीतिओ को जोर-जबरदस्ती से लगो की जाएगी तो उनलोगों के पास लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विकल्प बहुत सीमित बचते है आजादी के बाद दसको तक इन आदिवासियो की खोज-खबर तो दूर एक तरह से उनके वजूद तक को संविधानिक रूप से त्याग दिया गया किसी तरह के हिंसा का समर्थन न करते हुए सबसे पहले उनकी समस्याओ पर जो अध्ययन हुए है उनकी धुल झाड़ कर समझाना चाहिए की आखिर इस समस्या के जड़ में क्या है छतीसगढ़ में ही मओवादियो के आने से पहले बीडी पत्ता तोड़ने वाले मजदूरों का जबरदस्त शोषद किया जा रहा था आज वाही व्यापारी २० गुना मजदूरी मिल रही है इस तरह आदिवासियो का दिल जीता और भी तमाम कम जो सरकारों को करना चाहिए आज नक्सलवादियो द्वारा कर के उनकी सहानुभूति प्राप्त की है आज जबसे उदारीकरण का घोडा द्वोड़ा है तथा सर्कार को पता चला की अरे ये तो अरबो खरबों डालर के खजाने पर बैठे है १९४७ के बाद एकाएक सर्कार को जबरदस्ती विकसित करने का अभियान चलाया जा रहा है सीधी सी बात है अगर जहा नक्सलवादियो का कब्ज़ा नहीं है क्यों नहीं सर्कार उन चेत्रो को विकसित कर के आदिवासियो का विश्यवास जितना चाहिए बजे इसके की टाटा अडानी के गुंडों द्वारा सलवाजदुम के साथ गैरकानूनी रूप से चोरी छिपे आदिवासिओ को उनके मूल निवासो से जबैदास्ती भागने से तो यह हिंसा बढ़ेगी ही अभी केन्द्रीय मंत्री श्री जय राम रमेश ने एक बहुत महत्व्पुर्द सुझाव दिया है की आदिवासियो के इलाके में १० वर्ष के लिए प्रतिवंधित कर देना चाहिए यह मन कर चलन की ये सब अपराधी है और इनलोगों से इसी तरह निपटा जाना चाही यह बिलकुल गलत सोच है सेना तो इसका इलाज कतई नहीं क्योकि नागालैंड,त्रिपुरा में तो हम आजादी के बाद से ही सेना के हवाले है क्या हुआ वह क्या शांति वापस आई? नहीं सेना देश की सुरकचा के लिए है हमारी सेना पेशेवर तरीके से कम कराती है इसीलिए जनरल वी.के. सिंह ने स्पष्ट तोंर से इंकार किया था आतंरिक सुरकचा में सेना को लगाने से भविष्य में पाकिस्तान जैसा भी कुछ हो सकता है कुछ लोग पंजाब का उदाहरद देते है जहा ओपरेशन ब्लू स्टार सेना द्वारा चलाया गया था लकिन वे भूल जाते है iक पंजाब में पहले जनता का विश्यास जीता गया और वहा की जनता भी आतंकवादियो से किनारा कर लिया था तथा स्व्द्मंदिर तथा जंगल की परिस्थितियो में जमीं-आसमान का अंतर है और आदिवासियो का समर्थन तो बिलकुल नहीं है नहीं तो बार-बार दुसरे प्रदेशो से सैकड़ो की तादाद में आने और इतने बड़े बड़े हमला करने का सुराग भी सुरकचा बलों को नहीं मिला निश्चित रूप से सेना का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए क्योकि इसमे बहुत बड़ी तादाद में निरीह आदिवासिओ को हिंसा हा शिकार होना पड़ेगा अभी भी वहा की खबरे बहार कहा आ पति है आदिवासिओ के उपर तो दुहरा जुल्म हो रहा है एक तरफ नक्सलवादियो की जोर-जबरदस्ती का शिकार होना पड़ता है वाही दूसरी तरफ जंगल विभाग सुरकचा बल वहा नक्सलियो का शिकार कम उनकी बहु-बेतिओ का शिकार अधिक करते है जब सरे राह किसी थाने में महिलाओ का शिकार करते रहते है वहा तो खुला खेल फर्रुखाबादी चल रहा है एक से एक कोबरा फाॅर्स ओप्रसन ग्रीन हंट जैसे भयाना नाम वाले सुरक्चाबलो को लगा दिया गया है जिसका सुरक्चाबलो में घोर असंतोष घर करता जा रहा है उन्हें भी महसूस हो रहा की ७४ जवानो की हत्या लोकतंत्र पर हमला क्यों नहीं मन जाता जब की नेताओ के उपर हुए हमले को लोकतंत्र पर हमला क्यों मन जाना चाहिए जब हम विद्र्ही नागो तथा अन्य अल्गाव्बडियो से बात कर सकते है दसको से दुसमन पाकिस्तान से बात कर सकते है चीनियो से वार्ता के लिए गिड़गिड़ा सकते है तो ये तो हमारे ही लोग है जो दसको की ज्यतातियो तथा शोषण एवं विस्थापन से नाराज लोग है जो विकल्फिनाता के चलात्र नाराज है तथा उनके वाजिब हको को स्वीकार करे तथा समाज के मुख्य धारा में लेन का प्रयास होना चाहिए हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था से जुड़े है जहा सबको अपने विचार व्यक्त करने आजादी है जिस दिन आदिवासिओ को लगेगा की हां हम भी इसी देश के नागरिक है इसपर हमारा भी उतना ही हक है जितना किसी अन्य नाग्रिक्ल का उबी दिन से नक्सल समस्या का समाधान निकलने लगेगा आदिवासिओ का विस्यास जितने के नाद ही कुछ बात बनेगी जो लोग सेना की बात कर रहे है उन्हें कश्मीर से लेकर पुरे पूर्वोत्तर में कोई प्रगति नहीं हो रही इन परिस्थितियो में श्री जयराम रमेशजी की बात को पुन्ह दुहराना चाहुगा की सबसे पहले १० वर्षो के लिए खनन पर रोक होनी चाहिए और फिर इन आदिवासिओ को विस्तास में ले कर ही कुछ किया जा सकता है कुछ लोग ऐओसे भी है आई एस आई का नाम नक्सलवादियो से जोड़ने का प्रयत्न कर रहे है उन्हें ध्यान रखना चाहिए की नक्सलवादियो द्वाराकभी अलगाव वाद की चर्चा नहीं की है और नाही इसके कोई प्रत्य्क्च साबुत है इन परिस्थितिओप में आई एस आई को लाना मतलब अलगाव वाद का एह मोर्चा और खुल जायेगा.

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प्रथमतया तो एक ही विचार है की गोली का जवाब गोली हे हो सकता है . नक्सलवादी लोगो की इनकम हजारो करोर रूपया है . वे अवैध वसूली में लगे है . अवाम एक तरह से सर्कार के पैसे से ही सर्कार से लड़ रहे है. इसलिए बेहद कडाई से निबटा जाये . साथ में यह भी सुनिश्चित किया जाये की पैसे वाले विकाश के नाम पर संसाधनों की लूट न कर पाए . आज सारा देश पैसे वालो के लिए नीलामी के लिए उपलभध है . आने वाले समय में गरीब आदमी अमीर को देखते ही लूटने का सोचने लगे , उसके पहले हमें बदलना होगा. abhee पिछले हफ्ते डेल्ही में एक ऑटो वाले ने बहस के बीच कहा था की डेल्ही के जितने भी माकन दिख रहे हैं , आपको क्या लगता है कितने इनमे से ईमानदारी के पैसे से खरीदे गए है . बात सोचने की है.

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नक्सल वाद मिटाने के पहले भ्रषटाचार मिटाइये . भ्रष्टाचार ही नक्सल वाद की माँ है . कसम खाएं नेता की भ्रष्टाचार नहीं करेंगे ,नक्सल वाद खुद ब खुद मिट जाएगा . बड़ी बड़ी आफिसें , दस से बीस टन कागजों का पुलिंदा लगता है राष्ट्र की आय व्यय  याने बजट पेश करने में . हवाई यात्राएं होती हैं .लाखों लीटर पेट्रोल जलाया जाता है अफसरों के वाहनों पर , मंत्री जी नयी तकनीक सिखने के लिए विदेश जातें हैं , की बजट घाटा कैसे कम किया जाए ,जब आम आदमी मोंटेक जी के अनुसार ३५ - ४० रुपियों में अपना पेट भर ले सकता है तब नक्सल वाद पनप ही क्यों रहा है . नक्सल वाद नहीं पनपेगा तो पुलिस को नौकरी पर रखने का जस्टिफिकेसन कैसे करियेगा. अखबार वाला ,मिडिया वाला क्या करेगा , कुछ तो न्यूज चाहिए . बड़ी दिक्कत हो गयी सरकारों को क्योंकि इस बार कभी सरकार में रहे आदमियों की न मौत हो गयी .जब आम जनता मरती है आतंकवादियों के हाथ तब सरकारें मतलब शिवराज सिंह पाटिल और अब सुशील कुमार शिंदे अपना सूट बदलते रहतें हैं . श्री मान सलमान खुर्शीद   जी का क्या गया या क्या लगा अपने राष्ट्र की २० किलोमीटर जमीं चली ही गयी तब . ऐसे ही होते रहता है होने दीजिए . फिर वार्ता से समाधान निकाल लिया जायेगा .वार्ता हुई, मिडिया का केमेरा  आया, वार्ता सफल हुई का पैरहन पहने वार्ता बाज़ खड़े हुए , निदान निकल गया .खुर्शीद जी मोबाइल पर देश विदेश बात कर लिए ,हाल चाल पूछ लिया आज का वाकया चुटकियाँ लेते हुए सुनाया गया ,हंसी मजाक हुई ,बात खतम. मिडिया में आ गया की चलो आखिर निदान निकल गया .लोकतंत्र का पहिया घूम रहा है

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आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

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पाक के एक के बाद एक कुटिनितिक चालो के बाद भी ये कहना अतिश्योक्ति ही होगी की सत्ता परिवर्तन के बाद पाक की सोच भारत के प्रती बदल जायेगी. अगर ऐसा कोटा भी है तो यह सूर्य का पश्चिम से निकलना ही होगा, क्योकी पाक ने पुरे इतिहास में कभी भी हमारे साथ पड़ोसी देश जैसा व्यवहार किया ही नहीं, बल्की उसे जब भी मौक़ा मिला है उसने भारत की पीठ पर छुरा ही भोका है. और उसने अपना विश्वास खो दिया है. फिर भी भारत अगर ऐसा करता है तो वह पुनः एक नए कारगिल को जन्म दे रहा है. और मै यह भी कहना चाहता हूँ की सरकार बदलने से किसी भी देश की सोच या उसकी रणनीति पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है. मैंने भी “Mother`s Day“ पर एक कविता लिखी है उसे पढ़िए और हमारा मार्गदर्शन कीजिये http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=१३ शुक्रिया .

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

पाकिस्तानी अखबारों के अनुसार सरबजीत सिंह ने यह कबूल किया कि वह शराब का एक मामूली तस्कर था। पाकिस्तानी सरकार द्वारा यह कहा गया कि सरबजीत सिंह भारतीय जासूस था और उसी ने वर्ष 1990 में पाकिस्तान में बम धमाके किए जिसके आरोप में उसे मौत की सजा सुनाई गई। परन्तु भारत की ओर से कभी भी उन्हें अपना जासूस स्वीकार नहीं किया गया और अगर उन पर लगे बम धमाके के आरोप सही थे तो बहुत हद तक संभव है कि वह एक चरमपंथी व्यक्ति थे। यह सब जानने और समझने के बाद भी यह समझना बहुत मुश्किल है की भारत सरकार उन्हें बहादुर लाल कहती है और राज्य सरकार उन्हें शहीद के दर्जे से नवाजती है तो शहादत के पैमाने क्या यही हैं लेकिन मेरी समझ में यह शहीद अवधारणा के साथ खिलवाड़ है। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि शहीद का दर्जा उसे दिया जाता है जो किसी तरह देश के काम आया हो या देश की सेवा करते हुए उसके प्राण गए हों। सरबजीत सिंह तो पाकिस्तान की जेल में बंद एक आम भारतीय थे और उन्होंने शहादत तक का यह सफर किस तरह पूरा किया यह बात समझ से परे है। आज सरबजीत सिंह को शहीद घोषित किया गया है कल यह आवाज कहीं और से भी उठ सकती है, इसीलिए यह कहना गलत नहीं है कि इस निर्णय ने शहादत की अवधारणा को ही हिला कर रख दिया है। लेकिन यह भी किसी शहीद का दुर्भाग्य ही होगा अगर वास्तव में वह देश हित में ही दुसरे देश में जासूसी करते हुए शहीद हो जय और गुमनामी के अँधेरे में बिना किसी सम्मान के ही रह जय ? परन्तु सरबजीत सिंह के साथ ऐसा भी कुछ नहीं हुआ है जेल में किसी दुसरे कैदी ने उन पर हमला किया और उस कारण उनकी मृत्यु हो गई इसमें कौन सा देश हित था या है. ? लेकिन अगर सरबजीत एक भारतीय एजेंट था और उसने देश हित में ऐसा स्वीकार नहीं किया तो जरूर उसको शहीद का सम्मान दिया जाना ही चाहिए जो सरकार के कार्य कलाप से लगता है की सरबजीत वास्तव में भारितीय ख़ुफ़िया एजेंसी रा का सदस्य रहा होगा ? एस. पी सिंह. मेरठ

के द्वारा:

मूर्ख हैं वो जो सरबजीत को शहीद का दर्ज़ा देने को शहादत का अपमान बता रहे हैं | उन चू..यों को ये नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान की अदालतों ने उसे भारतीय जासूस साबित कर मृत्युदंड की सज़ा सुनायी थी और उसकी सज़ा उसने एक मुस्लिम देश की जेलों में नारकीय व हैवानियत की इन्तेहा पार करने वाली पायी क्योंकि इस्लामी मुल्कों में एक काफिर (गैर मुसलमान) को तड़पा-तड़पा कर हलाक़ करने का प्रावधान है क्योंकि इस्लाम में लिखा है 'काफिर जितना तड़पेगा, तडपाने वाले को उतना शवाब मिलता है | दोनों ही परिस्तिथियों में सरबजीत पाकिस्तान की जेल में बंद एक भारतीय था जिसको भारत सरकार कसाईयों के पंजों से छुडा नहीं पाई | जिस कृत्य की उसने वहाँ सज़ा पाई वह उसे 'शहीद' का दर्ज़ा देने के लिए पर्याप्त है | इस घटना के बाद उन लोगों की आँखें खुल गयी हैं जो पंजाबियत की दुहाई देकर दुष्ट पाक को मित्र समझते थे | ज़बां एक होने से दिल एक नहीं होते यह फर्क है उनके मज़हब और हमारे धर्म में |

के द्वारा: nagesh nagesh

अमेरिका ने अपने व्यापारिक, आर्थिक, सामरिक हित साधने के लिए अरब मुस्लिम के साथ दोहरे संबंध बनाए हुए हैं। वहां पर ही ऐसे कस्बे हैं जहां 5 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या में विशाल किले जैसी मस्जिदें बन रही हैं। वहां के पाठ्यक्रम में मोहम्मद का नाम "साहब" या "सलल्लाहे अलैही वसल्लम" "पी बी यू एच" के बिना लिखा नहीं जा सकता। अमेरिका की रक्षा तथा विदेश नीति में ऐसे मुस्लिम भी हैं जो मुस्लिम बहुल देशों में राजनीतिक लोगों को क्या व कैसे करना है तय करते हैं। वहां अरबी वहाबी मुस्लिम कम्यूनिस्ट व मानवतवादी विचारजीवियों की पुस्तकें तथा लेख प्रचारित कर सरकारी विश्वविद्यालयी शैक्षिक प्रचार तंत्र में पूरा प्रभाव धन व शासन बल से बनाते जा रहे हैं। उन तथाकथित मुस्लिम अहिंसक लोगों की भी वही कुरान है तथा आतंकवादियों की कुरान भी वही है। यही आतंकवादी वर्षों तक सी आई ए से संरक्षण व सहयोग पाते रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिका हित के विरोध में स्वतंत्र हुए समूहों पर पैनी दृष्टि भी अमेरिका का तंत्र रखता है। विश्व में कहीं भी मुस्लिम साम्राज्यवादी विचार के लोगों पर हर तरह से शिकंजा रखना भी अमेरिका की नीति का हिस्सा है। कुल मिलाकर इस्लामिक साम्राज्यवाद का नया संस्करण अमेरिका ने अपनाया हुआ है जो मोहम्मद के मदीना रहते हुए इस्लामी साम्राज्यवाद से भिन्न नहीं है। मोहम्मद की शादियों को तथा अमेरिका के मीडिया तंत्र संबंधों को इसी से परिभाषित किया जा सकता है। व्यवस्था के प्रश्नों पर अनेक प्रसंग अमेरिका के राष्ट्रपतियों के परिवार जनों के भी हैं जहां वे भी चर्चा में आए हैं। भारतीय मीडिया भी सत्ता के साथ गठबंधन थामे वही कर रहा है तथा मुस्लिम, अल्पसंख्यक, साजिश जैसे विषय सतही चर्चा के साथ ऊँचे अजानी शोर की तरह बार बार पुकारे जाते हैं।

के द्वारा:

दो चीजे देखिए उसके बाद समझिए कि कुछ तुच्छ राजनीतिक लोगों की सोच होती कैसी है। ..कुछ दिन पहले की बात है कर्नाटक में विधान सभा चुनाव का जोश चरम पर है, बीएसपी अध्यक्ष पार्टी का प्रसार प्रसार करने हुगली गई थी। इस दौरान चुनाव आयोग के अधिकारियों ने इनकी तलाश ली। इस पर मायावती का बयान था कि मैं दलित की बेटी हूं इसलीए तलाशी ली गई। दूसरी तरफ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज का बयान था कि चुनाव आयोग के इस पहल की मैं स्वागत करती हूं। ये एक अच्छा संदेश है। ठीक उसी तरह अमेरिका में आजम खां की तलाशी ली गई तो उनका लगी की ये मेरा अपमान है। इनके जैसा मौकापर्सत नेता यही सोचते है कि हर जगह हिन्दुस्तान है। जिसे मन में आया गाली दे दे। जो नम में आया बक दो। उनकी सरकार के मंत्री कहते है मेरे हुक्म के बिना पुलिस अधिकारियों की हिम्मत नहीं है जो कुर्सी पर बैठ जाए। दरअसल ये कहते ही नहीं है यहीं इन नेताओं की नीयत भी है। पर दोगला प्रशासन भी तो है। लालच में वो थूक कर चाटता है। पर अमेरिका जैसे देशों में पुलिस प्रशासन और जांच ऐजेंसियों के लिए सब एख सनाम होते है। इसीलिए जब हमारे यहां से कोई जाता है तो उसे लगता है कि ये मेरा अपमान है। पर वास्तव में ये उसका अंहाकार होता है जो वहां सहीं रुप से चकनाचूर हो जाता है।

के द्वारा: ravichand ravichand

अमेरिका का भारत के आम और खास नागरिकों के प्रति इस प्रकार का व्यवहार कोई नया नहीं है । यह सही  है कि विश्व में अनेक स्थानो पर आतंकवाद के जन्म का कारण अमेरिका ही है , और यह भी सही है कि  आतंकवाद के विरुद्ध लडाई में अमेरिका पूरी तरह से ईमानदार भी नहीं है । परन्तु आश्चर्य है , आजम खां  साहब को यह सब बातें तब पता चलीं , जब खुद उन पर आन पडी । ऐसी उग्र प्रतिक्रिया तो उन्हों ने तब भी  नहीं दी थी , जब भारत के पूर्व राष्ट्रपति आदर्णीय अब्दुल कलाम जी का भी इस ही प्रकार अपमान हुआ था । क्या आजम खां साहब अपने को आदर्णीय अब्दुल कलाम जी और देश से भी महान समझ कर अमेरिका  गये थे । यह सब उनकी चुनावी कवायद के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।

के द्वारा: anilkumar anilkumar

के द्वारा:

जो दोषी है सिर्फ उसी को सजा मिलनी चाहिए.परिवार के लोगों को बिलकुल भी सजा नहीं होनी चाहिए.कुछ लोग यह कह रहे हैं की माँ बाप की जिम्मेदारी होती है की वह अपने बच्चों को अच्छा संस्कार दे यह बात सही है लेकिन क्या सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं की वह ऐसी कोई व्यवस्था करे की समाज में आधुनिकता के नाम पर जो गन्दगी फ़ैल रही है उस पर अंकुश लगे.सरकार पोर्न साईट पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाती.मीडिया पर अंकुश क्यों नहीं लगाती की वे ऐसी कोई चीज़ न दिखाएं जिससे युवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ता हो.सरकार फिल्म सेंसर बोर्ड पर प्रतिबन्ध क्यों नही लगाती.कौन नहीं जानता की फिल्मों और टीवी के धारावाहिकों में कितनी गन्दगी फ़ैल गयी है.

के द्वारा:

आज का मुद्दा है बच्चियों से रेप का !एक समय था जब भयंकर अपराधी भी ऐसा क्रूर अपराध करने की सोच भी नहीं सकता था ! आज सबसे अधिक अपराध बच्चियों के साथ होता है न जाने कितने मामले ऐसे है जो प्रकाश में नहीं आते !कही न कही शिक्षा ,संगत और माहोल भी इन सबके लिए दोषी है ! आज नैतिकता मजाक बन गई है खुद को आधुनिक दिखाने के लिए मर्यादा भूल गये हैं ,बच्चों में विकृति आ रही है पर बच्चियों के साथ जो हो रहा है बेहद घृणित है इसके लिए जरूर कठोर सजा का प्रावधान होना चाहिए !यह एक भयंकर और एकतरफा अपराध है परन्तु ऐसे मामले में अगर परिवार रेपिस्ट का बचाव करता है तो ही परिवार को सजा मिलनी चाहिए !कोई भी परिवार अपने बच्चों से मर्यादा और सम्मान की आशा रखता है वो नहीं चाहता की उसका बच्चा ऐसा कुकृत्य करे ऐसे बच्चों के परिवार का उल्लेख भी नहीं होना चाहिए क्यों की इस बदनामी का दंश पीढ़ी दर पीढ़ी झेलना पड़ता है ! समाज में बढ़ता नशा ,अश्लीलता और पोर्न फिल्म की कोई जरुरत नहीं है पर आज ये सब बड़ी आसानी से उपलब्ध है हमारा समाज और सरकार दोनों मिलकर इसे ख़तम करें ताकि एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो ! परिवार को सजा देने से अच्छी सोच नहीं बनेगी शायद अपराधी भी बढ़ेंगे ! लेकिन परिवार को यह जरूर देखना चाहिए की उसके बच्चे की सांगत कैसी है ! एक बड़ी जरूरी बात की अधिकांश ऐसे परिवार गरीबी और अशिक्षा में जी रहे हैं रोटी के लिए जूझ रहे है कानून और नैतिकता वे नहीं समझते सम्मान भूख के नीचे दबा होता है ऐसे लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है ! अपराधी को अवश्य सजा मिले परिवार को नहीं !

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किसी भी व्यक्ति को इन्सान बनाने और हैवान बनाने में परिवार और उसके सामाजिक वातावरण की मुख्य भूमिका होती है.यद्यपि जब एक अपराधी को सजा मिलती है तो उसका पूरा परिवार प्रभावित होता है.परन्तु यदि अपराधी के साथ साथ परिवार या उससे सम्बंधित व्यक्तियों को भी सामाजिक बहिष्कार,दुत्कार का भी प्रावधान रखा जाय, तो स्थिति में सुधार आने की सम्भावना बन सकती है.प्रत्येक परिवार उसके रिश्तेदार उसके मित्र भी अपनी जिम्मेदारी समझ सकेंगे.और उसे अपराध करने से रोकने का हर संभव प्रयास भी करेंगे.यह बात तो उचित है की सजा सिर्फ अपराधी को ही दी जा सकती है परन्तु उसके परिवार और जानकारों को अपनी लापरवाही का खामियाजा तो भुगतना ही चाहिए.

के द्वारा:

नौ महीने गर्भ और फिर गोद में पालनेवाली माँ और शिशु को संरक्षण देनेवाले उसके पिता की यही ख़्वाहिश रहती है कि बड़ा होकर मेरा बच्चा/बच्ची बड़ा आदमी बनेगा/बनेगी और अपना व साथ ही घर-परिवार का नाम रोशन करेगा/करेगी। कोई अभिभावक यह नहीं चाहता कि उसकी सन्तान बलात्कारी या अपराधी बने। सन्तान द्वारा की गयी ग़लती का ठीकरा अभिभावक के सिर पर नहीं फोड़ा जाना चाहिए। यदि ऐसा किया जाता है तो उनको तो दोहरी मार झेलनी पड़ती है- एक तो अपने बच्चे के किये पर ख़ुद शर्मिंदा हैं और दूसरे समाज का बहिष्करण उन्हें जर्जर बना देगा। एक बात और जोड़ना हूँ चाहता कि पहले बच्चे के सामाजीकरण (सोशलाइज़िंग) का कार्य परिवार, विद्यालय आदि के द्वारा किया जाता था। उस समय व्यक्ति मिलनसारिता, सामाजिक वर्जनाएँ आदि सीखता था। ऐसे में उसके पथभ्रष्ट के अवसर अत्यल्प थे। परन्तु, आज यह कार्य परिवार से ज़्यादा मीडिया के विभिन्न माध्यम निभा रहे हैं। वे ‘‘बूद्धू बक्से’’ की खिड़की से दुनिया का नज़ारा लेते हैं। अब वे परिवार की अपेक्षा अपना ज़्यादातर समय मोबाइल और इंटरनेट पर बिताते हैं। मल्टीमीडिया मोबाइलों में जो अश्लीलता परोसी जा रही है वह किसी से छिपी नहीं है। जिस सामग्री के सन्दर्भ में कहा जाता है कि उसे 18 वर्ष पूरा होने के बाद देखने की अनुमति है, उसे बच्चे आज 8 साल की उम्र में ही देख रहे हैं। ऐसे में अन्दाज़ा लगाया जा सकता है अभिभावकों की बेबसी का...।

के द्वारा: anoopkumarmishra anoopkumarmishra

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मेरे विचार से रेपिस्ट के परिवार वालों को अपराधी के जुर्म की सजा नहीं मिलनी चाहिए। और यदि वे उसका सुपोर्ट कर रहे हों तब अलग की बात है। कई बार देखा गया है कि संयुक्त परिवार में कई लोग होने के बावजूद उसमें से एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अपराधी प्रवृत्ति का हो जाता है, घर परिवार वाले समझाते हैं परन्तु उसका कहीं कोई असर नहीं होता है। इसलिए मेरा मानना गलती एक व्यक्ति करता है तो उसकी सजा उसके पूरे परिवार को क्यों मिले। उन बेचारों का क्या दोष है? किसी के मां बाप नहीं चाहते कि उनका बेटा अपराध की दुनिया में जाए, परन्तु इसके बाद भी वह चला जाता है तो उसकी सजा उसके मां बाप या परिवार के अन्य सदस्यों को नहीं मिलनी चाहिए। इसके लिए सिर्फ अपराधी को ही सजा मिलनी चाहिए।

के द्वारा:

1. श्रीमती सुषमा स्वराज हो या आडवाणी या एनडीए का अन्य कोई भी नेता अगर नरेन्द्र मोदी के अतिरिक्त स्वीकार किया जाता है तो एनडीए के अदंरुनी संबंध टूटे या न टूटे परन्तु एनडीए की राष्ट्रीय पटल पर स्वीकार्यता अवश्य घटेगी और सोनिया गांधी पुनः सरकार बनाने में सक्षम हो जायेगी। 2. ‘‘साम्प्रदायिकता’’ के दाग का हव्वा खड़ा करने वालो की पोल खुल चुकी है। साम्प्रदायिकता को गलत ढंग से पेश करके मोदी को मीडिया व तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों ने जो बदनाम किया है उससे उन पर कोई दाग प्रमाणित नहीं होता। आज व पहले भी उससे अधिक घिनौने साम्प्रदायिक दंगे देश में हो चुके है परन्तु क्या कभी मीडिया व छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों ने उन पूर्व जिहादी दंगों को राष्ट्रीय स्तर पर सत्त प्रचारित करके किसी अन्य नेता पर साम्प्रदायिकता का दाग लगाने का साहस दिखाया है। फिर मोदी को ही क्यों कठघरे में खड़ा करना चाहते है। भारत का मुकुट कश्मीर जो आज हिन्दू रहित हो गया है उससे बड़ा साम्प्रदायिक अत्याचार का उदाहरण आपको कहां मिलेगा। आज जब देश की जनता मोदी के रूप में नये नेता का स्वागत करने को तैयार है और उनके नेतृत्व में एक सुदृढ़ राष्ट्र का सपना संजोयें हुए है तो फिर चुनावों में कैसा खामियाजा। 3. राष्ट्र राजनीति में कोई 30 वर्ष से सक्रिय हो या 50 वर्ष से इस योग्यता का राजनीति में कहीं से भी बेहतर उम्मीदवारी का सरोकार नहीं होता अगर ऐसा होता तो आडवाणी जी व मुरली मनोहर जोशी तथा कांग्रेस के कई दिग्गजों का नाम सबसे ऊपर होना चाहिये था। 4. आज जब मोदी को राष्ट्रभक्त नेताओं की कतार में सबसे अग्रणी भूमिका में देखा जा रहा है तो उनकी पार्टी भाजपा में प्राण आ गए है। क्या मोदी के बिना बीजेपी अपना पिछला स्तर भी बचा पायेगी। जिस प्रकार ‘‘इन्दिरा इज इंडिया’’ था आज उसी प्रकार मोदी भारत माता की पुकार है। आडवाणी व सुषमा आदि सभी बीजेपी के नेताओं के मुकाबले मोदी की लोकप्रियता उनसे कई गुणा ज्यादा बढ़ चुकी है। अतः बीजेपी के सामने किसी अन्य को प्रधानमंत्री पद के लिये सोचने का प्रश्न ही नही होना चाहिये।

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नग्नता को परोसने वाली आइटम सोंग्स, माहवारी के समय उपयोग में लाये जाने वाले नैप्किन, कोंडोम , शराब और अंतर्वस्त्र के विज्ञापनों ने अपना चमत्कार दिखाना आरंभ कर द...िया है ! वासनान्ध कामी पुरुषों, पशुओं से भी नीचे गिर गया है उसे अब मात्र अपनी वासना की भूख कैसी पूरी करें यह ध्यान रहने लगा है और उसका शिकार वे बच्चियों को बनाने लगा है ! चारो ओर बलात्कारी निःसंकोच अपने आसुरी कृत्य से भारत माता के आँचल को कलंकित करने लगे हैं ! हमारी यह धर्मद्रोही सरकार और उसकी विनाशकारी नीतियाँ समाज को पतन के मार्ग पर ले जा रही है ! ईश्वर करें इन सबका कुल समेत नाश हो क्योंकि इनके कुल का कोई भी व्यक्ति इन आसुरी अंश के साथ बच गया तो पुनः आसुरी रूपी वृक्ष खड़ा हो जाएगा !

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सजा सबसे पहले नग्नता परोसने वाले विज्ञापन निर्माताओ को देना चाहिए उसके बाद नग्नता परोसने वाले खबरिया चैनेल को फिर शराब बेचने वाली सरकार को उसके बाद मनोज के परिवार को यह सही है की घर ही बच्चे की सबसे पहली पाठशाला होती है और घर में जो जैसा देखेगा वैसा ही करेगा लेकिन २२ वर्षीया मनोज जिसने कभी स्कूल का मुह सही से नहीं देखा जिसका परिवार दैनिक मजदूरी करके अपना भरण पोषण करता रहा उसके सामने पहले पापी पेट का सवाल खड़ा था वो आखिर अपने बच्चे को कैसे बढ़िया संस्कार दे सकता था क्या जागरण ने कभी इस मुद्दे पर विचार किया आज ऐसी घटनाओ के पीछे सबसे बड़ा कारन शराब है लोग शराब और नसे में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे है लेकिन देश में शराब बंदी पर कभी चर्चा नहीं की गई लेकिन एक मनोज के गुनाह की सजा उसके पुरे परिवार को आखिर क्यों यह पूरी तरह घृणित मानसिकता का परिचायक है .

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नहीं ओनली मोदी . वसे भी सुषमा जी ने क्या कर लिया है . इतने सालो से विपक्चे में बठे है .. आज तक क्या रोक पी है सरकार को किसी भी फैसला लेन में .. सरकार का जब मन करे दाम बडाये जाये .. और ये बस बहा पर कुछ नहीं करते . बहस में भी कांग्रेस और उनके साथ के लोग अपने कान बंद कर के सो जाते है .. संसद की मर्यादा के नाम पे . सब अपनी मर्यादा ही भूल गए ... बीजेपी को अपनी छबी सुधारने के लिए इनका वोय्कोत करना चाहिए . में तो समझ नहीं पा रहा के कसे आलू और प्याज के नाम पर सरकार गिरा दे थे इन कांग्रेस वालू ने . और आप के सामने इतने बड़े बड़े घोटाले पे घातले होते जा रहे है . और आप को बस अप फ़ायदा दिख रहा है .. अभे देश को बोल बचन नहीं कर्म करने वाला नेता चैये . जो मोदी जी है .. और बीजेपी वालो को तो खुलकर उनका समर्थन करना चाहिए .. न की उनके नाम पे राजनीती . बंद करो मुह उनका जो उनका विरोध करते है .. अगर बीजेपी ने मोदी को ले कर चुनाव न लड़ा .. तो ये देश तो गया नर्क में .. सुकेश दुबे ... जय श्री राम .

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हा बिलकुल सही है की महिला शारीरिक रूप से कमजोर और आकर्षन के केंद्र भी मने जाते है . और जहाँ तक महिला की बात है तो वो भी कही से भी आकर्षित करने के मामले में चुकती नहीं है.पहला कारन तो ये है DUSRA कारन ये है की JABABI कर्बी के दोरान जो JYADATI होता है USME PURI TARAH से USKE इज्जत JIMMEDAR होता है . जहा तक आज की महिला की बात करे तो वो किसी की इजजजत भी नहीं है फिर भी हुम्ला होता जा रहा है उन पर कारन यही है की वो शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से कमजोर HOTE है . तीसरा पुरुष की MANSHIKTA जो जन्मजात ही होता है . उसे हर किसी में उसे इच्छा पूरा करने की छह जगती है चाहे वो उसकी खुद की माँ बहन क्यूँ न हो . लेकिन भारत जैसे देश में माँ बहन को इज्जत समझते है ISI कारन कोई और तो नहीं लेकिन खुद उस घर के मर्द इनसे परहेज करते है. साउथ अफ्रीका जैसे देश में ये चीज तो काफी हुड तक है . वहां तो घर से सुरु जो जाते है ये कहानी लेकिन वहां इससे इज्जाजत नहीं मानते इसलिए उनको कोई फर्क नहीं परता है. फ़िलहाल मैं तो यही कहूँगा की भारतीये औरत कोई नुमैसे के बजे आपनी ताकत बधन चाहिए TAKI पुरुष से आसानी से लारा जा सके.

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चलो एकबार मान लेते है की “इज्जत की अवधारणा” ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार है तो इज्जत का ठेका महिलाओं के सर से उतार देते हैं । याने उस पर बलात्कार कोइ करे या महिला खूद परपुरुष से संबध बनाये तो इज्जत का मामला नही बनता है । दुसरे अर्थ में रजनिश जैसा कहते थे आदमी के जीवन में सेक्स को नैतिकता से जोडा गया है वो गलत है, सेक्स किसी से भी करो कुछ गलत नही है । फिर परिणाम क्या होगा ? सेक्स ऐसी भूक है जो बढती ही जाती है और "वेराईटी" भी चाहती है । सारे फसाद की जड ये "वेराईटी" ही है । "वेराईटी" की चाह में व्यभिचार बढ जायेगा और उस के कारण हजारों कुटुम्ब तुटेन्गे और नये बनन्गे । कोइ स्थायी कुटुम्ब नही टिक पायेगा जो बच्चों की परवरिश के लिए जरूरी होता है । हमारे पूरखे पागल नही थे । उन्होंने इस "वेराईटी" को कंट्रोल करने के लिए शादी प्रथा बनाई । बीचमें तिसरा ना आये ईसलिए सेक्स को नैतिकता से जोड दिया जीस से कुटुम्ब ना तुटे और सब शान्ति से जी सके । महिला ही घर चलाती है तो वो घर की इज्जत नही होती तो क्या बाहर की महिला आयेगी इज्जत बनने ? 1. जिस इज्जत की दुहाई देकर हम महिलाओं को शालीनता का पाठ पढ़ाते हैं क्या वही इज्जत उनके सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाती है? इज्जत बहुत बडी चीज है, सिर्फ शारीरिक संबंध से मत जोडो । कोइ किसी को थप्पड या जुता मारता है तो भी दोनो दाईड की व्यक्ति की इज्जत चली जाती है । जिनको इज्जर ही प्यारी नही होती है उनको ये बात नही समजमें आयेगी । 2. क्या वाकई महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचारों के लिए जिम्मेदार सिर्फ उनका शारीरिक रूप से कमजोर होना है? जी हां, कोइ पहेलवान की इज्जत लूट के बता दे कोइ । आज कल शैतानो की संस्कृति बढ रही है तो महिलाओं की छोडो कमजोर लडकों की भी इज्जत लूटी जा रही है । 3. चर्चित गालियों में भी सिर्फ महिलाओं को ही निशाना बनाया जाता है, इस विषय में आप क्या कहना चाहेंगे? गालियां तो गालिया होती है, रेन्डमली दी जाती है । मां के साथ बाप को भी नही बक्षते । 4. महिलाओं के साथ यौन अपराध का उद्देश्य उससे संबंधित अन्य लोगों पर प्रहार करना है, तो क्या ऐसा इज्जत की अवधारणा के कारण संभव होता है? फिर्फ हवस । अन्जान महिला पर होते अत्याचार को क्या कहोगे ? किसे क्या बता देना चाहता है अत्याचारी ?

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अपने यौन-उत्पीडन के लिए स्त्री स्वयं ज़िम्मेदार है उसने अपनी देह को उपभोग की वस्तु खुद बनाया है | पूरी दुनिया में अगर आज नारी अपनी काया का खुलेआम प्रदर्शन बंद कर दे तो यौन-उत्पीडन अपनेआप बंद हो जायेंगे | नग्न-प्रदर्शन को देश में आधुनिकता का पैमाना मान लिया गया है जिसका दुष्परिणाम आज सामने है | स्त्री अपनी देह को बिकाऊ व प्रदर्शन की वस्तु न बनाए तो यौन-उत्पीडन खुद-ब-खुद बंद हो जाएगा | विपासा, मल्लिका, राखी. सनी लिओन,वीना मालिक...... आदि तमाम कामुक तारिकाएँ हैं जो परदे पर अपने जिस्म के एक एक अंग दिखाती हैं जिससे युवाओं में यौन-कुंठा पनपती है और विवाह की औसत उम्र २८ होने के कारण उनको यौन सुख की स्थाई व्यवस्था देर से होती है| अब ऐसे में यौन-अपराध लाज़मी हैं.......

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Mughe Ye samajh nahi aa raha hai ki Kyon log Arvind Kejriwal ka support kar rahe hai?? Kejriwaal Tab tak thik tha jab tak usne koi rajneetik Dal nahi banaya tha.. mai Kuchh sawaalo puchhunga jiske jawaab agar arvind ya unki team ka koi bi sadashya de dega to i will support. Ye sab Ek Pre-Planned hai kewal BJP ka nuksaan karne ke liye or Congress ko fir se Jitaane ke liye Why you people are making fool to us. we know that very well " No bady can live one day without water" If he has sugar problem. we know that Arvind has Sugar Prob.. Dont Make Us Fool........ ૧. जब केजरीवाल ने माँ भारती का चित्र आन...्दोलन से ये कहकर हटाया था की माँ भारती का चित्र सांप्रदायिक हैं ..इससे हिंसा भड़केगी तब "AAP" कहाँ थे ? ૨. जब केजरीवाल ने ईद की बधाई दी व दिवाली को इग्नोर कर दिया तब " AAP" कहाँ थे ? ૩. जब केजरीवाल जी का दोस्त प्रशांत भूषण ने कहा की कश्मीर पकिस्तान को दे देना चहिये ताकि समस्या ख़तम हो सके तब " AAP" कहा थे ? ૪. जब केजरीवाल टीम के कुमार विश्वास भरी सभा में भगवान् शिव जी का अपमान करते नज़र आ रहे थे तब" AAP" कहाँ थे ? ૫. जब केजरीवाल टीम की शालिया इजमी ने हिन्दुओ के भाग्यलक्ष्मी मंदिर को तोड़ने में ओवेशी का समर्थन किया था तब"AAP" कहाँ थे / ૬. जब केजरीवाल ने आरएसएस को आतंकवादी संगठन कहा था तब "AAP"कहाँ थे ? ૭. जब केजरीवाल ने मुस्लिमो को 11 % आरक्षण का समर्थन किया था तब "AAP" कहाँ थे ? ૮. जब केजरीवाल बुखारी को देशभक्तव बाबा रामदेव को मुर्ख कह रहा तब "AAP" कहाँ थे ? ૯. जब केजरीवाल के सहयोगी संजय सिंह ने मोदी जी को हत्यारा व कातिल कहा तब "AAP" कहाँ थे ? ૧૦. जब भूषण परिवार पर भ्रष्ट्राचार के आरोप लगे और केजरीवाल ने जांच तक नहीं कराई"AAP" तब आप कहाँ थे ? ૧૧. जब केजरीवाल ने मोदी जी पर अनैतिक सम्पति रखने का आरोप लगाया और कोर्ट ने इसे गलत करार दिया तब "AAP" कहाँ थे ? जय हिन्द —See More

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Bhartiye rajniti me Kejriwal jaise logo ko sakht jaroorat hai.. Sare desh aage ki or jaa rahe hain.. USA humesha apne desh ke bare me sochta hai.. wahan ke politicians country ko pahle rakhte hain party and politics ko bad me isliye itne saal beet gaye aur na jane kitne saal aur bhi beet jayenge bt vo sari duniya ko lead kar rahe hain aur karte rahenge.. China ke bare me bhi aisa hi kaha ja sakta hai.. jis bhi desh ke leader aur log apne desh ki izzat aur samman ko pahle rakhta hai wahi sahi mayno me super power ho sakta hai.. 1.25 crore ki aabadi wale desh hain hum aur chhoti moti bato ke liye bhi hum in countries ki or dekhte hain.. itne sare population hone ka mutlab hai humare pas sabse jyada engineers sabse jyada doctors sabse jyada scientists ho sakte hain agar unhe sahi aur sasti padhayi mile.. fir hum kisi helicopter ke liye Italy nahi jayenge.. army ke kapdo ke liye, boots ke liye videshiyon ko paisa nahi denge.. koi videshi saman hum kyun kharidenge jab humare yahan khud hi inka production hoga??/ Bt aisa nahi hoga kyuki humare yahan leaders kewal apni aur apni party ka sochte hain.. Manmohan singh ji, Narendra modi ji ya koi aur pahle apni kursi dekhte hain.. UPA ki jab se 2nd term govt bani hai tab se Sonia ji is sochh me padi hain ki kursi kaise bacha ke rakhha jaye.. koi bhi govt tab tak koi kaam thik dhang se nahi kar sakti jabtak vo surakshit nahi hogi.. aur yahan leaders uff mat puchhiye.. ek ek banda kitne crore dakar jata hai aur aam janta bhookho mar rahi hai.. ye aadmi hain ya janwar?? Main noida sec 63 office roj jata hu wahan ek canal hai us canal ke pas kuchh log temporary cnopy laga ke rah rahe hain.. subah subah sare log us gande nale me snan karte hain .. usi gande pani se khana banate hain jisme kafi sare log peshab karte hain.. kitne sharm ki baat hai ye.. ek aisa country jo duniya ka ek bahut bada economy power hai uska ek leader arbo rupay dakar jata hai.. uske kutte bhi alishan fawware me nahata hai aur usi ke desh ka ek nagrik... chhi.. Hume sharm aati hai ye kahte huye ki hum us bharat me jee rahe hain jahan ke logon me Raja Harishchandra, Dashrath, Bhishma aur Maharana Pratap jaise log huye hain... Agar aapme jara bhi sharm shesh bacha hai to aap unki madad karen jo logo ke liye lad rahe hain... Agar Kejriwal kal beimaan bhi ho jaata hai to itna tay hai in baaki netaon se achha jaroor rahega.. aur waise bhi vo beimaan nahi ho sakta agar vo chaahe to bhi.. Agar vishwas nahi hai to aap apna fayda, jatiwad aur lalach chhor kar apne dil se poochhiye.. Thanks

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अरविन्द केजरीवाल की राजनीती पूरी तरह फेल हो गई पिछले १२ दिनों से बिजली पानी के मुद्दे पर अनसन पर बैठे अरविन्द ने कई सपने संजोये थे लेकिन जितना समर्थन उन्हें मिलना चाहिए था वो नहीं मिला इसके पीछे के करनो में जाये तो अरविन्द ने क्या क्या गुल खिलाये अपनी राजनीती चमकाने के लिए समझा जा सकता है कभी अन्ना के खिलाफ बोला तो कभी किरण बेदी के खिलाफ और अपनी मह्त्वकंषा के चलते वो सब से दूर हो गए अन्ना के आन्दोलन को अभी अधिक दिन नहीं हुए थे लेकिन उससे पहले ही केजरीवाल ने अपना स्वार्थ जग जाहिर कर दिया जिसका नतीजा आज देखने को मिल रहा है देश का युवा वर्ग आज बहुत बुद्धिमान हो गया है और अब उसे कोई ठग नहीं सकता .अन्ना के आन्दोलन को भले ही सफलता नहीं मिली हो लेकिन अन्ना ने आम आदमी के दिल में अपनी अलग जगह बना ली है जो कभी कह्तं नहीं होगी .जहा तक राजनीती करने के अधिअक्रो की बात है तो यह सही है की सबको अधिकार है लेकिन आप पहले जनता को सब्ज बाग़ दिखाते है और तुरंत ही अपना स्वार्थ जगजाहिर कर देते है तो जनता जो की पिछले ६५ वर्षो से भुगत रही है वो आप पर कैसे विस्वाश करेगी .केजरीवाल के स्वार्थ की पूर्ति अभी नहीं हो सकती उनके लिए दिल्ली अभी बहुत दूर है

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अन्ना और अरविन्द केजरीवाल के अनशन में एक बुनियादी फर्क है. भारतीयों के लिए अन्ना उनके जैसे एक आम नागरिक थे और उनका अनशन निस्वार्थ भाव से आम जन के हित के लिए कानून बनाने की मांग को लेकर था. वही अरविन्द अब एक राजनेता है और बिजली की बढ़ी दरो को लेकर किया गया उनका अनशन लोगो के गले नहीं उतर रहा है. लोगो को लगता है की वे आने वाले दिल्ली विधान सभा चुनावों में उनसे अपने आंदोलनों केआधार पर वोट मांग सकते है. मीडिया में भी उनके अनशन को मामूली स्थान ही मिल सका. राजनेताओ के प्रति देश के लोगो में तनिक भी सम्मान नहीं रह गया है. शायद यही वजह है की अरविन्द केजरीवाल के अनशन को अन्ना के मुकाबले मामूली समर्थन मिल सका. अरविन्द को अपने राजनितिक पार्टी बनाने के निर्णय पर पुनर विचार करने की आवश्यकता है. 

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अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल के अनशन में बुनियादी फर्क है. अन्ना का अनशन निस्वार्थ भाव से आम जन के हित में एक कानून पास करने के लिए किया गया था. लोगों के लिए अन्ना एक आम आदमी थे. जबकि अरविन्द केजरीवाल का अनशन एक राजनितिक पार्टी के मुखिया द्वारा किया जा रहा अनशन है. दिल्ली के नागरिकों को पता है की आगामी विधान सभा चुनावों में केजरीवाल की पार्टी उनसे इस आधार पर वोट मांग सकती है. इसलिए अरविन्द के अनशन को अपेक्षित जन समर्थन नहीं मिल सका. अरविन्द के अनशन को पर्याप्त समर्थन न मिलने का एक कारन यह भी है की भारत के नागरिकों के मन में राजनेताओं के प्रति बिलकुल भी सम्मान भाव नहीं रह गया है और अरविन्द अब एक राजनेता है.

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मित्रों कुछ दिनों पहले एक प्रमुख समाचार पत्र में महिला अपराधों के ऊपर एक सर्वे करवाया था। इस सर्वे में दो सवाल पूछे गये थे। 1. पहला सवाल था- क्या सख्त कानूनों से महिला अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकता है। इस सवाल पर 59 फीसदी लोगों ने हाँ में जवाब दिया जबकि 41 फीसदी लोगों ने ना में जवाब दिया। 2. दूसरा जवाब था- क्या सामाजिक संस्कार महिला अपराधों के खिलाफ कानून से ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं इस सवाल पर 95 फीसदी लोगों का जवाब हाँ में था जबकि 5 फीसदी लोगों का जवाब ना में था। इसका मतलब साफ है कि सामाजिक संस्कारों से महिलाओं पर होने वाले अपराध कम किये जा सकते है । महिलाओं पर ही क्या अपितु हर तरह के अपराधों में कमी लायी जा सकती है। परन्तु चिन्ता की बात ये है कि कोई संस्कार अपनाने को तैयार ही नहीं अपितु संस्कारों को रुढ़िवादिता एवं पिछड़ी मानसिकता से जोड़कर इसका बहिष्कार ही किया जा रहा है ऐसा प्रतीत हो रहा है।

के द्वारा: prashant choubey prashant choubey